Monday, September 7, 2015

वो भी एक दौर था, यह भी एक दौर है!

-वीर विनोद छाबड़ा
क्या ज़माना आ गया है? 
मुझे वो दिन याद आते हैं जब हम हज़रतगंज में गंजिंग के दौरान किसी बड़े शो रूम में घुस जाते थे। नए आये आईटम देखते, परखते। खासियतों का विवरण एकत्र करते और दाम पूछते। और फिर बाहर निकल जाते।

आमतौर पर दुकानदार हमें शक्ल से पहचानते थे। सेल्समैन बाख़ुशी त्वजो देते।
एक बार एक बड़े इलेक्ट्रॉनिक्स शोरूम के मालिक सडाना जी ने हमें रोक लिया। अपने केबिन में ले गए। बैठाया और हमसे मुख़ातिब हए - एक बात बताइये श्रीमानजी। मैं अक़्सर देखता हूं आप लोग आते हैं, दुकान का कोना कोना खंगालते हैं। हर छोटे-बड़े आईटम का दाम पूछते हैं और खाली हाथ बाहर चले जाते हैं। कभी खरीदते नहीं देखा।
हमारे सीनियर शुक्ला जी ने कहा - महोदय, खरीदने की इच्छा तो बहुत होती है। लेकिन आईटम इतने महंगे होते हैं कि हिम्मत नहीं पड़ती। बजट भी तो होना चाहिए। जिस दिन आमदनी बढ़ेगी। खरीद भी लेंगे।
सडाना जी मुस्कुराये - देखने में आप लोग सज्जन और ठीक-ठाक दिखते हो। आप लोग काम कहां करते हो? सरकारी नौकरी है क्या?
हम थोड़ा सकपकाये - हां सरकारी ही समझिए। इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड में हैं। यहीं शक्ति भवन…

सडाना जी ने हम लोगों की बात पूरी नहीं होने दी- ओ इलेक्ट्रिसिटी में हो! यार फिर फ़िक्र काहे की। बस आप आईटम पर हाथ रखो और एड्रेस बताओ। अभी आपके घर पहुंचाते हैं। ओ श्यामू ज़रा चा-शा, ठंडा-शंडा ले आ भाई।
हम लोग परेशान - सुनिये तो। अभी हमारा बजट नहीं है। अगले महीने स्केल रिवाइज़ होना है। उसके बाद।
लेकिन सडाना जी अड़ गए। अरे भाई पैसों की कौन बात कर रहा है? वो तो आते रहेंगे। बल्कि हमें तो चाहिये ही नहीं। जब आपकी इच्छा हो देना।
बड़ी मुश्किल से हमने पिंड झुड़ाया। उसके बाद से हमने लंबी मुद्दत तक शो-रूमों में घुसना बंद कर दिया। सडाना जी के शो रूम के सामने से तो.…जिस गली में तेरा घर हो साजना उस गली से हमें तो गुज़रना नहीं। अगर कभी मजबूरी में किसी शो रूम में गए भी तो भूल से भी डिपार्टमेंट का नाम नहीं बताया।

मक़सद बताने का यह है कि कितनी हनक थी अपने बिजली बोर्ड की। लोगों को कितना भरोसा होता था बिजली विभाग और उसके कर्मियों पर। इज़्ज़त की निगाह से देखे जाते थे। बतौर हुंडी कहीं भी इस्तेमाल हो जाते थे।
यानि एक वो सुखद दिन थे और एक आजकल के दिन हैं। दुखद ही नहीं, बेहद नाशुक्रे। सब गवां दिया। नाम और इज़्ज़त सभी कुछ।

Sunday, September 6, 2015

सबसे बड़ा दुश्मन अहंकार!

-वीर विनोद छाबड़ा
प्रख्यात चित्रकार, मूर्तिकार, आर्किटेक्ट और कवि माइकल एंजिलो इटली के रोम शहर में रहते थे।
माइकल एंजिलो जितने प्रसिद्द थे, उससे कहीं ज्यादा उनसे डाह रखने वाले
भी थे।
ऐसे ही एक चित्रकार को गुस्सा आया। सरेआम उसने ऐलान किया - माइकल एंजिलो और उसके चित्र मेरे चित्रों के समक्ष बेकार हैं। मैं उससे कहीं बेहतर चित्र बना सकता हूं।
उसने चित्र बनाना शुरू किया।
कई रोज़ की मेहनत के बाद चित्र तैयार हुआ। वाकई बहुत सुंदर चित्र था।
लेकिन चित्रकार संतुष्ट नहीं हो सका। उसे लगा कुछ कमी है, जिसकी वज़ह से यह चित्र माइकल एंजिलो की किसी भी पेंटिंग के सामने ठहर नहीं पायेगा। लेकिन वो समझ नहीं पा रहा था कि कमी है कहां और क्या है?
उसने अपने कई शुभचिंतकों से भी पूछा। लेकिन सब नाकाम रहे।
तब उसने उस चित्र को अपने घर के बाहर रख दिया, इस उम्मीद में कि शायद कोई कला प्रेमी बता सके कि उसमें क्या कमी है?
एक दिन इतिफ़ाक़ से माइकल एंजिलो खुद उधर से गुज़रे। उनकी नज़र भी उस पेंटिंग पर पड़ी। वो ठिठक गए।
उस चित्रकार ने माइकल एंजिलो को पूर्व में कभी नहीं देखा था। सोचा यह कोई कला प्रेमी है। उसने पूछा - क्या आप मेरी सहायता कर सकते हैं? इस चित्र में कुछ कमी है। लेकिन मैं समझ नहीं पा रहा हूं।
माइकल एंजिलो ने एक बार फिर ध्यान से चित्र को देखा। ब्रश निकाला और दोनों आंखों में दो छोटी सी बिंदियां बना दीं।
बिंदियों के अंकित होते ही था कि चित्र सजीव हो उठा। बोलने लगा।
चित्रकार सन्न रह गया। एक छोटी सी भूल! इसे वो पहचान नहीं पाया। वाह क्या बात है?
चित्रकार ने अपने परिवार के सदस्यों को भी बुलाया। चित्र देख कर सबने यही कहा - क्या खूब? अब माइकल एंजिलो हार गया समझो।
चित्रकार ने उस राहगीर से पूछा - ए मेरे अनजाने मित्र? आपके कारण मेरा यह चित्र दुनिया का सर्वश्रेष्ठ चित्र हो गया है? अब माइकल एंजिलो को मेरे सामने पानी भरना पड़ेगा। आप कौन हैं?

Saturday, September 5, 2015

नौकरानी पुराण।

-वीर विनोद छाबड़ा
मेमसाब ने तल्ख़ होकर पुकारा -सुनिये।
लगा कोई आफ़त आई है। मैंने जानबूझ कर अनसुना किया। मेमसाब पैर पटखते मेरे कमरे में आ गयीं। मैंने गहरी नींद से जागने का अभिनय
किया। मेमसाब ने शिकायत की -सुनाई नहीं देता क्या?
अरे बाबा सुन तो रहा हूं? जो कहना हो कहो।
मेमसाब कुछ याद करते हुए बोलीं -क्या कह रही थी मैं?
मैंने चुटकी ली -मैं क्या जानूं?
देखा, मैं भूल गयी। इसीलिए कहती हूं एकबार में सुन लिया करो।
मेमसाब ने खीजते हुए कमरे से एग्ज़िट मारती सी दिखती हैं। मैं मन ही मन खुश हुआ कि चलो बलां टली। लेकिन यह ख़ुशी क्षणिक साबित हुई।
कमरे से बाहर कदम रखते ही मेमसाब को याद आ गया। वो लौट आती हैं -हां तो मैं कह रही थी।
मैंने कहा -किससे कह रही थी और क्या कह रही थी?
मेमसाब भन्नाती हैं -अरे बाबा चुप रहिये। नहीं तो मैं फिर भूल जाऊंगी।
मैंने सरेंडर कर दिया -हां चुप हो गया। अब बोलो।
मेमसाब सांस खींची  -हां तो मैं कह रही थी कि आप कुछ कहते क्यों नहीं?
मैं आश्चर्यचकित हुआ  -अरे भाई किससे?
मेमसाब ने घोर आश्चर्य व्यक्त किया -कहां रहते हैं आप? अरे मैं सुबह से परेशान हूं? आप का क्या? खाने को मिल जाता है। फिर सुबह से शाम तक
लैपटॉप और सोना। तीसरा कोई काम नहीं है।
मैंने खीजते हुए कहा -बात लंबी मत खींचो। मुद्दे पर आओ। नहीं तो फिर भूल जाओगी।
मेमसाब को गलती का आभास हुआ। फौरन ट्रैक पर लौटीं - मैं कह रही थी कि आप नौकरानी को कुछ कहते क्यों नहीं?
मुझे आश्चर्य हुआ -क्या कहूं और क्यों कहूं? किया क्या है उसने?
मेमसाब गुस्से में आ गयीं -तभी कहती हूं जरा घर की ओर ध्यान दिया करो। मालूम है आज भी माहरानी नहीं आई है? पिछले चार दिन से नहीं आ रही है। अभी अभी मोबाइल आया है कि तबियत ठीक नहीं है। कल आऊंगी।
मैंने कहा -तो ठीक है। तबियत ठीक नहीं होगी। कल आ जाएगी।
मेमसाब झुंझुला गयीं -यह सब बहाने हैं। मुझे सब मालूम है, उसके घर मेहमान आये हैं। मौज मस्ती हो रही है। आप कुछ कहते नहीं। उसी का नतीजा है।
मैंने कहा -अरे बाबा मैं क्या कहूं उससे?
मेमसाब ने शिकायत की -कित्ती बार कहा कि उसे डांटो कि यह क्या तरीका है। रोज़ टाइम से आओ। काम करो और जाओ। बस पैसा ज़रूर टाइम पर चाहिये।
मैंने समझाने की कोशिश की- मेरे डांटने से वो टाइम पर आया करेगी? बीमार होना बंद करे देगी?
मेमसाब ने कहा -हां। आदमियों की डांट का असर जल्दी होता है।
मैंने वार किया- तुम पर मेरी डांट का होता है असर क्या?
मेमसाब ने बचाव किया - मेरी बात और है।

Friday, September 4, 2015

हम तो तेरे आशिक़ हैं!


-वीर विनोद छाबड़ा
ये वाक्या यूनिवर्सिटी की यादों से जुड़ा है। दौर सत्तर के दशक का प्रारंभ।
हमारे एक मित्र थे माईकल, दिलफेंक किस्म के। बिलकुल बिंदास। किसी भी स्टेशन पर एक दिन से ज्यादा नहीं रुकते थे।
तमाम सहपाठनियां भी उनकी इस बाल सुलभ हरकत से वाकिफ़ थीं। उन्हें भी बुरा कतई नहीं लगता था। उल्टे वे उनसे चुहल करतीं।
एक बार उनका दिल एक ऐसी मोहतरमा पर आ गया कि हम मित्रगण डर गए। हमने उन पर फ़िदा होने वाले सरेआम पिटते देखे थे। उनकी और देखने का मतलब था कि किसी को बर्र के छत्ते में ऊंगली डालना। डायरेक्ट करेंट वाले बिजली के नंगे तार को छूना।
मोहतरमा के जलवे और दशहत की धमक पूरी यूनिवर्सिटी में थी। दो राय नहीं कि बलां की खूबसूरत जो थीं। किसी का भी दिल आना लाज़िमी था। मगर
वो चौबीस मुश्टंडे किस्म के पहरेदारों की सख्त निगरानी में रहतीं। ऐसे में किसी की क्या मज़ाल कि नज़र मिला कर बात भी कर सके। कई लड़के बता चुके थे कि सपने में उन्हें ग़लती से हेलो कह गए और बदले में पिट गये।
इन तथ्यों के मद्देनज़र हम मित्रों ने माईकल को बहुत समझाया। वो खुद भी सारे हालात से वाक़िफ था। मगर फिर भी जान देने पर उतारू था - दिल दिया है जां  भी देंगे …अरे भई आशिक़ का जनाज़ा है, ज़रा धूम से निकले। 
इज़हारे मुहब्बत के लिए एक मख़्सूस दिन भी उन हज़रत ने तय कर लिया। एक शेरवानी का इंतज़ाम किया। तमाम नामी फ़िल्मी और ग़ैर-फ़िल्मी शायरों के क़लाम रटे। दायें हाथ में गुलाब का फूल लेकर इज़हारे मुहब्बत की कई बार रिहर्सल हुई।
एकहरा जिस्म, छाती अंदर धंसी हुई, काली शेरवानी, हाथ में गुलाब का फूल और होटों पर ये फ़िल्मी नग़मे - हम तो तेरे आशिक़ हैं सदियों पुराने… फूल तुम्हें भेजा है ख़त में.…पांव छू लेने दो फूलों को इनायत होगी…
उनकी संभावित बेतरह पिटाई के नज़ारे की कल्पना करके हम सब मित्र दहल जाते। हमें तो यह भी डर था कि चक्की में घुन की तरह हम भी न पिस जाएं।
जब तमाम कोशिशें नाकाम साबित हुईं तो हमने तय किया कि हरदिल अज़ीज़ सहपाठनी 'आपा' की मदद ली जाये।
हमने उनको सारा किस्सा बयां किया। वो भी सकते में आ गयीं। खामख्वाह ही एक नादान लड़का पिटेगा। इस बेइज़्ज़ती से उसका दिल टूटेगा। गहरे सदमे में भी जा सकता है।
वो हमारी मदद के लिए तैयार हो गयीं। एक फूलप्रूफ स्क्रिप्ट तैयार की गयी।
स्क्रिप्ट के मुताबिक़ अगला सीन यूं हुआ।
शेरवानी में दुबले-पतले माईकल दायें हाथ में गुलाब का फूल और इत्र में तरबतर क्लास में दाखिल हुए। सारे लड़के-लड़कियां माईकल को इस लिबास
और अंदाज़ में पहली मरतबे देख रहे थे। हैरान और परेशान थे। कुछ लड़कियां तो डर ही गयीं। उन्हें लगा कि माईकल को कोई दौरा पड़ गया है।
मगर हम बेफ़िक्र थे। सब कुछ स्क्रिप्ट के मुताबिक चल रहा था। बस मोहतरमा के आने की देर थी।
एक घंटा गुज़रा। दो घंटे। तीन घंटे और फिर सारा दिन गुज़र गया। मगर मोहतरमा नहीं आईं। थक गयीं अखियां पंख निहार। आशिक़ का दिल टूट गया। हम ने हौंसला रखने का मशविरा दिया। आज नहीं तो कल।

Thursday, September 3, 2015

दोस्त दोस्त न रहा!

-वीर विनोद छाबड़ा
छुट्टी का दिन। हम चीनू के घर पहुंचे। जान छिड़कने वाला मित्र। साईकिल लिये बाहर ही मिल गया। कहीं जाने की तैयारी में था।
कहीं जा रहे हो?
बहुत ज़रूरी काम है। फिर कभी आना।
कुछ टरकाऊ अंदाज़ था उसका। हम सोच में डूब गए। दो मिनट बैठाया भी नहीं। पानी भी न पूछा। दरवाज़े से ही चलता कर  दिया। तनिक दुख हुआ। फिर दिल को समझाया। होता है कभी-कभी। कोई मजबूरी होगी। बाद में तो बता ही देगा।
चीनू साईकिल लेकर निकल लिया। हमने भी साईकिल घुमा दी। एक पेड़ के नीचे खड़े होकर सिगरेट को धुआं किया। सोचा मिंटू के घर चलते हैं। लेकिन वहां ताला मिला। अब क्या करूं? घर लौटूं?
अचानक ख्याल आया सहपाठिनी के घर चलते हैं। बहुत दिन से गया नहीं। कई बार कह भी चुकी है। हमने उधर मोड़ दिया हैंडिल।
दीवार के साथ सटी साईकिल देख कर हम चौंके। कुछ जानी-पहचानी सी लग रही है। कुछ आगे सोचते कि अचानक सहपाठिनी ने दरवाज़ा खोल दिया।
चौंक पड़ी हमें देख कर। ख़ुशी से ताली बजाई। अरे तुम! आओ, आओ। तुम भी आओ।
हमारा दिमाग कलाबाजियां खाने लगा। तुम भी आओ? मतलब क्या है?
वो कहे जा रही है। तुम्हारे जीजा जी अभी-अभी बाहर निकलें हैं। चिंटू थोड़ा चिड़चिड़ा हो गया है। दांत निकाल रहा है न। 
लेकिन हमारे दिमाग में वो 'साईकिल' और 'तुम भी आओ' घूम रहा था। लेकिन अभी आगे बड़ा सरप्राईज़ बाकी था।
हमने कमरे में जैसे ही प्रवेश किया कि बिजली सी गिरी। आंखों के सामने अंधेरा छा गया। तेज़ चक्कर आया। हम पछाड़ खा कर मूर्छित होने को ही थे कि 
किसी ने थाम लिया।
चीनू था वो।
तुम यहां कैसे? तबियत हुई एक घुमा कर लगाऊं। तो यह है ज़रूरी काम? बड़ी जल्दी थी। सीने में ज्वाला धधक रही थी। दोस्त दोस्त न रहा। सच-सच बता देता यार। मैं जान दे देता।
वो सर झुकाये बैठा था।
हम दोनों के मध्य संवादहीनता की स्थिति थी।  सन्नाटा पसरा था।
तभी सहपाठिनी जी चिंटू को गोद में लिये कमरे में आयीं। लो तुम लोगों के
तीसरे भाई भी आ गये। हमने हैरान होकर गर्दन उठाई।
एक और सरप्राईज़!
सामने मिंटू खड़ा है। हमें लगातार घूरता हुआ। इधर से गुज़र रहा था। तुम दोनों की साईकिलें खड़ी देखीं। सो तफ़तीश करने चला आया।
हम कुछ पल एक-दूसरे को हैरां-परेशां देखते रहे। कुछ समझ नहीं आ रहा था। तीनों ही चोर थे। एक दूसरे की चोरी पकड़ी गयी। अब तो एक ही तरीका था।
हम तीनों ही एक साथ खिलखिला कर ज़ोर से हंस पड़े।
सहपाठिनी जी असलियत से अंजान हम तीनों को भौंचक्का देख रही थीं। भई, माज़रा क्या है? मैं भी तो जानूं?
हम हंसते ही रहे। आप चाय पिलाईये।
उसने चिंटू को चीनू की गोद में डाल दिया।

Wednesday, September 2, 2015

कहानी थोड़ी फ़िल्मी है - शोले के पीछे शोले!

-वीर विनोद छाबड़ा
चालीस साल और कुछ दिन की हो गयी 'शोले'। कल फिर देखी। शायद चालीसवीं बार। आज भी तरो-ताज़ा है। एक-एक शॉट और अंदाज़-ए-बयां बासी नहीं है।

क्यों है ऐसा? कुछ भी तो बेवज़ह नहीं। स्पॉट बॉय से लेकर टॉप स्टार्स तक का टोटल इन्वॉल्वमेंट। बड़े से छोटे तक एक-दूसरे के लिए और फ़िल्म के लिये कुछ भी करने को तैयार दिखता है। वरना आमतौर पर शॉट ओके। पैक-अप। सब अपने अपने रस्ते। तू कौन और मैं कौन?  

तीन साल और तीन करोड़। १९७२ से १९७५ के दौरान की सबसे महंगी फ़िल्म। जन्म लेने के दिन से चर्चा में थी। फिर हम ठहरे पिक्चरबाज़। फ़िल्म को परदे पर देखते हुए परदे के पीछे की पढ़ी कहानी भी मिक्स-अप करते चलते।

दो लाईन की कहानी। जेलर ठाकुर बलदेव सिंह के हाथ डाकू गब्बर सिंह ने काट दिए। बदला लेने के लिए उसने जय और वीरू नामक दो सज़ायाफ्ता गुंडों का सहारा लिया। सलीम-जावेद पहले 'खोया-पाया' फॉर्मूले में सिद्ध मनमोहन देसाई के पास गए। चाचा-भतीजा में व्यस्तता के बहाने मना कर दिया। अच्छा हुआ। वरना बेड़ा ग़र्क़ कर देते।

इतने से अफ़साने को सलीम-जावेद ने किस्सागोई के अंदाज़ में फ़साना बना कर रमेश सिप्पी को सुनाया। वो उछल पड़े। किरदार जुड़ने लगे। बसंती तांगेवाली…चल धन्नो आज तेरी बसंती की इज़्ज़त का सवाल है। हिटलरनुमा जेलर असरानी…हम अंग्रेज़ों के ज़माने के जेलर हैं। सांभा…पूरे पचास हज़ार। सिर्फ़ इतना बोलने के लिए उन्हें पचीस मरतबे बंबई से बंगलौर तक सफ़र का सफ़र तय करना पड़ा।  

सिर्फ़ नज़रों से बात करती ठाकुर की विधवा बहु राधा सिर्फ़ संध्या होते ही लालटेन जलाती नज़र आती है। कालिया, सूरमा भोपाली, मौसी, तमाम किरदार जुड़ते गए। इन्हें गढ़ने को लेकर कई कहानियां गढ़ी गयीं, किस्सागोई हुई। सीन शूट हुए। और फिर इन सबको सिलसिले वार पिरो दिया गया।

ठाकुर बलदेव सिंह में प्राण साहब बिलकुल फिट बैठ रहे थे। उनके लिए बायें का रोल। लेकिन जाने क्या हुआ कि सीता-गीता में काम कर चुके संजीव कुमार जंच गए। यह आदमी हर किरदार चैलेंज की तरह स्वीकारता है। जान डाल देगा। 

धरम गरम हो गए। ठाकुर का किरदार हम करेंगे। शुभचिंतक ने समझाया। क्या कर रहे हो? हेमा दूर हो जायेगी। संजीव तब बनेगे वीरू। हेमा पर फ़िदा हैं संजीव। उन्हें करीब होने का मौका मिलेगा। इस आशंका के मद्देनज़र धरम नरम हुए।

जय का क़िरदार शत्रुघ्न सिन्हा के लिए रिज़र्व था। लेकिन अमिताभ बच्चन ने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया। राधा में उनकी जया थी। वो भला कैसे दूर रहते। शूटिंग शुरू होने से पहले दोनों की शादी भी हो गयी। बेटी श्वेता गर्भ में थी और शूटिंग ख़त्म हुई तो बेटा अभिषेक गर्भ में था।

फ़िरोज़ खान की 'धर्मात्मा' में व्यस्त न होते तो गब्बर के किरदार में डैनी दिखते। अमजद खान को ले आये सलीम-जावेद। पहली नज़र में रमेश सिप्पी को नहीं भाये। लेकिन सलीम-जावेद को इत्मीनान था। बाकी तो
Amjad Khan
हिस्ट्री है। सिर्फ़ नौ सीन में दिखे गब्बर का ख़ौफ़ पूरी फ़िल्म पर छाया रहा.
…कितने आदमी थे.…तेरा क्या होगा रे कालिया…ये हाथ हमको दे दो ठाकुर…अरे सांबा कितना ईनाम रखे है सरकार हम पर.…जो डर गया समझो मर गया.…यहां से पचास कोस दूर गांव में बच्चा रोता है, तो मां कहती है, बेटे सो जा, नहीं तो गब्बर सिंह आ जायेगा…ये रामगढ वाले अपनी बेड़ियों को कौन चक्की का पीसा आटा खिलाते हैं रे.…क्या सोच कर आये थे सरदार बहुत खुश होगा, शाबाशी देगा… 

भारतीय सिनेमा के इतिहास में पहली दफ़े विलेन को इतना क्रूर बनाया गया कि लोग थूकें उस पर। लेकिन इसके उलट उसकी इमेज समाज में महिमा-मंडित हो गयी। लोग बेतरह प्यार करने लगे। उसके संवादों की मिमक्री होने लगी। इसे कैश करने के लिए बाज़ार में संवादों के कैसेट उतारे गये।  

'शोले' पूरी होते ही इमर्जेंसी लागू हो गयी। खतरा मंडराने लगा। फ़िल्म परदे का मुंह देख पाएगी? इसमें तो हिंसा ही हिंसा है। निर्माता ने ज़मीन-आसमान एक कर डाला। कई सीन कटे, हिंसा का प्रभाव कम करने को। कुछ रीशूट हुए। गब्बर को ठाकुर के पैरों तले रौंदे जाने से ऐन पहले पुलिस
Hema Malini
लाई गयी।

फ़िल्म रिलीज़ हुई। अच्छा रिस्पांस नहीं मिला। खिड़की खुली है। आराम से टिकट ले लो। क्रिटिक उबल पड़े - 'मेरा गांव मेरा देश' के पैरों से निकली सेकंड रेट नक़ल है.…दूसरी 'खोटे सिक्के…तमाम अंग्रेज़ी फ़िल्मों का कचरा…समाज को हिंसा बर्दाश्त नही…

Tuesday, September 1, 2015

एक्स्ट्रा रोटी!

-वीर विनोद छाबड़ा
मुझे याद है, पचास के दशक का आख़िरी और साठ के दशक के पहले दो साल।
तब हम आलमबाग के चंदर नगर गेट के पास बनी मार्किट के ऊपरी हिस्से में रहते थे। उस इलाके में ज्यादातर रिहाईश उन रिफ्यूजियों की थी जो पार्टीशन के कारण पाकिस्तान से उजड़ कर आये थे।  
मां दिन के लिए जब रोटी बनाती थी तो एक एक्स्ट्रा रोटी विधवा ब्राम्हणी के लिए भी बनाना नहीं भूलती थी। इसे हमदा कहा जाता था। और जिसको दी जाती उसे हम हमदेवाली कहते थे। 
मां बताती थी -ये रिवाज़ है। पुरखों के वक़्त से चला आ रहा है। हमारे पुरखे और माता-पिता मियांवाली (अब पाकिस्तान में) के रहने वाले थे।
मां के मायके और उनके पुरखों में भी भी यही रिवाज़ था। बल्कि पूरे इलाके में था यह रिवाज़।
हम लोग भले ही रात का बचा सुबह और सुबह का बचा रात में खा लेते थे परंतु ब्राह्मणी के लिए ताज़ी रोटी ही बनती थी। हम पूछते थे - ऐसा क्यों
किया जाता है?
मां बताती थी - इससे पुण्य मिलता है। सारे समाज को पुण्य मिलता है। समाज का सामूहिक दायित्व बनता है कि किसी ग़रीब और विधवा को मदद पहुंचाई जाए।
लेकिन हम यह न पूछ सके कि पुण्य प्राप्त के लिए ब्राह्मणी का ही चुनाव क्यों किया गया?
हमें याद है। रोज़ दोपहर बारह-एक के बीच सफ़ेद सलवार कमीज पहने एक औरत थाल लिए आती थी। उसमें पहले से ही कई रोटियां होती थीं। वो कहीं दूर से आती थी। मां उसे कभी-कभी अचार भी देती थी और वार-त्यौहार के अलावा भी उसे इकन्नी या दुअन्नी देती थी। हम उसे ब्राह्मणी ही समझते थे। लेकिन एक दिन मां की बातों से पता चला कि उस हमदेवाली का नाम कौशल्या है। उसका परिवार भी पार्टीशन के फलस्वरूप सरहद पार से आया है।  वो वास्तव में दरख़्वान (बढ़ई) की विधवा है।
दान देने से मतलब है, वो बस ज़रूरतमंद हो। यह छूट पुरखे दे गए थे कि अगर आस-पास ब्राह्मणी न मिले या वो हमदा लेने के लिए तैयार न हो तो ब्राह्मणी के नाम की रोटी किसी मजलूम को दे दी जाये।
हमें अपने पुरखों के इस गुण पर बहुत गर्व हुआ।
यों मेरी मां भी बहुत भली थी। वो थी तो धर्म-कर्म और रीति-रिवाज़ों को मनाने वाली, लेकिन दकियानूस नहीं थी। वो ऑमलेट-मीट खाती भले नहीं थी लेकिन हम लोगों के लिए बना ज़रूर देती थी। 
हम हैरान होते थे कि ये कौशल्या इतनी ढेर रोटियां कैसे अकेले खाती होगी? पूछने पर पता चला कि उसके परिवार में उसके अलावा चार और लोग भी हैं। जो रोटियां बच जाती थी कौशल्या किसी गरीब को या गाय को खिला देती।