Monday, May 22, 2017

भूतनी के छाबड़ा जी....

- वीर विनोद छाबड़ा
ज्ञानी-ध्यानी कह गए हैं पाप से घृणा करो पापी से नहीं।
लेकिन इसके बावजूद कुछ लोग कभी दुरुस्त नहीं होते। क्यूंकि उनका स्वाभाव ही डंक मारना होता है।
कोई नौ दस साल पहले की बात है। तब हम इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड की सेवा में हुआ करते थे।
चेयरमैन साब का फरमान हुआ कि फलां फ़ाइल फौरन से पेश्तर पेश की जाये।
अधीनस्थ ऑफ़िसर से मैंने उस खास फाइल को पर्सनली सेक्शन से जल्दी करवा कर लाने को कहा।
जब किसी पत्रावली को आला ऑफ़िसर तलब करता है तो उसे सिर्फ मातहतों के भरोसे छोड़ना ठीक नहीं होता। यह सोच कर मैं भी पीछे-पीछे चल दिया कि वहीँ सेक्शन में बैठ कर निपटा दूंगा फाइल। इससे जल्दी का उद्देश्य भी पूरा होगा। और फिर मैं खुद चेयरमैन को फाइल पेश दूंगा।
जब मैं सेक्शन पहुंचा तो देखा दरवाज़ा खोल कर वो अधीनस्थ ऑफ़िसर खड़े थे और मेरे दिए हुए हुक्म को कुछ इस अदाज़ में पास कर रहे थे - वो फ़लानी फाइल जल्दी निकालो। वो भूतिनी के छाबड़ा जी मांग रहे हैं।

उन्होंने पत्र को ही लेख बना दिया

- वीर विनोद छाबड़ा
पत्र लेखन से संबंधित मुझे एक किस्सा याद आ रहा है ।
बात १९८८ की है। क्रिकेट के 'डॉन' सर डॉन ब्रैडमैन २७ अगस्त को ८८ साल के होने जा रहे थे। मैं डॉन का ज़बरदस्त फैन था। उन पर कई लेख लिख चुका था। लेकिन इस बार इस कुछ अलग हट लिखना चाहता था। मैंने विषय चुना उनकी आख़िरी पारी का। इसमें वो शून्य पर आऊट हुए थे। अगर चार रन बना लेते तो उनका टेस्ट एवरेज सौ हो जाता।
लेकिन क्रिकेट तो महान अनिश्चिताओं का खेल है। होता वही है जो नियति में बदा होता है।
इरादा किसी स्थानीय अख़बार में देने का था। लेकिन फिर सोचा, अभी समय है, बाहर भेज दूं, किसी बड़ी खेल पत्रिका को।
उन दिनों इंदौर से एक प्रकाशित होती थी - 'खेल हलचल', खेल के विषय में एकमात्र हिंदी साप्ताहिक। मुझे बहुत पसंद थी। यह 'नई दुनिया' समाचार समूह का प्रकाशन था। मैंने उन्हें लेख भेज दिया।
चूंकि उन्हें पहली बार रचना भेज रहा था, इसलिए साथ में एक पत्र नत्थी किया। पत्र में प्रथमता अपना परिचय दिया। तदुपरांत लेख की महत्वत्ता के संबंध में विस्तार से लिख दिया। मुझे लगा कि पत्र कुछ ज्यादा ही लंबा हो गया है। फिर सोचा, जाने दो। संपादक जी को तो लेख से मतलब है। मर्ज़ी होगी तो पत्र पढ़ेंगे अन्यथा रद्दी की टोकरी तो हर संपादक के बगल में रखी ही रहती है।
बहरहाल, कुछ दिनों बाद लेख प्रकाशित हो गया। लेकिन मुझे सदमा लगा। लेख नहीं छपा था, बल्कि मेरा पत्र लेख छपा हुआ था, लेख के रूप में।
मैंने फ़ौरन संपादक जी को नाराज़गी भरा पत्र लिखा। कोई जवाब नहीं आया। दो-तीन बार स्मरण भी कराया। तब भी कोई असर नहीं पड़ा।
झल्ला कर मैंने अपने पत्रकार मित्र विजय वीर सहाय से बात की। वो 'स्वतंत्र भारत' में फीचर देख रहे थे।
उन्होंने कहा - इसमें परेशान होने वाली क्या बात है? अरे, उनको लगा होगा कि पत्र में तुमने ब्रैडमैन के बारे में ज्यादा बेहतर लिखा है। इसीलिए इसे उन्होंने छाप दिया और लेख फाड़ रद्दी की टोकरी में फेंक दिया होगा।

Sunday, May 21, 2017

राजेश खन्ना उस दौर में वाकई टॉप पर थे

- वीर विनोद छाबड़ा
Rajesh Khanna with Sharmila in Amar Prem
राजेश खन्ना अपने दौर में वाकई सुपरस्टार थे। वो उस दौर को परदे बाहर भी पूरी शान-ओ-शौकत के साथ जी रहे थे। दो राय नहीं कि वो बेहतरीन कलाकार थे। तब तक आखिरी खत, राज़, आराधना, कटी पतंग, अमर प्रेम, आनंद, डोली, सच्चा-झूठा, अंदाज़ आदि दर्जन भर से ज्यादा फ़िल्में उनकी रिलीज़ हो चुकी थीं। कई तो बॉक्स ऑफिस पर ज़बरदस्त हिट थीं।
लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि वो बहुत संवेदनशील व्यक्ति थे। ज़रा सी भी चोट बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। कुछ इसे फुटबाल साइज़ ईगो के रूप में देखते हैं। लेकिन इस सच से इंकार करना बहुत मुश्किल है कि राजेश खन्ना जैसी शख्सियत उस दौर में 'हवा हवाई' नहीं थी।
राजेश खन्ना की 'अमर प्रेम' को हम उनकी सबसे बेहतरीन फिल्म मानते हैं। १९७१ में रिलीज़ हुई इस फ़िल्म में वो एक ऐसे मुश्किल किरदार को बहुत सहजता से अदा करते हुए दिखते हैं जिसे घर से कोई ख़ुशी नहीं मिलती और उस ज़िंदगी को वो कोठों पर तलाशता फिरता है।
इस फ़िल्म में उनकी परफॉरमेंस को १९७२ में फ़िल्मफ़ेयर ने ईनाम देने के लिए नामांकित किया। यह वही अवार्ड फंक्शन था जिसमें प्राण साहब ने बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का ख़िताब लेने से इसलिए मना कर दिया था क्योंकि 'पाकीज़ा' में गुलाम मोहम्मद को संगीत के लिए ख़िताब देने से इंकार करके आयोजकों ने बड़ी बेइंसाफी की थी।
राजेश खन्ना के साथ भी ऐसा ही हुआ। उन्हें पता चल गया कि बेस्ट एक्टर का अवार्ड मनोज कुमार को 'बेईमान' के लिए दिए जाने का फैसला कर लिया गया है। बहुत आहत हुए वो ये सुन कर। उन्हें लगा कि यह अपमान है, उनका ही नहीं बल्कि एक बेहतरीन परफॉरमेंस का भी, जिन्हें उन्होंने बड़ी शिद्दत से जीया है।
लेकिन राजेश उन लोगों में नहीं थे जो चुपचाप सह लें। ऊपर से सुपरस्टारडम को भूत। उन्होंने फैसला किया एक बहुत बड़ी पार्टी का, ठीक अवार्ड नाईट के वक़्त में, आयोजित करेंगे। फिल्म इंडस्ट्री के तमाम छोटे से बड़े तक को न्यौता चला गया। बड़ी तादाद में 'न्यौता कबूल है' की मुहर भी लग गयी।
जब फ़िल्मफ़ेयर वालों को पता चला तो उनके पैर तले से ज़मीन खिसक गई। अवार्ड नाईट फेल होने की नौबत आ गयी। प्राण साहब ने अवार्ड लेने से इंकार करके पहले से ही विवाद खड़ा कर रखा था। और अब राजेश खन्ना की एक प्रकार की यह धमकी। हिल गए आयोजक।
बहरहाल, बड़ी मुश्किल से मना पाए वे राजेश खन्ना को। सुना है कुछ बड़े प्रोड्यूसर, डायरेक्टर्स और सीनियर कलाकारों की सेवाएं भी ली गयीं थीं।

Friday, May 19, 2017

बाप बाप होता है और.…

-वीर विनोद छाबड़ा
Govinda & Amitabh in Bade Miyan, Chote Miyan
कभी अतीत की कोई पोस्ट इसलिये अच्छी लगती है क्योंकि उसमें कोई अतीत का बंदा आकर अतीत की याद दिलाता है।
ऐसी ही एक अतीत की पोस्ट। 
करीब ढाई साल पहले की बात है। रात डेढ़ बजे का समय। आंखों से नींद गायब है। बिस्तर पर ख़ामख़्वाह करवटें बदलने से बेहतर है कि फेसबुक खोल कर बैठ जाओ। वही किया मैंने।
सहसा मेसेज बॉक्स खुल गया। राम भाटिया का नाम उभरा। पूछ रहे थे, कैसे हैं?
मैंने कहा ठीक हूं। फिर सोचने लगा, कौन है यह बंदा? प्रोफाइल चेक किया। बंदा हिन्दुस्तान मीडिया का था। देखा-भाला लगता है।
स्मृति पर पड़ी धूल की मोटी परत थोड़ी झाड़ी ही थी कि याद आ गया। अरे, यह तो राम चन्दर भाटिया है। इसे मैंने किशोरावस्था से युवावस्था में जाते हुए देखा था। मेहनती और जिज्ञासू बंदा है। 
मैं सिनेमा और क्रिकेट पर लिखता था। वो मेरा फैन था। अक्सर घर भी आता था, कुछ सलाह-मशविरा लेने।  उन दिनों मैं पुलकित होता था ये जान कर कि सिनेमा और क्रिकेट के स्थानीय लेखकों के भी प्रशंसक होते हैं।
इतने बरस बाद भी भाटिया ने मुझे याद रखा, यह भी मेरे लिए सुखद आश्चर्य की बात थी। वरना सिनेमा और क्रिकेट के लोकल लेखक की बिसात लेखन संसार में ज़र्रे से भी कम है। हमें ही याद दिलाना पड़ता है कि मैं फलाना हूं और इन विषयों पर लिखता हूं। बहुत ख़राब लगता था जब अगला कहता था कि उसकी इन विषयों में कोई दिलचस्पी नहीं है, इसलिए अख़बार के इन सफ़ों को वे बिना खोले की आगे बढ़ लेते थे।
बहरहाल, भाटिया ने लेकिन आगे जो लिखा, उसका जोल्ट बहुत ज्यादा सुखद था।
उसने बताया कि हिन्दुस्तान, लखनऊ में प्रकाशित उसे मेरा लेख 'बड़े मियां छोटे मियां' इतना पसंद आया था कि आज भी याद है।
मुझे याद आया कि अक्टूबर, १९९८ में मैंने वो लेख लिखा था। इसमें मेरा दृष्टिकोण यह था कि फिल्म 'बड़े मियां, छोटे मियां' की कामयाबी कोई मायने नहीं रखती है। ज्यादा देखने वाली बात तो यह होगी कि आज के दौर में 'सिनेमा के पर्दे के बड़े मियां' गोविंदा हैं या अमिताभ बच्चन। 
दरअसल, यह नब्बे के दशक के अंतिम दौर की बात है। उन दिनों गोविंदा की पतंग सातवें आसमान पर उड़ रही थी और बॉक्स ऑफिस पर एक के बाद एक नाकामियों से घायल अमिताभ फड़फड़ाने तक के लिए झटपटा रहे थे।

Thursday, May 18, 2017

अब कहां जायें हम?

- वीर विनोद छाबड़ा
हम लखनऊ के चारबाग़ रेलवे स्टेशन के सामने रेलवे की तिमंज़ली मल्टी स्टोरी बिल्डिंग में २१ साल रहे। पचास कदम पर पूर्वोत्तर रेलवे का लखनऊ जंक्शन। दो सौ मीटर की दूरी पर चारबाग़ राजकीय बस अड्डा। सामने मेन रोड थी। आलमबाग से हज़रतगंज जाने वाला सारा ट्रैफिक वहीं से गुज़रता था। बस अड्डे से गोरखपुर-बनारस की दिशा की ओर जाने वाला ट्रैफिक भी वहीं से होकर जाता था। सड़क पर कोई गड्ढ़ा बन गया या टूट गयी तो समझ लीजिये कोढ़ में खाज। ट्रैफ़िक के शोर प्लस गड्ढ़े में के ऊपर से गुज़रने का शोर।
हम तिमंज़ले पर रहते थे, कोने वाले मकान में। कुल तीन खिड़कियां थीं। बंद करने पर भी सड़क पर गुज़रते वाहनों का शोर। सुनने के आदी हो गए थे। लेकिन जब पढ़ने बैठे तो पागल हो गए।
फिर स्टेशन के सामने रहने का अलग से ख़ामियाज़ा भी। किसी न किस वज़ह से कोई न कोई मेहमान बना ही रहता। मसलन चार घंटे ट्रेन लेट हो गई। अब घर जाकर क्या करेंगे? किसी को सुबह सवेरे ट्रेन पकड़नी है तो वो रात को आ गया। कहां जायें हम?

मां छत पर भेज देती थी। वहां शोर फैला हुआ मिलता। ऊपर खुला आसमान। पढ़ने में दिल लग जाता था। गर्मियों में खम्मन पीर का उर्स। तीन-तीन दिन तक रात भर जगह-जगह कव्वालियां। लेकिन हम छत पर टेबल लैंप की रोशनी में जैसे-तैसे फोकस करते रहे और गिरते-पड़ते पास भी हो गए। हमारी कॉलोनी के कई लड़के तो इस शोर में भी पढ़ते हुए फर्स्ट आये। कोई डॉक्टर बन गया तो कोई इंजीनियर। हम फिस्सडी थे, इसलिए बाबू बनना नसीब में रहा। गो, वो बात दूसरी है कि हम बिजली बोर्ड से डिप्टी जीएम की पोस्ट से रिटायर हुए।
अस्सी के दशक की शुरूआत में हम चारबाग़ छोड़ कर इंदिरा नगर के डी ब्लॉक में शिफ्ट हुए तो अहसास हुआ कि हम जंगल में आ गए हैं। सिर्फ़ दर्जन भर मकानों में रहते थे लोग। बगल से गुज़रती कुकरैल फारेस्ट रोड। रात में कुत्ता भी टहलता हुआ दिखा तो लगा कि भेड़िया है। कस कर दरवाज़े बंद कर लेते थे।
न सड़क का शोर और न इंजिन की कूक और न ट्रेन की खड़खड़। वहां रूरल फीडर से बत्ती आती थी। जाती तो कई कई घंटो तक न लौटती। कई बार दो दिन बाद आई। सन्नाटा हमें दिन में भी डराता रहा। महीनों तक नींद नहीं आई। बार-बार किसी न किसी बहाने चारबाग़ भागते थे। संयोग से पत्नी का मायका भी उधर पानदरीबा में था। कई बार हमने स्टेशन के जेनरल वेटिंग रूम में भी शरण ली।

Wednesday, May 17, 2017

वो यम नहीं बरेठा था

-वीर विनोद छाबड़ा 
मेरे साथ छोटी-मोटी दुर्घटनायें और टूट-फूट लगी रहती हैं। दो साल इन्हीं दिनों की बात है।
आसमान पर घने बादल थे। मैं घर लौट रहा था। इंद्र देवता से मना रहा था, दस मिनट रुक जाओ। तब तक मैं घर पहुंच जाऊंगा। फिर जी भर कर बरसना। लेकिन उन्होंने मेरी इल्तज़ा पर ध्यान नहीं दिया। बरस ही पड़े। तब मैं घर से करीब तीन किलोमीटर दूर था।
मैंने स्कूटी रोकी। वहां एक कपड़े इस्त्री करने वाले बरेठे का डेरा था। धूप-पानी से बचने के लिए ऊपर मोटे पॉलीथीन की चद्दर वाली छत। पुरानी होने के कारण उसमें चार-पांच जगह छेद थे। पानी टपक रहा था। फिर भी बारिश से बचने के लिए उसमें कई लोग घुसे हुए थे। मेरे लिए उसमें कतई जगह नहीं थी।
मैंने आस-पास अन्य आश्रय के लिए नज़र दौड़ाई। सड़क पार कुछ दुकानें और उन पर शेड। सुरक्षित स्थान। कुछ लोग खड़े भी वहां थे। मैंने पीछे मुड़ कर देखा। खाली सड़क थी।
मैंने स्कूटी मोड़ी ही थी कि जाने कहां से बलां की रफ़्तार से एक बाईक आई और उसने मेरी स्कूटी को बीच में ठोंक दिया। मैं उछला कर गिरा। चारों चित्त। मेरी आंखों के सामने अंधेरा छा गया। कुछ पल के लिए लगा मैं परलोक में हूं। किसी ने सहारा दे बैठाया और फिर हाथ खींच कर मुझे खड़ा कर दिया। तब तक मैं उसे दूसरे लोक का ही वासी यम समझता रहा। वो बोला, शुक्र है कि आप बच गए।
तभी मैंने ध्यान दिया कि अरे यह यम नहीं। कोई मनुष्य है देवता के रूप में। याद आया, वो बरेठा था। कई और लोग भी जमा हो गए। मूसलाधार बारिश जारी थी। किसी ने मेरी स्कूटी किनारे खड़ी कर दी। दूर मीटर दूर जा गिरा हेलमेट और घड़ी उठाई।
एक्सीडेंट के शॉक मैं बाहर नहीं था। बांह पकड़ कर बरेठा अपनी झोंपड़ी में ले आया। शुक्र है जिस्म की सारी हड्डियां सलामत थीं। हां, खाल ज़रूर चार-पांच जगह से छिल और फट गयी थी। सर में पीछे दर्द हो रहा था। हाथ लगाया तो पाया की मोटा सा रोड़ बन गया है। स्कूटी को देखा। मुझसे ज्यादा चोट लगी है। बरेठे ने एक बीमार सी टूटी कुर्सी पर बैठा दिया। बारिश से भीगा होने के कारण कंपकंपी छूट रही थी। जाने कौन कहीं से चाय ले आया। चाय तो वैसे भी मेरी जान है। मैंने उसे फूंक मार कर फटा-फट सुड़ुक लिया। मैंने खुद को बेहतर महसूस किया। दो-एक ने घर छोड़ने का ऑफर दिया।
लेकिन मैंने उनका अनुरोध क्षमा मांगते हुए अस्वीकार कर दिया। अपने मित्र सत्य प्रकाश को मोबाईल किया। वो मेरी स्कूटी का डॉक्टर है, मुझसे करीब बीस साल छोटा।

Tuesday, May 16, 2017

आत्मा नहीं है ऑनलाइन में

-वीर विनोद छाबड़ा
हमने वो ज़माना देखा है जब हर जगह लंबी कतार थी। राशन की दुकान, मिट्टी का तेल, बैंक, पोस्ट ऑफिस, बिजली, पानी, सीवर, हाउस टैक्स, रेल-बस का टिकट और सिनेमा का टिकट, हर जगह मारा-मारी थी। गरीबों की कतार अलग और सिफाऱिशियों की अलग। दबंग लोग तो जहां खड़े हुए वहीं से कतार शुरू हुई। 
अब सिस्टम थोड़ा आसान हो गया है। हर तरह के पैसे का लेन-देन ऑनलाइन है। साइबर कैफ़े जाना ज़रूरी नहीं है। मोबाईल भी किसी से कम नहीं। दो सेकंड में हज़ारों मील दूर अपने प्रिय को पैसा भेज दो। जनता बड़ी खुश है। समय और ऊर्जा की बचत नहीं बल्कि महाबचत। सारा काम घर बैठे-बैठे। लिहाज़ा भाड़े की भी बचत।
लेकिन जहां फ्री सामान मिलता है, वहां अब भी कतार लगती है। सरकारी अस्पतालों में दवा लेने की कतार। मुफ़्त में पूड़ी-कचौड़ी पाने के लिए कतार। वो बात अलग है कि कुछ लोगों की प्रवृति कतार तोड़ू रही है, उन्हें तो झेलना ही होगा।
लेकिन हमारे जैसे रिटायर और निठल्ले लोग भी प्रचुर मात्रा में हैं जो कतार में लगना पसंद करते हैं। वहां तरह-तरह की बातें होती हैं। देश की, समाज की और परिवार की। कोई बेटे से दुखी है तो कोई पत्नी से और कोई पत्नी अपने निठल्ले पति से। सास-बहु और ननद-भौजाई के बीच तनातनी के मामले भी हमने वहीं डिस्कस होते और निपटाये जाते देखे हैं। रिश्ते भी हमने वहां देखे। जब उसी पंक्ति में महिलायें भी लगी हों तो मर्दों के कंठ से वीरगाथाएं स्वतः बाहर आने लगती हैं। इंसान की फितरत के दर्शन होते हैं। कई के लिए तो समझो यह टैक्स फ्री एंटरटेनमेंट का प्रबंध हो गया।
हम सोचते हैं यदि ऑनलाइन सिस्टम अगर कंपलसरी हो गया तो समस्याओं को सुलझाने का जो मज़ा रूबरू है, वो ऑनलाइन में कहां? चाय-वाय तो ऑनलाइन आने से रही। हमें तो लोकल काल से बेहतर आमने-सामने बैठ कर बात करना अच्छा लगता है। हम तो कहते हैं कि भले ही महीने में एक बार दस पल के लिए ही सही, लेकिन मिलो तो दिल से। हम तो तकरींबन रोज़ किसी न किसी मित्र के घर झांकने चले जाते हैं। यह बताने के लिए कि हम ज़िंदा हैं और यह देखने को कि वो ज़िंदा है। हम सुने हैं कि भीख भी ऑनलाइन होने जा रही है। भिखारी को घर बैठे एक तय राशि मिल जायेगी।
अब ये डिजिटलीकरण हो रहा है। अच्छी बात है। पारदर्शिता और प्रक्रिया में तीव्रता तथा सरलीकरण हो जाएगा। और वो भी फूलप्रूफ। मगर डर भी लगता है कि मानव का यंत्रीकरण न हो जाए। हमने तो हाड़-मांस का मेहनत करता इंसान देख लिया। अब आने वाली पीढ़ी का क्या होगा? शायद वो यह कहेगी - सुना है कोई इंसान ऐसा भी था, जो खुद सोचता था और चलने-फिरने के साथ दौड़ता भी था।
हमारे मित्र मिश्रा जी ऑनलाइन शॉपिंग के नंबर वन हिमायती हैं। दाल-चावल तक ऑनलाईन मंगाते हैं। कहते हैं, बाज़ार से बहुत सस्ता पड़ता है। क़्वालिटी भी ए-क्लास। बड़े गर्व से दूसरों को भी प्रेरित करते हैं।