Wednesday, July 12, 2017

काश आईना न होता!

- वीर विनोद छाबड़ा
किसी भी समय मुझे तैयार होने में कुल जमा पांच-सात मिनट लगते हैं। वो भी चेंज करने में, सिर्फ पार्टी में जाने के लिए। कभी-कभी वो भी नहीं। जूता पहना और चल दिए।
मुझे लगता है ज्यादा वक़्त आईना देख कर कंघी करने में जाया होता है। मैं वही नहीं करता। सर पर गिने चुने तो बाल हैं। क्रीम पाउडर कतई पसंद नहीं। चुल्लू भर पानी से मुंह धो लिया। लेकिन वो भी कभी-कभी। रुमाल ही काफी है। शेव करते हुए आईने में चेहरा देखना तो एक मजबूरी है। अन्यथा एक मुद्दत हो गयी है कायदे से आइना देखे।
लेकिन जवानी के दिनों में मैंने यह दावा कभी नहीं किया । बार बार ज़ुल्फ़ें संवारी। ख्याल रखा कि जेब में कंघी है। कई एंगल से खुद को निहारना तो खूब चलता रहा। लेकिन अपनी कसम कभी जेब में आइना नहीं रखा। जबकि कई लड़के उस ज़माने में छोटा सा आइना हिप पॉकेट में रखते थे।
और लड़कियां! पत्नी! पूछो मत। इवनिंग शो देखना हो तो मैटनी बोलो। तब जाकर जैसे-तैसे टाइम पर निकल पाएंगी।
कोई भी ज़माना रहा हो, ढेर सारा मेकअप का सामान मय आईने के उनके पर्स में धरा मिलता था और आज भी ऐसा ही है। इसमें आईना तो निहायत ज़रूरी आईटम है।
कई बार मैं खुद से मुख़ातिब होता हूं - यह आईना न होता तो दुनिया क्या कर रही होती? हो सकता है थोबड़ा देखने के लिए सरकार ने या किसी निजी संस्था ने जगह-जगह एटीएम की भांति छोटे-छोटे तालाब बनवाये होते। प्रति पांच रूपए में दस मिनट तक खुद को निहारें। क्रीम पॉवडर थोपें। कहीं-कहीं रिचार्ज कार्ड सिस्टम भी होता। या फिर मंथली किराये पर अनलिमिटेड का प्राविधान होता।
खैर यह तो एक खामख्वाह का यूटोपिया है।
असल बात यह है कि यह कंघी, लिपिस्टिक पॉवडर शीशा आदि आज से पचास साल पहले भी मैं पर्स में देखता था और आज भी। तैयार होने में तब भी पुरुषो के मुकाबले महिलाओं को ज्यादा टाइम लगता था। सेम तो सेम। शिकायत नहीं कर सकता कि हमारे ज़माने में यह सब नहीं होता था।
मुझे तो लगता है कि इंसान ने सभ्य होते ही सबसे पहले आईना ही बनाया होगा।

मेरे फैमली डॉक्टर साहब का कथन है कि घर में दो आईटम नहीं होने चाहिए। एक, वज़न दिखाने वाली मशीन और दो, आईना। ऐसा हो तो इंसान का बहुत वक़्त बच जाए। 
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13 July 2017
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