Tuesday, July 11, 2017

बदलते युग की आहट!

-वीर विनोद छाबड़ा
कहने को ब्राह्मण हैं। पंडित जी कहलाते हैं। उन्हें भीतर से जानने वाले फ़र्ज़ी पंडा बोलते हैं। बगल में गैंडा खड़ा कर दो तो पहचानना मुश्किल है कि इसमें आदमी कौन है।
सुबह उठते नहीं, उठाये जाते हैं। बिना कुल्ला किये चाय सुड़की। अखबार पर नज़र दौड़ाई। सरकार और प्रशासन को दो-चार चुनींदा गालियां दीं। जनेऊ कान पर चढ़ाया। शौच आदि से निपटे। दो लोटा पानी सर पर डाला। भगवान की मूर्ती के सामने खड़े होकर करताल बजाई। शीशे के सामने खड़े हो गए। टीका लगाया। बगल में पोथा-पत्री लपेटा और चल दिए यजमान के घर। आज पूजा जो है।
रास्ते में एक असिस्टेंट भी ले लिया लिया। यह ज़रूरी है। असिस्टेंट है तो किसी निचली जाति का। लेकिन पांडित्य में माहिर है। पूजा भी वही करेगा। पंडित जी को तो कुछ आता नहीं। एक बार ग़लत श्लोक पढ़ते हुए पकड़े गए। दूसरी बार स्वास्तिक का चिन्ह उल्टा बनाते दबोचे गये। एक बार शादी में तेरवीं वाले श्लोक पढ़ गए। तब से असिस्टेंट रख लिए। दक्षिणा में जो मिलादोनों में फिफ्टी-फिफ्टी।
कभी-कभी असिस्टेंट पसड़ गया। सारा काम-धाम तो मैंने किये। आपने तो सिर्फ़ शंख बजाया। बड़ी मुश्किल से सत्तर-तीस परसेंट पर मामला पटा।

एक और पक्ष है। वो गली गली सब्जी बेचता है। सब उसे पंडित कहते हैं। पुताई का काम भी जानता है। पार्ट टाईम में करता है। घर का भारी भरकम सामान इधर से उठा कर उधर रखना है। बदले में दस-पंद्रह मिल जाते हैं। संतोष कर लेता है। दिवाली के आस पास फुल्ल टाईम पुताई और पार्ट टाईम सब्जी बेचना। तिवारी है वो। हरदोई का रहने वाला। छह बच्चे। सबको पढ़ाना और खिलाना है। ब्राह्मण हैं तो क्या? पहले इंसान हैं। कोई घर बैठे-बैठे तो देता नहीं। मेहनत मज़दूरी से पेट भरना ज्यादा मुनासिब है। झूठ-मूठ पोथा-पत्री लेकर मंत्र पढ़ना पाप है। ईश्वर को मुंह दिखाना है। और फिर दुनिया भी चालाक हो गयी है। ब्राह्मण हो तो क्या हुआ? पहले बताओ कि कुछ मंत्र-शंतर वगैरह जानते भी हो कि नहीं।
मेरे ख्याल से दुनिया चालक होने के साथ साथ बदल भी रही है। कोई जन्म से भले ही ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हो लेकिन कर्म सबके बदल गए हैं।

मुझे उस युग की वापसी की आहट सुनाई दे रही है जब आदमी की पहचान उसके जन्म और कुल से नहीं बल्कि उसके गुण और कर्म से होती थी। 
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11 July 2017
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