-वीर विनोद छाबड़ा
किस्सा बहुत पुराना है। इतना पुराना कि इसे अब तक भूल जाना चाहिए था। मगर रह-रह कर याद आती है तो इसलिये कि जब-जब एक खास ब्रांड के जूतों के शोरूम के सामने से गुज़रता हूं तो वो भूली दास्तां याद आ जाती है। उस ज़माने में जब इस खास ब्रांड के पसंदीदा जूते की कीमत महज़ पचपन रुपये निन्यानवे पैसे थी। वो सस्ता दौर था। इस लिहाज़ से यह कीमत ज्यादा थी। जेब तो हर वक़्त खाली रहती। छात्र
जीवन था। मैं शोरूम को बाहर से ही निहार कर इस हसरत के साथ वापस आ जाता कि नौकरी मिलने पर पहला काम इस खास जूते को खरीदने का ही करूंगा। उन दिनों अðkरह-बीस रुपये का लोकल ब्रांड जूता नसीब था। इसे तब तक मरम्मत कराकर पहनता था जब तक कि जूता मेकर यह न कह दे कि भैया, आयंदा मत आना। अब मरम्मत की कोई गुंजाईश नहीं बची।
मुझे याद है कि एक बार मेरा नया जूता तब चोरी हुआ जब भगवान जी के दर्शन को गया था। तब विदीर्ण हृदय से दो जोड़ी पुराने जूते लेकर जूता मेकर के द्वारे गया-‘‘ भाई, कुछ ऐसा कर दो कि इन दो जोड़ी जूतों में से कायदे का मैटीरीयल निकाल कर एक जोड़ी जूते की गुंजाईश निकल आये।’’ जूता मेकर को मेरे पर तरस आया। उसने उन दो जोड़ी जूतों के बदले में दस रुपये अतिरिक्त लेकर एक जोड़ी नया जूता दे दिया। इसके बाद एक बार फिर ऐसी ही स्थिति पैदा हुई। तब पिताजी और दादाजी के फटे-पुराने जूतों की एवज में एक अदद नई जोड़ी जूते की आशा थी। मगर जूता मेकर ने भगा दिया-‘‘अमां टी0वी0-फ्रिज एक्सचेंज आफर की दुकान समझी है क्या?’’
नौकरी लगी। मैं पहली पगार मिलने ही सबसे पहले उस खास ब्रांड के जूतों के शोरूम पर पहुंचा। तब तक उस खास जूते के दाम पहले से काफी बढ़ चुके थे। पगार के तकरीबन एक तिहाई के बराबर। इससे कम कीमत के तो मेरे बदन पर कपड़े थे। मन थोड़ा उचाट हुआ। साथ ही ख्याल आया माता-पिता का जिन्होंने पाल-पोस कर व पढ़ा-लिखा कर इस काबिल बनाया था। बहनों का भी ख्याल आया जिनके संग मैं बचपन में खूब खेले और लड़े थे। यों खानदानी रस्म के मुताबिक पहली पगार माता-पिता के हाथ में ही रखी जानी होती है। घर के प्रत्येक सदस्य का भी उसमें थोड़ा-थोड़ा हक़ बनता है। पिताजी को सूट, मां के लिये साड़ी, छोटी बहन के लिये सलवार-कमीज तो बननी ही थी। बीकानेर में ब्याही बड़ी बहन-जीजा जी और नन्हीं भाजी को भी कुछ न कुछ देना बनता था। यह सोच कर मैं भावुक हो गया। खास जूता क्रय करने का इरादा अगले महीने के लिये स्थगित कर किया।

