Monday, January 5, 2015

छेती छेती चन्ना ले के आजा बारात!

-वीर विनोद छाबड़ा
११ सितम्बर। जबसे अमरीका के वर्ल्ड  ट्रेड सेंटर पर आतंकी हमला हुआ है, ये तारीख इसी याद के लिए जानी जाती है।

वरना इससे पहले इस तारीख को बंदे की शहादत के तौर पर याद रखा जाता था। उस पर श्रद्धा सुमन चढाने वालों का अल सुबह से देर रात तक तांता बंधा रहता था। तेरह साल हो गए। कोई याद दिलाने नहीं आया। चलो अच्छा हुआ। फुरसत मिली याद दिलाने वालों से। मुफ़्तखोरों पर होने वाला खर्चा पानी बचा। 

लेकिन जाने क्यों बंदा आज खुद को बहुत तन्हा महसूस कर रहा है। दोस्तों रिश्तेदारों को तो अपनी ही मुसीबतों से फुरसत नहीं। उन्हें क्या याद होगा ये दिन? कुछ तो ऊपर ही चले गए हैं। वहां से भी अफ़सोस का पैगाम नहीं आता।

सबसे बड़ा अफ़सोस तो ये है कि पत्नी को भी वो दिन याद नहीं आता। हर साल बंदा ही याद कराता है। बदले में वो मुंह बिचका लेती है। हिकारत से देखती है। शायद अफ़सोस करती रही होगी कि काश इस नाशुक्रे बंदे के बदले उस दिन कोई राजकुमार सेहरा सजा के आया होता तो वो रानी होती आज किसी स्टेट की। बंदे पर नास्टैल्जिया हावी होने लगता है। दिमाग के पर्दे पर फ्लैशबैक चालू हो गया है। 

बंदे को वो नज़ारा, वो 'मुबारक' घड़ी याद आती है। वो सज-धज के पिताजी के दोस्त कुलदीप सिंह जी की कार में बैठ कर अपनी 'बैटर-हाफ' लेने के लिए रवाना होता है। दिन भर खूब बारिश हुई है। बंदे को फ़िक्र लगी हुई है बारात कैसे जाएगी?

लेकिन बाकी सब बेफिक्र हैं। जैसे सब जानते हैं कि शाम होते-होते आसमान साफ़ हो जायेगा। और वाकई सब अंतरयामी निकले। लेकिन सड़क पर बेतरह कीचड है। और उमस ज़बरदस्त। सर पर साढ़े सात किलो का भारी भरकम चांदी का मुकुट है। इसे उसकी मां चौक वाले किसी पुजारिन से मांग कर लायी है।  और अपने कद के बराबर की तलवार भी है। ये पड़ोस के करतार सिंह जी के घर से आई है। 

मगर बंदे को ये सब कतई अखर नहीं रहा है। उसे तो दुनिया की सबसे बड़ी नियामत जो हासिल होने जा रही है। अब ये बात अलबत्ता दूसरी है कि कुछ ही दिनों में रियालाइज़ हो गया कि बैठे-बिठाये एक इन्क्वायरी कमेटी सर पे बैठा ली, उम्र भर के लिए।

बहरहाल ठीक सात बजे तक़रीबन ३०० मित्रो-रिश्तेदारों का जुलूस बैंड -बाजे और पंजाबी ढोल की बेसुरी धुनों पर नाचते-गाते और झूमते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ता है।

आज सभी नशे में हैं। सबके नशे अलग-अलग हैं। कोई शुभ अवसर के नशे में चूर है तो कोई बोतल के। और किसी किसी को नाचने का नशा है। कोई कोई तो इन सबको देख कर मस्त है।

Friday, January 2, 2015

फ्री की पीता हूं!

-वीर विनोद छाबड़ा

१९९१ की गर्मियां थीं। एक रात अचानक पेट में दर्द उठा। गैस होगी। ये सोच कर ठंडा पानी पिया। मगर दर्द बढ़ता ही गया।

दर्द जब बर्दाश्त की हद से बाहर हो गया तो पत्नी को उठाया। अजवाइन, हींग, गरमपानी से सिकाई आदि तमाम घरेलू उपाय किये। मगर सब बेकार।

पिताजी ने डॉक्टर की सलाह दी। लेकिन रात दो बजे कौन डॉक्टर मिलेगा? हमारी कॉलोनी इंदिरा नगर को बसे यों तो बारह बरस हो चुके थे मगर स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल था। सिविल हॉस्पिटल, मेडिकल कॉलेज या बलरामपुर ये सरकारी अस्पताल थे। आठ दस किलोमीटर से कम तो कोई नहीं। प्राइवेट बहुत कम थे और उन पर ऐतबार भी नहीं था।

निम्न आय वर्गीय कॉलोनी थी। लिहाज़ा आसपास किसी के पास कार तक नहीं थी। ऑटो था नहीं। टेम्पो दूर मिलते थे। स्कूटर पर बैठने की स्थिति में नहीं था। अड़ोसी-पडोसी आ गए तो तरह-तरह के सुझाव भी आने लगे। एक साहब ने अपने तजुर्बे के आधार पर एलान किया - तुरंत ले जाओ इन्हें अस्पताल। वरना सुबह तक के मेहमान हैं।

पत्नी ने रोना-धोना शुरू कर दिया। तभी महसूस हुआ कि दर्द कम हो रहा है। सबको धन्यवाद दिया - कृपया अब जायें। अब मैं ठीक हूं। अब जाकर सोएं अपने घरों में। ज़रूरत हुई तो फिर याद करूंगा।

और अगले पंद्रह मिनट बाद पता ही नहीं चला कि कभी दर्द था। सब नार्मल। शुक्र है। खूब बढ़िया नींद आई। सुबह देर तक सोया भी। आराम से खाया-पिया।

डॉक्टर को दिखाया। उसने कहा - कुछ भी तो नहीं। गैस्टिक रही होगी। कुछ दवा दे दी।

हम भी खुश। दो दिन कुछ नहीं हुआ। डॉक्टर ठीक कहते थे कि गैस्टिक ही रही होगी।

लेकिन अगली ही रात फिर वही दर्द। बढ़ता ही गया। दो घंटा रहा और फिर चला गया। मानों कुछ हुआ ही नहीं था।

अगली रात फिर वही हुआ। फिर डॉक्टर को दिखाया। वो बोले - गैस्टिक ही है। दवा बदल दी है। थोड़ी तेज भी कर दी है। 

मगर सब बेकार। आधी रात शुरू होते ही दर्द शुरू हो जाता था।

कई जगह से राय आई - किसी भूतनी का साया है। झाड़ फूंक करा लो।

बड़ी-बूढ़ियों को लगा जादू-टोना है। उतरवाना चाहिए। टिल्लू की दादी एक्सपर्ट है। कइयों का उद्धार कर चुकी है।  

इधर डॉक्टर परेशान। उसने किसी बड़े डॉक्टर को रेफर किया। एक्सरे हुआ। सब सही। इसके बाद लखनऊ के दर्जन भर डॉक्टरों को दिखाया। कोई एसिडिटी बताता तो कोई हाइपर एसिडिटी। नई-नई दवा दे देता। कोई वही दवा ब्रांड बदल कर देता।

लेकिन सब फेल हो गया। दर्द बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की।

इस बीच महीना गुज़र गया। अब खाना भी अच्छा लगना बंद हो गया। 

डॉक्टर से अनुरोध किया - अल्ट्रा-साउंड करा लें। कुछ तो पता चलेगा। 

डॉक्टर ने कहा - ठीक है। लेकिन मेरा तीस साल का तजुर्बा कहता है। निकलेगा कुछ नहीं।