Wednesday, December 17, 2014

दो दोस्तों की तीसरी क़सम!

-वीर विनोद छाबड़ा
अच्छा सिनेमा देखने वालों को ‘तीसरी क़सम’(1966) ज़रूर याद होगी। इसे गीतकार शैलेंद्र ने प्रोड्यूस किया था। निर्देशन बासु भट्टाचार्या का था। प्रसिद्ध लेखक फणीरेश्वरनाथ रेणु की रचना ‘मारे गए गुल्फाम’ पर आधारित थी यह फिल्म। शैलेंद्र का सपना था।


शैलेंद्र भले बहुत प्रसिद्ध गीतकार थे और अनन्य मित्र राजकपूर के अलावा तमाम निर्माता-निर्देशकों की पहली पसंद। मगर फिल्म बनाना हमेशा बहुत ही मुश्किल रहा है। ये बात फिल्म लाईन से रोटी-रोज़ी का जुगाड़ करने वाले शैलेंद्र से बेहतर भला कौन समझ सकता है? और फिर गीतकार की हैसियत ही कितनी होती है? मगर ये ऐसा कीड़ा है। एक बार काट ले तो कोई ईलाज नहीं।

शैलेंद्रजी पर तो मानो भूत चढ़ा था। सपनों में खोये थे... सब तो अपने ही हैं। फिल्म बन जाने दो। पैसे की बात बाद में। देखना, सब यही कहेंगे। लेकिन ये सपनों की नगरी है प्यारे। जितने चाहे देखो, एक से एक हसीन सपने। एक ठोकर पड़ेगी। नींद खुल जायेगी। भूल जाओगे सपना। याद करोगे उस गंदी बस्ती को जहां से तुम आये हो। शैलेंद्र के साथ भी यही हुआ। लेकिन वो पीछे नहीं हटे। फिल्म तो बन कर रहेगी। बैंक खाली किया। दोस्तों-यारों से मदद मांगी। थोड़ी बहुत ही मिली। फिल्म फ्लोर पर जाने के लिए तैयार हो गयी।


राजकपूर साहब की हां चाहिए थी। यों तो वो मुद्दत पहले से तैयार थे। फिर भी एक औपचारिक हां तो ज़रूरी थी। शैलेंद्रजी पहुंचे राजसाहब के दरबार। शैलेंद्र ने उन्हें वादा याद कराया।

राजसाहब बोले - ‘‘हां, बिलकुल याद है। मगर पहले यह तो बताओ प्रोजेक्ट क्या है? बजट कितना है? मेरी फीस कितनी है? साईनिंग एमाउंट कहां है? एग्रीमेंट फार्म कहां है?’’

शैलेंद्रजी के हाथों से तोते उड़ गए। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें और क्या बताएं। वो जो सोच कर आए थे वैसा तो यहां कुछ नहीं घटा। बल्कि सवाल पर सवाल। खैर, शैलेंद्रजी ने जैसे-तैसे हिम्मत बटोरी - ‘‘ये रहा एग्रीमेंट फार्म। जो आपकी फीस हो इसमें भर दीजिए। और हां ये रहा आपका साईनिंग एमाउंट।’’ यह कहते हुए शैलेंद्रजी ने जेब में हाथ डाला। जितना भी जेब में पैसा था निकाल कर रख दिया।

Sunday, December 14, 2014

राजकपूर - छलना मेरा काम!

- वीर विनोद छाबड़ा

जब होश संभाला तो दिलीप कुमार, राज कूपर और देवानंद की त्रिमूर्ति को राज करते हुए पाया हिंदी स्क्रीन पर। लाखों प्रशंसकों के साथ-साथ मैं भी इनका जबरदस्त फै़न था। अपने-अपने कारणों से तीनों ही दिलों पर राज करते थे। मेरे लिए दिलीप कुमार नंबर एक थे तो देवानंद ज्यादा पीछे नहीं। राजकपूर भी बेहतरीन एक्टर थे लेकिन उससे कहीं ज्यादा सुपर्ब प्रोड्यूसर-डायरेक्टर।


मुझे उनकी सबसे पहली फिल्म ‘बूट पालिश’(1954) याद आती है। हमारे स्कूल में दिखायी गयी थी। ये बात 1958 की है। सुना था राजकपूर बहुत बड़ा एक्टर है। वो भी इस फिल्म में काम करता है। लेकिन निराशा हुई जब पूरी फिल्म में सिर्फ़ एक बार दो मिनट के लिए उन्हें देखा और वो भी सोते हुए। बहरहाल, मैं ‘नन्हें मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है....’ गुनगुनाते घर आ गया। कुछ दिनों बाद पिताजी मुझे ‘छलिया’(1960) दिखाने ले गये। तब जाना राजकपूर क्या है? मुझे याद है जब राजकपूर को प्राण पीटते थे तो बहुत गुस्सा आता था लेकिन जब प्राण पिटते थे तो मैं भी सीट से उछल-उछल जाता-‘मार साले को, और मार...।’ आने वाली कई बरसातों में मैं कभी आंगन और कभी छत पर खूब नहाया - डमडम डिगा डिगा, मौसम भिगा भिगा, बिन पिए मैं तो गिरा, मैं तो गिरा हाय अल्लाह....। आज भी जब कभी बरसात होती है और बच्चों को उछलते-कूदते मस्ती करते देखता हूं तो जु़बां पर बरबस यही गाना आता है। आज की पीढ़ी को भी जब यही गुनगुनाते सुनता हूं तो बड़ा फ़ख्र होता है, अपने अतीत पे। आज 54 बरस बाद भी बड़ी जान है इसमें।

मुझे राजकपूर बतौर एक्टर भले उतना पसंद न हों मगर गानों में वो पूरी तरह छूबे दिखते हैं। इस कारण से कि धुन बनने से लेकर रिकार्डिंग तक वो बराबर शरीक रहते हैं। वो अच्छे डांसर नहीं थे लेकिन हौले-हौले उनका ठुमकना बहुत भाता था। ‘मेरा जूता है जापानी, ये पतलून इंग्लिशतानी, सर पे लाल टोपी रूसी, फिर भी दिल है हिंदुस्तानी...’। श्री 420’(1955) का ये गाना मुझे इतना अच्छा लगता है कि हिंदी सिनेमा के सारे गाने इस पर न्यौछावर हैं। कारण ये है कि हम हिन्दोस्तानी
दुनिया में कितने ही बड़े तुर्रमखां क्यों न बन जायें मगर अपनी ज़मीन, अपनी संस्कृति और अपनी पहचान नहीं भूल सकते, हमें फ़ख्र है अपने खून पर और भारतीय होने पर। तकरीबन हर गाने में वो दूसरों के मुकाबले बेहतरीन हैं। कभी उनकी मस्ती भाती है- सब कुछ सीखा हमने, न सीखी होशियारी, सच है दुनिया वालो कि हम हैं अनाड़ी....छलिया मेरा नाम छलना मेरा काम, हिंदु-मुस्लिम-सिख-इसाई सबको मेरा सलाम....। तो कभी चुहलबाज़ी - तुम अगर मुझको न चाहो तो कोई बात नहीं, मगर किसी और को चाहोगी तो मुश्किल होगी... मेरे मन की गंगा और तेरे मन की जमुना का, बोल राधा, बोल संगम होगा कि नहीं....। और कभी गंभीरता - मेरे टूटे हुए दिल से, कोई तो आज ये पूछे कि तेरा हाल क्या है...।

भले ही मैं दिलीप कुमार को एक्टिंग के मामले उनसे ज्यादा भाव देता हूं लेकिन ज़िक्र जब ऋषिकेष मुखर्जी की ‘अनाड़ी’(1959) या उनकी अपनी ‘आवारा’ और ‘जिस देश में गंगा बहती है’(1961) का होता है तो राजकपूर यकीनन टाप पर मिलते हैं। इसके लिए उन्हें बेस्ट एक्टर का फिल्मफेयर भी मिला। वो भारत के चार्ली चैप्लिन थे। मगर यह इल्ज़ाम सरासर गलत है कि राजकपूर सिर्फ़ अपने ही प्रोड्यूस फिल्मों में बेहतर परफार्म करते हैं। छलिया, अनाड़ी, तीसरी क़सम, दिल ही तो है, फिर सुबह होगी, परवरिश, शारदा, मैं नशे में हूं, दो जासूस वगैरह तमाम फिल्में गवाह हैं कि राजकपूर अपने बैनर की बरसात, आवारा, जागते रहो, श्री 420, चोरी चोरी, जिस देश में गंगा बहती है, संगम, और मेरा नाम जोकर की परफारमेंस के मुकाबले बाहरी फिल्मों में भी पूरी तरह ईमानदार रहे।

Thursday, December 11, 2014

दिलीप कुमार - उनकी नायिकाएं और इश्क!

-वीर विनोद छाबड़ा
आज 92 साल पूरे करके 93वें दाखिल हो रहे दिलीप कुमार की फिल्मी ज़िंदगी का हर सफ़ा निराला है, अद्भुत भी। नायिकाओं के बारे में खासतौर पर। उनके दौर की नायिकाएं दिलीप कुमार के साथ काम करने के लिये तड़पा करती थीं। कई सफल हुईं और कई नाकाम। कुछ नायिकाओं के साथ उनकी दोस्ती मोहब्बत की दास्तान बनी, कुछ के साथ लुक्का-झुप्पी चली और कुछ के साथ लडाई-झगड़े हुए।
मधुबाला का मामला तो कचेहरी तक जा पहंुचा था।

उनकी शुरू की नायिकाओं में कामिनी कौशल हुआ करती थीं। दिलीप ने उन्हें ‘नीचा नगर’ (1946) में देखा और दिल दे बैठे। उन दिनों कामिनी हिट नायिका थी और दिलीप की तीन फिल्में फ्लाप हो चुकी थीं। रमेश सहगल की ‘शहीद’ (1948) में संयोग से एक साथ काम करने का मौका मिला। कामिनी को भी युवा दिलीप और उनका रोमांटिक अंदाज भा गया। दोनों दीवानावार प्यार करने लगे।
कामिनी शादीशुदा थी। उनके पति सूद साहब को ये कतई पसंद नहीं था। वो दोनों का पीछा किया करते और अकेले रहने का कोई भी मौका नहीं देते थे। लेकिन बाबजूद इसके शाट के बहाने कोई न कोई रास्ता तलाश लेते। कभी मचान और कभी टीले की चोटी। ‘शहीद’ सुपर हिट हुई। साथ ही दिलीप-कामिनी की जोड़ी भी। नदिया के पार, शबनम और आरजू तक दोनों का रोमांस खूब चला। लेकिन एक सुबह दोनों ने पाया कि ये ठीक नहीं है। इसका कोई भविष्य नहीं है। कामिनी की शादी-शुदा जिं़दगी में आग लग जायेगी। और दिलीप ये तोहमत दिल पर लिये समाज को मुंह नहीं दिखा पायेंगे। लिहाज़ा दोनों अलग हो गये।

दिलीप कुमार ने नरगिस के साथ सात फिल्में कीं - मेला, अंदाज, जोगन, बाबुल, दीदार, अनोखा प्यार और हलचल। शुरू में नरगिस-दिलीप को लेकर कुछ अफ़वाहें उड़ी मगर वहां कुछ था नहीं। वो दोनों सिर्फ़ दोस्त थे। नरगिस तो राजकपूर के साथ थीं। यह बात महबूब की अंदाज़(1949) में ज़ाहिर हो चुकी थी। इसमें दिलीप-नरगिस-राजकपूर का प्रेम त्रिकोण था। नरगिस ने राजकपूर को दिल दिया। और दिलीप का किरदार दर्द लिए दुनिया से कूच कर गया।

दिलीप के दिल को अगला पड़ाव मधुबाला की दहलीज़ पर मिला। दोनों ने साथ साथ तराना, संगदिल और अमर कर चुके थे। ‘नया दौर’(1957) फ्लोर पर थी। मधु भी जल्दी ही दिलीप के दिल के दरवाजे़ पर दस्तक देने लगी। दोनों बेसाख्ता मोहब्बत में डूब गये। परंतु मधु के पिता अताउल्लाह खान इस रिश्ते के सख़्त खि़लाफ़ थे। उन्हें डर था कि अगर कमाऊ चिड़िया हाथ से उड़ गयी तो दर्जन भर लोगों का परिवार कौन चलायेगा? इसी मुद्दे पर मधु इमोशनल हो जाती और दिलीप कुमार से दूर जाने की कोशिश करती। लेकिन बेमुरुव्वत मोहब्बत दूर होने न देती। मधु की हालत न जीने की थी और न मरने की। दिलीप भी कुछ ऐसी ही परेशानी महसूस करते।

Wednesday, December 10, 2014

चरण स्पर्श, चरण वंदना और चारण भक्त!

-वीर विनोद छाबड़ा
चरण स्पर्श बड़ों के प्रति आदर का प्रतीक है।
जब बड़े हुए तो माता-पिता को बड़ों के चरण स्पर्श करते देखा। रूठने वालों को भी बड़ों के पैर छूते देखा। देखा-देखी हम भी वैसा ही करने लगे।
तब हमें नहीं मालूम था कि मुस्लिम समाज में ये प्रथा नहीं है। लेकिन हम उनके भी पांव छूते थे। माता-पिता ने मना नहीं किया। और उन्होंने भले ही 'न न' की, लेकिन हम फिर भी छूते रहे।
चिट्ठीपत्री में भी सबसे पहले चरण स्पर्श या पांव लागी लिखा जाता था। 
जब घर से बाहर दुनिया में कदम रखा तो पता चला कि किसके छूने और किसके नहीं। कौन हिन्दू और कौन मुसलमान। लेकिन जब किसी विद्वान से मिलना होता तो न हिन्दू न मुसलमान और न इसाई, हाथ खुद-बी-खुद पांव छूने को बेताब हो जाते। और ये जज़्बा आज भी बदस्तूर कायम है।
हमारे खानदान में बेटियां पांव नहीं छूती। बड़े बुज़ुर्गों ने सख्ती से मना किया है। हम तो बहुओं द्वारा पांव छूने के भी विरुद्ध हैं। लेकिन वो मानती नहीं। शायद ज़माने के सदियों पुराने बंधन यह उन्हें ऐसा न करने की इज़ाज़त नहीं देते।
हालांकि अब पूरी तरह दंडवत हो कर चरण स्पर्श की प्रथा में थोड़ा सुधार हुआ है। कई घरों में तनिक झुक कर एक हाथ आगे बढ़ाने तक सीमित रह गया है। अगर किसी कारणवश दूरी अधिक है ये कवायद दूर से प्रतीकात्मक रूप ही अदा हो जाती है। और अगला इसे आदर दिया जाना मान लेता है।
लेकिन तब बहुत ख़राब लगता है जब हम अपने किसी मित्र या रिश्तेदार के घर जाते हैं तो बहू हमारे चरण स्पर्श करने के साथ-साथ सास-ससुर के भी चरण स्पर्श करती है।
एक बार बहू भूल गई तो सास ने आखें तरेर कर उसे चरण स्पर्श करने का इशारा किया। थोड़ी देर बाद अंदर से आती आवाज़ों से पता चला कि सास ने बहू को बहुत बुरी तरह डांटा - अगर दिन में दस बार मेहमान आएंगे तो तुम्हें दस बार उनके और हमारे पांव छूने पड़ेंगे। बहू हो, बहू बन कर रहो। हमने उन मित्र के घर जाना बहुत कम कर दिया है।

Sunday, December 7, 2014

बदलता भिखारी!

-वीर विनोद छाबड़ा
मेरे एक निकटवर्ती रिश्तेदार हैं। हर साल वो अपने जन्मदिन पर देवी जागरण का आयोजन करते हैं और तत्पश्चात विशाल भंडारा।

भंडारा दो किस्म का होता है। एक - भिखारियों के लिए और दूसरा - आमजन के लिए।

दोपहर में भिखारी और शाम को आमजन। भिखारियों की संख्या २५१ तक लिमिट है। और आमजन कोई रोक-टोक नही। पांच सौ तक को वो स्वयं न्यौता दे आते हैं मगर सात सौ से ज्यादा ही खा जाते हैं। पूरा मोहल्ला जुटता और उनके बाहर से आये रिश्तेदार भी।

मगर अगले साल से उन्होनें भंडारा बंद करने का फैसला किया है। 

वो इसकी वज़ह बताते हैं कि - यों तो भिखारी हर गली मोहल्ले अस्पताल मदिर के आसपास ढेरों की संख्या में मिलते हैं। मगर इन्हें संगठित करके ढोकर ले आना एक टेढ़ी खीर है। इसके लिए भिखारियों के ठेकेदार का सहारा रहा।

प्रति भिखारी की दर १००-१२५ रूपए के आसपास होती है। ठेकदार की कमीशन अलग। ठेकेदार भिखारी से भी कमीशन मारता है।

ठेकेदार भिखारियों की संख्या में भी हेरा-फेरी करता है। २५१ की जगह १५० लाएगा और बताएगा पूरे ढाई सौ। कई भिखारियों को कपडे बदल कर दो बार दिखा कर संख्या पूरी करने का दावा करता है।

अब ये तो संभव है नहीं कि प्रत्येक भिखारी का चेहरा याद रखा जाए या उनके नाखुन पर जल्दी न मिटने स्याही वाली लगा दी जाए। और फिर कई तो शक्ल से भिखारी ही नहीं दिखते। अंग्रेजी में बात करते हैं। घोटाला ही घोटाला। इसीलिए बंद कर दिया।

रिश्तेदार का फ़साना सुनकर मुझे अपना बचपन याद आता है।

Wednesday, December 3, 2014

और एक था, ज्वेल थीफ़!

-वीर विनोद छाबड़ा
आज ०३ दिसंबर है। देवानंद साहब को गुज़रे तीन साल हो गए हैं।

मैंने जब होश संभाला था तो पाया कि देवानंद हमारे पिताजी की पीढ़ी के नायक थे। लेकिन उनकी सदाबहार इमेज की कायल मेरी पीढ़ी भी हो गयी। मैंने १९६५ में उनकी पहली फ़िल्म देखी थी - तीन देवियां। तभी से वो देवानंद से देवसाब हो गए और उनसे रश्क हो गया। तब मैं चौदह प्लस था। सोचता था - बड़ा होकर मैं भी बनाऊंगा - चार देवियां।


देवसाब से रश्क का एक और कारण था कि उनको पुरुषों से ज्यादा महिलाओं द्वारा पसंद किया जाना। सोलह साल की भी और साठ वाली भी। सिनेमाहाल में  मर्दों से ज्यादा तो औरतों की तादाद देखी जाती थी। सुनते थे कि लड़कियों के तकिये के नीचे देवसाब की तस्वीर होती थी।

ये भी सुना था कि देवसाब का मशहूर एक्ट्रेस सुरैया से ज़बरदस्त इश्क चला था। मगर सुरैया की नानी तैयार नहीं थीं। देवसाब ज्यादा इंतज़ार नहीं कर पाये और अपने बड़े भाई चेतन आनंद की खोज मोना उर्फ़ कल्पना कार्तिक से ब्याह रचा लिया। लेकिन सुरैया ने उम्मीद नहीं छोड़ी। टूटे दिल के साथ ज़िंदगी गुज़ारने का फैसला किया। उन्होंने मरते दम तक शादी नहीं की।

मैं ही नहीं सारा का सारा पुरुष वर्ग देवसाब से डाह रखता था। शायद यही वज़ह थी कि उस ज़माने में देवानंद कट हेयर स्टाइल के प्रति नौजवान के साथ-साथ दस-बारह साल वाले लड़के भी दीवाने थे। मैंने एक मुद्दत तक उनकी स्टाइल को अपनाने की कोशिश की। मगर कम्बख़्त उनकी मानिंद बाल ही नही सेट हो पाये।

कई नायिकाओं का कैरियर बनाने का श्रेय देवसाब को जाता है। ज़ीनत अमान हालांकि ओपी रल्हन की खोज थी। परंतु उसे ज़मीन से आसमान पर बैठाने का काम देवसाब ने किया। 'हरे रामा हरे कृष्णा में' वो देवसाब की बहन थीं। इसके बाद कलाबाज़, डार्लिंग डार्लिंग, वांटेड आदि कई फिल्मों में दोनों नायक-नायिका रहे। लेकिन बात कुछ हज़म नहीं हुई।
उन दिनों पचास की उम्र में आम तौर पर कलाकार चरित्र भूमिकाओं में देखे जाते थे। या ये भी कह सकते हैं कि डाह के कारण बदहज़मी हुई। लेकिन जब 'देस परदेस' में वो ५५ की पिता समान उम्र में १७ की टीना मुनीम से इश्क फरमाते देखे गए तो उनके घनघोर दीवानों को भी उलटी हो गयी। उनके बारे में उन दिनों ये जोक मशहूर हो गया। फिल्म की नायिका के बेटी हुई। देवसाब बधाई देने के साथ एग्रीमेंट भी लेते गए, १६ साल बाद बनने वाली फिल्म की नायिका की भूमिका के लिए नवजात बेटी को साइन करने के लिए। इससे देवसाब की चिरयुवा छवि छिन्न-भिन्न हो गयी।

Tuesday, December 2, 2014

स्मृतिशेष! सहज और शालीन देवेन वर्मा।

-वीर विनोद छाबड़ा

हिंदी सिनेमा के जाने-माने ए ग्रेड कॉमेडियन देवेन वर्मा का ०२ दिसंबर २०१४ को स्मृतिशेष हो गए । वो ७७ वर्ष के थे।


वो कॉमेडी के सृजन के लिए सिर्फ़ चुटीले संवादों का सहारा नहीं लेते थे। उनकी बॉडी लैंगुएज और चेहरे के एक्सप्रेशन भी हास्य का बोध कराते थे। वो कॉमेडी के लिए अतिरिक्त परिश्रम नहीं करना पड़ता । सब कुछ सहज और अपने आप ही होता जाता। कॉमेडी अंदर से स्वयं निकलती। लेखक के लिखे संवाद धरे रह जाते। न संवादों में और न ही एक्शन में फूहड़पन दीखता था। सादगी और शालीनता दिखती होती।

याद आता है यश चोपड़ा की कभी-कभी का वो दृश्य। देवेन वर्मा से ऋषिकपूर पूछते हैं - नहाने के लिए गरम पानी कहां मिलेगा। देवेन वर्मा दूसरी ओर इशारा करते हुए बड़बड़ाते हैं - यहां अट्ठाईस साल हो गए नहाय और इनको नहाने के लिए गरम पानी… 

उनकी टाइमिंग गज़ब की थी। इसका प्रमाण बेस्ट कॉमेडियन के लिए तीन-तीन फिल्मफेयर अवार्ड उनकी झोली में गिरना है (चोरी मेरा काम, चोर के घर चोर और अंगूर)।

देवेन वर्मा की मांग साठ, सत्तर और अस्सी के दशक में सर्वाधिक थी।

शेक्सपीयर की कॉमेडी ऑफ़ एरर्स पर आधारित गुलज़ार की 'अंगूर' में देवेन संजीव कुमार के साथ डबल रोल में थे। लुक में वो किसी  हीरो से कम नहीं थे। कॉमेडी के अलावा देवेन ने मिलन,  देवर और बहारें फिर भी आएंगी में गंभीर रोल भी किये।
 

सुप्रसिध्द अभिनेता अशोक कुमार की पुत्री रूपा गांगुली से देवेन का विवाह हुआ था। लेकिन अशोक कुमार के दामाद होने का उन्होंने कभी लाभ नहीं उठाया। अपनी प्रतिभा और अदायगी के बूते ही आगे बढ़ते रहे। साली प्रीति गांगुली के साथ भी देवेन ने कई फ़िल्में की।

देवेन ने लगभग १४४ फिल्मों में अभिनय के साथ साथ  दाना पानी, चटपटी, बेशरम, नादान, यकीन और बड़ा कबूतर भी निर्मित व निर्देशित की। परंतु उन्हें औसत सफलता ही मिल पायी। कमाई का एक बड़ा हिस्सा व्यर्थ गया।