Sunday, June 14, 2015

हुस्नलाल-भगतराम - तेरे नैनों ने चोरी किया…

-वीर विनोद छाबड़ा
एक छोटा सा दिलचस्प वाक्या पेश है जिससे पता चलता है नियति के खेल कितने निराले और क्रूर हैं।
चालीस और पचास के दशक में मशहूर संगीतकार जोड़ी थी पं.हुस्नलाल-भगतराम। फ़िल्मी दुनिया की पहली संगीतकार जोड़ी। उनके आर्केस्ट्रा में शंकर नाम का नौजवान सहायक होता था। संगीत का अच्छा ज्ञान था। वो अच्छा गाता भी था और ढोलक तो
बहुत ही अच्छी बजाता था। प्यार की जीत (१९४८) में शंकर ने तीनो ही काम किये। बहुत ही कामयाब फिल्म रही। लेकिन त्रासदी यह रहे कि शंकर ने एक और नौजवान संगीतकार जयकिशन के साथ शंकर-जयकिशन की जोड़ी बना ली। जैसे-जैसे ये कामयाबी के शिखर पर चढ़ते रहे हुस्नलाल-भगतराम परली तरफ से नीचे उतरते चले गए। बरसों बाद दोनों में बिखराव हुए और दुर्दिन के दिन आये। उस वक़्त भगतराम को अपने कभी चेले रहे शंकर के शंकर-जयकिशन के आर्केस्ट्रा में हारमोनियम बजाना पड़ा।
नयी पीढ़ी ने शायद जालंधर में जन्मे हुस्नलाल-भगतराम का नाम नहीं सुना होगा। लेकिन उनकी बनायीं धुनें ज़रूर सुनी होंगी - चुप चुप खड़े हो ज़रूर कोई बात.…वो पास रहें या दूर रहें दिल में समाये रहते हैं.…मांगी मोहब्बत पायी जुदाई, दुहाई है दुहाई…तेरे नैनों ने चोरी किया मेरा छोटा सा जिया ओ परदेसिया…ओ दूर जाने वाले…एक दिल के टुकड़े हज़ार हुए कोई यहाँ गिरा कोई वहां गिरा…जो दिल में ख़ुशी बन कर आये…दो दिलों को दुनिया मिलने नहीं देती…आंखों में आंसू होटों पे फरयाद ले चले.…क्या बताएं कि मोहब्बत की कहानी क्या है.… अपना ही घर लुटाने दीवाना जा रहा है.…बिगड़ी बनाने वाले…पास आके भी हम दूर हुए.…आंख का तारा प्राणों से प्यारा …
और राजेंद्र कृष्ण का लिखा रफ़ी की आवाज़ में सबसे प्यारा गैर-फ़िल्मी गाना - सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों बापू की ये अमर कहानी…
सुरैया, लता, अमीरबाई कर्नाटकी, जोहराबाई अंबालेवाली, गीतादत्त, आशा भोंसले, सुमन कल्याणपुर, शमशाद बेगम, निर्मला देवी, रफ़ी, जीएम दुर्रानी, तलत महमूद आदि अनेक जाने-माने गायकों ने हुस्नलाल-भगतराम के संगीत पर आवाज़ बिखेरी और राजेंद्र कृष्ण, मजरूह, सरशर सैलानी ने कलाम दिए।
क़मर जलालाबादी के साथ हुस्नलाल भगतराम की जोड़ी खूब जमी। कुल चौबीस फिल्मों में १०४ गाने लिखे।
सुप्रसिद्ध संगीतकार पंडित अमरनाथ ने छोटे भाई होते थे हुस्नलाल और भगतराम। इन दोनों का जन्म क्रमशः १९१४ और १९२० में हुआ। हुस्नलाल वॉयलिन के और भगतराम हारमोनियम के एक्सपर्ट थे। पं.दिलीप चंद्र वेदी से संगीत की ट्रेनिंग ली।  
१९४४ में 'चांद' से हुस्नलाल-भगतराम की जोड़ी नक्षत्र पर उभरी। एक रिकॉर्ड बना -भारतीय सिनेमा की पहली संगीतकार जोड़ी।
इनका सफ़र १९४९-५० में पीक पर था-१९ फ़िल्में। लेकिन इसके बाद शंकर-जयकिशन, सी.रामचंद्र, ओपी नैय्यर आदि के आगमन से उनकी बुलंदी पहले जैसी नहीं रही। सफ़र की रफ़्तार बहुत धीमीहो गई। बी और सी ग्रेड की फ़िल्में भी करनी पड़ी। और साठ का दशक आते-आते इनका सितारा गर्दिश में डूब गया। आपसी विवाद भी इसका एक प्रमुख कारण बना।

Saturday, June 13, 2015

प्राण साहब - बुराई का दूसरा नाम!

-वीर विनोद छाबड़ा
आज एक म्यूज़िक चैनल पर पुरानी फ़िल्म का गाना देख रहा था। उसमें प्राण साहब को देखा।
मुझे तो उनका वो चेहरा याद आ गया जब वो हीरो की बड़ी बेदर्दी से लात-घूंसों से और ज़मीन पर पटक-पटक कर पिटाई करते थे। हीरो की इतनी बेक़द्री किसी अन्य विलेन के हाथों होती मैंने कभी नहीं देखी। वो बात अलबत्ता दूसरी है कि अधमरा हो चुका हीरो बाद में उनकी ऐसी कम तैसी करता था।

तमाशबीन थिएटर से बाहर निकल बेरहम प्राण साहब की बात करते थे - क्या तोड़ा है भाई ने हीरो को। मान गए।
तमाम हीरोइनों को बड़ा बुरा लगता था कि उसका हीरो ज्यादा पिटता है और प्राण साहब कम। यह बात पचास और साठ के दशक की है। हीरो लोग स्क्रिप्ट में बदलाव करने की कोशिश में लगे रहते थे कि दुर्दांत प्राण साहब के हाथों न पिटना पड़े। लेकिन नया हीरो चाहता था कि प्राण साहब उसे खूब पीटें। जितना चाहें पीटें। कम से कम नाम तो होगा।
अभिनय सम्राट दिलीप कुमार भी फिल्मों में प्राण के हाथों कई बार धर-धर पिटे हैं। लेकिन वो दोनों स्क्रीन के बाहर बहुत अच्छे दोस्त थे। दिलीप ने चाहा स्क्रीन पर जब कोई विलेन उन्हें पीटे तो वो प्राण ही हो। दोस्त के हाथ पिटना अच्छा लगता है। 
जब 'उपकार' में प्राण साहब सहृदय मलंग बाबा की भूमिका में आये तो तमाम नायकों को चैन मिला- प्राण साहब से बचे यारों।
साठ के दशक में प्राण साहब बुरे आदमी की पराकाष्ठा पर थे। लोगों ने बच्चों का नाम प्राण रखना बंद कर दिया था। ये एक्टिंग की लाजवाब कामयाबी का नमूना था।
बताया जाता है कि प्राण साहब की बुराई का मीटर चेक करने के लिए उनके परिवार वालों ने एक इश्तिहार छपवाया था - १९६० के आसपास जन्मे जिस बच्चे का नाम प्राण रखा गया हो उसका परिवार सबूत सहित संपर्क करे। उसे सम्मानित किया जाएगा। खाने का न्यौता भी। ईनाम-इकराम भी दिया जाएगा और आने-जाने का रेल के फर्स्ट क्लास के बराबर किराया भी। 
रियल लाइफ में प्राण साहब बहुत नेक और परोपकारी शख्स थे। उनके द्वारे पर मदद के लिए आया कोई शख्स खाली हाथ वापस नहीं गया।
प्राण साहब को बेइन्साफ़ी कतई नापसंद थी। १९७३ में 'बेईमान फिल्म के लिए बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का फिल्मफेयर अवार्ड मिला। लेकिन उन्होंने लेने से मना कर दिया। क्योंकि उनका मानना था कि बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर का अवार्ड 'बेईमान' में शंकर-जयकिशन को नहीं बल्कि 'पाकीज़ा' के लिये गुलाम मोहम्मद को मिलना चाहिए।
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D-2290 Indira Nagar Lucknow-226016

Friday, June 12, 2015

इमाम-दस्ता तो दें ज़रा!

-वीर विनोद छाबड़ा
मुझे याद है हमारे घर में मिर्च, धनिया आदि मसाला कूटने के लिए लोहे का इमाम-दस्ता, पुदीने की चटनी के लिए पत्थर की दौरी और लकड़ी का सोटा, सिल- बट्टा, गेहूं-चावल आदि अनाज में से धूल और छोटे-मोटे कंकड़ छानने वाली किसिम-किसिम की छाननियां आदि तमाम घरेलू उपकरण मौजूद होते थे। यह महज़ उपकरण ही नहीं थे। संस्कृति का हिस्सा थे, सांझी विरासत थी। हमारे खानदान में पुश्तों से इन उपकरणों के रखने का रिवाज़ चला आ रहा था। याद पड़ता है इनमें कुछ उपकरण तो दहेज़ में भी दिए जाते थे।
 
ये विरासत मेरी दादी और फिर मेरी मां ने बड़े दिल से सहेजते हुए अगली पीढ़ी को सौंपी। इन मामलों में मेरी मां पर उनकी मां यानि मेरी नानी का भी खास असर रहा।
जिनके पास ये उपकरण नहीं होते थे तो वो हमसे मांग कर इन्हें ले जाते। बड़ी ख़ुशी से आदान-प्रदान होता। इसी बहाने पता चल जाता कि अगले के घर आज क्या कुटने जा रहा है। साथ ही आधे घंटे खड़े-खड़े बुकराती हो जाती। एक-दूसरे का दुःख सुख पता चल जाता। उस ज़माने में इंटरनेट ख्याल में नहीं था। लेकिन बाज़ महिलाएं इंटरनेट से भी तेज समाचार देतीं थीं। किसी खबर को फैलाना हो तो छाननी वापस करने आई पड़ोसन को बस कह भर दीजिये कि अपने दिल में रखना। शाम तक पूरे मोहल्ले को खबर हो जाती।   
बहरहाल, कई आइटम तो अगले के पास से निकल कर दूसरे, तीसरे…जाने कहां से कहां निकल जाते।
जब हमें ज़रूरत पड़ती थी तो पता चलता था कि शहर के दूसरे कोने में चला गया है हमारा सामान। यह जान कर मेरी मां गर्व से फूल कर कुप्पा हो जाती - हाय देखो, कहां-कहां काम आ रहा है अपने घर का इमाम-दस्ता।
हमारी मां विजई मुस्कान के साथ अपना सामान बटोरते हुए आश्वासन देती थी दोबारा ज़रूरत हो तो फिर ले लेना। साथ ही गलगलान होते हुए ये बताना भी नहीं भूलती थी कि हमारे घर में और कौन-कौन से घरेलू उपकरण हैं। क्रॉकरी और पीतल के ढेर बड़े बर्तनों की पूरी फ़ेहरिस्त भी थमा आती।
उन दिनों नॉन-वेज के लिए बर्तन अलग होते थे। इन्हें आंगन के कोने में या छत की मियानी में रखा जाता था। इसे भी बाज़ पडोसी शेयर करते थे। 
एक बार मां का पड़ोसन से अंगीठी जलाने के स्थान को लेकर झगड़ा हो गया।
इत्तिफ़ाक़ से उसी दिन पड़ोसन के घर ख़ास मेहमान आये।
मां को पता चला तो फौरन हम बच्चों के हाथ कुछ क्रॉकरी और बर्तन भिजवा दिए।
दरअसल, मां को मालूम था कि पड़ोसन की रसोई में कितने आइटम हैं। उसे फ़िक्र थी कि ख़ास मेहमान के सामने पड़ोसन को शर्मिंदा न होना पड़े।
लाख मन-मुटाव के बावजूद दुःख-सुख सांझे होते थे। न कोई दुराव था और न कोई छुपाव। सबकी ज़िंदगी खुली किताब थी।
इस सिलसिले में एक किस्सा बताऊं। हमारा इमाम-दस्ता पड़ोसन के घर गया। हफ्ता गुज़रा। फिर दस दिन। सुबह मांगे तो शाम को देंगे। शाम को मांगा तो सुबह पर टरका दिया। देने का नाम नहीं। यों खा जाने वाली निगाहों से देखते जैसे अपनी नहीं उनका खज़ाना मांग रहे हों। होते-होते दो महीने हो गए। हमने जासूसी शुरू की। पता चला वो पंद्रह किलोमीटर दूर उनके किसी रिश्तेदार के रिश्तेदार और फिर उनके रिश्तेदार के रिश्तेदार घर पर इस्तेमाल हो रहा था। बामुश्किल लड़-झगड़ कर वापस लाये। पडोसी नाराज़ अलग से हुए - इतनी भी क्या जल्दी थी। अरे मिल जाता। कोई भागा जा रहा था क्या?

Thursday, June 11, 2015

ऊंचे सदन और ऊंची कुर्सी वालों की डिग्री भी स्कैन करो।

-वीर विनोद छाबड़ा
एक महत्वपूर्ण और चर्चित प्रदेश का कानून मंत्री और ग्रेजुएशन की डिग्री फ़र्ज़ी!
अगर यह डिग्री वाकई फ़र्ज़ी है तो इसके आधार पर कानून की हासिल की डिग्री भी फ़र्ज़ी हुई।
बंदा कोई छोटी-मोटी पोस्ट पर नहीं है। उसने इस सफाई से झूठ बोला कि मुख्यमंत्री भी कायल हो गए। पूरा मंत्रिमंडल ही डिफेंड करता घूमा। अपनी साख ही दांव पर लगा दी।

पुलिस ने हर बार की तरह अँधेरे में छलांग नहीं लगाई। इस बार पूरा होमवर्क किया। मामला छोटा-मोटा नहीं। एक सरकार को पटखनी देनी है। जिसके पास न नाखून हैं और न दांत। बड़ी सरकार तो पीछे खड़ी है। जो जब चाहे किसी को भी 'लिफ़्ट' करा दे।  
लेकिन बात अब यहां तक नहीं रुकनी चाहिए। फर्जीवाड़ा एक लिए तो हुआ नहीं होगा। सैकड़ों होनहार घर बैठे पेमेंट देकर बैकडोर से नकली-फ़र्ज़ी डिग्री पाए होंगे।
अनेक प्राइवेट नौकरियां कर रहे होंगे और अनेक सरकारी भी। सरकार में कुछ ने ऊंचा मुक़ाम भी हासिल कर लिया होगा। मुल्क के कर्णधार बने होंगे। भाग्य विधाता बने घूम रहे होंगे। तभी तो मुल्क का बंटाधार हो रहा है। सबकी डिग्री चेक होनी चाहिए। चाहे वो कितने ही ऊंचे सदन का सदस्य क्यों न हो। या बहुत ऊंची कुर्सी पर विराजमान हो। सबको स्कैन करो।
मैं तो कहता हूं कि जिनकी डिग्री असली है उनके दिमाग का स्कैन करो। इसमें अनेक मिलेंगे शातिर दिमाग़ और सड़े-गले दिमाग। शातिर जनता को लूटते हैं और सड़े-गले दिमाग वाले बेवज़ह की मीनमेख निकालते हैं। नतीजा जनता ही भुगतती है। मैं तो अनेक ऐसों को जानता हूं जिनकी डिग्री तो असली है मगर आईक्यू ज़ीरो। कहते हैं हम-पढ़े लिखे हैं। बुद्धिजीवी हैं। डिग्री लेने भर से कोई महान नहीं हो जाता।
जुगाड़ वाले बिना कानून की डिग्री लिए कानून सलाहकार हैं। जुगाड़ के बूते 'काल अक्षर भैंस बराबर वाले' शान से चल रहे हैं।
शिकायत पर सरकार कहती है पलने दो, तेरी जेब से क्या जा रहा है। मेरी जेब से न सही सरकारी ख़जाने से तो जा रहा। और सरकारी ख़जाना किसका है? किसी मंत्री-संत्री के बाप का नहीं, जनता का है। इसे लूटने से बचाना चाहिए।
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11-06-2015 mob 7505663626
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Wednesday, June 10, 2015

वो कार वाली!

-वीर विनोद छाबड़ा
मुझे याद है कि सन 1971 में लखनऊ युनिवर्सटी के वाईस चांसलर के अलावा पोलिटिकल साईंस डिपार्टमेंट के हेड प्रोफेसर पी.एन. मसालदान साहब ही सिर्फ़ कार से चलते थे। कभी कभी डॉ जे.सी. शर्मा जी भी कार का प्रयोग करते थे। जहां तक याद है वे खुद ड्राइव करते थे।
बाकी रीडर्स और लेक्चरार रिक्शा या साईकिल के सहारे थे। यूनिवर्सटी के बाकी डिपार्टमेंट्स में हालात कुछ बेहतर थे। प्रोफ़ेसरों के अलावा कुछ अमीर स्टूडेंट्स की भी कार वाली हैसियत थी। और वो यदा-कदा कार से ही यूनिवर्सिटी आते थे।

मेरी एक क्लासमेट भी काली अंबेस्डर कार से आती थी। वो लखनऊ के एक रईस इलाके में रहती थी। उनके भाई नामी व्यवसाई थे। कई संस्थाओं में प्रेजिडेंट भी थे। उसकी कार में एक अदद छोटी बहन और उसी के मोहल्ले में रहने वाली एक-दो क्लासमेटनें भी अक्सर उसी में लदी-ठूसी होती थीं।
मुझे उससे दोस्ती की बड़ी ललक रहती थी। इसकी वज़ह उसकी कार थी। ऐसा नहीं था कि मैं कभी कार में बैठा नहीं था। क्लासमेट की कार में बैठने का नशा तो दूसरा होता है।
जल्दी ही उससे दोस्ती की हसरत पूरी हुई। उसकी चमचागिरी में भी कोई कसर नहीं रख छोड़ी थी। मगर फिर भी उसकी कार की सवारी का सुख कभी नसीब न हुआ। होता भी तो कैसे? कार हमेशा फुल्ल रहती। और फिर रास्ते ही जुदा थे। कहां साइकिल और कहां कार! हंसी-मज़ाक में भी उसका अपर हैंड रहता जब वो कहती कि पीट दूंगी। यह तकिया कलाम भी था उसका। हम सब सब हंस देते। वो अच्छी ही नहीं बहुत अच्छी थी। राखी वाले दिन यूनिवर्सिटी बंद रहती थी। मगर अगले दिन हम लोग उससे बच नहीं सकते थे। मुखबरी भी खूब चलती थी।  
एक बार यूनिवर्सिटी के गेट पर उसकी कार पंक्चर हो गयी। सब लड़कियां बेचारगी की मुद्रा में बाहर खड़ी गई। ड्राइवर पहिया बदलने में जुटा था। हम पांच दोस्त उधर से गुज़रे। जब अपने पास न हो और दूसरे के पास हो तो उसे परेशान देखकर मज़ा आता है। शायद यही वज़ह थी कि यह दृश्य देख कर हम सब को हंसी आ गयी। और महबूब प्रोडक्शन का यह शेर भी याद आ गया-
क्या हुस्न ने समझा है, क्या इश्क़ ने जाना है
हम ख़ाक़ नशीनों की ठोकर पे ज़माना है।
कहा तो धीमे से था मगर उसने सुन लिया। हो सकता है कि मुखबरी भी हुई हो। दूसरे दिन मैं यूनिवर्सिटी पहुंचा तो पता चला कि उस शेर की वज़ह से वो मुझसे सख़्त नाराज है। मित्रों की मदद से कई दिनों बाद बामुश्किल मनाया था उसे।
कुछ दिनों बाद उसकी शादी हो गयी। हम सब गिफ्ट लेकर गए। मेरी प्यारी बहनिया बनेगी दुल्हनिया…का रिकॉर्ड बार बार बज रहा था।

Tuesday, June 9, 2015

सी०रामचंद्र- ऐ मेरे वतन ले लोगों!

-वीर विनोद छाबड़ा
सी०रामचंद्र- ऐ मेरे वतन ले लोगों!
चितलकर, अण्णा साहेब और सी० रामचंद्र। यह तीन नाम एक ही व्यक्ति के हैं। महाराष्ट्र के जिला अहमदनगर के पुतंबा कसबे में जन्मे संगीतकार सी०रामचंद्र ने अपना कैरियर तमिल फिल्म 'नागानंद' से बतौर हीरो शुरू किया। फ्लॉप हुए। फिल्मों में संगीत देने लगे। तमिल, मराठी और फिर हिंदी फिल्मों में आये।

भगवान दादा की 'सुखी जीवन' (१९४३) में नोटिस हुए। पराकाष्ठा पर पहुंचे 'अनारकली' (१९५३) में। यह ज़िंदगी उसी की है.…ज़िंदगी प्यार की दो चार घडी होती है.… जाग दर्दे इश्क़ जाग…
सी०रामचंद्र का कैरियर अनेक अजीबो-गरीब घटनाओं से भरा पड़ा है। मशहूर फ़िल्मकार और अभिनेता गजानंद जागीरदार एक फिल्म बना रहे थे। किसी ने उनको सी०रामचंद्र का नाम सुझाया। सी०रामचंद्र ने कई धुनें सुनायीं। जागीरदार बोले -अच्छी तो हैं। लेकिन वो एक नया संगीतकार चितलकर छाया हुआ है। उसकी तरह कुछ ताजा सुनाओ।
सी०रामचंद्र ने दूसरे दिन कुछ और धुनें सुनायीं। जागीरदार प्रसन्न नहीं हुए- कुछ और चितलकर जैसा लाओ।
सी०रामचंद्र अबकी तीन दिन बाद गए। इस बार उन्होंने पहले दिन वाली धुनें सुनायीं और बताया कि ये चितलकर जैसी हैं।
जागीरदार बोले - हां अब ठीक हैं। तब सी० रामचन्द्र ने उन्हें बताया वही चितलकर हैं।
अवसाद के दौर से निकले दिलीप कुमार को फ़ौरन कोई हलकी-फुल्की सुखांत कॉमेडी चाहिए थी। एसएम नायडू ने उन्हें 'आज़ाद'(१९५५) ऑफर की। दिलीप उछल पड़े। संगीत के लिए नौशाद से बात हुई। उन्होंने मना कर दिया। मुंहमांगी कीमत ऑफर हुई। नौशाद बिगड़ गए - कोई बनिए की दुकान समझ रखी है क्या? मैं क्या कोई भी नहीं कर सकता।
सी०रामचन्द्र ने सुना। उन्हें चैलेंज पसंद थे। कुछ दिन में छह गाने रिकॉर्ड हो गए। अपलम-चपलम, चप लायी रे तेरी दुनिया को छोड़ कर.…कितना हसीं है या मौसम…ये दूसरा गाना लता के साथ उन्होंने गाया था।

Monday, June 8, 2015

आशा में आशा राजखोसला ने तलाशी।

-वीर विनोद छाबड़ा
मन जब अतीत में जाने फड़कता है तो पुराने गाने सुनता/देखता हूं।
एक म्यूजिक चैनल पर गाना चल रहा है - 'मैं तुलसी तेरे आँगन की, कोई नहीं मैं तेरे साजन की.....' आशा पारेख अंसुअन की धारा बहा रही थी। मैं यादों खो जाता हूं।

यह गाना प्रोड्यूसर-डायरेक्टर राजखोसला की ये १९७८ में रिलीज़ सुपर हिट फिल्म 'मैं तुलसी तेरे आंगन की' से है। इसने उस साल का श्रेष्ठ फिल्म का फिल्मफेयर अवार्ड भी जीता। तफ़ायफ़ तुलसी की भूमिका में आशा पारेख प्रेम में सब कुछ हार गई। सब छोड़ कर अपने देवता के पड़ोस में आ बसी। त्रासदी, त्याग और दया की मूर्ति बन कर। मगर फिल्म के हर हिस्से में छाये रहने बावजूद भी श्रेष्ठ अभिनेत्री का ईनाम नूतन के हिस्से गया। आशा को महज़ श्रेष्ठ सह-अभिनेत्री के नॉमिनेशन से ही संतुष्ट रहना पड़ा। बड़ी कंट्रोवर्सी हुई कि ऐसा क्यों हुआ? आशा पारेख की परफॉरमेंस नूतन से हर सूरत में कहीं ज्यादा पावरफुल थी। क्या आशा का कसूर सिर्फ़ इतना था कि वो दूसरी औरत का किरदार कर रही थी। समाज पर कोई पहाड़ टूट पड़ता अगर दूसरी औरत के किरदार की अदाकारा को एक नंबर का अवार्ड मिलता! कुछ भी हो दर्शकों के दिल में श्रेष्ठ अभिनेत्री आशा पारेख ही रही। और यही सबसे बड़ा अवार्ड था।  
आशा और राजखोसला का एसोसिएशन १९६५ में शुरू हुआ था। तब तक नासिर हुसैन की खोज आशा पारेख की इमेज एक नकचढ़ी और चुलबुली अभिनेत्री की थी। राजखोसला ने उसमें टैलेंट का ज़बरदस्त पोटेंशियल देखा और 'दो बदन' में कास्ट किया। ये एक ट्रैजिक रोल था। हालांकि शानदार अभिनय के बावजूद आशा को कोई अवार्ड नहीं मिला। लेकिन दर्शकों के दिल उसने जीत लिए। और आशा यह स्थापित करने में कामयाब रही कि वो सिर्फ़ ग्लैमर गर्ल नहीं है एक कुशल अभिनेत्री भी है।

राजखोसला ने १९६९ ने आशा को 'चिराग़' दी। इस बार आशा ने 'दो बदन' से भी बेहतर परफॉरमेंस दी। लेकिन बड़ी हिट के बावजूद आशा को बेस्ट अभिनेत्री के नॉमिनेशन के सिवा कुछ न मिला। 
१९७१ में आशा-राजखोसला का साथ एक बार फिर बड़ी हिट 'मेरा गावं मेरा देश' में हुआ। लेकिन आज तक समझ नहीं आया कि आशा के पास इसमें करने को कुछ था भी? सारी तालियां तो सहनायिका लक्ष्मी छाया ले गई।
इस बीच शक्ति सामंत ने 'कटी पतंग' ने श्रेष्ठ अभिनेत्री का फिल्मफेयर अवार्ड आशा की झोली में डाल दिया। आशा की बरसों की चाह पूरी हुई।