Saturday, December 20, 2014

इत्ता पिटोगे…

-वीर विनोद छाबड़ा

अभी कुछ दिन पहले की बात है।

मेरे भांजे की पोस्टिंग आगरा हो गई। उसने रोमिंग से बचने के लिए अपना मोबाइल नंबर बदल दिया। लेकिन ये न बताया कि पुराना ख़त्म हो गया है। मैंने दोनों ही नंबर 'सेव' में रखे। जब भी बात होती थी नए नंबर से।

एक दिन नया लग नहीं रहा था। पुराना मिला दिया। उधर से किसी स्त्री का कठोर स्वर सुनाई दिया - कौन है?

मेरा भांजा तो अकेला रहता है? ऐसा-वैसा भी नहीं है। फिर ये स्त्री कौन?और वो भी लट्ठमार स्वर। मुझे लगा कहीं गलत लग गया। मैंने कहा - जी माफ़ करियेगा। शायद गलत लग गया है।

उधर से पहले जैसी ही लट्ठमार आवाज़ आई - ठीक है। रख अब।

मैंने फ़ौरन काट दिया। और मन ही मन कहा - क्या ज़माना आ गया है। बात करने तक की तमीज नहीं।


ये सोच कर कि अब ठीक जगह नंबर लगेगा मैंने थोड़ी देर बाद फिर उसी नंबर पर कॉल किया।

लेकिन फिर वही कड़क आवाज़ -  कौन है?

मैं सकपका गया। वही कानों के परदे फाड़ने वाली कर्कश आवाज़। फिर वही गलती। मैं शर्मिंदा हो गया - माफ़ कीजियेगा। फिर गलत मिल गया।


ये कहते हुए मैंने कॉल बंद कर दी। अब मेरे समझ में आ गया कि भांजेराम का पुराना नंबर किसी और को अलॉट हो गया है।

चाहिए तो ये था कि मैं उस नंबर को फौरन डिलीट कर दूं। लेकिन गलती से ऐसा नहीं हो पाया। दो दिन बाद फिर भांजे से बात करने की ज़रूरत पड़ी। मैंने कॉल किया।

सहसा मुझे ख्याल आया कि ये तो उसी नंबर पर कॉल किया है। तुरंत काट दिया। तब तक दो बार 'ट्रिंग-ट्रिंग' हो चुकी थी। एक गहरी सांस लेते हुए शुक्र किया कि उधर से उठा नहीं था।
इस बार मैंने देर नहीं की। फौरन नंबर डिलीट किया।

फिर दूसरे नंबर से भांजे से बात की। उससे पुष्टि भी कर ली कि पुराना नंबर अब उसके पास नहीं है।

आदत के मुताबिक अगले दिन सुबह उठ कर सबसे पहला काम ये किया कि मैसेज और मिसकॉल चेक की। तीन मैसज थे और एक मिस कॉल। मिसकॉल बिना नाम की थीं।

आमतौर पर मुझे नंबर याद नहीं रहते। कोई नया मित्र होगा? ये सोच कर मैंने कॉल बैक किया। ट्रिंग ट्रिंगमैं हैलो की प्रतीक्षा करने लगा।


दिल के कोने में कहीं दबी इच्छा भी जाग्रत हुई - काश कोई सुरीली हैलो सुनने को मिले।

तभी ट्रिंग-ट्रिंग बंद हुई। मेरी उत्कंठा बढ़ गयी। कुछ क्षण गुज़रे। लेकिन उधर से कोई सुरसुराहट नहीं सुनाई दी। मेरी उत्कंठा व्यग्रता में तब्दील हो गयी। बर्दाश्त नही हुआ। मैंने ही बोला – हैलो!  
बस साहब पूछिये मत। उधर से जो मां-बहिन एक करने वाली गालियों की बौछार हुई कि मुझे धरती-आकाश-पाताल तीनों लोक याद आ गए। मैंने लाख कोशिश की उन्हें समझाने की कि मैं वो नहीं, मैं ये हूं। मैं ऐसा नहीं, वैसा हूँ। मैं ऐरा-गैरा नहीं। जो आप समझ रही हैं, मैं वो नहीं। लेकिन उसने मेरी एक न सुनी। जब बर्दाश्त के बाहर हो गया तो मैंने कॉल काट दी।

उस भद्रे ने जो कहा उस भाषा को मैं रिपीट नही कर सकता। क्योंकि वो सज्जनों की भाषा कतई नहीं है। मैंने उसे परिष्कृत किया है। भद्रलोक से संबंध रखने वाले कुछ शब्द मिले हैं। 

आप भी सुनिए - इत्ता पिटोगे और जूते खाओगे साले कि कई पुश्तों तक निशान रहेंगे। तेरा जीना हराम कर दूंगी। घर में जो मां बहन हैं उन्हें लगा फ़ोन.....

मैंने वो नंबर नोट कर लिया है। जेब में भी रखा हुआ वो नंबर। आज महीना भर हो गया है। बिना नाम की कोई भी काल आती है तो सबसे पहले उस लिखे हुए नंबर से मिलाता हूं। इत्मीनान होने पर ही जवाब देता हूं। मिसकॉल पर भी खासी छान-बीन करके कॉलबैक करता हूं।

इस घटना के बारे में जब मैंने अपने घर में बताया तो बेटी खूब हंसी थी  - पापा मज़ा आ गया। 

आप बताएं। कैसा लगा?

-वीर विनोद छाबड़ा 

2 comments:

  1. सॉलिड वाली गलती

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  2. सॉलिड वाली गलती

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