Tuesday, June 27, 2017

जूता चोर चोरनी और इक हसीं ख्वाब

- वीर विनोद छाबड़ा
कल दोपहर खाना खाने के बाद जो नींद आयी तो शाम को ही टूटी। टूटी नहीं बल्कि तोड़ी गयी। मेमसाब 'चाय चाय' करती हुईं आयीं और एक झटके में नींद तहस-नहस कर गयीं। मैं उस समय कोई हसीन ख्वाब देख रहा था। यूं तो पचहत्तर फ़ीसदी ख्वाब मेमोरी से गायब हो जाते हैं और बचे हुए दो घंटे बाद वाश आउट। लेकिन अपवाद स्वरूप कुछ मष्तिष्क पटल पर टिके रह जाते हैं। कल वाला ख़्वाब भी कुछ ऐसा ही था।
हुआ यों कि मंदिर से हमारा नया नया स्पोर्ट्स शू चोरी हो गया था। हे भगवान, तेरे दर पर ये कैसा अंधरे? भक्त भी चोर होने लगे। मैंने पुलिस थाने में रपट लिखाई। अभी मैं थाने से बाहर निकला ही था कि पुलिस ने चोर को पकड़ लिया। मुझे हैरानी हुई कि लाखों-करोड़ों की चोरी का मामला तो पुलिस हल कर नहीं पाती और हमारे साढ़े छह सौ वाले जूता चोर को कैसे पुलिस ने कैसे आधे घंटे में धर दबोचा? इतना इंटरेस्ट लेने की वजह भी समझ में नहीं आयी। हैरानी तो और भी बढ़ी जब देखा कि वो जूता चोर चोरनी है।

दरोगा जी बड़े जोश में जोर जोर से ज़मीन पर डंडा और पैर फटका रहे थे - लड़की होकर जूते पहनती है और वो चुरा कर? जूता तो पकड़ में आ गया, अब जल्दी से यह भी बता कि कल कप्तान साहब की मेमसाब के जो सैंडिल चुराये थे वो कहां हैं?
अब मेरी समझ में आया कि जूता चोरी के मामले में दरोगा जी का बढ़-चढ़ कर के इंटरेस्ट लेने का कारण क्या है। वस्तुतः तलाश तो किसी सैंडिल की थी और हाथ में आया हमारा जूता।
वो लड़की बार बार कह रही थी - मैंने जूता चोरी नहीं किया है, यह जूते मेरे ही हैं। आजकल लेडीज़ भी जेंट्स जैसे जूते पहनती हैं। चाहो तो मेरे पापा से पूछ लो। मेरा मोबाईल वापस करो। मैं उनसे बात करा देते हैं। या आप खुद बात कर लें। उनका मोबाईल नंबर है.....।

Sunday, June 25, 2017

फ्लाई ओवर

- वीर विनोद छाबड़ा
मित्रों लखनऊ के गोमती नगर इलाके के जिस फ्लाईओवर पर मैं खड़ा हूं इसके नीचे सिंगल रेलवे लाइन है जो लखनऊ से वाया बाराबंकी गोंडा और गोरखपुर जाती है।
मुझे 1984 के वो दिन याद आ रहे हैं जब यहाँ सिर्फ़ रेलवे लाइन थी। क्रासिंग भी नहीं थी। दो लेन की सड़क थी। मैं अपनी मोपेड रेलवे लाइन पर से किसी तरह फंदा कर इंदिरा नगर से गोमती बैराज और डालीबाग़ होते हुए अशोक मार्ग स्थिति अपने ऑफिस आया जाया करता था।
गोमती नगर का इलाका आबाद हो गया, जो आज वीआईपी हो गया है। जल्दी ही रेलवे क्रासिंग बन गयी। यहां पर सड़क संकरी हो गयी। दो लेन से सिंगल लेन हो गयी। भीड़ होने लगी। अक्सर जाम लगने लगा। फाटक बंद होने का मतलब होता था कम से कम आधे घंटे का इंतज़ार। गर्मी और उमस के दिनों में हालत ख़राब हो जाती थी। मुझे याद है 2001 तक यही हालत रही।

यहां कार वाले स्क्रेच से बचने के लिए देर तक खड़े भीड़ छंटने का इंतज़ार करते मिलते। फिर फ्लाईओवर बन गया। एक साल से भी कम रिकॉर्ड समय में। आज तो इससे जुड़े दो फ्लाई ओवर बन गए हैं। शुरुआत में इरादा इसे साईकिल और स्कूटर के लिए बनाना था। लेकिन सरकार बदल गयी। इसका डिज़ाइन बदल गया इसे चौड़ा कर दिया गया। आज इन पर हैवी ट्रैफिक दौड़ता है। वीवीआईपी मूवमेंट के मौकों को छोड़ कर ट्रैफिक जाम का नामो-निशान नहीं रहा। अभी कुछ महीने पहले फैज़ाबाद रोड हाई कोर्ट की नई बिल्डिंग बन जाने के परिणाम स्वरूप ट्रैफिक बढ़ गया है। एक और फ्लाई ओवर बनाना पड़ बन गया है। लोहिया चौराहे से आने वाले वाहन सीधा हाई कोर्ट के क़रीब उतरते हैं। 

Saturday, June 24, 2017

तजुर्बे को सम्मान दो

- वीर विनोद छाबड़ा
अपने मुल्क में पढ़े-लिखे लोगों की कमी नहीं है। लेकिन हर आईएएस, आईपीएस, डॉक्टर, इंजीनियर, जज, शिक्षक, मास्टर या डिग्रीधारी विद्वान नहीं होता। अगर ऐसा होता तो हम आज जहां हैं, वहां बहुत पहले पहुंच गए होते। और आज की तारीख़ में अमेरिका, जापान, रूस और और चीन जैसे विकसित मुल्कों से कहीं आगे निकल गए होते। मुल्क में सकून होता। सोने की चिड़ियाँ चहचहा रही होतीं।
यों कई बार ऐसा भी होता है कि बिना डिग्री वाले डिग्री वालों से ज्यादा होशियार होते हैं।
एक बार हमने देखा कि एक सरकारी अस्पताल में बुढऊ कंपाउंडर अपने बॉस डॉक्टर को डांट रहा था - इतने छोटे बच्चे को इतनी स्ट्रांग एंटीबॉयटिक टेबलेट दी जाती है भला? पहले दवा टैस्ट कराइए, तब आगे बढ़िए। एमडी क्या कर लिए हैं कि जैसे तोप हो गए।
राज मिस्त्रियों को ही लीजिये। कई राजमिस्त्री बड़े बड़े आर्टिटेक्ट और सिविल इंजीनियर से भी ज्यादा जानते हैं। एक बड़े आदमी का घर बन रहा था। छोटी सी जगह से जीना निकालना था। आर्किटेक्ट की समझ में नहीं आ रहा था। सिविल इंजीनियर उनके दोस्त थे। वो भी फेल हो गए। उन दिनों हमारा मकान बन रहा था। हमारे मिस्त्री को बुला ले गये। उसने जुगाड़ निकाल लिया। आमतौर पर आम आदमी मकान-दुकान बनाते वक़्त राज-मिस्त्री के तजुर्बे का ही सहारा लेता है।
हम बिजली विभाग से रिटायर हुए हैं। संविदा पर काम करने वाले बिजली मज़दूर और मकैनिक अपने दम पर खुद ही फूंका हुआ ट्रांसफार्मर बदल लेते हैं। ऐसे ही लोगों के तजुर्बे के दम पर ही टिका है यह विभाग। डिप्लोमा या डिग्रीधारक इंजीनियर तो अंत में मुआयाना करने आते हैं।

कृपालू भगवान

- वीर विनोद छाबड़ा
भगवान बड़े दयालु एवं कृपालु हैं। वो किसी को निराश नहीं करते।

एक बंदे ने दो बरस तक खड़े होकर तप किया। लेकिन भगवान प्रकट नहीं हुए। लेकिन बंदे ने हिम्मत नहीं हारी। दोबारा तप किया, लेकिन इस बार एक टांग पर खड़े एक बरस तक कठोर तप किया।
भगवान प्रसन्न हुए। परंतु उनके पास बंदे को विज़िट करने का टाइम नहीं था। अतः उन्होंने दूत भेज कर बंदे को सशरीर बुला स्वर्ग लिया।
भगवान ने बंदे को गले लगाया। मौसमी और संतरे जूस पिलाया। फिर पूछा - बोल, क्या चाहता है भक्त?
भगवान की अपने पर कृपा देख कर गलगलान होते हुए बंदे ने फरमाइश की - बाबा, अब अंधे को क्या चाहिए? बस दो आंखें!  मुझे आपके दर्शन हो गए यही बहुत है।
भगवान ने कहा - वो तो ठीक है। लेकिन मैं जानता हूं, तूने बेवज़ह तप नहीं किया। बेझिझक मांग। मैं तुम्हें चार वरदान देता हूं।
बंदा बोला - तो ठीक है बाबा, मुझे एक बढ़िया नौकरी चाहिए।
भगवान ने कहा - समझो मिल गई जॉब। अब आगे।
बंदा बोला - मेरे पास एक बैग हो, जो हमेशा नोटों से भरा रहे।
भगवान ने कहा - चलो यह भी हो जाएगा। अब तीसरा वरदान मांग।
बंदे ने कहा - बाबा, मेरे पास एक बड़ी सी गाडी हो।
भगवान ने कहा - ठीक है। अब चौथा और आख़िरी।
बंदे ने थोड़ा शर्माते हुए कहा - और उसमें ढेर लड़कियां हों।
भगवान शरारत वाले अंदाज़ में मुस्कुराये  - भक्त, जा तेरा कल्याण हो।

Friday, June 23, 2017

इतिश्री मॉर्निंग वॉक

- वीर विनोद छाबड़ा
पति-पत्नी के मध्य सुबह-सुबह की बहस। एक पत्रिका में पढ़ी। पसंद आई। रोचक बनाने के लिए थोड़ा तड़का लगा कर पेश कर रहा हूं।
पति तैयार हो कर मॉर्निंग वॉक पर निकलने को था।  
पत्नी ने आदतन पूछा - जनाब, सुबह- सुबह कहां चल दिए?
पति सहज भाव से बोला - वही डेली का रूटीन, मॉर्निंग वॉक। तुम भी चलो।
पत्नी तनिक इठलाई - मैं क्यों चलूं? मुझे कोई बीमारी तो है नहीं। न शुगर और न ब्लड प्रेशर। देखने में भी ठीक-ठाक हूं, दुबली-पतली। तुम्हारी भाभी की तरह भैंस तो दिखती नहीं हूं।
पति ने बात पर  फुल स्टॉप लगाया - ठीक है बाबा। मत जाओ। मैंने तो ऐसे ही सुझाव दिया था। माइंड फ्रेश हो जाता है। सुबह की वॉक से।
पत्नी ने हाथ नचाया - तुम्हारे कहने का मतलब मैं खूब समझती हूं। मैं कोई गुस्से वाली हूं कि माइंड फ्रेश की ज़रूरत पड़े। 
पति परेशान हो कर बोला - ओफ्फो। अब बस भी करो। कहा न, मत जाओ। पड़ी रहो घर में।
पत्नी ने ऐंठ कर कहा - तुम क्या समझते हो मैं आलसी हूं।
पति ने आत्मसमर्पण किया - अरे भई, मैंने ऐसा तो नहीं कहा। प्लीज़ झगड़ा मत करो।
पत्नी गुस्से से बोली - मैं झगड़ा कर रही हूं? झगड़ालू हूं?
पति ने हाथ जोड़े - बाबा, मैंने ऐसा कब कहा?
पत्नी ने साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा - अच्छा। तो तुम्हारा मतलब है कि मैं झूठी हूं।
पति झुंझलाते हुए बोला - ठीक है, तुम जीती, मैं हारा। मुझे जाने दो।

Wednesday, June 21, 2017

अपने लिए जिए, तो क्या जिए?

- वीर विनोद छाबड़ा 
कुछ महीने पहले की बात है। हमारे एक पुराने सहकर्मी दिवंगत हो गए। कारण अत्यधिक दारू से पूर्णतया ख़राब हो गया लीवर।
वो खुद तो चले गए लेकिन पीछे छोड़ गए कई यक्ष प्रश्न। उनमें प्रमुख था कि अनुकंपा के आधार पर नौकरी किसे दी जाये? दरअसल, उनकी दो पत्नियां थीं।
पहली पत्नी वैधानिक थी। परंतु उसके साथ वो रहते नहीं थे। वो गांव में रहती थी। उससे उनके तीन बच्चे भी थे।
बताते हैं कि दूसरी पत्नी से उन्होंने आर्य समाज मंदिर में शादी की थी। अंत तक उसी के साथ रहे भी। लेकिन समाज और कानून की मोहर नहीं लगी। किसी ने अटेंड नहीं की। उससे भी उनके दो बच्चे भी हुए। अब इन बच्चों की क्या गलती?
पहली पत्नी ने उनकी इस तथाकथित शादी के विरुद्ध मुकद्दमा भी चल रहा है।
क्लेम किसे दिए जायें? दावा दोनों और से पेश किया गया है।
कुछ का कथन है कि दूसरा विवाह उन्होंने पहली पत्नी की लिखित सहमति के आधार पर किया था। ऐसा डॉक्यूमेंट भी मौजूद है। परंतु पहली पत्नी का कथन है कि यह सहमति फर्जी है। धोखे से हस्ताक्षर कराये गए थे। 

कल तक नौकरानी थी

- वीर विनोद छाबड़ा
आमतौर पर जिसकी नई-नई शादी हुई होती है वो बंदा दो-तीन हफ्ते तक दफ़्तर देर से पहुंचता है। और जल्दी चला भी जाता है। दफ्तर के आस पास रहने वाले तो लंच पर घर भी चले जाते हैं और कम से कम दो घंटे बाद लौटते हैं। भी लंबा लेते हैं। बॉस लोग कुछ नहीं बोलते। सब चलता है। आख़िर वो भी कभी सी मुकाम से गुज़र चुके होते हैं।
और ऐसा युगों युगों से चला आ रहा है।
मगर अति हमेशा ख़राब होती है। टोकना पड़ता है। नहीं माने तो लिख कर देना पड़ता है। तब भी नहीं माने तो फिर.समझ जाइए बॉस के हाथ में बहुत ताकत होती है।
ऐसा हरेक की ज़िंदगी में कमोबेश घटित हुआ है।
एक नौजवान के साथ भी ऐसा ही हुआ। बात इतनी बढ़ी कि जवाब-तलब हो गया।
बॉस ने नौजवान को बुलाया और फायर किया - जबसे तुम्हारी शादी हुई है तुम लेट आ रहे हो। एक महीना, दो महीना और अब तीन महीने हो गए। कितनी ही बार समझाया गया। लिख कर दिया। तुम्हारी वेतन कटौती तक हो गयी। लेकिन तुम सुधरने का नाम ही नहीं ले रहे। नौकरी नहीं करनी है क्या? चूँकि तुम बहुत मेहनती सहायक हो इसलिए इससे पहले मैं वज़ह जानना चाहता हूं और उसके बाद फैसला करूंगा कि तुम्हें रखूं या निकाल दूं।