Monday, April 17, 2017

ये बिल्ली मौसी कब बनी?

-वीर विनोद छाबड़ा
हमारे घर में हर समय कोई न कोई बिल्ली मौजूद रहती है। आजकल भी है। यह बिल्ली कौन है? कहां से आयी? मालूम नहीं। दोपहर में आती है। देख कर म्याऊं म्याऊं करती है। हम भी जवाब में म्याऊं म्याऊं करते हैं। फिर वो पसड़ कर गलियारे में बैठ जाती है। कभी कबाड़ की तरह खड़े स्कूटर के नीचे पसड़ जाती है। ठंडा-ठंडा कूल कूल लगता है। भयंकर गर्मी जो पड़ रही है।
अभी कुछ महीने पहले जब सर्दियां थीं तो यही बिल्ली स्कूटर की गद्दी पर बैठ कर बड़े ठाठ से धूप सेंका करती थी।
प्रसंगवश बता दें हम कि इसी बिल्ली की किसी पूर्वज बिल्ली ने आठ-नौ साल पहले हमारे स्कूटर की गद्दी नाखूनों से नोच मारी थी। नया-नया स्कूटर था तब। नई गद्दी की सबसे बड़ी दुश्मन होती हैं यह। इससे पूर्व वाली स्कूटर की गद्दी भी इन्होंने ही नोची थी।
बचपन में खूब कहानियां पढ़ी हैं हमने बिल्ली की। इसकी चालाकी और धूर्तता की। इसे मौसी कहा जाता था। यह आज तक नहीं मालूम कि बिल्ली के साथ मौसी क्यों लगाया जाता है? क्या मौसियां ऐसी ही होती हैं। भई, हमारी मौसी तो बड़ी अच्छी थी। दिल्ली में रहती थी। हमारा प्रिय बेसन का हलवा खिलाती थी। लौटते हुए दो रूपए भी हाथ पर रख देती थी। पर्याप्त होते इतने रूपए। साठ का दशक था वो। मौसी अब दुनिया में नहीं है। बहुत याद आती है, जब किसी बिल्ली मौसी को देखता हूं। यों हमें वो तमाम चंट किस्म की महिलाएं भी याद आती हैं जो यूनिवर्सिटी में हमारे साथ पढ़ा करती थीं और मक्खन लगा कर नोट्स लिया करती थीं। और सहकर्मी महिलाएं भी याद आतीं हैं जिन्हें स्वेटर बुनने के अलावा कुछ नहीं आता था और मुस्की मार कर फाईल पर नोट लिखने के लिए मदद लेने आया करती थीं। 
कहते हैं बिल्लियां एक जगह ज्यादा दिन नहीं टिकतीं। मां बताया करती थी कि बिल्लियां रास्ता भूल जाया करती हैं। इसीलिए किसी दिन अचानक गायब हो जाती हैं। उनका स्थान दूसरी कोई रास्ता भूली ले लेती हैं। हमने महसूस किया है कि हमारे घर में भी चार-पांच महीने के बाद बदली हुई बिल्ली दिखती है। 
हमारे घर बिल्लियों का आना-जाना लगा रहता है। हमें कोई प्रॉब्लम नहीं होती जब तक कि घर में नहीं घुसतीं।

यह ठीक है कि बिल्ली घर में घुसी नहीं कि चूहे नदारद। लेकिन नुकसान बहुत करती हैं। निकालना बहुत मुश्किल होता है। कभी पलंग के नीचे तो कभी टीन  वाले बड़े संदूक के नीचे। हम डंडा लेकर पीछे दौड़ते हैं। इधर से उधर खूब दौड़ातीं हैं।
कई साल पहले जाने कब खुले रोशनदान के रास्ते एक बिल्ली हमारे घर में घुस गयी और तीन बच्चों को जन्म दिया। सर्दी के दिन थे। तरस आ गया। बच्चों को बाहर नहीं किया। दिन भर बिल्ली इधर-उधर मटरगश्ती करती थी। रात होते ही लौट आती। उसके बच्चे थोड़े बड़े होने पर दिन भर हमारे घर में इधर-उधर फुदका किये। कभी-कभी बगल में आकर बैठ भी जाते थे। हम प्यार से उनके सर पर हाथ फेरते थे तो वो और भी सट जाते थे। एक दिन वो इन्हें हमारे घर से लेकर जाने कहां चली गयी। शायद हम इंसानों से डर गयी। हमने भी शुक्र मनाया। और पहला काम या किया कि रोशनदान बंद कर दिया। लेकिन याद बहुत दिनों तक बनी रही। 

पिछले साल दो बिल्ली के बच्चों ने कार के नीचे डेरा जमा लिया था। जब कार बाहर निकालनी होती तो बहुत तंग करते थे। हमें भी डर लगता था कि कोई पहिये तले तब न जाए। उनकी तस्वीर हमने फेस बुक पर डाली थी। कुछ दिनों बाद जाने कहां गायब हो गए।
लेकिन जब यह बिल्लियां रात इंसानों के तरह रोती हैं तो बड़ी ख़राब और मनहूस लगती हैं। वर्चस्व को लेकर आपस में लड़ती भी खूब हैं। नोच डालती हैं एक दूसरे को।

बताते हैं शेर के फैमिली से बिल्ली का रिश्ता है। शेर की मौसी है कहलाती है यह। नानी बताया करती थी कि शेरनी को शिकार करना इसी बिल्ली ने सिखाया। और फिर यही शेरनी उसके दुश्मन बन गयी। लेकिन बिल्ली भी मौसी ठहरी। बचने का उपाय इंतज़ाम उसने कर लिया। उसने शेरनी को पेड़ पर चढ़ना नहीं सिखाया। 
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2 comments:

  1. बिल्ली मौसी नहीं शैतान हे

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  2. बिल्ली मौसी नहीं शैतान हे

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