Monday, March 23, 2015

अरे ओ, चश्मुद्दीन!

-वीर विनोद छाबड़ा

मैंने चश्मा १९६१ में धारण किया था। उम्र ११ ग्यारह साल और कक्षा - छह। पिताजी बताते थे कि उन्हें भी इसी उम्र में और इसी क्लास में चश्मा लगा था। मुझे तसल्ली हुई कि कोई अनहोनी नहीं हुई।

बहरहाल, जैसे ही मैंने चश्मा लगाया, एक नई दुनिया दिखी। एक अरसे से दुनिया धुंधली दिख रही थी। स्कूल के ब्लैक बोर्ड पर लिखी इबारत पढ़ने में दिक्कत होती थी।

कई साल बाद मैंने नवभारत टाइम्स लखनऊ में इसी चश्मे पर एक कहानी भी लिखी थी। जिसमें मैंने बताया था कि एक ज़हीन बच्चे को इसलिए कम नंबर मिले क्योंकि उसे ब्लैक बोर्ड पर साफ़ साफ़ दिखाना बंद हो गया। बच्चे ने शर्म के कारण माता-पिता से बताया नही। लेकिन उसके शिक्षक ने यह बारीकी पकड़ ली। उसके माता-पिता को स्कूल में बुला कर बात की। माता-पिता मानने के लिए तैयार नहीं थे - हाय! लोग क्या कहेंगे?  इतनी छोटी सी उम्र में चश्मा? आगे क्या होगा?
लेकिन मास्टरजी ने अभिभावक को मना लिया। बच्चे को चश्मा लगा। और वो फिर से फर्स्ट आने लगा।

जब मैंने कम उम्र में चश्मा लगाया तो मेरे माता पिता को तो कोई उलझन नहीं हुई हां समाज और स्कूल में हाहाकार मच गया।

अक्सर कमेंट्स सुनने को मिलते - ओ, चश्मुद्दीन। सबसे ख़राब तब लगा जब एक टीचर ने भी मुझे चश्मुद्दीन कहा और किसी गलती पर पिटाई भी कर दी। इससे मेरा चश्मा टूट गया। विद्यांत कॉलेज में मेरे मैथ वाले मास्टर जीडी बाबू पहले चश्मा उतरवाते थे और पिटाई करते थे। एक दिन पिटाई करते हुए उनका ही पतले फ्रेम वाला चश्मा टूट गया। इस पर कुछ लड़के हंस दिए। जीडी बाबू ने गुस्से में आकर उनकी भी ज़बरदस्त धुनाई कर दी।

अक्सर दबंग लड़के मेरा चश्मा मुझसे छीन लेते। मैं उनसे वापस लेने के लिए भिड़ भी लेता। इस लप्पा -झप्पी में चश्मा टूट कर ही मानता।

चूंकि मैं क्रिकेट खेलने का शौक़ीन हुआ करता था  इसलिए आये दिन चश्मा टूटता था। घर में डांट भी खूब पड़ती। नाते रिश्तेदारों ने भी सुना तो बोले -हाय हाय! अभी से हाल है तो आगे क्या होगा।? डॉक्टरी और इंजीनियरिंग में तो एडमिशन मिल नहीं सकता। नौकरी भी अच्छी नहीं मिलेगी और छोकरी भी।

जब मैं यूनिवर्सिटी में था एक दिन मैंने सुना कि लड़की मेरी मित्र से पूछ रही थी - आज तेरा चश्मुद्दीन नहीं दिखा?

Saturday, March 21, 2015

ज़िंदगी है रुमाल!

-वीर विनोद छाबड़ा 

ये रूमाल भी अजीब शै है जनाब। इसके बिना काम नहीं चलता। बड़ी फ़ज़ीहत होती इसके बिना।

आज सुबह घर से निकलने को हुआ। पहले तो खुद तलाशा। नहीं मिला। यह नामाकूल ज़रूर किसी कपडे के गट्ठर के नीचे दबा होगा या किसी कपडे के साथ चिपक कर चला गया। अपने अटैची में भी झांका। वहां भी नदारद। ना चाहते हुए मेमसाब को गुहार लगानी पड़ी - मेरे रुमाल कहां हैं? एक भी नहीं दिख रहा।

दिवाली की ६० मिनट वाली चटाई फट पड़ी -मुझसे पूछ कर लाये थे? अपने कपडे खुद क्यों नहीं संभाल रखते? कल रूमाल किसने धोये थे? खुद न? सूखने किसने डाले? खुद न? तो फिर मुझसे क्यों पूछ रहे हो? मैंने कभी तुम्हारे रूमालों हिसाब रखा क्या? हर महीने दर्जन भर खरीदते हो तो जाते कहां हैं?

मैं समझ गया कि बिच्छू के बिल में हाथ डाल दिया है। मदद तो करेंगी नहीं, उल्टा उलटे-पुल्टे सवाल पूछ कर ब्लडप्रेशर ही बढ़ाएगी। ऐसे मौके पर पत्नी से हारने का भी सुख अलग है। बेहतर है बाज़ार से नये खरीद लूं। ऐसा एक बार नहीं दर्जनों बार हो चुका है। हर महीने छह रूमाल  खरीदता हूं। महीना खत्म होते न होते एक भी नहीं दिखता। छोटा आइटम है। बह जाते हैं। मुझे याद है मेरे पडोसी का सीवर चोक हो गया था। सफाई कराई तो दर्जनों रुमाल फंसे हुए निकले। 

कुछ अरसा पहले बंदरों को ले जाते देखा था। न जाने यह क्या करते होंगे रूमालों का? बहरहाल तबसे कमरे में सुखाने लगा।

लेकिन गायब होने का सिलसिला रुका नहीं। तमाम पैंटों की जेबें भी झाड़ डालीं। वहां भी नहीं दिखते। यों रुमालों से अपनी दोस्ती बड़ी प्यारी है। जब छोटे होते थे तो अक्सर नाक बहा करती थी। मां स्कूल जाते वक़्त एक अदद जेब में ठूंस देती थी। लेकिन मुझे याद है कि कमीज़ से नाक पोंछते हुए लौटता था। तब मां  बक्सुए से रुमाल जेब से टांग दिया करती थी।

ये मां भी एक अजीब शै है इस दुनिया में। बहुत प्यार करने वाली इतना। फ़्लैश बैक में जब भी जाओ बाट निहारती मिलेगी। और यह एक पत्नी है हर कदम पर रास्ता रोके मिलेगी। शादी के एक दो-महीने तक तो दफ़तर जाने से पहले सब आइटम चेक करेगी - सबसे पहले रुमाल। फिर पर्स, कंघी वगैरह।

उस पुराने ज़माने में साल में एक मज़ेदार इवेंट होता था। बड़ी बहन की कुकिंग के एग्जाम में ढेर सामान ढोने के लिए मेरी बुकिंग रहती। उसमें दर्जन भर रेशमी रुमाल भी होते थे। जब बहन एग्जाम वापस आती तो एक दो ही बचते। आधा दर्जन तो एग्जाम टीचर रख लेती। एक-दो प्रिंसिपल। 

याद पड़ता है पुरानी फिल्मों में भी रुमाल का महत्व रहता था। १९६१ में रेशमी रुमाल नाम से एक फिल्म भी आई थी। इसमें मनोज कुमार और शकीला हीरो-हीरोइन थे। राजेश खन्ना की अनुरोध में एक खूबसूरत गाना था - आती जाती खूबसूरत सड़कों पे इतफ़ाक से.…इसी में आगे था - किस कदर यह हंसी ख्याल मिला है राह में, एक रेशमी रुमाल मिला है जो गिराया है किसी ने जानकर, जिसका हो ले जाए वो पहचान कर, वरना मैं रख लूंगा उसको अपना मान कर, किसी हुस्न वाले की निशानी मान कर...

Friday, March 20, 2015

दो ड्राप कैच - और पाकिस्तान मैच हार गया!

-वीर विनोद छाबड़ा

एडिलेड में ऑस्ट्रेलिया ने पाकिस्तान को छह विकेट से हरा दिया। और इसके साथ ही वो वर्ल्ड कप से बाहर हो गया।

इस हार से पाकिस्तानियों से ज्यादा दुखी मुझे भारतीय दिख रहे हैं। उन्हें लग रहा था कि इस लचर पाकिस्तानी टीम को टीम इंडिया कहीं भी हरा सकती है। अगर ऑस्ट्रेलिया को पाकिस्तान हरा देती तो टीम इंडिया उसे हरा कर आसानी से फाइनल में पहुंच जाती। लेकिन ऐसा होना नहीं बदा था। क्रिकेट किसी के सोचने की तरह नहीं चलता। उसकी अपनी चाल और नियति है।
 

आज पाकिस्तान का दिन नहीं था। २१४ का लक्ष्य। बेहद मामूली था। पहले तो पाकिस्तानी बल्लेबाज़ों ने हरा दिया। टॉस जीत कर खुद बल्लेबाज़ी की। उम्मीद के मुताबिक २६०-२७० तक नहीं पहुंच पाये। ऑस्ट्रेलिया की गेंदबाज़ी में दम न होने की बावजूद ख़ुदक़शी करते दिखे।

लेकिन इसके बावज़ूद एक वक़्त ऐसा लगा कि पाकिस्तानी गेंदबाज़ टीम को वापस ले आएंगे। ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ों को वहाब रियाज़ की तूफानी गेंदबाज़ी और खतरनाक बम्परों ने खूब परेशान किया। खासतौर पर शेन वाटसन की शक्ल देखने लायक थी। ऊपर से वहाब का साथदूसरे गेंदबाजों नहीं दिया। 

मगर यहां जीती बाज़ी फील्डरों ने पलट दी। वॉटसन का सिट्टर कैच राहत अली ने छोड़ा और मैक्सवेल को सोहैल ने छोड़ा। दोनों बार वहाब की गेंद पर। इस मैच के वास्तविक टर्निंग पॉइंट यही थे। कैच छोड़ो, मैच छोड़ो। अगर ये कैच न छूटे होते तो आजकी कहानी कुछ और ही होती।

खिलाडियों का व्यवहार भी ठीक नहीं था। पाकिस्तानी खिलाड़ी संभावित हार के कारण खिन्न थे तो ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों को उकसाते देखा गया। निश्चित ही यह जेंटलमैन क्रिकेट नहीं है।

बहरहाल, एक दिनी तो यही है। कभी इधर, कभी उधर। जितने पास, उतने दूर।
अब तसल्ली के लिए कहा जा सकता है कि पाकिस्तान टीम ने सोचा यहां ऑस्ट्रेलिया से हारना ठीक है। कई बहाने हैं। होम पिच पर होम क्राउड के सामने थे वो। हम क्या कर सकते थे? अगर सेमी में इंडिया से हार कर घर पहुंचते तो बड़ी कुट (मार) पड़ती।

यह सब तो लुत्फ़ लेने वालों की बातें हैं।

चाहे भारत हो या पाकिस्तान। मनोवृति एक है। जीत गये तो बल्ले बल्ले। और हार गए तो ज़बरदस्त मीन-मेख।

मैंने कई चैनल पर सुना। बताया जा रहा है कि कोई पीएम से लिखवा लेता है और कोई प्रेजिडेंट से। सवाल यह है कि कल तक यह किसी को याद क्यों नहीं था?

आज विशेषज्ञों को इंफ्रास्ट्रक्चर भी याद आ रहा है। और मेरे ख्याल से ये पॉइंट गलत भी नहीं है। पाकिस्तान ने पिछले कई साल से अपने ग्राउंड पर घरेलू प्रथम श्रेणी क्रिकेट भी ज्यादा नहीं खेली है, अंतर्राष्ट्रीय तो बिलकुल ही नहीं। बोर्ड पर अज्ञानी प्रशानिक अधिकारियों का कब्ज़ा है।

Wednesday, March 18, 2015

मुकाबला जोश और होश के बीच!

-वीर विनोद छाबड़ा

कल विश्वकप में मेलबोर्न के मैदान में टीम इंडिया और बांग्लादेश के बीच क्वार्टरफाइनल मुक़ाबला है। जीत का सत्ता लगाने का मौका है। सबको टीम इंडिया की जीत की घंटियां सुनाई दे रही हैं। मेरे घर के आस-पास रहने वाले कुछ बच्चे और नौजवान जीत के जश्न को मनाने तैयारियां कर रहा है। परसों एक मित्र ने लिखा था कि उन्हें लग रहा है कि यह मैच टीम इंडिया हार जायेगी।


अपनी बात कहने से पहले मैं दिवंगत लाला अमरनाथ के शब्द दोहराना चाहता हूं। एक देशी पत्रकार ने पूछा - लाला जी आपके ख्याल से इस टेस्ट मैच का परिणाम क्या होगा?

लाला जी ने कहा - बड़ा आसान सवाल है और वैसा ही आसान जवाब है - भारत यह टेस्ट जीतेगा या हारेगा और अगर दोनों नतीजे नहीं होंगे तो मैच ड्रा हो जायेगा।

चलिए अब सीरियस बात की जाए। मैं किसी खिलाड़ी का नाम नहीं लूंगा।

दरअसल मैं इस मैच को जोश और होश के बीच का मुक़ाबला मान रहा हूं ।

बांग्लादेश जोश से भरी टीम है। अब तक कोई भी जीत उसे अपनी वज़ह से नहीं मिली विपक्ष की कमजोरी की वज़ह से या उसे हल्का समझने की भूल के वज़ह से मिली हैं। बांग्लादेश ने इस जगह पर पहुंचने की कभी कल्पना भी नहीं की थी, तैयारी तो दूर की बात है। अब तक सब उछल- कूद रहे हैं। मगर कल की सुबह अलग होगी। मुक़ाबला टीम इंडिया से है। 

टीम इंडिया भले ही बांग्लादेश का क्रिकेटिंग पॉइंट पर या किसी सामाजिक या जातीयता या राजनैतिक आधार पर कोई परंपरागत विपक्ष नहीं रहा। लेकिन बड़े पडोसी से आगे जाने का जोश तो होता ही है। और छोटे पडोसी को चुप बैठने की सलाह देना तो बनता ही है।


जोश में अक्सर भूल ये होती हैं की स्ट्रैटजी नहीं बन पाती या कोई  मुख्य कमजोरी पकड़ने जैसी महत्वपूर्ण बात याद नहीं रहती। हमारे देश में कभी कपिल देव इसी नीति के अनुसार खेलते थे - आओ, चलो उतरते हैं मैदान में। देख लेंगे वो क्या हैं और जैसे-जैसे मैच आगे बढ़ेगा वैसे ही हम कुछ न कुछ तो कर ही लेंगे। हार या जीत। क्रिकेट में तो यह होता ही रहता है।

लेकिन कपिल वाला युग कबका ख़त्म हो चुका है।

अब प्लानिंग के हिसाब से चलना होता है।  प्लान-वन, प्लान-टू, प्लान -थ्री।

अगर बांग्लादेश हारेगी तो इसी वज़ह से। फील्डिंग अच्छी है और कैचिंग भी। थ्रो सटीक न हों तो भी बढ़िया हैं। टीम इंडिया को बांग्लादेश में यही विशेषता अच्छी नही लग रही होगी। हालांकि टीम इंडिया भी इस डिपार्टमेंट में बांग्लादेश से उन्नीस नहीं है।

Monday, March 16, 2015

ज़िंदगी है आलू!

-वीर विनोद छाबड़ा

आलू का नाम आते ही कुछ लोगों को लालू प्रसाद यादव की याद आती होगी। जब तक है समोसे में आलू तब तक रहेगा देश में लालू। यह बात लालू खुद कहते फिरते थे।

अब आलू तो अपनी जगह है। मगर लालू शनै शनै विस्मित हो रहे है।

बहरहाल यहां मक़सद लालू जी को याद करने का नहीं बल्कि उसके सेवन से है।

कुदरत ने भी आलू नाम की क्या दमदार चीज़ बनाई है! स्वाद के मामले में खुद में बेजोड़ तो है ही, हर जगह फिट होने में भी अव्वल है। मटर, गाज़र, बैंगन, मैथी आदि छत्तीस किस्म के व्यंजन बताये जाते हैं जो जिनकी जोड़ी आलू के साथ खूब जमती है।

हमारे जैसे लोग लौकी के नाम पर पलटी मारते हैं। मगर आलू के साथ मिला कर लबर-लबर खाते हैं। बड़ा टेस्टी है जी! कई लोगों को मट्टन के साथ आलू की जोड़ी बनाते देखा है।

आलू के बिना तो समोसे की कल्पना भी नहीं की जा सकती। यों मैंने कीमा समोसा भी खाया है। इसके अलावा भी कई किस्म के समोसे खाये हैं और सुने हैं। लेकिन आलू के साथ समोसा नंबर वन है। कई मित्रों को समोसे का खोल उतार सिर्फ आलू खाते हुए ही देखा है।

इमरजेंसी के दिनों में समारोहों में अन्न के दुरूपयोग को रोकने की खातिर कुछ बंदिशें थीं। लेकिन आलू हीरो नंबर वन था। तमाम बंदिशों के ऊपर। कदाचित इमरजेंसी लगाने वालों की भी पहली पसंद आलू ही था। आलू और पूड़ी का संगम तो हर रेलवे स्टेशनों, बसस्टेशन और बीच बिज़ी बाज़ार में बड़ी सामान्य सी घटना है।

व्यक्तिगत तौरपर आलू मुझे बहुत पसंद है। मेमसाब को भी आलू के व्यंजन बनाना आसान लगते हैं।  लेकिन हमने आलू के व्यंजनों के प्रति अपनी आसक्ति उनके समक्ष कभी ज़ाहिर नहीं होने दी। वरना हमारा और आलू का मिलन बाधित ही रहता। समारोहों में पहला अटैक आलू टिक्की पर होता है। एक से मन तो कभी भरा नहीं। कटलेट्स और फिंगर चिप्स दूसरी पसंद हैं। अंतता होता यह है कि पेट भर जाता है। अक्सर खाने की प्लेट उठाने की ज़रूरत ही महसूस नहीं होती।

आलू संग दोस्ती बचपन से ही है। मां ढेर आलू उबाल देती थी। स्कूल जाने में देर न हो। इसलिए मां उबला आलू फोड़ कर ज़रा सा घी/सरसों का तेल और प्याज का चोखा बना रोटी संग बांध देती थी। कभी मां घर पर न हुई तो आलू चोखा हम लोग खुद ही बना लेते।

आज भी जब कभी भूख लगती है तो एक उबला हुआ आलू और थोड़ा से नमक। भरपूर चार्जिंग हो जाती है। और वो आलू के पराठे! उसके ऊपर थोड़ा ताज़ा निकला सफ़ेद मक्खन। भाई वाह, भाई वाह। आज भी वो खुशबू और स्वाद याद है। खाते तो आज भी भरपूर हैं मगर वो ताज़ा सफ़ेद मक्खन और मां के हाथ की प्रिपरेशन याद आती है तो आंखें में नमी महसूस होती है।

Saturday, March 14, 2015

शीर्ष बल्लेबाज़ ऐसे ही खेले तो रोशोगोला नहीं मिलेगा

-वीर विनोद छाबड़ा

टीम इंडिया की ज़िंबाबवे पर जीत पर क्रिकेट प्रेमी बहुत प्रसन्न हैं। लेकिन मुझे इतना अच्छा नहीं लगा।
रिकार्ड्स में रूचि रखने वालों के लिए यह ज़रूर अच्छा मैच था। आज भी विपक्ष को टीम इंडिया ने आल आउट किया। विश्वकप में छटी लगातार जीत मिली। 

लेकिन स्पिनर्स ने चिंता बढ़ा दी वरना ज़िंबाबवे जैसी टीम २८७ नहीं बना पाती।

सोचिये भला जब ९२ पर ४ बल्लेबाज़ गिर चुके थे तो दिल की धड़कनें तेज हो ही जायेंगी। शीर्ष बल्लेबाज़ों की मेहरबानी से वो होने जा थी जिसका डर इस टूर्नामेंट के शुरू होने पर था कि टीम इंडिया हारेगी तो किसी छोटी-मोटी टीम से ही। अभी १९५ की दरकार अभी बाकी थी। इसे पार पाना आसान नहीं था। यहां प्रशंसा करनी होगी सुरेश रैना और महेंद्र धोनी की। उनकी जांबाजी की बदौलत ६ विकेट से बेड़ा पार हो गया। अगर कैच न टपके होते तो आज ऑकलैंड में टीम इंडिया के ड्रेसिंग रूम में मातम होता। कोई बात नहीं यह खेल का हिस्सा है। लेकिन ऐसे कैच आगे नहीं टपकेंगे। ऐसी कोई गारंटी नहीं है।
  

वेस्ट इंडीज से भी टीम इंडिया गिरते-पड़ते धोनी के कंधो पर सवार हो कर नदी पार कर पाई थी। छोटी टीमों के विरुद्ध ऐसा प्रदर्शन  टीम इंडिया की फितरत है।

अब क्वार्टर-फाइनल में बांग्लादेश से मुकाबला है। ठीक है बांग्लादेश छोटी टीम है। लेकिन क्वार्टर फाइनल में पहुंचने वाली टीम को कमजोर नहीं कहा जा सकता। कई उलट-फेर किये हैं इस छोटी टीम ने। क्रिकेट के पितामाह इंग्लैंड को हराया ही नहीं, उठा कर टूर्नामेंट से ही बाहर फ़ेंक दिया। अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि कितने जोश से भरी होगी यह टीम और पूरी ताक़त से भिड़ेगी, अपने से आकार और संसाधनों और इंफ्रास्ट्रक्चर के मामले में कहीं बड़ी टीम इंडिया से।

टीम इंडिया को हराने पर जो ख़ुशी पाकिस्तान को होती है वही बांग्लादेश को हासिल होती है। यह बात धोनी अच्छी तरह जानते हैं कि यह मैच पिछले मुक़ाबलों से ज्यादा बड़ा मैच है। विपक्षी कमजोर नहीं है।

Thursday, March 12, 2015

उन्नाव में धमाल! (पार्ट - २)

-वीर विनोद छाबड़ा

सुबह-सुबह किसी ने झिंझोड़ कर उठाया। गर्मागर्म चाय और उतना ही गर्म समोसा। रात भर के भूखे थे। एक की जगह तीन समोसे खाए। कुल्हड़ वाली कड़क चाय का ज़ायका ही निराला था। जब तक मिलती रही पीते ही रहे।

और हां वो पाजी दलजीत सिंह। सुबह-सुबह हमसे पहले उठ गया। नहा-धोकर और सजधज कर बैठा मुस्कुरा रहा था। तय प्रोग्राम के अनुसार हममें से कोई नहीं बोला। फिर मेरी बगल में बैठ कर कोहनी मारने लगा। उसकी आंखों और चेहरे पर वही भोलापन था जो शरारत करके कान पकड़ने वाले बच्चे के चेहरे पर होता है। मुझे हंसी आ गयी। बाकी को भी। हम सबने उसकी प्यार से धुनाई की। उसे बताया कल रात तेरे हम पे क्या गुज़री।

तभी राजनारायण आया। हमने उसे बधाई दी। लेकिन थैंक्यू होने की बजाये वो नाराज़ निकला। उन्नाव कोई बड़ी जगह तो थी नहीं। रात थाने की घटना की भनक पिताजी को हो गयी थी। हाई-अलर्ट जारी कर वो खसक लिया।

अचानक ही लगा कि कई जोड़ी आंखें हमें घूर रहीं हैं। हमारे सर शर्मिंगी से झुक गए।

दोपहर दो बजे रवानगी हुई। मगर इससे पहले हमें ठंडाई पिलाई गयी। ठंडी-ठंडी। भांग मिली हुई। यह बात हमें मालूम नहीं थी। मैंने तो पहली-पहली बार पी। दिमाग पर चढ़ गयी। मज़ा इतना ज्यादा आया कि पीते ही गए थे। रुकने पर बामुश्किल माने थे।

अचानक नामालूम किसी बात पर हंसी शुरू हुई। बार- बार सब हमें चुप रहने को कह रहे थे। मगर हम हंसते ही जा रहे थे। तंग आकर एक जगह बस रुकवाई गई और हम पांचों को उतार दिया। कोई सुनसान जगह थी।

हमें तब भी चिंता नहीं हुई - उतार दें । भूतनी वाले समझते क्या हैं? अरे बहुत दम है हममें। दौड़ते हुए पैदल भी जा सकते हैं।

मगर थोड़ी देर में ही पता चल गया कि कितना दम है हममें। जेबें कल थाने में हालांकि खाली हो चुकीं थीं। लेकिन शुक्र था कि दलजीत पैंट की चोरजेब में पांच रूपए थे। उन दिनों के हिसाब से ठीक रकम थी घर तक पहुंचने लायक। बस सरोजिनीनगर दिख जाए।

टाइम देखा तो चार बजे थे। सूरज हालांकि ढलान पर था मगर गर्मी शिद्द्त की। तिस पर मई का महीना। थोड़ी-थोड़ी दूरी पर चार-पांच घने पेड़ मिल जाते। थोड़ी देर सुस्ता लेते। प्यास बहुत लगने लगी। गला सूखने लगा। सड़क किनारे जो भी गांव मिला और रहट देखी। प्यास बुझा ली।
अब भूख भी लगने लगी। अब हम पूरी तरह निढाल हो चुके थे। लगा बस अब गिर ही जाएंगे।