Friday, June 23, 2017

इतिश्री मॉर्निंग वॉक

- वीर विनोद छाबड़ा
पति-पत्नी के मध्य सुबह-सुबह की बहस। एक पत्रिका में पढ़ी। पसंद आई। रोचक बनाने के लिए थोड़ा तड़का लगा कर पेश कर रहा हूं।
पति तैयार हो कर मॉर्निंग वॉक पर निकलने को था।  
पत्नी ने आदतन पूछा - जनाब, सुबह- सुबह कहां चल दिए?
पति सहज भाव से बोला - वही डेली का रूटीन, मॉर्निंग वॉक। तुम भी चलो।
पत्नी तनिक इठलाई - मैं क्यों चलूं? मुझे कोई बीमारी तो है नहीं। न शुगर और न ब्लड प्रेशर। देखने में भी ठीक-ठाक हूं, दुबली-पतली। तुम्हारी भाभी की तरह भैंस तो दिखती नहीं हूं।
पति ने बात पर  फुल स्टॉप लगाया - ठीक है बाबा। मत जाओ। मैंने तो ऐसे ही सुझाव दिया था। माइंड फ्रेश हो जाता है। सुबह की वॉक से।
पत्नी ने हाथ नचाया - तुम्हारे कहने का मतलब मैं खूब समझती हूं। मैं कोई गुस्से वाली हूं कि माइंड फ्रेश की ज़रूरत पड़े। 
पति परेशान हो कर बोला - ओफ्फो। अब बस भी करो। कहा न, मत जाओ। पड़ी रहो घर में।
पत्नी ने ऐंठ कर कहा - तुम क्या समझते हो मैं आलसी हूं।
पति ने आत्मसमर्पण किया - अरे भई, मैंने ऐसा तो नहीं कहा। प्लीज़ झगड़ा मत करो।
पत्नी गुस्से से बोली - मैं झगड़ा कर रही हूं? झगड़ालू हूं?
पति ने हाथ जोड़े - बाबा, मैंने ऐसा कब कहा?
पत्नी ने साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा - अच्छा। तो तुम्हारा मतलब है कि मैं झूठी हूं।
पति झुंझलाते हुए बोला - ठीक है, तुम जीती, मैं हारा। मुझे जाने दो।

Wednesday, June 21, 2017

अपने लिए जिए, तो क्या जिए?

- वीर विनोद छाबड़ा 
कुछ महीने पहले की बात है। हमारे एक पुराने सहकर्मी दिवंगत हो गए। कारण अत्यधिक दारू से पूर्णतया ख़राब हो गया लीवर।
वो खुद तो चले गए लेकिन पीछे छोड़ गए कई यक्ष प्रश्न। उनमें प्रमुख था कि अनुकंपा के आधार पर नौकरी किसे दी जाये? दरअसल, उनकी दो पत्नियां थीं।
पहली पत्नी वैधानिक थी। परंतु उसके साथ वो रहते नहीं थे। वो गांव में रहती थी। उससे उनके तीन बच्चे भी थे।
बताते हैं कि दूसरी पत्नी से उन्होंने आर्य समाज मंदिर में शादी की थी। अंत तक उसी के साथ रहे भी। लेकिन समाज और कानून की मोहर नहीं लगी। किसी ने अटेंड नहीं की। उससे भी उनके दो बच्चे भी हुए। अब इन बच्चों की क्या गलती?
पहली पत्नी ने उनकी इस तथाकथित शादी के विरुद्ध मुकद्दमा भी चल रहा है।
क्लेम किसे दिए जायें? दावा दोनों और से पेश किया गया है।
कुछ का कथन है कि दूसरा विवाह उन्होंने पहली पत्नी की लिखित सहमति के आधार पर किया था। ऐसा डॉक्यूमेंट भी मौजूद है। परंतु पहली पत्नी का कथन है कि यह सहमति फर्जी है। धोखे से हस्ताक्षर कराये गए थे। 

कल तक नौकरानी थी

- वीर विनोद छाबड़ा
आमतौर पर जिसकी नई-नई शादी हुई होती है वो बंदा दो-तीन हफ्ते तक दफ़्तर देर से पहुंचता है। और जल्दी चला भी जाता है। दफ्तर के आस पास रहने वाले तो लंच पर घर भी चले जाते हैं और कम से कम दो घंटे बाद लौटते हैं। भी लंबा लेते हैं। बॉस लोग कुछ नहीं बोलते। सब चलता है। आख़िर वो भी कभी सी मुकाम से गुज़र चुके होते हैं।
और ऐसा युगों युगों से चला आ रहा है।
मगर अति हमेशा ख़राब होती है। टोकना पड़ता है। नहीं माने तो लिख कर देना पड़ता है। तब भी नहीं माने तो फिर.समझ जाइए बॉस के हाथ में बहुत ताकत होती है।
ऐसा हरेक की ज़िंदगी में कमोबेश घटित हुआ है।
एक नौजवान के साथ भी ऐसा ही हुआ। बात इतनी बढ़ी कि जवाब-तलब हो गया।
बॉस ने नौजवान को बुलाया और फायर किया - जबसे तुम्हारी शादी हुई है तुम लेट आ रहे हो। एक महीना, दो महीना और अब तीन महीने हो गए। कितनी ही बार समझाया गया। लिख कर दिया। तुम्हारी वेतन कटौती तक हो गयी। लेकिन तुम सुधरने का नाम ही नहीं ले रहे। नौकरी नहीं करनी है क्या? चूँकि तुम बहुत मेहनती सहायक हो इसलिए इससे पहले मैं वज़ह जानना चाहता हूं और उसके बाद फैसला करूंगा कि तुम्हें रखूं या निकाल दूं।

Tuesday, June 20, 2017

तन्हाई की साथी नलिनी जयवंत

- वीर विनोद छाबड़ा
छोटा कद व गठीला बदन। बड़ी-बड़ी आंखें, आमंत्रित करते होंट और चेहरे पर टपकता चुलबुलापन। नलिनी जयवंत बरबस ही किसी का भी ध्यान आकर्षित कर लेती थी। वो एक जगह टिक कर बैठ नहीं सकती थी। सेट पर भी इधर से उधर डोला करती थी। मगर अंदर ही अंदर उसे अकेलेपन का गम खाता रहा। उसका कोई स्थायी साथी नहीं था जो उसके मन को पढ़ सके, उसके दुख और अकेेलेपन को शेयर कर सके। मां-बाप, भाई-बहन और परिवार, दोस्तों सभी ने ठुकराया। पहले पति वीरेंद्र देसाई से पटी नहीं। उम्र में बहुत बड़ा था। ज़ालिम था। मार-पीट भी करता था। अशोक कुमार से उनका दस साल तक दिल का नाता रहा। लेकिन ज़माने के डर से अपना न सके। तन्हाई से छुटकारा पाने के लिए प्रभुदयाल से शादी कर ली। लेकिन वो अपने ही ग़म से खाली नहीं था।
साठ के दशक के मध्य तक नलिनी एक्टिव रही। फिर नई नायिकाओं की आमद, बदलते सामाजिक मूल्य और नये आसमान। नलिनी का वक़्त खत्म हो चुका था। उसने अकेलेपन के अंधेरे को अपना साथी बना लिया। उसने मान लिया कि उसका अपना कोई नहीं। यहां आदमी सिर्फ खुद से प्यार करता और जीता है। अस्सी के दशक में बंदिश और नास्तिक को छोड़ कर नलिनी ने कभी बाहर की दुनिया नहीं देखी। उनके कुछ ही नाते रिश्तेदार थे। कुछ मित्रगण उनसे मिलने आते थे। लेकिन उनकी मौजूदगी नलिनी को अच्छी नहीं लगती थी। वो चुपचाप बैठी रहती। फिर यह जान कर कि नलिनी अपनी तनहाईयों से खुद ही बाहर नहीं आना चाहती तो उन्होंने भी किनारा कर लिया।

नलिनी के एक मित्र का कहना था कि वो असुरक्षा की भावना से पीड़ित थी। आस-पास रहने वालों से यदा-कदा ही कभी बात हुई हो। सच तो यह था कि उनमें से अधिकतर को नहीं मालूम था कि उनके पड़ोस में कभी लाखों दिलों पर राज करने वाली बीते दिनों की शोख हसीना रहती है जिसने अनोखा प्यार, समाधी, संग्राम, नौजवान, शिकस्त, नास्तिक, फिफ्टी फिफ्टी,दुर्गेश नंदिनी, हम सब चोर हैं, आनंद मठ, हम सब चोर हैं, मिस बॉम्बे, कालापानी, मुनीम जी जैसी मशहूर फिल्मों में काम किया है और दिलीप कुमार, देवानंद, शम्मी कपूर और प्रदीप कुमार की नायिका रही है।
नलिनी ने दो कुत्ते पाल रखे थे। वही उसके अभिन्न साथी थे। उन्हीं से वो बात करती थी। उसे डर लगता था कि उन्हें कुछ हो न जाये। इसीलिए उसने उनकी सेहत का बहुत ध्यान रखा। उनको बढ़िया खाना दिया। उन्हें कभी तन्हा नहीं रहने दिया।
एक पड़ोसी ने एक दिन नलिनी को लंगाड़ते हुए देखा। शायद पैर में चोट लगी थी। उसने चिंतित होकर डाक्टर की मदद का प्रस्ताव दिया। मगर नलिनी ने मना कर दिया।

Monday, June 19, 2017

चमत्कार होते हैं

- वीर विनोद छाबड़ा
पत्नी गंभीर रूप से बीमार है। ब्लड कैंसर है। बेइंतहा प्यार करने का दम भरने वाले पति ने सारे जतन कर डाले ।
दिल्ली, मुंबई, चेन्नई आदि तमाम बड़े शहरों के स्पेशलिस्ट से चेक-अप कराया। लंदन, जर्मनी और न्यूयार्क भी हो आये। होमियोपैथी, आयुर्वैदिक, यूनानी और हक़ीम से देख लिया। लेकिन कहीं से भी अच्छी ख़बर नहीं मिली। ऑपरेशन एकमात्र सहारा है, मगर हाई रिस्क है। बचने का चांस सिर्फ दस परसेंट।
डॉक्टरों ने जवाब दे दिया। दुआ करो। हवन करो। टूना-टोटका करो। जो मर्ज़ी हो करो। हर हर बोलो या ज़िंदाबाद, तुम्हारी मर्ज़ी। मगर चांस नहीं के बराबर  है। चमत्कार ही एक मात्र सहारा है।
बेपनाह प्यार करने वाला पति ज़ार ज़ार रो रहा है। पल पल गिन रहा है। अब गई, तब गई वाली स्थिति है।
पत्नी ने पति का हाथ अपने हाथ में लिया - मत रो जानू। अगले जन्म में मिलेंगे। वादा करो। ऊपर जल्द से जल्द आओगे। तब वहां मौज करेंगे /
पति ने कहा - न होंगे जुदा, ये वादा रहा।
मगर मरती पत्नी को शक़ है कि ज़मीन-आसमान एक देने वाले पति की आंखों से झर-झर टपकते आंसू असली हैं या नकली। वादा असली है या झूठा। उसने पति के आंसूं पोंछे - जानू, एक बात सच्ची-सच्ची बताना। मेरे मरने के बाद क्या तुम दूसरी शादी करोगे?

Saturday, June 17, 2017

हेलो पिताजी

-वीर विनोद छाबड़ा
आज सब अपने पिता को अलग अलग तरीकों से याद कर रहे है। जिनके पिता हैं, उनको बच्चे गिफ़्ट दे रहे हैं। जिनके नहीं हैं वो वक़्त की मोटी धूल को हटा रहे हैं। किसी-किसी की आंख से दो बूंद भी टपकते दिख जाती है। हमे तो पिताजी का ज़न्नाटेदार थप्पड़ भी याद आ रहा है।
सच तो यह है कि हमें तो रोज़ ही पिताजी की याद आती है। दिल में रहते हैं। जब जी चाहा, गर्दन झुकाई और दर्शन हो गए। हमारे दिवंगत चाचा नंदलाल जी कहा करते थे कि मरने के बाद आत्मा परमात्मा में विलीन हो जाती है। दिवंगत माता-पिता को याद करने का मतलब है, भगवान को याद करना।
हमे तो सपने में आये दिन माता और पिता को देखते हैं। सुबह सर्वप्रथम उन्हें मन ही मन प्रणाम करते हैं। वही भगवान हैं। शक्ति हैं और भटकने की स्थिति में मार्गदर्शक भी। 
कुछ दिन हुए हमने अपने मित्र से ये फीलिंग शेयर की।
उन्होंने समझा कि हमारे माता-पिता की आत्मा अभी तक भटक रही है। उन्हें शांति की ज़रूरत है। कई उपाय बता डाले। तावीज़ वाले एक मौलाना के नाम के साथ-साथ एक सर्वज्ञानी पंडित का नाम भी सुझा दिया। गारंटी दी कि वे निश्चित ही सपने में आना बंद हो जाएंगे। 
हमने कहा ऐसे तावीज़ और पूजा-पाठ हमें नहीं चाहिए कि माता पिता सपने में आना बंद हो जायें। सपने में उनका आना सुहाना लगता है। और जिस कमरे में पिता जी का देहांत हुआ था हम तो उसी में दिन-रात रहते हैं। हरदम उनके वहां होने का अहसास होता है।
हमारे मित्र ने हमें भुतहा और साइको करार दिया। माथे पर आई पसीने की बूंदें पोंछीं और बिना चाय पिए तिड़ी हो गए।
अब कुदरत ने कुछ सूरत भी ऐसी दी है कि जिन्होंने पिता जी देखा है, हमें देखते ही उन्हें पिता जी की याद आती है। वो जब थे तब भी उनका बेटा होना हमारी पहचान थी और अब वो नहीं हैं तब भी उनके बेटे के नाते लोग जानते हैं। हमें गर्व है इस पर।

आईने के सामने जब हम खड़े होते हैं तो कन्फ्यूज़न होता है कि हम उनकी तस्वीर तो नहीं निहार रहे हैं। कई बार तो कहने का मन करता है - हेलो पिताजी।
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18 June 2017
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Lucknow - 226016
mob 7505663626

Friday, June 16, 2017

भुगतान हो चुका है

- वीर विनोद छाबड़ा
वो लड़का अनाथ और बहुत ग़रीब था। उस दिन वो बहुत उदास था। वो पढ़ना चाहता था। उसने कई जगह मदद की गुहार लगाई। लेकिन सफलता नहीं मिली। उसने फ़ैसला किया कि वो अपने कपड़े और जितना भी उसके पास सामान है, सब बेच देगा। उसे विश्वास है कि इससे इतने पैसे निकल आएंगे कि महीने भर की फ़ीस का भुगतान हो जाएगा।
और सचमुच आशानुसार फीस के लिए ज़रूरी पैसे उसे मिल गए हैं और कुछ सेंट अतिरिक्त भी हो गए हैं। तभी उसे महसूस हुआ कि उसे बहुत भूख लगी है। लेकिन उसकी भूख इन अतिरिक्त सेंट से पूरी होनी संभव नहीं थी।
तभी उसके दिमाग में एक आईडिया आया। उसे विश्वास था कि उसे सफलता मिलेगी। उसने एक अच्छे दिखने वाले घर की बेल का बटन दबाया। एक स्त्री ने द्वार खोला। वो स्त्री बहुत सुंदर थी। इतनी अधिक सुंदर कि वो लड़का उसे अपलक निहारता रह गया। सुध-बुध खो बैठा। भूख भी भूल गया। उसने खाने की जगह एक गिलास पानी की मांग की।
लेकिन वो सुंदर स्त्री उसके चेहरे को देख कर ताड़ गई कि यह लड़का भूखा है। वो उसके लिए एक बड़े ग्लास में दूध भर कर ले आई। लड़का गटागट दूध पी गया। बदले में उसने बचे सेंट देने चाहे। लेकिन सुंदर स्त्री ने मना कर दिया। किसी पर दया करने का कोई मूल्य नहीं होता है।
लड़का बहुत खुश हुआ। दूध पीकर उसके शरीर में नई स्फूर्ति पैदा हुई। उसे विश्वास हो गया कि दुनिया में अभी अच्छे लोग हैं। आगे बढ़ो। कोई न कोई उसकी मदद करता रहेगा।

Thursday, June 15, 2017

न हिंदू, न मुसलमान, मिल बांट कर खाया

- वीर विनोद छाबड़ा
एक ज़ोरदार दारू पार्टी चल रही थी। इंजीनियर, बाबू, अकाउंटेंट, ठेकेदार आदि हर प्रोफेशन के लोग जमा थे। उनमें हिंदू भी थे और मुसलमान भी, सिख और ईसाई भी, यानि हर धर्म और जाति के लोग थे। दारू ने सारे भेद-भाव मिटा दिए।
पुरषोत्तम जी भरी महफ़िल में अपनी ईमानदारी के जोरदार किस्से बयान रहे थे। अच्छी-खासी चढ़ गयी थी। स्वयं को देशभक्त और बाकी धर्म वालों को भ्रष्ट भी बताते चल रहे थे।
एक बंदे से  बर्दाश्त नहीं हुआ। उसने उनको याद दिलाया - बरसों पहले मैं अपने एक दोस्त के साथ आया था। सारे कागज़ात पूरे थे, लेकिन बावजूद इसके आपने बिजली का कनेक्शन नहीं दिया। जब आपकी दराज़ में पांच सौ रूपए डाले, तो आपको सारे कागज़ात सही दिखने लगे थे और आपने फ़ौरन हस्ताक्षर कर दिए थे।
पुरषोत्तम जी ने सफ़ाई दी - अरे, हमारा उसूल है कि हम पैसा मांगते नहीं। जिसने ख़ुशी से दराज़ में डाल दिए, हमने मना नहीं किया और कभी गिने भी नहीं। अपना तो यही काम करने का तरीक़ा रहा। हराम के पैसे को कभी छुआ तक नहीं।
तभी पुरषोत्तम जी का मोबाईल बजा। उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें आयीं।

Tuesday, June 13, 2017

ड्राईवर का भी स्टेटस होता है

-वीर विनोद छाबड़ा
आज के शोर-शराबे और हर तरफ़ ट्रैफ़िक जाम के दौर की तुलना में गुज़रा ज़माना ख़्वाब जैसा लगता है। पहले मोटरकार होती थी। अब मोटर ग़ायब है, सिर्फ़ कार रह गयी है।
अब कार रसूखदारों और बड़ों की बपौती नहीं है, बड़ी आसानी से आम आदमी की पहुंच में है। शुरुआत मारूति ने की थी और टाटा की नैनों ने इसे थोड़ा सा आगे बढ़ाया। मज़े की बात यह कि टाटा ने जिस अल्प आये के लिए बनाया, उसने ही रिजेक्ट कर दिया। यह कार नहीं खिलौना है। एक लाख एक्स्ट्रा खर्च करके आल्टो न ख़रीद लें। स्टेटस भी बनेगा। 
हम यूपी के बत्ती विभाग के शक्ति भवन स्थित हेडक्वार्टर से रिटायर हुए हैं। वहां वेतन इतना अधिक है कि तमाम छोटे-मोटे बाबू और तकनीशियन तक बड़ी बड़ी कारों के मालिक हैं। अब ये बात अलबत्ता दूसरी है कि दिल छोटे हैं। कार पेट्रोल या गैस से चलती है। और ये मुफ्त में नहीं पैसे से मिलता है। कईयों के लिए पैसा महत्वपूर्ण है। अरे भाई, दिल-गुर्दा होना भी तो ज़रूरी है।
यों महंगे पेट्रोल ने भी बहुतों को अपनी हैसियत का अहसास करा दिया है। बेशुमार छोटी-बड़ी कारों व स्कूटर-बाईको के कारण भयंकर ट्रैफ़िक जाम और नाकाफ़ी पार्किंग स्पेस सच्चाई तो है ही, साथ ही कार को बाहर न निकालना बहाना भी।
एक साहब ने फ़रमाया - मुझे चलानी नहीं आती। आजकल ड्राईवर मिलते नहीं। क्या करूं? कोई मिले तो बताईयेगा।
हमने थोड़ा डांट दिया - भलेमानुस खरीदी ही क्यों थी, जब चलानी नहीं आती?
इसके साथ ही हमें अपने ज़माने के पेड़़ पर चढ़ी हीरोइन की याद आती है। वो नीचे उतरने के लिए हीरो की चिरौरी कर रही थी।
एक समीक्षक ने टिप्पणी की थी - अरे भई, जब उतरना नहीं आता था तो चढ़ी ही क्यों थी?

ड्रेसिंग के बहाने लूट

-वीर विनोद छाबड़ा
हमारे पड़ोस में एक डॉक्टर हैं, पक्के एमबीबीएस। लेकिन बहुत ही ख़तरनाक, उनके लिए जिन्हें उनकी दवा सूट नहीं करती।
कभी इमरजेंसी में हमने भी उनसे दवा ली है। लेकिन एक से ज्यादा ख़ुराक कभी नहीं खा पाये। बहुत सस्ती दवा देते हैं। गरीबों के लिए तो यों समझिए मसीहा हैं। आजकल एक दिन की सौ रूपए फीस है, इसमें एक दिन की दवा भी शामिल है। बच्चों के लिए मिक्सचर का फार्मूला है।
इंजेक्शन लगा दिया तो कम से कम पचास रूपए बढ़ गए। इंजेक्शन महंगा हुआ तो सौ से दो सौ तक का इज़ाफ़ा। उनकी कोशिश रहती है कि मरीज़ इंजेक्शन लगवा ले। कहते हैं बहुत जल्दी फायदा हो जाएगा। दिहाड़ी वाले मज़दूर और कामग़ार को इंजेक्शन सूट करता है। इंजेक्शन लगवाईये और काम पर चलिए। लेकिन सुबह से शाम तक बीस-पच्चीस को तो इंजेक्शन ठोक ही देते हैं। लेकिन कुछ लोग तो सुई को देख कर रोने लगते हैं। सयाने टिकिया खाना पसंद करते हैं। तुरंत आराम नहीं मिलेगा, कोई बात नहीं। शाम या सुबह तक तो मिल ही जाएगा। 
अभी कुछ दिन पहले की बात है। बीच बाज़ार हमारा छोटा सा एक्सीडेंट हो गया। हाथ, कोहनियां और घुटने छिल गए। सामने ही एक डॉक्टर दिखा। उन्होंने एटीएस लगा दिया और ड्रेसिंग भी कर दी। बोले, आपका घर दूर है। बेहतर होगा कि पड़ोस के किसी डॉक्टर से एक-आध ड्रेसिंग करा लें।
छोटी-मोटी चोटें हमें लगती ही रहती हैं। घर में मरहम-पट्टी का इंतज़ाम भी हम रखते हैं। लेकिन उस दिन जाने कैसे मेडिकल बॉक्स इधर-उधर हो गया। साप्ताहिक बंदी के कारण बाजार भी बंद था। मजबूरन पड़ोस वाले डॉक्टर के पास जाना पड़ा।
डॉ साहब बातें बहुत करते हैं। ढंग की हों, तो बंदा सुने भी। फ़िज़ूल की बातें। वर्तमान हालात और अपने बाप-दादाओं के नीरस किस्से।
यों बातें नहीं खलती। लेकिन काम रोक कर बातें करना अखरता है। और उस पर तुर्रा यह कि उनकी हां में हां मिलाते चलिए। नहीं तो बहस करिये। नतीजा यह कि बात और भी लंबी। किसी को दफ्तर पहुंचना है या कोई दर्द से बिलबिला रहा है, उनकी बलां से। भाग भी नहीं सकते क्योंकि नस उनके हाथ में होती है। 

Sunday, June 11, 2017

बहस मत करो

- वीर विनोद छाबड़ा
वो सब्ज़ी वाला फेरी लगाता है। हमारी गली में रोज़ आता है। हरी-भरी ताज़ी सब्ज़ी होती हैं। हमें दूर मंडी से सब्ज़ी लाने की ज़हमत से बचाता है।
हमने कई बार आजमाया है कि मंडी के मुक़ाबले भाव भी सही हैं। किसी-किसी आईटम पर शक़ होता है कि तीन-चार परसेंट ज्यादा चार्ज कर रहा है। लेकिन हम इग्नोर करते हैं। सोचते हैं कि दो किलो दूर मंडी गए तो पेट्रोल फूंकेगा। एनर्जी और टाईम भी अलग वेस्ट होगा। सब्ज़ी खरीदते वक़्त ध्यान स्कूटी की तरफ रहता है। यह भी एक टेंशन है। और फिर मंडी वालों की तौल तो हमेशा ही संदिग्ध रही है।
हमें विश्वास है कि हमारा यह फेरी वाला गड़बड़ी नहीं करेगा। पिछले दस साल से आ रहा है। फिर भी हमारे एक मीन-मेख प्रेमी पड़ोसी चार-पांच दिन पर उसके तराज़ू की डंडी चेक कर लेते हैं।
हमारा यह फेरी वाला पहले जवान था। अब उम्र चेहरे पर दिखने लगी है। झुर्रियां आ गई हैं। इनमें बहता पसीना इसके अनथक मेहनत की कहानी बयां कर रहा है। कभी कभी छुट्टा नहीं होता। कोई बात नहीं। दस-पंद्रह रूपये की बात हुई तो अगले दिन एडजस्ट हो जाता है। नोटेबंदी के दौरान तो हमने उससे सौ रूपये तक उधार कर लिए। एक बार वो हमसे दो हज़ार का नोट ले गया। हम रोज़ाना उससे सब्ज़ी लेते रहे जब तक कि नोट एडजस्ट नहीं हो गया।

Saturday, June 10, 2017

बाबा भारती, सुल्तान और खड़ग सिंह

- वीर विनोद छाबड़ा
बचपन में पढ़ी एक कहानी की धुंधली याद आ रही है। सुदर्शन जी की यह कहानी शायद पाठ्य क्रम का हिस्सा होती थी। आज की पीढ़ी ने शायद यह कहानी नहीं पढ़ी सुनी है।

एक थे बाबा भारती। बड़े दयालु और ज्ञानी। उनके पास एक सफ़ेद घोडा था। जान से भी ज्यादा प्यारा। उसका नाम था सुल्तान। हष्ट-पुष्ट, बलिष्ट और ऊंचा कद।  उसे देखते ही मन प्यार करने को हो जाए। सुल्तान की ख्याति दूर दूर तक फ़ैल गयी। खड्ग सिंह नाम के एक दुर्दाँद डाकू के कान तक भी यह बात पहुंची। उसने बाबा भारती तक संदेसा भिजवाया। आप ठहरे साधु-संत। घोड़े से आपका क्या काम? यह हम जैसों के अस्तबल की शोभा बढ़ाता है।
लेकिन बाबा ने साफ़ इंकार कर दिया। जान ले लो लेकिन सुल्तान नहीं। मैंने इसे बच्चों की तरह पाला है।
डाकू खड़ग सिंह को बाबा का इंकार अच्छा नहीं लगा। घोड़ा तो मैं लेकर दम लूंगा।

एक रात बाबा भारती सुल्तान की पीठ पर बैठे हुए कहीं से लौट रहे थे। देखा, बीच मार्ग में एक आदमी तड़प रहा है। बाबा भारती ने क़रीब जाकर उसे देखा।
वो आदमी ज़ख्मी था। उसने कहा - मेरी मदद कर दो। मुझे घोड़े पर बैठा कर किसी किसी वैद्य या हकीम के पास ले चलो।

Friday, June 9, 2017

कभी अख़बार में रचना देने खुद जाते थे

- वीर विनोद छाबड़ा 
वो ज़माना मोबाईल और ऑनलाईन सिस्टम का नहीं था।
बाहर के अखबारों में लेख प्रकाशनार्थ प्रेषित करने का एक ही जरिया था - पोस्ट ऑफिस। कई बार पैकेट खो भी जाता था और कभी-कभी पहुंचते पहुंचते विलंब हो जाता। कारण दो तीन छुट्टियां पड़ गयीं। या पोस्टमैन बीमार पड़ गया। मैच ही ओवर हो गया यानि विषय की प्रासांगिकता ही ख़त्म हो गयी। टिकट लगा लिफ़ाफ़ा नत्थी हुआ तो कभी-कभी खेद की पर्ची सहित रचना वापस हो गयी।
'अमर उजाला' को तो आज भेजिए कल मिल जाए वाली स्थिति थी। यहां लखनऊ में लाल कुंआ पर ब्यूरो ऑफिस होता था उसका। हम तो वहीं अपना पैकेट छोड़ देते थे। रात ग्यारह बजे नौचंदी से डाक निकलती और अगली सुबह मेरठ। 
स्थानीय अखबारों में तो स्वयं ही जाना होता था। लेकिन वो थे मज़े के दिन।
स्क्रिप्ट आम तौर पर हाथ की लिखी हुई या कभी-कभी टाईप की हुई। हमारे पास पोर्टेबल टाईपराइटर होता था। यों फैसला हाथ के हाथ कभी नहीं हुआ कि रचना छपनी है या नहीं। मगर रचना के पन्ने पलटते हुए फ़ीचर एडिटर की बॉडी लैंगुएज देखकर अंदाज़ा लगाना मुश्किल न होता कि इस रचना का अंजाम क्या होगा। अमूमन तीसरे-चौथे दिन छप ही जाती थी। नहीं तो एक-आध हफ्ते बाद सही। बहुत ज्यादा हुआ तो कालातीत होने या कतिपय अन्य कारणों से रचना को वापस ले लिया। रद्दी की टोकरी में नहीं जाने दिया।
इसी के साथ अगली रचना के लिए भी डिस्कस हो जाता था। कभी फ़ोन आ जाता या कहीं से मैसेज मिल जाता - ऑफिस से लौटते हुए मिल लीजियेगा। लेकिन अपनी मर्ज़ी से लिखने का आनंद अलग ही रहा।
अक्सर जाते-आते अख़बार में काम करने वाले तक़रीबन सभी बंदों से मुलाक़ात होती रहती। छपे हुए लेख पर त्वरित प्रतिक्रिया भी मिल जाती - अच्छा लिखा, आज क्या लाये? कभी कभार मज़ाक भी चल जाता था - अरे भाई, हमारे लिए भी जगह छोड़ दिया करो।
प्रमोद जोशी, नवीन जोशी, क़मर वहीद नक़वी, डॉ तृप्ति, दयानंद पाण्डेय, राजीव मित्तल, नागेंद्र सिंह, मनोज तिवारी, घनश्याम दुबे, आलोक मेहरोत्रा, संतोष तिवारी, विजय वीर सहाय, राजीव शुक्ला, आदर्श प्रकाश सिंह, नागेंद्र सिंह, विनोद श्रीवास्तव, क़माल ख़ान, कमलेश श्रीवास्तव, सुफ़ल भट्टाचार्य, राम भाटियाएक लंबी फ़ेहरिस्त है जो हफ़्ते में कहीं न कहीं दिख जाते थे। कभी स्वतंत्र भारत में तो अमृत प्रभात में या फिर नवभारत टाइम्स या हिन्दुस्तान में।

Thursday, June 8, 2017

हर तरफ़ धुआं ही धुआं

-वीर विनोद छाबड़ा
जब होश संभाला था तो उन दिनों हर तरफ मुझे सिगरेट पीने वाले ही नज़र आये। घर में पिताजी को धूंआधार सिगरेट पीते देखा। 
दादाजी और अन्य रिश्तेदार भी सिगरेट के लती थे। दादाजी को तो मुट्ठी में दबाकर कैवेंडर पीते देखा।
स्कूल में भी टीचर्स रूम में कई अध्यापक कश खींचा करते थे। सिनेमा के परदे पर हीरो को ग़म ग़लत करने के लिए सिगरेट पीनी पड़ी तो विलेन को क्रूर दिखने के लिए धुएं के छल्ले उड़ाने पड़े। महफ़िलों में बिना सिगरेट दारू पीने वालों को मज़ा नहीं आता था।  
मुझे पिताजी बताया करते थे कि जब मैं गोदी था तो उनके मुंह से सिगरेट छीना करता था। ऐसे ही हालात का सामना मुझे तब करना पड़ा जब मेरी बेटी ने मेरे मुंह से सिगरेट छीनी।
बड़ी बहन शादी के बाद पहली बार घर आयी तो मैंने पूछा था- जीजाजी सिगरेट पीते हैं?
वो बोली - ना बाबा, ना। बिलकुल नहीं। उनके सामने पीना तो दूर नाम तक भी नहीं लेना। सिगरेट से सख्त नफ़रत करते हैं वो। मैं महीनों इसी मुगालते में रहा। एक बार मैं उनसे मिलने बीकानेर गया। रात भोजन के बाद टहलने निकले। सिगरेट की ज़बरदस्त तलब लगी। कई दिन से सिगरेट होंटों पर नहीं लगी थी। मैंने तनिक संकोच से जीजा से सिगरेट पीने की आज्ञा मांगी तो सहर्ष स्वीकृति प्रदान करते हुए वो बोले- दो लेना। एक मेरे लिये भी।
मैं अवाक उनका मुंह देखता रह गया। फिर उनके ही श्रीमुख से पता चला कि वो पुराने सिगरेट पीने वालों में से हैं।
यूनिवर्सटी में प्लेटो की रिपब्लिक और अरस्तू की पोलिटिक्स पढ़ाने और उस पर लंबे जादुई भाषण देने वाले हमारे जीनीयस प्रोफेसर डा०राजेंद्र अवस्थी तो क्लास में आने के पूर्व टीचर्स रूम में बैठकर दो-तीन सिगरेट फूंक कर आये। शायद इसके धूंए में वो सुकरात, अरस्तू और प्लेटो की रूह से रूबरू हुए। इसीलिये पढ़ाते-पढ़ाते वो ईसा पूर्व इरा में खुद भी पहुंच जाते थे और साथ में हम स्टूडेंट्स को भी ले चलते थे।
इससे मेरी ये धारणा बलवती हो गयी कि फ़िलासफ़र बनने के लिये सिगरेट ज़रूरी है।
नौकरी लगी तो वहां भी ज्यादातर संगी-साथी सिगरेट पीने वाले मिले। यहां मैंने कई अजीबो गरीब लोग देखे। बिना इज़ाज़त सिगरेट उठाई और होंटों से लगा कर सुलगा ली। मैंने इनको कभी खरीद कर सिगरेट पीते नहीं देखा। ताउम्र फ्री का धुआं उड़ाते रहे। अपनी सेहत भी न देखी। एक बंधु तो इसी चक्कर में खुदा को प्यारे हो गए। एक साहब तो रास्ते चलते दूसरे के मुंह से सिगरेट छीन लेने के लिए बदनाम थे।

दुःख अकेले झेले लेकिन ख़ुशी बांटी

- वीर विनोद छाबड़ा
कुछ अपवादों को छोड़ दें तो सरकारी नौकरी में कोई किसी का सगा नहीं होता। सबको अपने प्रमोशन का ख्याल होता है। होना भी चाहिए। लेकिन दुःख होता है कि संकट के समय सब दूर चले जाते हैं। कोई डूब रहा होता है तो उसे बचाने की बजाए एक धक्का और दे दिया, जा जल्दी से पूरा ही डूब जा। कभी कभी कोई बेगाना ही काम आता है।
हमारे साथ तो कई बार ऐसा ही हुआ है अब तक। कई बार हमीं ने राजफाश किया। व्हिसल ब्लोअर का काम किया, लेकिन हमीं फंस गए। जवाब तलब हो गया।
लेकिन हम हमेशा इस बात के कायल रहे कि जीत अंततः सच्चाई की होती है। हमारे इसी विश्वास ने हमें जिताया।
एक केस में हम उच्चाधिकारियों को समय समय पर फाईल पर सबूत सही नोट लिख कर बताते रहे कि फलां का सेलेक्शन ग़लत है। इसके विरुद्ध दहेज़ उत्पीड़न का पुलिस केस है। चार दिन सलाखों के पीछे रहा है। नियमानुसार पहले इसका डीम्ड सस्पेंशन होना ज़रूरी है। लेकिन हमारी बात नहीं मानी गयी। हमारे उच्चाधिकारी हमारी बात को काटते रहे। नतीजा यह हुआ कि वो फलां प्रोमोट हो गया। शासन से शिकायत आई। हमारा जवाब-तलब हुआ। हमने पूरा-पूरा सहयोग किया। चेयरमैन तक को हमने पूरा केस बताया।
लेकिन वही हुआ जिसका हमें अंदेशा था। जांच समिति बन गयी। गलती करने वाले जिस अधिकारी को चार्जशीट मिलनी चाहिए थी उसे न मिल कर हमें मिली। हमारे कैडर में चार्जशीट मिलना ही असाधारण घटना थी। शायद हमारे खानदान में चार्जशीट वाले हम पहले थे। लेकिन हमें कोई आघात नहीं लगा। हमें विश्वास था कि हम पाक साफ़ हैं। बिना खरोंच बा-इज़्ज़त सीना चौड़ा करके बाहर आएंगे। हमारे पास सबूत थे। सच्चाई के रास्ते पर थे। ऑफिस से इंसाफ न मिला तो कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाएंगे।