Monday, May 22, 2017

उन्होंने पत्र को ही लेख बना दिया

- वीर विनोद छाबड़ा
पत्र लेखन से संबंधित मुझे एक किस्सा याद आ रहा है ।
बात १९८८ की है। क्रिकेट के 'डॉन' सर डॉन ब्रैडमैन २७ अगस्त को ८८ साल के होने जा रहे थे। मैं डॉन का ज़बरदस्त फैन था। उन पर कई लेख लिख चुका था। लेकिन इस बार इस कुछ अलग हट लिखना चाहता था। मैंने विषय चुना उनकी आख़िरी पारी का। इसमें वो शून्य पर आऊट हुए थे। अगर चार रन बना लेते तो उनका टेस्ट एवरेज सौ हो जाता।
लेकिन क्रिकेट तो महान अनिश्चिताओं का खेल है। होता वही है जो नियति में बदा होता है।
इरादा किसी स्थानीय अख़बार में देने का था। लेकिन फिर सोचा, अभी समय है, बाहर भेज दूं, किसी बड़ी खेल पत्रिका को।
उन दिनों इंदौर से एक प्रकाशित होती थी - 'खेल हलचल', खेल के विषय में एकमात्र हिंदी साप्ताहिक। मुझे बहुत पसंद थी। यह 'नई दुनिया' समाचार समूह का प्रकाशन था। मैंने उन्हें लेख भेज दिया।
चूंकि उन्हें पहली बार रचना भेज रहा था, इसलिए साथ में एक पत्र नत्थी किया। पत्र में प्रथमता अपना परिचय दिया। तदुपरांत लेख की महत्वत्ता के संबंध में विस्तार से लिख दिया। मुझे लगा कि पत्र कुछ ज्यादा ही लंबा हो गया है। फिर सोचा, जाने दो। संपादक जी को तो लेख से मतलब है। मर्ज़ी होगी तो पत्र पढ़ेंगे अन्यथा रद्दी की टोकरी तो हर संपादक के बगल में रखी ही रहती है।
बहरहाल, कुछ दिनों बाद लेख प्रकाशित हो गया। लेकिन मुझे सदमा लगा। लेख नहीं छपा था, बल्कि मेरा पत्र लेख छपा हुआ था, लेख के रूप में।
मैंने फ़ौरन संपादक जी को नाराज़गी भरा पत्र लिखा। कोई जवाब नहीं आया। दो-तीन बार स्मरण भी कराया। तब भी कोई असर नहीं पड़ा।
झल्ला कर मैंने अपने पत्रकार मित्र विजय वीर सहाय से बात की। वो 'स्वतंत्र भारत' में फीचर देख रहे थे।
उन्होंने कहा - इसमें परेशान होने वाली क्या बात है? अरे, उनको लगा होगा कि पत्र में तुमने ब्रैडमैन के बारे में ज्यादा बेहतर लिखा है। इसीलिए इसे उन्होंने छाप दिया और लेख फाड़ रद्दी की टोकरी में फेंक दिया होगा।

Sunday, May 21, 2017

राजेश खन्ना उस दौर में वाकई टॉप पर थे

- वीर विनोद छाबड़ा
Rajesh Khanna with Sharmila in Amar Prem
राजेश खन्ना अपने दौर में वाकई सुपरस्टार थे। वो उस दौर को परदे बाहर भी पूरी शान-ओ-शौकत के साथ जी रहे थे। दो राय नहीं कि वो बेहतरीन कलाकार थे। तब तक आखिरी खत, राज़, आराधना, कटी पतंग, अमर प्रेम, आनंद, डोली, सच्चा-झूठा, अंदाज़ आदि दर्जन भर से ज्यादा फ़िल्में उनकी रिलीज़ हो चुकी थीं। कई तो बॉक्स ऑफिस पर ज़बरदस्त हिट थीं।
लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि वो बहुत संवेदनशील व्यक्ति थे। ज़रा सी भी चोट बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। कुछ इसे फुटबाल साइज़ ईगो के रूप में देखते हैं। लेकिन इस सच से इंकार करना बहुत मुश्किल है कि राजेश खन्ना जैसी शख्सियत उस दौर में 'हवा हवाई' नहीं थी।
राजेश खन्ना की 'अमर प्रेम' को हम उनकी सबसे बेहतरीन फिल्म मानते हैं। १९७१ में रिलीज़ हुई इस फ़िल्म में वो एक ऐसे मुश्किल किरदार को बहुत सहजता से अदा करते हुए दिखते हैं जिसे घर से कोई ख़ुशी नहीं मिलती और उस ज़िंदगी को वो कोठों पर तलाशता फिरता है।
इस फ़िल्म में उनकी परफॉरमेंस को १९७२ में फ़िल्मफ़ेयर ने ईनाम देने के लिए नामांकित किया। यह वही अवार्ड फंक्शन था जिसमें प्राण साहब ने बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का ख़िताब लेने से इसलिए मना कर दिया था क्योंकि 'पाकीज़ा' में गुलाम मोहम्मद को संगीत के लिए ख़िताब देने से इंकार करके आयोजकों ने बड़ी बेइंसाफी की थी।
राजेश खन्ना के साथ भी ऐसा ही हुआ। उन्हें पता चल गया कि बेस्ट एक्टर का अवार्ड मनोज कुमार को 'बेईमान' के लिए दिए जाने का फैसला कर लिया गया है। बहुत आहत हुए वो ये सुन कर। उन्हें लगा कि यह अपमान है, उनका ही नहीं बल्कि एक बेहतरीन परफॉरमेंस का भी, जिन्हें उन्होंने बड़ी शिद्दत से जीया है।
लेकिन राजेश उन लोगों में नहीं थे जो चुपचाप सह लें। ऊपर से सुपरस्टारडम को भूत। उन्होंने फैसला किया एक बहुत बड़ी पार्टी का, ठीक अवार्ड नाईट के वक़्त में, आयोजित करेंगे। फिल्म इंडस्ट्री के तमाम छोटे से बड़े तक को न्यौता चला गया। बड़ी तादाद में 'न्यौता कबूल है' की मुहर भी लग गयी।
जब फ़िल्मफ़ेयर वालों को पता चला तो उनके पैर तले से ज़मीन खिसक गई। अवार्ड नाईट फेल होने की नौबत आ गयी। प्राण साहब ने अवार्ड लेने से इंकार करके पहले से ही विवाद खड़ा कर रखा था। और अब राजेश खन्ना की एक प्रकार की यह धमकी। हिल गए आयोजक।
बहरहाल, बड़ी मुश्किल से मना पाए वे राजेश खन्ना को। सुना है कुछ बड़े प्रोड्यूसर, डायरेक्टर्स और सीनियर कलाकारों की सेवाएं भी ली गयीं थीं।

Friday, May 19, 2017

बाप बाप होता है और.…

-वीर विनोद छाबड़ा
Govinda & Amitabh in Bade Miyan, Chote Miyan
कभी अतीत की कोई पोस्ट इसलिये अच्छी लगती है क्योंकि उसमें कोई अतीत का बंदा आकर अतीत की याद दिलाता है।
ऐसी ही एक अतीत की पोस्ट। 
करीब ढाई साल पहले की बात है। रात डेढ़ बजे का समय। आंखों से नींद गायब है। बिस्तर पर ख़ामख़्वाह करवटें बदलने से बेहतर है कि फेसबुक खोल कर बैठ जाओ। वही किया मैंने।
सहसा मेसेज बॉक्स खुल गया। राम भाटिया का नाम उभरा। पूछ रहे थे, कैसे हैं?
मैंने कहा ठीक हूं। फिर सोचने लगा, कौन है यह बंदा? प्रोफाइल चेक किया। बंदा हिन्दुस्तान मीडिया का था। देखा-भाला लगता है।
स्मृति पर पड़ी धूल की मोटी परत थोड़ी झाड़ी ही थी कि याद आ गया। अरे, यह तो राम चन्दर भाटिया है। इसे मैंने किशोरावस्था से युवावस्था में जाते हुए देखा था। मेहनती और जिज्ञासू बंदा है। 
मैं सिनेमा और क्रिकेट पर लिखता था। वो मेरा फैन था। अक्सर घर भी आता था, कुछ सलाह-मशविरा लेने।  उन दिनों मैं पुलकित होता था ये जान कर कि सिनेमा और क्रिकेट के स्थानीय लेखकों के भी प्रशंसक होते हैं।
इतने बरस बाद भी भाटिया ने मुझे याद रखा, यह भी मेरे लिए सुखद आश्चर्य की बात थी। वरना सिनेमा और क्रिकेट के लोकल लेखक की बिसात लेखन संसार में ज़र्रे से भी कम है। हमें ही याद दिलाना पड़ता है कि मैं फलाना हूं और इन विषयों पर लिखता हूं। बहुत ख़राब लगता था जब अगला कहता था कि उसकी इन विषयों में कोई दिलचस्पी नहीं है, इसलिए अख़बार के इन सफ़ों को वे बिना खोले की आगे बढ़ लेते थे।
बहरहाल, भाटिया ने लेकिन आगे जो लिखा, उसका जोल्ट बहुत ज्यादा सुखद था।
उसने बताया कि हिन्दुस्तान, लखनऊ में प्रकाशित उसे मेरा लेख 'बड़े मियां छोटे मियां' इतना पसंद आया था कि आज भी याद है।
मुझे याद आया कि अक्टूबर, १९९८ में मैंने वो लेख लिखा था। इसमें मेरा दृष्टिकोण यह था कि फिल्म 'बड़े मियां, छोटे मियां' की कामयाबी कोई मायने नहीं रखती है। ज्यादा देखने वाली बात तो यह होगी कि आज के दौर में 'सिनेमा के पर्दे के बड़े मियां' गोविंदा हैं या अमिताभ बच्चन। 
दरअसल, यह नब्बे के दशक के अंतिम दौर की बात है। उन दिनों गोविंदा की पतंग सातवें आसमान पर उड़ रही थी और बॉक्स ऑफिस पर एक के बाद एक नाकामियों से घायल अमिताभ फड़फड़ाने तक के लिए झटपटा रहे थे।

Thursday, May 18, 2017

अब कहां जायें हम?

- वीर विनोद छाबड़ा
हम लखनऊ के चारबाग़ रेलवे स्टेशन के सामने रेलवे की तिमंज़ली मल्टी स्टोरी बिल्डिंग में २१ साल रहे। पचास कदम पर पूर्वोत्तर रेलवे का लखनऊ जंक्शन। दो सौ मीटर की दूरी पर चारबाग़ राजकीय बस अड्डा। सामने मेन रोड थी। आलमबाग से हज़रतगंज जाने वाला सारा ट्रैफिक वहीं से गुज़रता था। बस अड्डे से गोरखपुर-बनारस की दिशा की ओर जाने वाला ट्रैफिक भी वहीं से होकर जाता था। सड़क पर कोई गड्ढ़ा बन गया या टूट गयी तो समझ लीजिये कोढ़ में खाज। ट्रैफ़िक के शोर प्लस गड्ढ़े में के ऊपर से गुज़रने का शोर।
हम तिमंज़ले पर रहते थे, कोने वाले मकान में। कुल तीन खिड़कियां थीं। बंद करने पर भी सड़क पर गुज़रते वाहनों का शोर। सुनने के आदी हो गए थे। लेकिन जब पढ़ने बैठे तो पागल हो गए।
फिर स्टेशन के सामने रहने का अलग से ख़ामियाज़ा भी। किसी न किस वज़ह से कोई न कोई मेहमान बना ही रहता। मसलन चार घंटे ट्रेन लेट हो गई। अब घर जाकर क्या करेंगे? किसी को सुबह सवेरे ट्रेन पकड़नी है तो वो रात को आ गया। कहां जायें हम?

मां छत पर भेज देती थी। वहां शोर फैला हुआ मिलता। ऊपर खुला आसमान। पढ़ने में दिल लग जाता था। गर्मियों में खम्मन पीर का उर्स। तीन-तीन दिन तक रात भर जगह-जगह कव्वालियां। लेकिन हम छत पर टेबल लैंप की रोशनी में जैसे-तैसे फोकस करते रहे और गिरते-पड़ते पास भी हो गए। हमारी कॉलोनी के कई लड़के तो इस शोर में भी पढ़ते हुए फर्स्ट आये। कोई डॉक्टर बन गया तो कोई इंजीनियर। हम फिस्सडी थे, इसलिए बाबू बनना नसीब में रहा। गो, वो बात दूसरी है कि हम बिजली बोर्ड से डिप्टी जीएम की पोस्ट से रिटायर हुए।
अस्सी के दशक की शुरूआत में हम चारबाग़ छोड़ कर इंदिरा नगर के डी ब्लॉक में शिफ्ट हुए तो अहसास हुआ कि हम जंगल में आ गए हैं। सिर्फ़ दर्जन भर मकानों में रहते थे लोग। बगल से गुज़रती कुकरैल फारेस्ट रोड। रात में कुत्ता भी टहलता हुआ दिखा तो लगा कि भेड़िया है। कस कर दरवाज़े बंद कर लेते थे।
न सड़क का शोर और न इंजिन की कूक और न ट्रेन की खड़खड़। वहां रूरल फीडर से बत्ती आती थी। जाती तो कई कई घंटो तक न लौटती। कई बार दो दिन बाद आई। सन्नाटा हमें दिन में भी डराता रहा। महीनों तक नींद नहीं आई। बार-बार किसी न किसी बहाने चारबाग़ भागते थे। संयोग से पत्नी का मायका भी उधर पानदरीबा में था। कई बार हमने स्टेशन के जेनरल वेटिंग रूम में भी शरण ली।

Wednesday, May 17, 2017

वो यम नहीं बरेठा था

-वीर विनोद छाबड़ा 
मेरे साथ छोटी-मोटी दुर्घटनायें और टूट-फूट लगी रहती हैं। दो साल इन्हीं दिनों की बात है।
आसमान पर घने बादल थे। मैं घर लौट रहा था। इंद्र देवता से मना रहा था, दस मिनट रुक जाओ। तब तक मैं घर पहुंच जाऊंगा। फिर जी भर कर बरसना। लेकिन उन्होंने मेरी इल्तज़ा पर ध्यान नहीं दिया। बरस ही पड़े। तब मैं घर से करीब तीन किलोमीटर दूर था।
मैंने स्कूटी रोकी। वहां एक कपड़े इस्त्री करने वाले बरेठे का डेरा था। धूप-पानी से बचने के लिए ऊपर मोटे पॉलीथीन की चद्दर वाली छत। पुरानी होने के कारण उसमें चार-पांच जगह छेद थे। पानी टपक रहा था। फिर भी बारिश से बचने के लिए उसमें कई लोग घुसे हुए थे। मेरे लिए उसमें कतई जगह नहीं थी।
मैंने आस-पास अन्य आश्रय के लिए नज़र दौड़ाई। सड़क पार कुछ दुकानें और उन पर शेड। सुरक्षित स्थान। कुछ लोग खड़े भी वहां थे। मैंने पीछे मुड़ कर देखा। खाली सड़क थी।
मैंने स्कूटी मोड़ी ही थी कि जाने कहां से बलां की रफ़्तार से एक बाईक आई और उसने मेरी स्कूटी को बीच में ठोंक दिया। मैं उछला कर गिरा। चारों चित्त। मेरी आंखों के सामने अंधेरा छा गया। कुछ पल के लिए लगा मैं परलोक में हूं। किसी ने सहारा दे बैठाया और फिर हाथ खींच कर मुझे खड़ा कर दिया। तब तक मैं उसे दूसरे लोक का ही वासी यम समझता रहा। वो बोला, शुक्र है कि आप बच गए।
तभी मैंने ध्यान दिया कि अरे यह यम नहीं। कोई मनुष्य है देवता के रूप में। याद आया, वो बरेठा था। कई और लोग भी जमा हो गए। मूसलाधार बारिश जारी थी। किसी ने मेरी स्कूटी किनारे खड़ी कर दी। दूर मीटर दूर जा गिरा हेलमेट और घड़ी उठाई।
एक्सीडेंट के शॉक मैं बाहर नहीं था। बांह पकड़ कर बरेठा अपनी झोंपड़ी में ले आया। शुक्र है जिस्म की सारी हड्डियां सलामत थीं। हां, खाल ज़रूर चार-पांच जगह से छिल और फट गयी थी। सर में पीछे दर्द हो रहा था। हाथ लगाया तो पाया की मोटा सा रोड़ बन गया है। स्कूटी को देखा। मुझसे ज्यादा चोट लगी है। बरेठे ने एक बीमार सी टूटी कुर्सी पर बैठा दिया। बारिश से भीगा होने के कारण कंपकंपी छूट रही थी। जाने कौन कहीं से चाय ले आया। चाय तो वैसे भी मेरी जान है। मैंने उसे फूंक मार कर फटा-फट सुड़ुक लिया। मैंने खुद को बेहतर महसूस किया। दो-एक ने घर छोड़ने का ऑफर दिया।
लेकिन मैंने उनका अनुरोध क्षमा मांगते हुए अस्वीकार कर दिया। अपने मित्र सत्य प्रकाश को मोबाईल किया। वो मेरी स्कूटी का डॉक्टर है, मुझसे करीब बीस साल छोटा।

Tuesday, May 16, 2017

आत्मा नहीं है ऑनलाइन में

-वीर विनोद छाबड़ा
हमने वो ज़माना देखा है जब हर जगह लंबी कतार थी। राशन की दुकान, मिट्टी का तेल, बैंक, पोस्ट ऑफिस, बिजली, पानी, सीवर, हाउस टैक्स, रेल-बस का टिकट और सिनेमा का टिकट, हर जगह मारा-मारी थी। गरीबों की कतार अलग और सिफाऱिशियों की अलग। दबंग लोग तो जहां खड़े हुए वहीं से कतार शुरू हुई। 
अब सिस्टम थोड़ा आसान हो गया है। हर तरह के पैसे का लेन-देन ऑनलाइन है। साइबर कैफ़े जाना ज़रूरी नहीं है। मोबाईल भी किसी से कम नहीं। दो सेकंड में हज़ारों मील दूर अपने प्रिय को पैसा भेज दो। जनता बड़ी खुश है। समय और ऊर्जा की बचत नहीं बल्कि महाबचत। सारा काम घर बैठे-बैठे। लिहाज़ा भाड़े की भी बचत।
लेकिन जहां फ्री सामान मिलता है, वहां अब भी कतार लगती है। सरकारी अस्पतालों में दवा लेने की कतार। मुफ़्त में पूड़ी-कचौड़ी पाने के लिए कतार। वो बात अलग है कि कुछ लोगों की प्रवृति कतार तोड़ू रही है, उन्हें तो झेलना ही होगा।
लेकिन हमारे जैसे रिटायर और निठल्ले लोग भी प्रचुर मात्रा में हैं जो कतार में लगना पसंद करते हैं। वहां तरह-तरह की बातें होती हैं। देश की, समाज की और परिवार की। कोई बेटे से दुखी है तो कोई पत्नी से और कोई पत्नी अपने निठल्ले पति से। सास-बहु और ननद-भौजाई के बीच तनातनी के मामले भी हमने वहीं डिस्कस होते और निपटाये जाते देखे हैं। रिश्ते भी हमने वहां देखे। जब उसी पंक्ति में महिलायें भी लगी हों तो मर्दों के कंठ से वीरगाथाएं स्वतः बाहर आने लगती हैं। इंसान की फितरत के दर्शन होते हैं। कई के लिए तो समझो यह टैक्स फ्री एंटरटेनमेंट का प्रबंध हो गया।
हम सोचते हैं यदि ऑनलाइन सिस्टम अगर कंपलसरी हो गया तो समस्याओं को सुलझाने का जो मज़ा रूबरू है, वो ऑनलाइन में कहां? चाय-वाय तो ऑनलाइन आने से रही। हमें तो लोकल काल से बेहतर आमने-सामने बैठ कर बात करना अच्छा लगता है। हम तो कहते हैं कि भले ही महीने में एक बार दस पल के लिए ही सही, लेकिन मिलो तो दिल से। हम तो तकरींबन रोज़ किसी न किसी मित्र के घर झांकने चले जाते हैं। यह बताने के लिए कि हम ज़िंदा हैं और यह देखने को कि वो ज़िंदा है। हम सुने हैं कि भीख भी ऑनलाइन होने जा रही है। भिखारी को घर बैठे एक तय राशि मिल जायेगी।
अब ये डिजिटलीकरण हो रहा है। अच्छी बात है। पारदर्शिता और प्रक्रिया में तीव्रता तथा सरलीकरण हो जाएगा। और वो भी फूलप्रूफ। मगर डर भी लगता है कि मानव का यंत्रीकरण न हो जाए। हमने तो हाड़-मांस का मेहनत करता इंसान देख लिया। अब आने वाली पीढ़ी का क्या होगा? शायद वो यह कहेगी - सुना है कोई इंसान ऐसा भी था, जो खुद सोचता था और चलने-फिरने के साथ दौड़ता भी था।
हमारे मित्र मिश्रा जी ऑनलाइन शॉपिंग के नंबर वन हिमायती हैं। दाल-चावल तक ऑनलाईन मंगाते हैं। कहते हैं, बाज़ार से बहुत सस्ता पड़ता है। क़्वालिटी भी ए-क्लास। बड़े गर्व से दूसरों को भी प्रेरित करते हैं।

मेफेयर के गलियारों में सिगरेट का अलग ही मज़ा था

-वीर विनोद छाबड़ा 
सिगरेट पीने की भी कई कलाएं होती हैं। देश, काल और माहौल के अनुसार स्टाइल बदलती है।
अब हाफ रेट के सिनेमाहाल में तो चाहे मुट्ठी में सिगरेट दबा कर पियें या छल्ले निकालें। न कोई रोके और न कोई इमेज बने। वहां तो पिक्चर चलते सिगरेट पियो। इधर हीरो ने सुलगाई, उधर कल्लन मियां को तलब हो आयी।
लेकिन मेफेयर में सिगरेट पीने का अंदाज़ बिलकुल निराला होता था। मेफेयर यानी अपने शहर लखनऊ के साठ और सत्तर के दशक का अंग्रेजी फिल्मों का प्रीमियर सिनेमाहाल। उस दौर में  लखनऊ का एकमात्र पूर्णतया केंद्रित वातानुकूलित छविगृह।
यहां अंग्रेज़ी में  गिटपिटाने वाले अभिजात्य वर्ग और कुलीन वर्ग के बंदे बहुतायत में पाये जाते थे। तकरीबन हर तीसरे-चौथे मुंह के होटों के किनारे दबी हाई क्वालिटी सिगरेट। वहां कल्लन और रामटहल नहीं दिखते थे।
कुल मिला कर वहां का माहौल टोटल अंग्रेज़ी और अंग्रेज़परस्त था। यह उसके माहौल का असर था कि सिर्फ सिगरेट पीने की तमीज़ ही नहीं बदलती थी बल्कि बोलचाल और हाव भाव में भी अंग्रेज़ियत किसी जिन्न की भांति चिपक जाती थी। हिंदी के तमाम धुरंधर प्रेमियों और विद्वानों को वहां मैंने सूट-बूट में और होटों में सिगरेट दबा कर अंग्रेजी में बतियाते देखा है।

Monday, May 15, 2017

ऊपर वाला बहुत समझदार है

- वीर विनोद छाबड़ा
उस दिन शाम की ही बात है। हमें ख़्याल आया कि हमारे जूते घिस चुके हैं। हम भूतनाथ मार्किट के लिए निकले।
मेमसाब ने भी पांच सौ का नोट पकड़ा दिया। कुछ अचार और ढोकला ले आना।
हमने कहा कि पैसे हैं, लेता आऊंगा।
मेमसाब ने जोर दिया, रख लो नहीं तो बाद में कहोगे कि पर्स में पैसे कम हो गए। और हमने पांच सौ रूपये शर्ट की जेब में रख लिए।
बाज़ार पहुंचते ही हम सीधे एक जूते की दूकान में घुस गए। बढ़िया सा जूता दिखाइये। सात-आठ सौ के भीतर, बहुउद्देशीय। मॉर्निंग वॉक भी हो जाए और बाज़ार भी घूम सकूं। और पार्टी-शार्टी में भी चल जाए।
सेल्समैन ने हमें सिर से पांव तक देखा। उसकी निगाहें हमारे घिसे और मैले-कुचैले जूतों पर टिक गयीं।
हमने बताया कि करीब चार साल से पहन रहे हैं इस जूते को। तब साढ़े चार सौ का लिया था बहुत आरामदायक रहा है। झाड़-पोंछ कर हम पार्टियों में भी चले जाते हैं इसे पहने-पहने। रात का टाईम, कौन नीचे देखता है। सब चेहरा देखते हैं। ड्रेस जूता-चप्पल तो दूल्हा-दुल्हन की देखी जाती है।
सेल्समैन ने हमारी बात बहुत गौर से सुनी। जूता पेश किया। बहुत बढ़िया है। ग्लाइडर्स गोल्फ़ ब्लैक। चार सौ अस्सी रूपए का।
हमने कहा, नहीं कोई बढ़िया ब्रांड का दिखाओ।
वो लौट कर आया। दो-तीन ब्रांड ले आया। यह छह सौ का और यह साढ़े सात सौ का। और यह हज़ार का। हमने गौर किया कि हज़ार पर सेल्समेन ने बहुत ज़ोर दिया। शायद वो हमारी औकात को चैलेंज कर रहा हो। 
हमें न उसका अंदाज़ पसंद आया और न ही जूता। कुछ और दिखाओ।
लेकिन उसने जोर कहा - मेरी मानिये। यह चार सौ अस्सी वाला ग्लाइडर्स गोल्फ़ ब्लैक बढ़िया है, कम्फ़र्टेबल। आपकी हर ज़रूरत पूरी करेगा। दो साल निकल जाएंगे आराम से। तब तक नए डिज़ाईन आ जायेंगे।
उसने बहुत विश्वास से यह बात कही। हमें लगा कि यह ठीक कह रहा है। इस बार सेल्समेन के कहने से जूता पहना जाए। हमने कहा - ठीक पैक कर दो।

Sunday, May 14, 2017

पोख

-वीर विनोद छाबड़ा
हमारे एक मित्र हैं राजन प्रसाद। राजन का परिवार पेशावर से संबंधित है और मेरा परिवार पेशावर से करीब दो सौ किलोमीटर के आस-पास स्थित मियांवाली से है। बोली भी तकरीबन एक सी है- यानी सरायकी। 
इस नज़रिये से हम अपने पुरखों के साथ उस संस्कृति की भी याद कर लेते हैं, जो अब कहीं गुम हो गयी है या किसी कोने में पड़ी आख़िरी सांस से पहले की हिचकियां ले रही है।
सरहद पार के पंजाब में ऐसी ही एक परंपरा थी - पोख या पोखा। विभाजन के वक़्त वहां से आये रिफ्यूजी आये तो इसे भी साथ लेते आये । 
हां, पोख है क्या? इसे मिसाल देकर बताता हूं। 
उन दिनों लखनऊ के आलमबाग इलाके के चंदर नगर में रिहाईश थी। मां आचार डालने से पहले कलई किये हुए बड़े से पीतल के थाल में सारा सामान मिक्स करने के लिए जमा करके बैठी है। तभी मैं उसके सामने आ कर बैठ जाता हूं।
मां हुश करके भगाती है - जा बाहर, तेरा दोस्त विंदी तुझे बुला रहा है। गुल्ली-डंडा वेड़े में रखा है। गुलेल वी है। वेख किसी दा शीशा न तोड़ीं।
मैं नहीं जाता था। उल्टा पाल्थी मार कर बैठ गया। क्योंकि में जानता हूं मां झूठ बोल रही है। दरअसल, वो मुझे वहां से भगाना चाहती है। लेकिन मैं वहीँ बैठा रहना चाहता हूं। मुझे आचार डालने का प्रोसेस देखना है। मां फिर भगाती है। मैं अड़ा ही रहता हूं।
मां मुझे इकन्नी देती है - जा कुछ खा ले। पर चूरन नईं खाईं। डंडी वाली आइसक्रीम ले लईं।
लेकिन मुझे दुनिया की कोई ताक़त नहीं डिगा सकी। मैं पसड़ गया।
मां उठी और मेरी बांह पकड़ कर मुझे स्टोर में बंद कर दिया। बोली - तेरा पोखा भैड़ा (ख़राब) हे।
तब मां ने मेरी छोटी बहन को सामने बैठाया और अचार बनाने की प्रक्रिया विधिवत पूर्ण की।
अचार ही नहीं। बाकी कामों में भी यही होता था। वो चाहे सिलाई मशीन पर काम शुरू करना हो या दस्ते में इमाम के साथ मिर्ची कूटना हो। लड़कों को सामने बैठा काम शुरू नहीं करना। ये काम बिगाड़ू होते हैं।
लड़कियों को शुभ माना जाता था। अपनी नहीं है तो पड़ोसन की बेटी को बुला लिया। वो नहीं मिली तो पड़ोस वाली मासीजी  भी चलती थी। बशर्ते वो झगड़ालू नहीं हो। गुणकारी हो तो बहुत ही अच्छी बात।
बताता चलूं कि उन दिनों पड़ोसनों को आंटियां का नहीं मासियां का दरजा हासिल था।
मां कहती थी - जा विमला मासी नू बुला ला। आखीं सलवार कमीज़ सिलणी शुरू करणी हे। पोखा डे जाए।
भंगन (मैला साफ़ करने वाली) भी शुभ मानी जाती थी। बदले में पैसा-दो पैसा नेक देनी ज़रूर बनती थी।

Saturday, May 13, 2017

घिस्सू आदमी

-वीर विनोद छाबड़ा
वो जब भी दिखते हैं तो लगता है अपने आप से बात कर रहे हैं। चेहरा भी सड़ा-सड़ा सा बनाये रखते हैं। कभी कभी तो लगता है बीवी से पिटे हों जैसे। दूसरों से बहुत कम बात करते हैं। दुआ-सलाम का जवाब भी नहीं देते। लेकिन जब बोलते हैं तो समझिए बन गए चिपक गए जोंक की तरह।

इसीलिए लोग उनसे कन्नी काटते हैं। सचिवालय में बाबू थे। डिप्युटी सेक्रेटरी पद से रिटायर हुए। हमें तो महीनों पता चला। हम यही देखते रहे कि रोज़ की तरह थैला उठाया। साईकिल के हैंडल में लपेटा और चल दिए। और शाम को बाकी बाबूओं की साथ लौट आये। सुना है दिन भर ऑफिस में इधर से उधर टूलते रहते थे। कोई लिफ्ट भी नहीं देता था। 
लोग बताते हैं कि बड़े कानूनची किस्म के बाबू थे। बाल में से खाल निकालने वालों में। फाईलों का ढेर लगा रहता था उनके आसपास। इसीलिए अर्जेंट फाईल उन्हें कभी नहीं पकड़ाई गयी। शासन को जिसमें न करनी होती थी, वही फाइलें पकड़ा दी जातीं थीं।
एक दिन हमें चिपक गए - यह स्कूटी कितने की खरीदी?
हमने कहा - खरीदे हुए छह साल हो गए। तब पैंतीस हज़ार के आस-पास थी। सुना है अब पचास की है।
उन्होंने हमारी स्कूटी का घूम-घूम कर क़ायदे से निरीक्षण किया - एवरेज कितना देती है?
हमने कहा - यही कोई ४० के करीब?
उन्हें हैरानी हुई - बस! अच्छा बिकेगी कितने में?
हमने अंदाज़ा लगाया - यही ढाई-तीन हज़ार में।
उन्हें फिर आश्चर्य हुआ - बस! अगर नई खरीद कर बेची जाये तो कितने की बिकेगी।
हम मन ही मन बड़बड़ाये कि किस घोंचू क़िस्म के आदमी से पाला पड़ा है। हम झुंझला गए - बेचने के लिए कोई नयी स्कूटी क्यों खरीदेगा?
उन्होंने आकाश की और ताका - मान लो। हमें सूट न करे तो क्या करेंगे? बेचेंगे ही न?
हमने कहा - तो पुरानी खरीद लीजिये न। मज़ा न आये तो बेच देना।
उनका मनहूस चेहरा एकाएक खिल उठा - वही तो मैं कहना चाह रहा हूं। आप अपनी स्कूटी हमें बेच दो। नहीं भायी तो हम आगे बेच देंगे।
मान न मान मैं तेरा मेहमान। हमने कहा - लेकिन हमें अपनी स्कूटी बेचनी ही नहीं है। बढ़िया चल रही है। चार-पांच साल बाद सोचूंगा, इसे बेचने के बारे में।
वो थोड़ा झेंपे - मैं भी अभी की बात कब कह रहा हूं? चार-पांच साल बाद ही सही।
वो तनिक रुके। उसके बाद फिर जारी हो गए - यह भी हो सकता है कि इस बीच आपका एक्सीडेंट हो जाए और आप.तब तक तो इसकी कीमत और भी कम हो चुकी होगी। बस वायदा करो कि स्कूटी हमीं को बेचोगे। 
हमारे पास पिंड छुड़ाने का एक ही तरीका था कि वायदा कर लिया जाए। और हमने कर लिया। इस करारनामे को हुए चार साल गुज़र गए।
हमारी स्कूटी बढ़िया चलती रही। इस बीच हमारा एक बार एक्सीडेंट भी हुआ। वो बड़ी उम्मीदों से हमें देखने आये। लेकिन उन्हें बड़ी निराशा हुई, जब पता चला कि हमारे जिस्म की सारी हड्डियां सलामत हैं। पुष्टि करने हेतु उन्होंने हमारे हाथ-पैर भी हिलाये।
इसके बाद वो जब-तब हमें हसरत भरी निगाहों से देखते रहे। और हम कन्नी काट कर निकल जाते रहे। जब कभी हम पकड़ में आये तो एक ही सवाल पूछा - नयी स्कूटी कब खरीद रहे हो?
हम बजट नहीं होने का बहाना बना कर खिसक रहे। सिर्फ हमीं नहीं हैं, हमारे जैसे बहुत से लोग हैं। सबसे कोई न कोई वायदा ले रखा है। किसी से फ्रिज का, किसी से एयर कंडीशनर और वाशिंग मशीन का। पुरानी साईकिल तक पर उनकी नज़र है।

लेकिन हमने तय कर लिया था कि जब भी हम नई स्कूटी खरीदेंगे तो पुरानी उन्हें नहीं बेचेंगे। और यही हमने किया भी। क्योंकि यह आदमी माल लपक कर ले लेता है, मगर पैसे देने के मामले में बहुत घिस्सू है। हम ऐसे कई लोगों को जानते हैं जिन्होंने उम्मीद ही छोड़ दी है। एक-दो हज़ार रुपये के लिए क्या लड़ना-झगड़ना और अपनी एनर्जी वेस्ट करना।
---
13-05-2017 mob 7505663626
D-2290 Indira Nagar
Lucknow - 226016

Friday, May 12, 2017

कंजूसों की दुनिया

-वीर विनोद छाबड़ा
सुबह-सुबह की चाय और साथ में दो अदद पार्लेजी के बिस्कुट। डुबो-डुबो कर खाने में खूब मज़ा आता है।
आज सुबह हम टहल से लौट रहे थे कि एक पुराने मित्र मिल गए। अपनी कंजूसी के लिए मशहूर। ज़बरदस्ती घर ले गए। उन्होंने पूछा - चाय चलेगी?
हमें आश्चर्य हुआ। कंजूस आदमी की चाय पीने का आनंद हमेशा कुछ और ही होता है। हमने फ़ौरन हां कर दी।
घोर आश्चर्य हुआ जब चाय के साथ पार्लेजी बिस्कुट भी प्लेट में आया।
दिल में भय भी हुआ कि कहीं ऐसा न हो कि ये कंजूस बदला की ख़ातिर अगले दिन हमारे घर न आ धमके और डबल धमाका कर दे। यानी एक के बदले दो कप चाय सुड़क कर ही उठे।
बहरहाल, हमने देखा कि मित्र ने प्याली में पार्लेजी गहरे डुबोया। और हिला दिया। नतीजा, बिस्कुट का बड़ा हिस्सा टूटकर चाय में समा गया। वो थोड़ा झेंपे।
हमने उन्हें थोड़ा सहज किया - होता है, कभी-कभी मेरे साथ भी। चाय ख़त्म होने पर चम्मच से बिस्कुट की लुगदी खाने में बड़ा स्वाद मिलता है।
मित्र बोले - हूं। ठीक कहते हैं।
चाय ख़त्म हुई। मित्र ने चम्मच मंगवाया। और लुगदी बन गया बिस्कुट थोड़ा-थोड़ा करके पूरे स्वाद से खाया। जब चम्मच ने जवाब दे दिया तो उन्होंने उंगली को तकलीफ़ दी। प्याली लकालक साफ़। फिर थोड़ा पानी डाला। एक दो बार हिलाया और पी गए - भई, अन्न है यह भी। बर्बाद कुछ भी नहीं होना चाहिए। इसी बहाने प्याला भी धुल गया। आख़िर खून पसीने की गाड़ी कमाई है। और फिर मैं पेंशनर भी हूं।

Thursday, May 11, 2017

वो गर्मी की छुट्टियां

-वीर विनोद छाबड़ा
गर्मी तो बड़ों के लिए है। लेकिन बच्चों के लिए गर्मी उत्सव है। उनको मतलब है तो गर्मी की छुट्टियां से। छुट्टियों का मतलब है - औकात के हिसाब से हिल स्टेशन/ मामू-नानू और दादू-ताऊ के घर जाकर धमा-चौकड़ी मचाना/ स्कूल से और पढाई से छुट्टी वगैरह वगैरह।
हमें अपना बचपन खूब याद है। गर्मी की छुट्टी हुई नहीं कि पहुंच गए अपने शहर लखनऊ के आलमबाग इलाके के रेलवे कॉलोनी का वेजिटेबल ग्राउंड या लंगड़ा फाटक के आस-पास । ऊंंचे-ऊंचे जंगल जलेबी के पेड़। लेकिन यह मस्ती ज्यादा दिन तक कभी नहीं ठहरी। मई के अंत तक हम दादाजी के पास दिल्ली चले जाते थे।
पिताजी की सरकारी नौकरी के कारण हम लोग संयुक्त परिवार के सुख से वंचित रहे। गर्मी की छुट्टी में ही सबसे मिलना-जुलना संभव हो पाता था। शादी-ब्याह भी इन्हीं दिनों रखे जाते। दिल्ली में पहले क़ुतुब रोड पर घर था। लेकिन साठ के दशक की शुरुआत में चिमनी मिल गली, बाड़ा हिन्दू राव में स्थाई हो गए।

चलन के मुताबिक़ दादाजी को लालाजी और दादी को भाभीजी कहा जाता था। बाकी चाचा और बुआ के बच्चे भी जमा हो जाते। उत्सव जैसा माहौल बन जाता था।  खूब मज़ा आता। धमा-चौकड़ी और छोटे-मोटे लड़ाई-झगड़े, रूठा रुठौवल। रोज़ कैरम बोर्ड और लूडो, कुछ नया खाने को और दिल्ली के रमणीय स्थलों पर पिकनिक मनाना। कभी पिक्चर का प्रोग्राम भी। पिक्चर कैसी भी हो, मतलब तो सिर्फ़ तांगे और ट्राम पर घूमना होता था। लालाजी जब शाम घर लौटते थे तो उनके दोनों हाथों में थैले होते थे। फलों से भरे हुए। हम लोग टूट पड़ते। कभी-कभी रंग-बिरंगे कपड़े भी होते। यह मेरा है, यह तेरा है। खूब छीना-झपटी होती।
लालाजी का थोक का बिज़नेस था - की रिंग एंड चेनों का। रोज़ सुबह सीनियरिटी के हिसाब से सबको चवन्नी से लेकर एक रूपया तक दिन के खर्च के लिए मिलता। शुरू में हमारी गिनती चवन्नी में थी। जब हमने आठवां पास कर लिया तो एक रुपया हो गयी।
दोपहर में कुल्फ़ी वाला फेरी लगाता था। फिर उबली हुई छल्ली (भुट्टा) मिर्च के घोल में डुबोने वाले का नंबर लगता। मुंह जल जाता। हाय, हाय चिल्लाते हुए पानी के लिए घर भागते थे।
कब बड़े हो गए पता ही नहीं चला। लेकिन गर्मी में दिल्ली जाना नहीं छूटा। लालाजी रोज़ का खर्च देना नहीं भूले। अब जेब खर्च दो रूपए हो गए थे। लेकिन जिस दिन पिक्चर का नाम लेते उस दिन सीधा पांच रुपया एक्स्ट्रा।
लाला जी खुद पिक्चर के शौक़ीन थे। अक्सर अकेले पिक्चर देख आते - चुपके चुपके। धार्मिक फ़िल्म होती तो  भाभीजी यानि दादीजी को भी ले जाते।
एक दिन हमें  राज़ के बात पता चली। हमारे पुरखों के शहर मियांवाली (अब पाकिस्तान ) में वो एक सिनेमा हाल के पार्टनर थे। नाम था दिलरुबा टॉकीज़। ये 1933 की बात है। लेकिन कुछ साल बाद उन्होंने हाथ खींच लिया और अपने बजाजी के धंधे में पूरी तरह रम गए।