Saturday, April 22, 2017

चाची की बहु

- वीर विनोद छाबड़ा
ट्रेन छूट जाने के कारण हम अपने चाचा के बेटे राजीव की शादी में नहीं जा पाये थे।
अगली बार छह-सात महीने बाद दिल्ली जाना हुआ। पहुंचते ही चाची ने बतियाना शुरू कर दिया। घर-बाहर, अड़ोस-पड़ोस और अपने-पराये सब का हाल पूछ डाला। काफ़ी वक़्त गुज़र गया बतियाते। इस बीच एक लड़की आई। ठंडा ठंडा कूल कूल रूह-अफ़ज़ाह शरबत रखा। पांव छुए और चली गई। थोड़ा वक़्त और गुज़रा।
चाची ने पूछा - कैसी लगी हमारी बहु अल्का?
हमने कहा - अभी तक दर्शन ही नहीं हुए।
चाची ने थोड़े शिकायती लहज़े में कहा - वाह! क्यों मज़ाक करते हो? अभी आई तो थी। तुम्हारे पैर भी छुए थे उसने।
हमें हैरानी हुई - वो बहु थी? हमने तो ध्यान ही नहीं दिया। और आपने इंट्रोडक्शन भी नहीं कराया। हम तो सोच रहे थे कि बहु होगी, नई-नवेली सी दुल्हन की ड्रेस में, मेकअप की मोटी परत में और पायल बांधे, छम छम नचदी फिरां के मोड में।
दरअसल हम अपने यूपी वाली सोच के मोड में थे, जहां नव-ब्याहता साल-दो साल तक तो दुल्हन के मोड में रहती है। हमें तो ख्याल ही नहीं रहा कि हम दिल्ली में बैठे थे। वहां लड़कियां काम-काजी होती हैं। हाथ पे हाथ रखे नहीं बैठतीं।

Friday, April 21, 2017

हमारा बेस्ट क्रिटिक फ्रेंड

-वीर विनोद छाबड़ा
जब कभी दफ्तर के दो-चार पुराने यार मिल कर बैठते हैं तो महेश चंद्र सिन्हा की याद ज़रूर आती है। यारों के यार थे वो।
ऑफिस के ज्ञानी-ध्यानी ऑफिसर्स में गिनती थी उनकी। कई मामलों में वो हमारे आदर्श थे। सीनियर होने के नाते किसी खास मुद्दे पर उनसे सलाह लेना हमेशा फायदेमंद रहा। कई बरस तक हमने ऑफिस में एक ही रूम शेयर किया। लंच पार्टनर भी रहे। घर-बाहर, देश-विदेश हर टॉपिक पर गर्मागर्म बहस होती थी उनसे। हम मानते थे हम एक-दूसरे के बेस्ट क्रिटिक हैं।
वो धुआंधार सिगरेट पीते और पिलाते थे। एक निजी काम से वो अमृतसर गए। वहां स्वर्ण मंदिर भी गए। पांच-छह घंटे वहां बिताये। वहां के पवित्र वातावरण ने उन्हें बहुत प्रभावित किया। सोचा सिखों के इतने बड़े तीर्थ आया हूं तो एक-आध बुराई छोड़ कर ही जाऊंगा। ख्याल आया कि सिख भाई सिगरेट से सख्त घृणा करते हैं। छत्तीस साल पुरानी बुराई एक झटके में छोड़ दी। उनके इस त्याग से मेरे हमको भी सिगरेट छोड़ने की प्रेरणा मिली। 
हमने अक्सर नोटिस किया है कि ये ज्ञानी-ध्यानी लोग ज्ञान बांटने के चक्कर में अपने शरीर को जाने-अंजाने तक़लीफ़ देते रहते हैं। एक दिन सिन्हा जी के दांत में दर्द उठा हुआ। फुटपाथिए दन्त चिकित्सक के पास पहुंच गए जहां से हम बामुश्किल उन्हें खींच कर लाये। लेकिन भाई माने नहीं। किसी झोलाछाप डॉक्टर से दवा ले आये। वही हुआ। दर्द बढ़ता गया, ज्यों-ज्यों दवा की। आख़िरकार स्पेशलिस्ट की शरण में जाना। तब तक दो दांत जवाब दे चुके थे। उन्होंने जानवरों के डॉक्टर के पास जाने में भी परहेज़ नहीं किया। जबकि पत्नी उनकी एक सरकारी अस्पताल में स्टाफ़ सुपरिंटेंडेंट थी। इस नाते तमाम नामी डॉक्टर उनसे परिचित थे।
सिन्हा जी हमसे तीन बरस बड़े थे। पहले रिटायर हुए। अक्सर भेंट होती रहती थी। एक कार्य विशेष के लिए उन्हें ऑफिस ने छह महीने कॉन्ट्रेक्ट दिया। कुछ दिन वो नहीं आये। चिंता हुई। फ़ोन किया तो पता चला कि अस्वस्थ हैं। खैर, करीब पंद्रह दिन बाद वो आये।
बताने लगे - पेट में थोड़ा दर्द था। इधर-उधर के घरेलु नुस्खे और अपनी डॉक्टरी आजमाई। जब दर्द बढ़ा तो भागे डॉक्टर के पास। जॉन्डिस शक़ किया गया। दवा दी और कुछ टेस्ट बताये। दवा तो उन्होंने ले ली। लेकिन टेस्ट नहीं कराये। कहने लगे सब धंधा है डॉक्टरों का। कमीशन के चक्कर में ये टेस्ट वो टेस्ट और महंगी-महंगी दवायें। अब सब ठीक-ठाक हो गया है।
दूसरे दिन पता चला कि भाई के पेट में फिर दर्द उठा है। एमआरआई में लीवर प्रॉब्लम दिखी है। इलाज़ चला। कुछ दिन बाद ठीक हो गए।

परवरिश में कमी रह गयी

- वीर विनोद छाबड़ा
हमारे एक साथी हैं, साधुराम जी। जैसा नाम, वैसा ही स्वभाव और दिल भी। कहते है, ज़िंदगी में हंसी और शांति से बड़ी कोई नेमत नहीं।
बावजूद इसके कि साधुराम की एक छोटी सी परचून की दुकान थी, ज़िंदगी में जो चाहा उन्होंने पाया। अच्छी पत्नी उर्मिला। एक नन्ही प्यारी बेटी हर्षा। और एक छोटा सा मकान। कुल मिला कर अच्छी कमाई। लेकिन जितना पाया उतना गंवाया भी। उर्मिला एक एक्सीडेंट में चल बसी। जाते-जाते तीन साल की हर्षा को झोली में डालते हुए कह गयी - पहाड़ सी ज़िंदगी अकेले नहीं बिता पाओगे। दूसरी शादी कर लेना। लेकिन हर्षा का ध्यान रखना तुम्हारी पहली ज़िम्मेदारी है।
लेकिन साधुराम ने उर्मिला की याद को बनाये रखने खातिर ताउम्र दूसरी शादी नहीं की। मां बन कर हर्षा को पाला। उसे डॉक्टर बनाया। उसका सहपाठी था, डॉ अरविंद। उसे वो बहुत पसंद करती थी। दोनों की बड़ी धूमधाम से शादी भी की। धन्य हो गए साधुराम जी। जैसा चाहा था उससे भी बढ़कर निकला दामाद। बिलकुल देवता समान। शादी के बाद दोनों हैदराबाद चले गए। बहुत बड़े अस्पताल में जॉब मिल गयी।
बेटी-दामाद ने आग्रह किया - पापा, हमारे साथ रहिये।
लेकिन साधुराम ने मना कर दिया। तुम दोनों की ज़िंदगी में मेरा क्या काम? मैं यहां लखनऊ में ठीक हूं। अच्छे मित्र हैं, पड़ोसी और एक बेहद फ़िक्र रखने वाला किरायेदार भी। और नाते-रिश्तेदार भी तो सब यहीं हैं।
समय बहुत अच्छा गुज़रता रहा। साधुराम करीब पचहत्तर साल के होने को आ गए। उन्हें लगा कि उम्र का यह वो पड़ाव है, जब उन्हें बेटी-दामाद के पास रहना चाहिए। सब कुछ तो वही है। बाकी बचा प्यार उस पर लुटा देना चाहिए। ऊपर जाकर उर्मिला को हिसाब भी तो देना होगा। उन्होंने वसीयतनामा तैयार किया, सारी संपत्ति बेटी-दामाद के नाम, चल और अचल दोनों ही।
और पहुंच गए हैदराबाद। बेटी-दामाद और उनके दो बच्चे - एक बेटा और एक बेटी - उन्हें रिसीव करने एयरपोर्ट आये। बहुत खुश हुए वो सब। तीन बेडरूम का फ्लैट था उनका। एक में बेटी-दामाद, एक में बच्चे और एक में साधुराम एडजस्ट हो गए। कुछ दिन सब कुछ बहुत अच्छा चला।
एक दिन साधुराम ने हर्षा को अपनी मंशा बताई कि सोचता हूं ज़िंदगी के बाकी दिन तुम लोगों के साथ ही बिता दूं। इस पर बेटी-दामाद ने बहुत ख़ुशी ज़ाहिर की।
कुछ दिन और गुज़रे। बेटी और दामाद दोनों को अमेरिका में जॉब मिल गयी, एक बहुत बड़े हॉस्पिटल में। बच्चों के अच्छे स्कूल में एडमिशन का मिलना भी तय हो गया। लेकिन जब वीज़ा के लिए आवेदन का वक़्त आया तो बेटी ने कहा - सॉरी पापा। आप हमारे साथ नहीं चल सकते। अभी तो हॉस्पिटल ने छोटा सा दो कमरे का फ्लैट प्रोवाईड किया है। इतने में प्राईवेसी मैंटेन करना बहुत मुश्किल है। और फिर हॉस्पिटल ने सर्विस कॉन्ट्रैक्ट में मां-बाप को शामिल नहीं किया है। मजबूरी है। आपको बाद में बुला लेंगे, जब हम अपने बड़े से घर में शिफ्ट होंगे। तब आप को हम एक ओल्ड ऐज रिसोर्ट में शिफ्ट किये देते हैं। वहां आप जैसे बहुत लोग हैं। मन लगा रहेगा।

Wednesday, April 19, 2017

मेमसाब का बंदरों से है रिश्ता पुराना

- वीर विनोद छाबड़ा
मेमसाब उस दिन शाम वो बाजार करके लौट रही थीं। कंधे पर लटके झोले में भरे सामान से लदी-फंदी। कुछ सामान हाथों में भी था। इसमें एक पोलीथीन बैग में दर्जन भर केले और दूसरे हाथ में मिठाई का डिब्बा।
अचानक पीछे से एक बंदर आया और उसने केले वाला बैग उनके हाथ से छीना और भाग खड़ा हुआ। 
मेमसाब कुछ समझ ही नहीं पायीं। उन्हें ऐसा लगा जैसे कोई बच्चा है, जो शरारत कर रहा है।
आस-पास खड़ी कुछ महिलायें ये तमाशा देख रहीं थीं। वो बंदर को केले का बैग छीन कर भागते हुए देख ज़ोर से हंसी।
तब मेमसाब को अहसास हुआ कि कहानी कुछ और ही है। वो पलटीं। देखा, एक बंदर केले का बैग लेकर भाग रहा है।
देखते ही देखते बंदर एक मकान की ऊंची बॉउंड्री वाल पर जा बैठा और केले छील कर खाने लगा।
मेमसाब 'हट हट' करती रहीं। अब फुदक कर दीवार पर तो चढ़ नहीं सकती थीं।
इधर बंदर कहां मानने वाला। इतने में तीन-चार बंदर और आ गए। आपस में छीना-झपटी शुरू हो गयी।
मेमसाब के सामने घुटने टेकने के सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं रहा - मंगल का दिन है। चलो माफ़ किया। समझेंगे कि हनुमान जी को चढ़ावा हो गया। 
यों हमारी मेमसाब बहुत हल्की-फुल्की हैं। शुक्र है कि बंदर उन्हें उठाकर नहीं ले गया।
वैसे हमारी मेमसाब का बंदरों से पुराना रिश्ता है। उनके मायके में भी बंदरों का आना-जाना लगा रहता था। एक बार हम उनके घर में बैठे चाय सुड़क रहे थे। एक प्लेट में कुछ बिस्कुट भी सामने रखे थे। बंदर आये और बिस्कुट उड़ा कर ले गए थे। बिस्कुट चुंकि घटिया क्वालिटी के थे, इसलिए हमें कतई अफ़सोस नहीं हुआ था। बल्कि बचे हुए दो बिस्कुट भी हमने उनके हवाले कर दिए थे।
बहरहाल, विवाह पूर्व मेमसाब को कितनी बार बंदरों ने काटा, यह ब्यौरा ससुरालवालों ने तो हमारी तमाम कोशिशों के बावजूद नहीं दिया। दरअसल, इस रिकॉर्ड की ज़रूरत हमें तब पड़ी जब विवाह के उपरांत एक बदंर ने उन्हें बेवज़ह काटा। तीन या चार महंगे वाले इंजेक्शन लगे थे। यह घटना करीब सोलह साल पहले की है।
तब डॉक्टर ने हमारे कान में धीरे से कहा था - ध्यान रखियेगा। एक बार जिसे बंदर काटता है, वो कभी भी बंदरों जैसी उछल-फांद शुरू कर सकता है। और एक बार बंदर जिसे काट ले बंदर उसे काटने को बार-बार भी आ सकते हैं।

Tuesday, April 18, 2017

और चोर पकड़ा गया

- वीर विनोद छाबड़ा
उन दोनों का प्रेम विवाह था। लेकिन पहले ही दिन से दोनों में झगड़ा शुरू हो गया।
दरअसल पत्नी को शक़ था कि उसके पति के संबंध कई लड़कियों से हैं। 
तीस साल गुज़र गए। मगर झगड़ा करने और शक़ करने की बीमारी गयी नहीं। उनके झगडे से परेशान होकर उनका एकमात्र बेटा अपनी पत्नी और बच्चों के साथ घर छोड़ कर चला गया और पड़ोस में ही किराये पर रहने लगा।
पति को नींद नहीं आती थी। वो रातों को उठ कर टहलने के लिए छत पर चला जाता था। लेकिन पत्नी को शक़ था कि उसके पति के जवान नौकरानी से संबंध हैं और रातों को टहलने के बहाने उसके कमरे में जाता है।
उस दिन पत्नी ने जासूसी करने की ठानी। बच्चू को रंगे हाथ पकड़ूंगी।
पत्नी ने उसने चालाकी की। नौकरानी को चुपचाप छुट्टी दे दी। पति को इसकी भनक तक न लगने दी।
रोज़ की तरह रात नींद न आने की समस्या से ग्रस्त पति उठा। फ्रिज खोल कर पानी पिया और छत की ओर बढ़ गया।
इधर पत्नी बड़ी फुर्ती से नौकरानी के कमरे में घुसी। और उसके पलंग पर मुंह तक चादर ओड़ कर सो गयी।

Monday, April 17, 2017

ये बिल्ली मौसी कब बनी?

-वीर विनोद छाबड़ा
हमारे घर में हर समय कोई न कोई बिल्ली मौजूद रहती है। आजकल भी है। यह बिल्ली कौन है? कहां से आयी? मालूम नहीं। दोपहर में आती है। देख कर म्याऊं म्याऊं करती है। हम भी जवाब में म्याऊं म्याऊं करते हैं। फिर वो पसड़ कर गलियारे में बैठ जाती है। कभी कबाड़ की तरह खड़े स्कूटर के नीचे पसड़ जाती है। ठंडा-ठंडा कूल कूल लगता है। भयंकर गर्मी जो पड़ रही है।
अभी कुछ महीने पहले जब सर्दियां थीं तो यही बिल्ली स्कूटर की गद्दी पर बैठ कर बड़े ठाठ से धूप सेंका करती थी।
प्रसंगवश बता दें हम कि इसी बिल्ली की किसी पूर्वज बिल्ली ने आठ-नौ साल पहले हमारे स्कूटर की गद्दी नाखूनों से नोच मारी थी। नया-नया स्कूटर था तब। नई गद्दी की सबसे बड़ी दुश्मन होती हैं यह। इससे पूर्व वाली स्कूटर की गद्दी भी इन्होंने ही नोची थी।
बचपन में खूब कहानियां पढ़ी हैं हमने बिल्ली की। इसकी चालाकी और धूर्तता की। इसे मौसी कहा जाता था। यह आज तक नहीं मालूम कि बिल्ली के साथ मौसी क्यों लगाया जाता है? क्या मौसियां ऐसी ही होती हैं। भई, हमारी मौसी तो बड़ी अच्छी थी। दिल्ली में रहती थी। हमारा प्रिय बेसन का हलवा खिलाती थी। लौटते हुए दो रूपए भी हाथ पर रख देती थी। पर्याप्त होते इतने रूपए। साठ का दशक था वो। मौसी अब दुनिया में नहीं है। बहुत याद आती है, जब किसी बिल्ली मौसी को देखता हूं। यों हमें वो तमाम चंट किस्म की महिलाएं भी याद आती हैं जो यूनिवर्सिटी में हमारे साथ पढ़ा करती थीं और मक्खन लगा कर नोट्स लिया करती थीं। और सहकर्मी महिलाएं भी याद आतीं हैं जिन्हें स्वेटर बुनने के अलावा कुछ नहीं आता था और मुस्की मार कर फाईल पर नोट लिखने के लिए मदद लेने आया करती थीं। 
कहते हैं बिल्लियां एक जगह ज्यादा दिन नहीं टिकतीं। मां बताया करती थी कि बिल्लियां रास्ता भूल जाया करती हैं। इसीलिए किसी दिन अचानक गायब हो जाती हैं। उनका स्थान दूसरी कोई रास्ता भूली ले लेती हैं। हमने महसूस किया है कि हमारे घर में भी चार-पांच महीने के बाद बदली हुई बिल्ली दिखती है। 
हमारे घर बिल्लियों का आना-जाना लगा रहता है। हमें कोई प्रॉब्लम नहीं होती जब तक कि घर में नहीं घुसतीं।

यह ठीक है कि बिल्ली घर में घुसी नहीं कि चूहे नदारद। लेकिन नुकसान बहुत करती हैं। निकालना बहुत मुश्किल होता है। कभी पलंग के नीचे तो कभी टीन  वाले बड़े संदूक के नीचे। हम डंडा लेकर पीछे दौड़ते हैं। इधर से उधर खूब दौड़ातीं हैं।
कई साल पहले जाने कब खुले रोशनदान के रास्ते एक बिल्ली हमारे घर में घुस गयी और तीन बच्चों को जन्म दिया। सर्दी के दिन थे। तरस आ गया। बच्चों को बाहर नहीं किया। दिन भर बिल्ली इधर-उधर मटरगश्ती करती थी। रात होते ही लौट आती। उसके बच्चे थोड़े बड़े होने पर दिन भर हमारे घर में इधर-उधर फुदका किये। कभी-कभी बगल में आकर बैठ भी जाते थे। हम प्यार से उनके सर पर हाथ फेरते थे तो वो और भी सट जाते थे। एक दिन वो इन्हें हमारे घर से लेकर जाने कहां चली गयी। शायद हम इंसानों से डर गयी। हमने भी शुक्र मनाया। और पहला काम या किया कि रोशनदान बंद कर दिया। लेकिन याद बहुत दिनों तक बनी रही। 

Sunday, April 16, 2017

कहां गए वो पिल्ले?

- वीर विनोद छाबड़ा
हमारी गली में एक कुतिया ने एक साथ छह पिल्ले जने। देखने वाले बच्चों की तो मौज हो गई। पिल्ले थोड़ा चलना सीखे तो इधर-उधर कूदने लगे।
दो पिल्ले एक  स्कूल बस के नीचे आ गए। बेचारी कुतिया उनके पास कुछ देर तक बैठ कर कातर दृष्टि से उन्हें देखती रही। फिर वहां से वो चली गई। आस-पास खेल रहे बच्चे सहम गए। उनका मन खट्टा हो गया। वे घर चले गए।
हम उस समय बाज़ार जा रहे थे। आधे घंटे बाद लौटे तो देखा वे कुचले हुए दोनों पिल्ले गायब हैं। सड़क पर सिर्फ़ थोड़ा खून फैला हुआ था। कहां गए वे पिल्ले? ज़मीन खा गयी, या आसमान निगल गया। हमारे पड़ोसी का कहना है कि दो मोटे-मोटे बिल्ले उनके आसपास घूम रहे थे और आवारा कुत्तों का झुंड भी मंडरा रहा था। हो सकता है कि उनमें शायद कोई उन पिल्लों का बाप भी हो।
अब बाकी चार पिल्लों का कुतिया बहुत ध्यान रखने लगी। हमेशा आस-पास ही टहलती रहती। भोजन की तलाश में जब उसे कहीं दूर जाना होता था तो पिल्लों  नाली के ऊपर रखी सिल्ली के नीचे छिपा देती थी।
एक दिन हमने गौर किया कि अब चार नहीं दो पिल्ले दिखते हैं। हम गहरी सोच में डूब गए। दो पिल्ले आखिर कहां गए? टहलते हुए कहीं दूर निकल गए और वापसी का रास्ता भूल गएया फिर कोई उन्हें उठा ले गया? या फिर फिर कुत्ते ही उन्हें मार कर खा गए? मोटे मोटे बिल्ले अभी भी इधर-उधर टहला करते हैं।  कुछ भी कयास लगाया जा सकता है।

अब दो पिल्ले बचे हैं। कुछ बड़े हो गए हैं। हर आने-जाने वाले की टांगों में लोट-पोट होते हैं। कुछ समझदार भी हो गए हैं। वाहन आते देख कर किनारे हो जाते हैं। उसमें से एक काला-सफ़ेद थोड़ा तंदरुस्त है। दूसरा भूरे रंग का है, कमजोर सा दिखता है। कुछ दिन पहले वो लंगड़ा कर चल रहा था। उसकी पिछली टांग में कुछ प्रॉब्लम थी। पड़ोसी यादव जी की मदद बच्चों ने उसकी टांग पर एक लकड़ी की पटरी बांध दी। हफ्ते भर में वो ठीक हो गया।
पिल्लों की मां अब बेपरवाह हो गयी है। जाने कहां दिन भर गायब रहती है। बस सुबह-शाम दिखती है। पिल्लों को दूध पिला कर फिर गायब हो जाती है।

Saturday, April 15, 2017

तनहा तनहा सफ़ीना

-वीर विनोद छाबड़ा
सैकड़ों रिटायर्ड कर्मी परेशान हैं। उन्हें पेंशन देर से मिलती है। मेडिकल का भुगतान नहीं होता। तमाम एरियर का भुगतान बाकी है। आज मुख्यालय पर अपनी विपदा सुनाने के लिए जमा हैं। बमुश्किल गिरते-पड़ते दूर-दूर से आये हैं। किसी के घुटने में दर्द है तो किसी के सर में। किसी को ब्रेन ट्यूमर है तो किसी को दिख नहीं रहा। 
इन्हीं में सत्तर साल की विधवा सफ़ीना भी है। वो फैमली पेंशनर है। नाना प्रकार की व्याधियों से पीड़ित। चेहरे पर पड़ी अनगिनित गहरी झुर्रियां और उनमें से बहता पसीना। उसके संघर्षमय अतीत की दास्तान बयां कर रहा है। पति लियाकत को गुज़रे मुद्दत हो चुकी है। एक बेटा था। कुछ अरसा पहले हादसे का शिकार हो गया। उसके जाने का बहु को ऐसा सदमा लगा कि कुछ दिन बाद वो भी गुज़र गयी। पोते-पोती को वही पाल-पोस रही है। उनकी पढाई और घर का खर्च फैमिली पेंशन और सिलाई-कढ़ाई से होने वाली थोड़ी-बहुत आमदनी से ही चलता है।
कुछ दिन पहले बैठे-ठाले एक नयी मुसीबत आन पड़ी। सीने में ज़बरदस्त दर्द उठा। पसीना-पसीना हो गयी। डाक्टर ने हार्ट की तकलीफ़ निकाली। बाई-पास सर्जरी की सलाह दी है। तीन लाख की सख़्त ज़रूरत है। थोड़ा इंतज़ाम हो गया है। सातवां वेतन आयोग लग जाए तो आराम हो जाए। पेंशन बढ़ेगी और ऐरियर मिल जाएगा। इससे ऑपरेशन हो जाएगा। उसका पिछले वेतन आयोग का भी कुछ ऐरियर बाकी है। बाबू बोलता है बीस हज़ार दो और अपना पैसा लो। मगर वो तैयार नहीं है। झिड़क दिया था गलीज़ को भरी महफ़िल में। थप्पड़ नहीं मारा बस। कह दिया था - मर जाऊंगी, मगर घूस नहीं दूंगी।
मरहूम शौहर लियाक़त भी अपने उसूलों का पक्का था। इलेक्ट्रीशियन था वो। किसी का काम किया। एवज़ में एक प्याली चाय पीना भी हराम समझा उसने। बड़े बड़े अफ़सर तक अपना निजी काम उसी से कराते थे। मगर आज मुंह फेरे बैठे हैं, न उसके नाम को और न उसकी बेवा को पहचानते हैं।
सफ़ीना का अभी बच्चों के लिये जिंदा रहना ज़रूरी है। यह फैमिली पेंशन ही जो उन्हें पढ़ा-लिखा रही है। यह लालसा उसमें जोश भर देती है। वो पूरे दम-खम से चीखती है। अभी तो ये अंगड़ाई है, आगे और लड़ाई है...
उधर से गुज़रता एक नौजवान कर्मचारी फब्ती कसता है - चढ़ी जवानी बुड्ढे नूं। दूसरा बोलता है। शुक्र मनाओ कि पेंशन मिल रही है। 

Friday, April 14, 2017

हम, पत्नी और फूलमती

-वीर विनोद छाबड़ा
हम जब भी गुड़हल के पेड़ को देखते हैं हम तीस साल पीछे डाउन मेमोरी लेन में चले जाते हैं।
हम शहर से बाहर एक नए मकान में शिफ़्ट हुए हैं। पत्नी ने मायके से लाकर लॉन में एक गुड़हल का पौधा रोपती है। पेड़-पत्ती के मामले में हम हमेशा पॉजिटिव रहे हैं।
कुछ महीनों बाद में वो पौधा बड़े पेड़ में कन्वर्ट हो गया। सुर्ख लाल फूल निकले। सुबह-सुबह पूजा के लिए फूल की डिमांड बहुत है। चूंकि पेड़ चारदीवारी के काफी अंदर है और फूल चाहत वालों में महिलाएं ज्यादा है, और ताकि उन्हें कष्ट न हो, इसलिए हम सुबह गेट जल्दी खोल देते हैं। हम भी सुबह वहां कुर्सी डाल बैठ जाते हैं और चाय की चुस्कियों के साथ अख़बार पढ़ते हैं।
उस दिन सुबह सुबह के वक़्त गेट पर आहट हुई। एक भद्र महिला खड़ी हैं। उसने विनम्र नमस्कार किया - दो-चार फूल चाहिए।
हमने गेट खोल दिया। शुक्रिया कहते हुए वो अंदर आ गयी। फूल तोड़ते-तोड़ते खुद ही बताने लगी - कुछ दिन पहले पिछली गली में किराये पर घर लिया है। कुछ महीने बाद। अपना घर बनवा रहे हैं न सेक्टर बारह में।
फूल थोड़ा ऊंचाई पर थे। हमारा भी हाथ नहीं पहुंच पाया। हम अंदर से स्टूल उठा लाये और चढ़ गए। थोड़ा डर लगा। गिर न जाऊं। जाने कैसे वो हमारे दिल के भाव की मैपिंग कर गई। उसने स्टूल कस कर पकड़ लिया।
फूल हाथ में आ गया। हमारा सीना गर्व से फूल उठा। जैसे कोई किला फ़तेह कर लिया है। वो भी बड़ी खुश हुई। बच्चों की तरह ताली बजाने लगी।
हमें उनकी इस अदा पर हंसी आ गयी। हमने कुर्सी पर बैठने का इशारा किया। वो बिना हिचक बैठ गयीं। शिष्टाचारवश हमने चाय के लिए पूछा। वो हंस दी।

हमने इसे हां समझ कर पत्नी को आवाज़ दी। उस वक्त वो ऊपर छत पर सफाई करने गयी हुई थी। वो नीचे आईं। उन्होंने सर से पांव उस भद्र महिला का एक परीक्षक की भांति परीक्षण किया। हमें उनका यह अंदाज़ कुछ ठीक नहीं लगा। मौसम में गर्मी अपेक्षाकृत ज्यादा महसूस हुई। हमने परिचय देना चाहा। परंतु पत्नी ने मौका ही नहीं दिया - मैं जानती हूं। फूलमती हैं। पीछे गली में चतुर्वेदन के मकान में किरायेदार हैं।
हमने महसूस किया कि पत्नी की आवाज़ में थोड़ी तल्खी है। तभी उसकी निगाह स्टूल पर पड़ी। इससे पहले कि वो पूछती मैंने बताया - फूल ऊंचा लगा था। इसलिए……
पत्नी स्टूल उठा कर अंदर ले जाती हुई बोली - अभी बनाती हूं चाय।
उस भद्र महिला ने खुद से दोबारा बोलना शुरू किया - मेरे पति बिजली के सामान की ठेकेदारी करते हैं। बड़ी बड़ी सरकारी बिल्डिंगों का इलेक्ट्रिफिकेशन.
इतने में पत्नी चाय ले आयी। चाय रिकॉर्ड टाइम में बनी है। मतलब यह कि जल्दी से चाय पिए और दफा हो।

Thursday, April 13, 2017

सफ़ारी का सफ़र

- वीर विनोद छाबड़ा
एक ज़माना था सफ़ारी का भी। शुरुआत में कोई इक्का-दुक्का। हमारे चेयरमैन साहब अक्सर सफ़ारी पहन कर आते थे। बड़े लोग, बड़ा पहनावा। लेकिन धीरे-धीरे इसका चलन इस कदर फैला कि हर तीसरा-चौथा बंदा सफ़ारी ओढ़े दिखने लगा।

हमारे दफ़्तर में तो सफ़ारीधारियों की बाढ़ सी आ गई। कुछ लोग दर्जन भर एक साथ सिलवा लेते थे और रोज़ बदल बदल कर पहना करते थे। इसका मतलब होता था कि प्रमोशन नज़दीक है।
पूर्ण समाजवाद के दर्शन होते थे उन दिनों। चेयरमैन भी सफ़ारी में और बाबू भी। बात यहीं तक रहती तो ग़नीमत थी। कई कतिपय चतुर्थ श्रेणी कर्मी भी सफ़ारी में इठलाते दिखने लगे।
सफारियों को देख हमें जाने क्यों खुन्नस रही। हमारे ख्याल से भेड़चाल थी यह। किसी अंग्रेज़ मुल्क से आया है यह सफ़ारी। ज्यादा दिन चलने वाला नहीं यह फ़ैशन।
लेकिन बकरे की मां कब तक खैर मनाती। परिवार और मित्रों का बहुत प्रेशर पड़ा। बिना सफ़ारी के हर महफ़िल में हम एक अलग-थलग प्राणी होते थे, एक दम समाज से कटे हुए। सब किसी न किसी बात पर हंस रहे होते थे। लेकिन हमें लगता था कि हम पर मानों हंस रहे हैं। हम भी नहीं चाहते थे कि लोग हमें असामाजिक प्राणी समझें। इतिहास भी हमें धारा के विपरीत चलने वालों सनकीयों के रूप में याद रखे।
सो हम भी पहुंच गए एक दिन दरजी के पास। उस वक़्त हमारी हालत युद्ध में पराजित आत्मसमर्पण किये सैनिक की भांति थी। हमें लगा दरजी भी हमारी मनोस्थिति भांप गया। मानों वो हमें देख कर व्यंग्य से मुस्कुरा रहा है, फंस गए बच्चू।
बहरहाल, हम भी सफ़ारीधारी हो गए। एक पराजित शख्स। लेफ़्ट से राईट में चले गए। साथियों ने इसे ग्रेट हृदय परिवर्तन का नाम दिया, एक असाधारण घटना। सुबह से शाम तक बधाईयों का तांता लगा रहा। ग्रैंड पार्टी भी ले ली। जितने का सफ़ारी नहीं, उससे ज्यादा का चूना लगा।
हमने इस कुल जमा तीन-चार बार ही सफ़ारी पहना। आख़िरी बार का पहना हुआ याद है। ऑफिस में लिफ़्ट का इंतज़ार कर रहे थे कि एक भद्र महिला सहकर्मी ने मुस्कुरा कर कहा - सर, बहुत अच्छे लग रहे हैं, बिलकुल हीरो। चाय तो बनती है। हम खिल उठे। उन दिनों हम जेब में टाफियां रखा करते थे। चाय की जगह फ़ौरन उनको एक टॉफी ऑफर कर दी। वो खुश हो गयी।
इधर दिल ने दिल से कहा - यार, एक महिला कह रही है तो ज़रूर कोई ख़ास बात होगी। महिलाएं किसी की झूठी तारीफ़ नहीं करतीं। दो-चार और सिलवा लूंगा।

Wednesday, April 12, 2017

उस लॉर्ड्स टेस्ट को वीनू बनाम इंग्लैंड कहा गया

- वीर विनोद छाबड़ा
12 अप्रैल 1917 को जन्मे महान हरफनमौला वीनू मांकड़ आज अगर होते तो सौवां साल मना रहे होते। यों तो कई हैरतअंगेज़ कारनामे उनके नाम हैं, लेकिन सबसे ऊपर है 1952 का लॉर्ड्स टेस्ट,जो इतिहास में 'मांकड़ बनाम इंग्लैंड' ने नाम दर्ज है। मजे की बात यह है कि मांकड़ टूरिंग भारतीय टीम के सदस्य भी नहीं थे। दरअसल लीड्स टेस्ट में बुरी तरह हारने के बाद टीम प्रबंधन को होश आया कि वीनू होते तो नाक न कटती। वीनू उन दिनों इंग्लैंड के क्लब क्रिकेट खेल रहे थे। उन्हें बुलावा भेजा गया। इंग्लिश प्रबंधन को भी ऐतराज न हुआ। मगर वे यह नहीं जानते थे कि उनका मुक़ाबला असली शेर से होने जा रहा है। जीत के बावजूद यश उनके नसीब में नहीं बदा होगा। वीनू और स्वंय भारतीयों क्रिकेट प्रेमियों और मठाधीशों को भी नहीं मालूम था कि वीनू अपने क्रिकेट जीवन का सबसे अहम मैच खेलेंगे।
सुधी पाठक हैरान होंगे कि आखिर वीनू ने ऐसा क्या कर दिया था कि यह मैच मांकड बनाम इंग्लैंड कहलाया। सच यह है कि मैच का हर पल तफ़सील से ज़िक्र के काबिल है। मगर अल्फाज़ों की कमी के कारण मुख़्तसर में ब्यौरा यों है।
वीनू मांकड़ ने भारत की 235 रन की पहली पारी में धूंआधार 72 रन बनाये। जवाब में इंग्लैंड ने 537 का विशाल स्कोर खड़ा कर दिया। वीनू ने 73 ओवर डाले थे, जिसमें 196 रन के खर्च पर उनकी झोली में 5 विकेट गिरे थे। यानी वीनू अकेले ही अंग्रेज़ों की मुख़ालफ़त करते रहे। अंग्रेज़ विद्वानों  और प्रेस ने भी वीनू बहुत तारीफ़ की। लेकिन साथ-साथ भारत की हार की कहानी भी मोटे मोटे हरफ़ों में दीवार पर लिख दी।

अब भारत को हारना तो था ही। मगर चर्चा इस बात की ज्यादा थी कि क्या 302 रन बना कर भारत पारी की हार से बच पायेगा? ज़हनी तौर पर भारतीय ख़ेमे का कोई भी बल्लेबाज़ इस चुनौती को कबूल करने की हालत में नहीं था। महज़ औपचारिकता ही पूरी करनी थी। मगर वीनू का इरादा कुछ और ही था। वो मैदान छोड़ने से पहले अंग्रेज़ों को छटी का दूध याद दिलाना चाहते थे। और सचमुच उन्होंने ऐसा कर दिखाया। क्रिकेट के मक्का लार्डस के मैदान में उस दिन ऐसी धूंआधार बल्लेबाज़ी की कि अंग्रेज़ी टीम का हर हथियार नाकाम हो गया। अंग्रेजों ने मान लिया कि उन्हें अकेले दम पर शिकस्त देने वाला क्रिकेट की दुनिया में कोई है तो वो वीनू मांकड़ ही है, सिर्फ वीनू। भारत की दूसरी पारी में 378 रन बने, जिसमें वीनू का स्कोर था 184 रन। कितनी हैरतअंगेज़ रही होगी ये पारी इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि जब वीनू आऊट हुए थे तो भारत का स्कोर था 3 विकेट पर 270 रन। मैच का लुत्फ़ उठा रहे विद्वानों ने किताबों में लिखा है कि उनके आऊट होने से ऐसा लगा था मानों संभावित प्रलय थम गयी है। मगर अफसोस बाकी के बल्लेबाजों ने वीनू से कोई सबक हासिल नहीं किया और महज़ 108 रन ही और जोड़ पाये।

आखिरकार इंग्लैंड ने ज़रूरी 79 रन बना कर 8 विकेट से मैच जीत लिया। लेकिन कहानी का दि एंड इतना सिंपल नहीं था जितना स्कोर कार्ड दिखाता है। इंग्लैंड को दूसरी पारी में भी वीनू ने अपनी जादुई स्पिन से खूब परेशान किया। उन्होंने 24 ओवर डाले। अगरचे उन्हें विकेट नहीं मिला, लेकिन लेन हट्टन और डेनिस काम्पटन जैसे वर्ल्ड क्लास बल्लेबाज़ों को कई दफे़ पसीना पोंछने पर मजबूर किया। कुल 24 घंटे, 35 मिनट चले इस मैच में 18 घंटे, 45 मिनट तक वीनू मैदान में रह कर बेहद मजबूत अंग्रेज़ों की नाक में दम करते रहे।

Tuesday, April 11, 2017

फूलन को हम फिल्मायेंगे, गांधी को एटनबरो!

- वीर विनोद छाबड़ा
Gandhi
कोई पैंतीस बरस पहले १९८२ में इंग्लैंड से आये जाने-माने एक्टर और फ़िल्म मेकर रिचर्ड एटनबरो ने एक फ़िल्म बनाई थी - गांधी। भारत सरकार का पैसा लगा था उसमें। हमने एक बार नहीं दो तीन मरतबा देखी वो फ़िल्म।
दो राय नहीं कि गांधी बहुत अच्छी फ़िल्म थी और दस्तावेज़ी कहलाने के काफ़ी करीब रही। लेकिन हम एटनबरो की गांधी को एक अंग्रेज़ की नज़र से बनाई फिल्म मान कर देखते रहे। उनका गांधी को देखने का अपना नज़रिया था। और अच्छी बात यह थी कि उनका नज़रिया पॉज़िटिव था।
लेकिन जब हम यह देख रहे तो हमें रह-रह कर बहुत गुस्सा भी आ रहा था। एक अंग्रेज़ को ही क्यों फ़िक्र हुए गांधी बनाने की? यह पहल हमने क्यों नहीं की? क्या हमारे पास संसाधन नहीं थे या सोच की कमी? क्या इसलिये कि हमें डकैतों पर और क्राईम पर फ़िल्में बनाने से फुरसत ही नहीं मिलती? हालांकि बाद में हमने गांधी पर फ़िल्में बनायीं। गांधी - माई फादर, महात्मा, हे राम, द मेकिंग ऑफ़ महात्मा, नाइन आवर्स तो राम, मैंने गांधी को नहीं मारा आदि। लेकिन एटेनबरो के 'गांधी' पहले थे और अभी तक टॉप पर हैं।
Saeed Jaffary as Sardar Patel in Gandhi
गुणवत्ता और तथ्यात्मक पहलूओं के दृष्टिगत 'गांधी' अच्छी थी। ऐतिहासिक तथ्यों को टुकड़ों-टुकड़ों बांटने के बावजूद कसी हुई पटकथा। 
इसके लगभग सारे आर्टिस्ट लगभग अनजान थे। ज़हन में किसी की कोई इमेज नहीं थी। जैसे बेन किंग्सले (गांधी), रोहिणी हट्टंगड़ी (कस्तूरबा) अमरीश पुरी (खान), वीरेंद्र राज़दान (मौलाना आज़ाद) रोशन सेठ (नेहरू) आदि। सभी बेहतरीन और मंझे हुए आर्टिस्ट। तभी तो अपने किरदारों में भी रचे-घुले दिखे। 

Monday, April 10, 2017

दुनिया न माने

-वीर विनोद छाबड़ा
व्ही शांताराम ने 1937 में एक फिल्म बनाई थी - दुनिया न माने। शायद यह लीक से हट कर बनी पहली फ़िल्म थी। इस फिल्म ने शांताराम को ही नहीं मराठी सिनेमा को भी विश्व पटल पर विशेष दर्जा दिलाया था।
Shanta Apte
मूलतः यह फिल्म मराठी में 'कुंकु' और हिंदी में 'दुनिया न माने' के नाम से साथ साथ बनी थीं। इस फ़िल्म ने न सिर्फ भारतीयों के मानस पटल को झकझोरा था वरन बॉक्स ऑफिस पर भी तहलका मचाया था। यही कारण था कि ये वेनिस फिल्म फेस्टिवल में भी दिखाई गयी।
नारायण हरि आप्टे के मराठी नॉवल 'ना पटणारी गोष्त' पर आधारित इस फ़िल्म की कथा यों है। अनाथ निर्मला (शांता आप्टे) को उसके चाचा-चाची ने पाल-पोस कर बड़ा किया है। गुणी निर्मला बड़े सपने देखती थी। उसका ख्याल रखने वाला सुंदर सा दूल्हा होगा और उसे ढेर प्यार देगा। लेकिन चाचा-चाची ने पैसों की लालच में उसका ब्याह 67 साल के विधुर काकासाहेब (केशवराव दाते) से रचा दिया। इस सच का पता उसे तब चला जब वो ससुराल की देहरी पर कदम रखती है। निर्मला डर जाती है। छल किया गया उससे। एक पिता तुल्य व्यक्ति उसका पति कैसे हो सकता है। चाचा-चाची ने उसे धोखे में रख कर घृणित काम किया है। उसने कृतघ्न पति को अपना बदन छूने नहीं दिया।
V.Shantaram
पति काकासाहेब कुछ नहीं कर सके। वो किंकर्तव्यविमूढ़ थे। ठगे रह गए। वो समाज में प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। उन्हें भी नहीं मालूम था कि निर्मला के साथ धोखा हुआ है।
इधर निर्मला फैसला करती है कि वो इस नर्क से निकल कर रहेगी। घर में उसका सामना सौतेले बेटे से होता है जो उस पर बुरी नज़र रखता है। वो उसे झिड़क कर अपनी मजबूती का अहसास कराती है। पति की चाची है जो हर समय उसे पत्नी के कर्तव्य का पालन करने का उपदेश देती है। एक सौतेली बेटी है जो विधवा है, लेकिन समाज सुधारक है। वो उसकी हमदर्द बनती है।

Sunday, April 9, 2017

नहाना सेहत के लिए निहायत ज़रूरी

- वीर विनोद छाबड़ा
पिछले दिनों एक बढ़िया खबर आई थी। धोबी घाट, धोबी और गधों के दिन बस गिनती भर के ही बचे हैं। विदेशी वैज्ञानिकों ने ऐसे कपडे तैयार कर लिए हैं कि पानी में डालो और निकालो। हो गए साफ़। फिर धूप दिखाई नहीं कि सूख गये।

यह तो चमत्कार हो गया। हमारे जैसे अनेक निठल्लों के लिए तो वरदान है यह। हफ्ते-हफ्ते बाद कपड़े धोते हैं। गर्मी में भी एयर कंडीशन में बैठे रहते हैं। नहाने की ज़रूरत तभी पड़ती है, जब बिजली घंटों गुल रहती है। हम तो सर्दी में तो अंडरगार्मेंट सहित एक जोड़े के साथ पखवाड़ा तो निकल ही जाता है। सर्दी में पहने कपड़े गर्मी में उतारते और धोते हैं। 
हमारी मेमसाब मास्क लगा कर बगल से गुजरतीं हैं - छी छी। इतनी बदबू! तुम तो जानवरों से भी गए बीते हो। तुम्हें तो चिड़ियाघर में मगरमच्छ के बदबूदार तालाब में डालना सही होगा।
हमें दोस्त दरवाज़े से ही विदा कर देते हैं। तमाम तरह की खुशबूओं से तर होने के बावजूद ऑटो वाला हमें देखते ही ऑटो आगे बढ़ा लेता है। ऑटो गंदी हो जाएगी। 
हमारे प्रिय मित्र गण मज़ाक उड़ाते हैं। हम तो जुम्मे के जुम्मे वाले हैं, मगर तुम तो दिवाली में पहना और होली पर उतारने वालों में हो। वाह!
लेकिन इस नई ईजाद ने हमारी सारी मुश्किलें आसान कर दी हैं। जाड़ा हो या गर्मी। दो छींटें मारे कपड़ों पर, साफ़ हो गए। और फिर धूप को शक्ल दिखा दी बस। सूख गए। हो गया काम।
हमने तो आगे भी सोचना शुरू कर दिया है। काश कोई मशीन ऐसी भी ईजाद हो जाये जो मुंह में निवाला भी डाल दे और हम अपने कम्प्यूटर पर बैठे रहें।
हमने अपने एक ज़ईफ़ मित्र से मन की यह बात शेयर की तो उसने पलटवार कर दिया। निठल्लेपन की हद ही हो गई। फिर कहोगे ऐसी भी मशीन आ जाए जो पख़ाना भी खींच कर ले जाये।