Sunday, June 7, 2015

जाने कब चाचा 'चाचू' और नाना 'नानू' बन गए?

-वीर विनोद छाबड़ा
नॉस्टैल्जिक हैं हम। अक्सर अतीत में विचरते हैं और जाने कब वर्तमान में आ गिरते हैं। अब कल ही बात लीजिये। किसी ने कह दिया - दद्दू, ज़रा ध्यान से चला करो। एक्सीडेंट हो जायेगा। कुछ बचेगा नही।
दद्दू शब्द सुनते ही हम पचास-पचपन साल पीछे चले जाते हैं। फ्लैशबैक शुरू…
मां-बाप को माताजी-पिताजी कहते हैं। लखनऊ शहर के नक्खास का इलाका है। आस-पड़ोस में रहने वालों में कोई आपा तो कोई फूफी। उम्रदराज़ महिला को अम्मी/अम्मा। खाला-खालू और अब्बू/अब्बा नाम भी अक्सर कानों में पड़ते।
 
पचास के दशक मध्य में आलमबाग के चन्दर नगर इलाके में आ बसे। यहां सब पंजाबी मिले। अड़ोस-पड़ोस से रिश्ता मासीजी और चाचाजी का रहा। थोड़ी दूर  मां के बड़े भाई हैं। माताजी ने परिचय कराया - ये तुम्हारी मामी हैं और ये मामा।
हमारे दादा-दादी और बाकी तमाम रिश्तेदार दिल्ली में हैं। दादा को लालाजी और दादी को भाभीजी पुकाराते हैं। लाला जी के माताजी-पिताजी भी हैं। उन्हें सब अम्मां-बाबाजी कहते हैं।
पचास के मध्य में चाचा की दिल्ली में शादी होती है। चाची बीए पास है। सरकारी स्कूल में मास्टरनी है। बड़ी कड़क है। उन्हें चाचीजी सुनना अटपटा लगा। नए ज़माने की जो है। बोलीं - आंटी बोला कर। दिल्ली बहुत अडवांस है। यहां सब अंकल और आंटी हैं। 
हम चाची का कड़क फरमान सुन सहम गए। हम बच्चों ने उनका नाम रख दिया - भूचाल आंटी। तब से मृत्युपर्यंत वो हमारी आंटी रही। चाची वाला प्यार नहीं मिला। दूसरे चाचा जी भी आंटी ब्याह लाये, चाची नहीं। हमने सुना कि ये आंटी कल्चर बड़े लोगों की देन है जिसे मिडल क्लास अपना कर प्रफुल्लित होता है। और कहीं-कहीं उच्चीकृत महसूस कर सीना भी फुलाता है। 
१९६२ हम चारबाग़ शिफ्ट हो गए। यहां  बिलकुल अलग कल्चर मिला। आस-पास पंजाबी नहीं अपितु ठेठ यूपी के रीति-रिवाज़ों में तर बंदे देखे। कुछ दिन तक अजीब लगा। लेकिन जब पता चला कि यहां चाची और चाचा का चलन हैं तो सब अपने लगे। एक मुद्दत से चाची कहने की अरज़ पूरी हुई।
हमारे घर के नीचे फ्लैट में श्रीवास्तव फैमिली है। बच्चे मां को जिया कहते हैं। नाते रिश्तेदारों को भी जिया कहते सुनता हूं। आस-पास के छोटे-बड़े भी उन्हें जिया ही कहते हैं। उसमें हम भी हैं। कुछ दिन बाद पता चला कि जिया तो बड़ी बहन को कहते हैं। फिर सुना कहीं-कहीं मां को जिया कहने का रिवाज़ भी है।

बुआ और मासी के 'उनको' यानि फूफा और मौसा को हमारे परिवार में न जाने क्यों 'भाईजी' बोला जाता है। बड़ा अटपटा लगा कि फुफड़/फूफा और मासड़/मौसा क्यों नहीं कहा गया। हम ज़िंदगी भर उन्हें रिश्ते के नाम से संबोधित करने के लिए तड़पते रहे।
जब हम साइकिल से स्कूल आने-जाने लगे तो लगा कि हम पर्याप्त बड़े हो गए हैं। तबसे आज तक हमने आंटियों को छोड़ दें तो रिश्तों को उनके नाम से  पुकारा। अर्थात बुआ को बुआ ही कहा। मासी को आंटी नहीं बोला। जीजा को जीजू कह कर बिगाड़ा नहीं। ये बात दूसरी है कि पिताजी चूंकि परिवार में बड़े थे अतः किसी को ताऊजी-ताईजी कहने के सुख से वंचित रहे।
हम स्कूल में पढ़ते हैं। एक दिन हमने अपने एक मित्र का पिताजी का परिचय कराया - ये मेरे 'फादर' हैं।
पिताजी बेहद नाराज़ हुए- पिताजी कहने में शर्म आती है।
फिर दूरदर्शन पर रामानंद सागर की रामायण का दौर आया। उसने रिश्तों में श्री लगाना शुरू कर दिया। पिताश्री, माताश्री, भ्राताश्री आदि।  
पिछले १५-२० सालों से बहुत कुछ बदला है। अब रिश्तों के नाम बदल गए हैं। मां मम्मी से मॉम और पिताजी डैडी/डैड से पापा और अब पापू/पॉप। दादा से दादू और नाना से नानू। दादी और नानी क्रमशः ग्रेमी/ग्रैनी  हैं। सारी की सारी चाचियाँ, मामियां, बुआ और मौसियां आंटियां हैं। जीजा>जीजू, चाचा>चाचू और मामा>मामू में न जाने कब चुपके से परिवर्तित हो गए।
कुछ महीने पहले एक सीरियल देखा था - जमाई राजा। नानी को नायिका 'सेक्सी' कह रही थी। हे राम!

Saturday, June 6, 2015

धरती के लाल।

-वीर विनोद छाबड़ा
१९४३ में बंगाल में भीषण दुर्भिक्ष पड़ा था। यह दुर्भिक्ष जमाखोरों के लिये वरदान था।
ज़मींदार और जमाखोर मिल कर अशिक्षित और भोले किसानों से अनाज के बदले ज़मीने हड़प लेते हैं।

दुर्भिक्ष से प्रभावित हज़ारों लोग गांव से कलकत्ता भाग जाते हैं।
यहां भी जमाखोर हैं। इंसान की शक्ल में भेड़िये बहुत हैं।
गांव भाई-भाई की तरह रहने वाले हिन्दू-मुस्लिम को शहर के लोग धर्म के आधार पर बांट सांप्रदायिकता की भावनायें भड़काते हैं।
हिन्दू का रिलीफ़ कैंप अलग है और मुसलमान का अलग।
दोनों में यदा-कदा ही भोजन मिलता है।
जब कभी हिन्दू कैंप में भोजन बंटता है तो हिन्दू अपने कैंप में मुसलमान को नहीं घुसने देता। इसी तरह मुसलमान अपने कैंप से हिन्दू को भगा देता है।
कई लोगों को काम नहीं मिलता।
अपने अस्तित्व को बचाने के लिए कुछ तन बेचने के लिये हैं।
कुछ भीख मांगने पर मज़बूर हैं। भीख ने मिलने पर उन्हें झूठन पर भी बसर करनी पड़ती है।
कई मर जाते हैं - कुछ भूख से और कुछ बीमारी से।  
इसी में एक सीन था।
एक घर से झूठन कूड़ेदान में फेंकी जाती है।
झूठन के ऊपर हक़ ज़माने के लिए कुत्ता और भूखे इंसान भेड़िये की मानिंद टूट पड़ते हैं।
भीख मांगता एक किरदार उन्हें देख कर हंसता है - सुना था बंदर से इंसान बना है। मगर आज इंसान को इंसान से कुत्ता बनता देख रहा हूं।
शहर से निराश और हताश किसान आख़िर में अपने घर लौटने का फैसला करता है। और सामुदायिक खेती के ज़रिये अपना अस्तित्व बचाने की कोशिश करता है। 
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०६ जून २०१५ मो. ७६०५६६३६२६
डी-२२९० इंदिरा नगर लखनऊ – २२६०१६

Friday, June 5, 2015

और यूं छूटी सिगरेट!

-वीर विनोद छाबड़ा
२००३ के किसी दिन की बात। कुछ दिन से लगातार खांसी-जुकाम से पीड़ित। बीपी और हाइपर टेंशन का दवा पिछले चार साल से राज-रोग। डॉक्टर ने चेस्ट  एक्सरे कराया। सब ठीक निकला।
फिर भी डॉक्टर ने सलाह दी -छोड़ दो सिगरेट। क्या रखा है? ज़िंदगी छोटी ही तो हो रही है।
कई लोग मशविरा दे चुके थे। अहसास तो मुझे भी था कि सिगरेट ने मुझे गुलाम बना रखा है। गुलामी भला किसे पसंद होती है।
मगर आफ़िस में कार्य की अधिकता और कुछ घरेलू परेशानियों की मज़बूत घेराबंदी। टेंशन दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा था। लगता था सिगरेट के मजबूत सहारे की बदौलत ही मुक़ाबला कर पा रहा हूं। इसीलिये न मैं इस छोड़ रहा था और न ये मुझे।
लेकिन चालीस साल से रोज़ाना दो डिब्बी पीने वाले मित्र महेश चंद्र सिन्हा (अब दिवंगत) ने एक झटके में सिगरेट छोड़ दी। इससे मैं बेहद प्रभावित हुआ। जलन भी हुई। बार-बार खुद से सवाल किया कि क्या इतना मजबूत इरादा मेरा नहीं हो सकता?
याद आया कई साल पहले पैंक्रियास की दिक्कत के चलते मैंने चार महीने सिगरेट नहीं छूई थी। परंतु वो एक मजबूरी थी। सब ठीक हो जाने के बाद फिर मुंह में आ लगी। किसी ने ऑफर किया और मैं इंकार नहीं कर सका। कुछ ही दिन में वही पहली जैसी रफ़्तार। हां, इतनी पाबंदी ज़रूर आयत की कि घर में बैठ कर नहीं पी और न दूसरों को पीने दी। जब तलब लगी तो कहीं दूर निकल गए।
इसका मतलब यह कि मैं छोड़ सकता हूं। इरादा तो किया जाए। भले ही ट्रायल के तौर पर। एक-दो दिन का सिगरेट उपवास रख कर। बस मौका मिले कोई।
और जल्दी ही मौका भी मिला। उस दिन चेयरमैन ने एक बेहद ज़रूरी और गोपनीय नोट तैयार के लिये सुबह-सुबह तलब किया। सुबह से शाम हो गयी। काम खत्म नहीं हुआ। इस बीच सिगरेट की तलब कई बार शिद्दत से महसूस हुई। पर चेयरमैन सामने हो तो सिगरेट कैसे धौंकी जाये? जबकि खुद उन्होंने हर पंद्रह-बीस मिनट पर एक सिगरेट फूंकी।
आखि़रकार काम ख़त्म हुआ। बाहर निकला। चिराग़ जल चुके थे। सिगरेट मुंह में लगाई। अभी सुलगाने को ही था कि मैंने खुद से सवाल किया- यार सारा दिन निकाल दिया। अब दिन बचा ही कितना है? कल पी लेना। सिगरेट के चुंगल से छूटने का यह पहला कदम हो सकता है। कोशिश कर। दिल मज़बूत कर। कलेजे पर पत्थर रख।
खुद को समझाते-रगड़ते जाने कब घर पहुंच गया। दिन भर का थका हुआ था। जल्दी आंख लग गयी। अगली सुबह जब उठा तो मैंने महसूस किया कि गुज़री रात मैंने बड़े इत्मीनान से काटी है। बड़ा भारी किला फतेह कर लिया है।
अपने आप पर जीत हासिल करना, जंग का मैदान मारने से कम नहीं होता। खुद पर यकीन होने लगा कि मैं सिगरेट छोड़ने का फैसला ले सकता हूं। डर ज़रूर लगा रहा कि कहीं शाम होते-होते मैं जंग हार न जाऊं।
ऐसी स्थिति हफ्ते भर तक रही। लेकिन मैं रोज़ जंग जीतता रहा। जीतने की आदत पड़ गई। एक बात और कि उन दिनों कतिपय कारणों से मैं लेखन की दुनिया से बहुत दूर था। अन्यथा मैं कमजोर हो सकता था।

Thursday, June 4, 2015

कभी मेहमानों का स्वागत मैगी से होता था!

-वीर विनोद छाबड़ा
मुझे याद पड़ता है कि पहली बार मैंने मैगी १९८३ या १९८४ में खायी थी। तब दो या ढाई रूपये का पैकेट था। अंडे की भुजिया के साथ मिला कर खाते थे। बड़ा मज़ा आता था। साथ ही महसूस हुआ था कि हम खाने-पीने के मामले में पाश्चात्य जगत के साथ एक और कदम आगे चले हैं। समाज का निम्नआय वर्ग भी अब कम पैसे में उच्च वर्ग की बराबरी कर सकता है।

कुछ समय बाद टॉप रैमन नाम से नूडल्स आये। प्रतिस्पर्धा चली। कभी स्टील की कटोरी और कभी प्लेट। छोटी-छोटी प्लास्टिक/मेटल की कारें भी। पीछे दौड़ाओ तो सरपट आगे भागती थीं। और भी कई कंपनियां आई। लेकिन दौड़ में मैगी के सामने कोई टिक नहीं पाया। कई की दुकान बढ़ गयी।
ऐसा भी हुआ कि नूडल्स किसी भी कंपनी के हों, नाम कुछ भी हो, लेकिन कहा उन्हें भी मैगी ही गया। 
मेहमानों का स्वागत मैगी से किया जाना ऊंची सोच के स्टेटस सिंबल को दर्शाता था। फिर तरह-तरह के फ्लेवर वाली मैगी।
कई घरों में तो बच्चों को मैगी के अलावा कुछ और खाते ही नहीं देखा। एक पूरी पीढ़ी जवान हो गयी मैगी खाते-खाते और दूसरी किशोरावस्था में है। यकीनन उन्हें धक्का लगा होगा यह जान कर कि उनकी जान से प्यारी मैगी में कतिपय ऐसे गुण पाये गए हैं जो सरदर्द, स्किन एलर्जी, गले में जलन, पेटदर्द, दिमागी परेशानी, किडनी फेल होने का सबब बन सकते हैं। हालांकि आज तक ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है कि किसी को उक्त वर्णित बीमारी मैगी के कारण ही हुई है। यह भी नहीं मालूम कि कितनी मात्रा में और कितने दिन लगातार मैगी खाने से शरीर को नुकसान होगा। यह भी तय नहीं हो पाया है कि मैगी में नुकसान पहुंचाने वाले तत्व मिलावट के कारण हैं या प्राकृतिक।
फिलहाल तो मैगी को कई राज्यों में प्रतिबंधित कर दिया गया है। उसके प्रति किसी ने भी सहानुभूति नहीं दिखाई है। 
मुझे भी मैगी से कोई सहानुभूति नहीं है। अपने समोसे के समक्ष मैं मैगी को चौथे -पांचवे  नंबर पर ही रखता रहा। अगर मैगी के नमूने मानकों पर फेल हैं तो मैगी पूर्णतया प्रतिबंधित होनी ही चाहिये। और साथ ही सजा भी मिलनी चाहिये।

Wednesday, June 3, 2015

बुख़ारी - कड़ी मेहनत से कमाई इज़्ज़त।

प्रस्तुति -वीर विनोद छाबड़ा 
अरब देश में बुख़ारी नाम के एक ज्ञानी-ध्यानी रहते थे। वो अपने ईमानदारी और साफगोई के लिए दूर दूर तक प्रसिद्ध थे। रोज़ सैकड़ों लोग उनसे सलाह-मशविरा करने आते थे।
एक बार बुखारी को समुंदर पार मुल्क से बुलावा आया कि अपने नेक ख्यालात और तजुर्बों से इस मुल्क के बंदो को भी अमीर करें।
बुखारी निकल पड़े समुंद्री जहाज़ से। अपने नेक ख़यालात की वज़ह से उन्होंने बहुत जल्दी उस जहाज के बाकी मुसाफ़िरों के दिलों में भी जगह बना ली।
उसमें एक मुसाफ़िर उनके बहुत करीब आ गया। वो भी बुखारी की तरह नेक और तालीमी बंदा बनना चाहता था। बुखारी भी उस पर बहुत यकीन करने लगे थे।
नज़दीकियों की वज़ह से वो मुसाफ़िर बहुत जल्दी बुखारी के बारे में सब कुछ जान गया। उसे यह भी पता चल गया कि बुखारी के पास सफ़र खर्च के लिए एक हज़ार दीनारें भी हैं जो एक थैली में बंद हैं।
दौलत देख उस मुसाफ़िर का मन बेईमान हो गया। उसने उन दीनारों को हड़पने की एक चाकचौबंद साज़िश रची।
अगली सुबह वो उठ कर चीखने-चिल्लाने लगा - हाय मैं बर्बाद हो गया। लुट गया। किसी ने मेरी एक हज़ार दीनारें चुरा लीं हैं।
जहाज पर हड़कंप मच गया। सारे मुसाफ़िर एक-दूसरे को शक़ की निग़ाह से देखने लगे।
जहाज के मुलाज़िमों ने उस मुसाफ़िर से कहा - घबड़ा मत। जो भी चोर है। इसी जहाज में है। वो बच कर जा नहीं सकता। अभी सबकी तलाशी हो जाती है।
बुखारी समेत तमाम मुसाफ़िर भी इसके लिए तैयार हो गए। इस पर उस मुसाफ़िर को हैरत हुई - बुखारी इतनी जल्दी कैसे तैयार हो गए?
बहरहाल जब बुखारी का नंबर आया तो मुलाज़िमों ने उनकी तलाशी लेने से इंकार कर दिया - आप जैसे नेक बंदे की तलाशी हम नहीं ले सकते।
मगर बुखारी ने सख्ती से कहा - नहीं भाई। मैं अनोखा नहीं। एक आम आदमी हूं। मेरी तलाशी ज़रूर लीजिये।
बहुत ज़ोर देने पर बुखारी के तलाशी हुई। मगर चंद दीनारों के सिवा कुछ न निकला।
उस मुसाफ़िर को बड़ी हैरानी हुई - आखिर कहां चली गयी हज़ार दीनारों वाली वो थैली?
उसने डरते-डरते बुखारी से पूछा - मुझे यकीन नहीं हो रहा। आखिर वो थैली गयी कहां?

Tuesday, June 2, 2015

अभी चाय थोड़ी गर्म है!

-वीर विनोद छाबड़ा 
सत्तर के दशक के शुरुआती वर्ष। उन दिनों दिल्ली की तमाम फ़िल्मी पत्रिकाओं में यदा-कदा कहानियां/लेख लिखता था।
मुफ़लिसी के दौर के बावजूद बड़ी मज़ेदार ज़िंदगी थी।
किसी न किसी वज़ह से दिल्ली अक्सर आना-जाना रहता था। पत्रिकाओं के दफ़तर का चक्कर भी लगता था इस उम्मीद में कि मिलना-जुलना होगा ही पारिश्रमिक भी मिल जाएगा ।
इसी बहाने दो-तीन तो बहुत अच्छे मित्र बन गए। यह सब सहायक संपादक हुए करते थे। इन्हीं में एक दिलचस्प सहायक संपादक थे।
कतिपय कारणवश नाम इंगित नहीं कर रहा।
वो बहुत अच्छे लेखक भी थे। मैंने उनकी कई कहानियां प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में पढ़ी थी। क्या बेबाक और पैनी कलम थी। प्लाट भी मारक होते थे। आदमी भी दबंग थे। एक जगह रुका पारिश्रमिक भी दिलवाया उन्होंने। 
एक बार उनसे मिलने पहुंचा। दोपहर करीब एक बजे का वक़्त रहा होगा। उनका ऑफिस भगीरथ पैलेस में था। कश्मीरी गेट स्थित मिनर्वा पर 'ऐलान' (विनोद मेहरा-रेखा-विनोद खन्ना) चल रही थी। मैंने मैटनी शो (३ से ६) का टिकट लिया। सोचा पहले मित्र की भेंट करूंगा। तत्पश्चात फिल्म देखूंगा और फिर घर जाकर कुछ आराम करूंगा। उसी रात मुझे वापस लखनऊ भी लौटना था।
मित्र से मुलाक़ात हुई। दिल्ली वालों के रिवाज़ मुताबिक़ जफ्फी-शफ्फी डाल कर मिलना हुआ। चाय एक लिए एक ढाबे पर गए। लंबी गपशप हुई। जाने क्या बात हुई कि मित्र को अपनी एक बहुत पुरानी कहानी याद आ गयी। लगे सुनाने किस्सागोई वाले अंदाज़ में। वक़्त करीब पौने तीन था।
जेब मई सिनेमा का टिकट। चिंता शुरू हुई। मिनर्वा वहां से करीब पंद्रह मिनट का वॉक रहा होगा। मैंने जल्दी से चाय ख़त्म की।
लेकिन मित्र अपनी किस्सागोई में बुरी तरह डूबे थे। सुरसा की आंत की तरह उनकी कहानी बढ़ती ही जा रही थी।
मैं बार-बार टाइम देख रहा था। तीन बज चुका था।
अचानक मित्र ने मेरे चेहरे पर कुछ पढ़ा। पूछा  - कहीं फिल्म देखने जाना है?
झिझक के मारे मैंने कहा - नहीं, नहीं बिलकुल नहीं। मैं तो सिगरेट की तलाश में हूं।
मित्र ने जेब से सिगरेट की डिब्बी निकल मेरे सामने रख दी। और फिर से अपनी कहानी की किस्सागोई में खो गए।
मैंने कनखियों से घड़ी देखी। साढ़े तीन बज रहा था। अब तो फिल्म शुरू हो चुकी होगी। ओखली में सर दिया है तो मूसल का क्या डर। मैंने फिल्म देखने का ख़्याल पूरी तरह दिल से निकाला और मित्र की किस्सागोई में पूरी तरह डूब गया। पता ही नहीं चला कि कब एक खत्म और दूसरी शुरू। 
इस बीच मित्र ने चाय की प्याली कई बार उठाई। उसमें फूंक मार कर छोटा सा घूंट भरा - अभी बड़ी गरम है। जबकि मैं मुद्दतों पहले अपनी चाय सुड़क चुका था।
उनकी कहानियां दिलचस्प होती जा रही थी। मुझे भी कोई चिंता भी नहीं थी। शाम छह बजे तक का टाइम था मेरे पास।
अक्टूबर का महीना था। शाम जल्दी होने के दिन और हल्का गुलाबी जाड़ा। मित्र की किस्सागोई ख़त्म होने का नाम भी नहीं ले रही थी।
एक बार फिर चिंता होने लगी।

Monday, June 1, 2015

बतरा साहब की कार!

-वीर विनोद छाबड़ा
जिस ज़माने में हमने होश संभाला था तब बस को लॉरी और कार को मोटर बोला जाता था। याद आता है गाड़ी स्टार्ट करने के लिए अक्सर लोहे के खास हैंडिल को ट्रक और लॉरी के इंजन के ठीक नीचे बने एक सुराख में डाल कर बड़ी तेजी से घुमाया जाता था। मोटर भी कभी-कभी चाबी से स्टार्ट न होने की ज़िद पकड़ लेती थी।
हमें याद है कि पिताजी के एक गहरे मित्र होते थे - सतीश बतरा। लार्सन एंड टूब्रो में बड़े ओहदे पर तैनात थे। उनके पास एक एक काली एम्बेस्डर कार थी। वो उर्दू के मशहूर अफसानानिगार भी थे। उनके कई कहानी संग्रहों को यूपी गवर्नमेंट ने ईनाम भी दिया था। उस ज़माने में उर्दू अकादेमी नहीं थी।

नशिस्तों के सिलसिले के अलावा भी बतरा साब अक्सर हमारे यहां आते थे। लखनऊ के वज़ीर हसन रोड एक बहुत बड़े बंगले में रहते थे। हम लोग आलमबाग की चंदर नगर मार्किट के ऊपर बने रिहाइशी फ्लैट में थे। हमने कार की पहली सवारी उनकी कार में ही की थी।
बतरा साब और हमारे पिताजी क्रिकेट के बहुत शौक़ीन थे। जब भी मिलते थे उनके अजेंडे में उर्दू इल्मो-अदब के बाद क्रिकेट पर चर्चा होती थी।
उन दिनों इंग्लैंड की टेस्ट टीम भारत आई हुई थी। कानपुर में भी एक टेस्ट था। तय हुआ कि एक दिन चल के टेस्ट देखा जाये। इसमें हम भी शामिल किये गए।  हम कोई ग्यारह साल के थे। मुझे याद पड़ता है कि बतरा  साब और मेरे पिताजी ने भी इससे पहले कभी टेस्ट नहीं देखा था।
बतरा साब की कानपुर में अच्छी वाक़फ़ियत थी। टिकटों का इंतेज़ाम उन्होंने कर लिया। वो टेस्ट का तीसरा दिन था- ०३ दिसंबर १९६१। इतवार था उस दिन।
हम सवेरे-सवेरे उनकी कार से कानपुर रवाना हुए। बतरा साब की पत्नी त्रिप्ता भी साथ में थीं। उन्हें वो प्यार से त्रिपत पुकारते थे।
ज़िंदगी में में हमने पहली दफ़े क्रिकेट का मैदान देखा - ग्रीन पार्क। जैसा नाम था वैसा ही पाया। मैदान पर हमने पॉली उमरीगर और फारुख इंजीनियर को जमे देखा। ये फ़ारूख़ का पहला टेस्ट था। भारत ने फ़ारूख़ के आउट होते ही डिक्लेअर कर दिया। 
उस दिन हमने मैदान में जयसिम्हा, कांट्रेक्टर, सरदेसाई, दुर्रानी, बोर्डे, मांजरेकर और कृपाल सिंह के अलावा इंग्लिश कप्तान टेड डेक्सटर के अलावा, माइक स्मिथ, केन बैरिंग्टन, ज्यॉफ पुलर,टोनी लॉक, स्टेथम  जैसे धुरंधरों को पहली  दफ़े रूबरू देखा था। बड़ा मज़ा आया दिन भर। शाम तक इंग्लैंड के १६८ रन पर आठ विकेट उखड चुके थे। फॉलोआन का खतरा पूरी मंडरा रहा था।