Monday, September 14, 2015

हिंगलिश ही सही बढ़ तो रही है।

-वीर विनोद छाबड़ा
पचास के दशक का अंत। हमने जब होश संभाला तो खुद को लखनऊ के चंदर नगर में पाया। पार्टीशन से आये शरणार्थियों का बोलबाला था। पूरा

पंजाबी माहौल। दुकानदार भी पंजाबी। पढ़ते उर्दू का अख़बार थे। लेकिन पंजाबी लहज़े में हिंदी बोलते थे। यहीं हमने पहली मर्तबे हिंदी और अंग्रेज़ी का अख़बार देखा। साल भर एक हिंदी मीडियम मिशनरी स्कूल में पढ़े। हिंदी में बाईबल पढ़ी। पिताजी को चिंता हुई कि बच्चे महर्षि बाल्मीकि को कैसे जानेंगे
? एक सरकारी स्कूल में भर्ती हो गए। कक्षा एक से लेकर ट्रिपल एमए तक हम हिंदी माध्यम से ही ज्ञान प्राप्त करते रहे। इस बीच १९६८ में अंग्रेज़ी विरोधी आंदोलन चला। अंग्रेज़ी के बोर्ड उतरे और हिंदी के टंगे। १९८९ में श्री मुलायम सिंह यादव यूपी के मुख्यमंत्री बने। कई अंग्रेज़ी पसंद विभागों को ख्याल आया कि प्रदेश की राज्यभाषा हिंदी है। 
जो हिंदी में सोचते थे और अंग्रेज़ी में तरजुमा करके लिखते थे, अब हिंदी में लिखने भी लगे। कार्य सहज और त्वरित निपटने लगे।
लेकिन आम ज़िंदगी में अंग्रेज़ी मानसिकता हिंदी पर हावी रही। रैट के पीछे कैट है.…टेबुल पर नाईफ़ रखा है.…मुमु गुड ब्वॉय है.…टॉयलेट में पॉटी करेगा…कुर्सी पर नहीं चेयर पर बैठिये। कुत्ता भी 'सिट' कहने पर बैठता है और 'अप' पर खड़ा होता है। हिंदी में क्षमा मांगने वाले को हिक़ारत से देखा जाता है। अंग्रेज़ी का सॉरी तो हर मर्ज़ की दवा है। दूधवाला हो सब्ज़ीवाला  या फिर रिक्शावाला छुट्टा नहीं 'चेंज' बोलता है। भिखारी भी टेन रूपीस प्लीज़ कहने लगा है। अंग्रेज़ी बोलने वाला गरीब खुद को अभिजात्य और इलीट के समकक्ष समझाता है।
लेकिन हम निराश नहीं हैं। हमें फ़ख़्र है कि बच्चों के नाम शुद्ध हिंदी में हैं - नदिया, नेहा, पंखुड़ी, पायल, अंकिता, सुरभि, शुभांगी, आकांक्षा आदि। अर्थ जानने के लिए शब्दकोष की सहायता भी लेनी पड़ती है। 
घरों-बंगलों के गेट पर शिलापट लगे हैं -श्रद्धा, छाया, घरौंदा, मातृछाया, आसरा, शांति…
कॉरपोरेट सामान बेचने के लिए हिंदी ही चाहिये। विज्ञापन देखिये। उत्पाद पर नाम अंग्रेज़ी में है। मगर यह पर्याप्त नहीं। साबुन का प्रयोग करने वाली सुंदरी हिंदी में बताती है उसका रंग रूप निखर आया है.… फलां क्रीम से मुंहासे गायब हो  गए हैं.…बिग बी तो कई कुछ मीठा हो जाये कह कर अरबों की चाकलेट बेच चुके हैं.…सेकंड हैंड कार चला रहा कुत्ता भी हिंदी में संतोष व्यक्त करता है। हमें लगता है अगर कुत्ते बोलते होते तो हिंदी ही बोलते। इसे सीखने और जानने वालों की संख्या बढ़ रही है।

Sunday, September 13, 2015

इंसाफ़ की डगर पर।

-वीर विनोद छाबड़ा
डाकुओं की समस्या के इर्द-गिर्द घूमती साठ के दशक में महबूब खान 'मदर इंडिया' दे चुके थे। इस सुपर हिट फ़िल्म के सेट पर आग लगी थी। नायिका नर्गिस को सुनील दत्त ने जान की बाज़ी लगा कर बचाया। नर्गिस दिल दे बैठीं। हालांकि फ़िल्म में दोनों मां-बेटे के किरदार में थे। 
बहरहाल, सहसा ही इस डाकू समस्या से कई फ़िल्म वालों को प्यार हो गया।
 
जन्म से कोई डाकू नहीं बनता। अन्याय, जमींदार, लाला और पुलिस का ज़ुल्म, बेरोज़गारी, गरीबी, सरकार और समाज की उपेक्षा उसे डाकू बनाती है। डाकू के सीने में भी दिल है। वो प्यार करता है। घर बसाना चाहता है। बस उसे सरकार और समाज के सहारे और वादे की ज़रूरत है।
इस थीम पर साठ के दशक में आगे-पीछे तीन मशहूर फ़िल्में बनीं। राज कपूर की 'जिस देश में गंगा बहती है', सुनील दत्त की 'मुझे जीने दो' और दिलीप कुमार की 'गंगा जमुना'.
यूं तो तीनों ही लैंड मार्क फ़िल्में थीं। लेकिन 'गंगा जमुना' ट्रेंड सैटर थी। भोजपुरी डायलेक्ट, गांव की ज़िंदगी, कलाकारों का चरित्र-चित्रण, उनकी वेशभूषा और बेहतरीन फिल्मांकन। फ़िल्म का रंगीन होना भी एक अतिरिक्त आकर्षण था।
एक भाई कानून तोड़ने पर अमादा है और दूसरा कानून का रखवाला है। यानि एक कानून के इस तरफ और दूसरा परली तरफ। कानून तोड़ने वाले डाकूओं का सफ़ाया और इंसाफ़ को उसके सही स्थान पर बैठाने के लिए पुलिस का दरोगा छोटा भाई कुछ भी कर सकता है। रास्ते में भाई आयेगा तो वो उस पर भी गोली चलाने से पीछे नहीं हटेगा।
इस थीम पर बीसियों फ़िल्में बनीं हैं। लेकिन सबसे पॉवरफुल 'गंगा जमुना' ही है। इसी थीम से प्रेरणा लेकर दीवार, त्रिशूल और अमर अकबर अंथोनी बनीं और तीनों में अमिताभ थे।
बर्लिन, चेकोस्लावेकिया, कार्लवरी आदि कई इंटरनेशनल अवार्ड मिले। नेशनल फ़िल्म अवार्ड में सिल्वर मेडल और फिल्मफेयर में वैजयंतीमाला को बेस्ट एक्ट्रेस, वजाहत मिर्ज़ा को संवाद और वी बाबासाहेब को फोटोग्राफ़ी के लिये चुना गया।
निर्देशन नितिन बोस का था जो दिलीप को बरसों पहले 'मिलन' और 'दीदार' में डायरेक्ट कर चुके थे। गॉसिप की दुनिया में ख़बर थी कि नितिन बोस किनारे बैठे रहते थे और पूरी कमांड दिलीप कुमार के हाथ में थी। लेकिन यह कोरी बक़वास थी। दिलीप को बदनाम करने और फ़िल्मी रिसालों का सर्कुलेशन बढ़ाने की साज़िश थी। इसका खंडन सेट पर मौजूद कई लोगों ने और खुद दिलीप कुमार और नितिन बोस ने किया।
नितिन बोस बंगाली फिल्मों के बहुत काबिल डायरेक्टर थे और बहुत अच्छे फोटोग्राफ़र भी। उन्होंने तीस और चालीस के दशक में बीस फिल्मों का छायांकन किया और ग्यारह फ़िल्में भी लिखीं।
यही फ़िल्म थी जिसमें दिलीप कुमार और वैजयंतीमाला का रोमांच उच्चतम शिखर पर था और इसके बाद दरारें पड़नी शुरू हो गयीं थी। इसी फ़िल्म की बेमिसाल कामयाबी से प्रभावित होकर भाइयों के नाम गंगा-जमुना रखे जाने लगे।  
इस फिल्म में शकील बदायुँनी के लिखे एक गाने को हेमंत मुख़र्जी ने गाया था। संगीतकार नौशाद अली के साथ हेमंत का होना सुखद आश्चर्य था। मुझे याद नहीं पड़ता कि इससे पहले और बाद में हेमंत ने नौशाद के लिए गाया हो।
हेमंत खुद भी बहुत अच्छे गायक होने साथ-साथ बेहतरीन संगीतकार थे। गुरुदत्त की क्लासिक 'साहेब बीवी और गुलाम' का म्यूजिक हेमंत कुमार का ही था।
उनकी आवाज़ को लोग सिल्की वॉयस बोलते थे। इस गाने में अरुणा ईरानी बाल कलाकार के रूप में दिखी थी।

Saturday, September 12, 2015

फ़ूफा की फ़ूफी!

-वीर विनोद छाबड़ा
फ़ूफा की फ़ूफी ने ताउम्र दांत से पैसा पकड़ा। चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाये। कंजूस ही नहीं महा-मक्खीचूस।
दरअसल फ़ूफी शुरू से ऐसी नहीं थी। उसे ऐसा बनने के लिये फ़ूफा ने मजबूर किया। उन्हें न घर की फ़िक्र और न अपनी। जितना कमाया जुए में
शराब उड़ा दिया। धुआं भी खूब उड़ाया। शबाब के भी खासे मुरीद थे। कुल मिला कर कोई ऐब ऐसा न था जिसके लिए फ़ूफा जी जाने न जाते हों। नीचे की कमाई तो बेहिसाब। जैसे आती वैसे ही निकल जाती। बचत नाम की ज़ीरो बटा अंडा।  
कभी कभी तो सारे पीपे खाली हो जाते। फूफी बेचारी क्या खुद खाए और क्या दो अदद बच्चों को खिलाये। अड़ोसी-पड़ोसी अच्छे न होते तो फ़ाके करने पड़ते। पानी एक बार नहीं कई बार सर से ऊपर निकला। कोई और होती तो कबकी कुएं में छलांग लगा चुकी होती। यह तो फ़ूफ़ी की हिम्मत की दाद देनी होगी कि पहुंच गयी एक दिन अपने फ़ूफ़ा के दफ़्तर।
ज़बरदस्त हंगामा हुआ। शोर बॉस के कान तक जा पहुंचा। बाल बच्चों वाला आदमी था वो। कई घर बर्बाद होते देखे थे उसने। हुकुम लिख दिया कि फ़ूफा का वेतन फ़ूफी को मिलेगा।
उस दिन से फ़ूफ़ी के अच्छे दिन आने शुरू हो गए। लेकिन एक दिन फ़ूफ़ी की बचत पर नामुराद फ़ूफा की नज़र पड़ गयी। सब साफ़ हो गया।
अबकी फ़ूफी ने ऐसी जगह बचत छुपाई कि फ़ूफा के फ़रिश्ते भी न सोच पायें। कोठारी में पड़े पीपे में। पुराने सड़े कपड़ों के बीच। डिब्बे में पहले नोट और ऊपर अरहर की दाल। आटा हटाओ तो वहां भी रूपए मिलें। घर में दो चूहेदानियां थीं। एक चूहेदानी में बचत के रूपए। पड़ोसी के घर मेहमान की महक पाते ही मय बच्चों के पहुंच जाती।
इसी बचत के बूते ही फ़ूफी ने बच्चों को बढ़िया तालीम दिलाई। पहले बिटिया और छह महीने बाद बेटे को ब्याह दिया। जी खोल कर खर्च किया। सब बोले, वाह फ़ूफी, वाह। अगली-पिछली सारी कसर पूरी कर दी।
अब फ़ूफी अस्सी की होने को आई। फ़ूफा को खर्च हुए दस साल गुज़र चुके थे। बहुत भाग-दौड़ की थी फ़ूफी ने। पानी की तरह पैसा बहाया। बड़े अस्पताल में बढ़िया ईलाज कराया। मगर फूफा का मर्ज़ डॉक्टर काबू न कर पाये। फूफा अंत समय में समझदार हो गए। जो किया है उसका फल इसी जन्म में भुगतना है।
बेटा-बहु तो नौकरी के सिलसिले में पहले से ही बंगलौर में थे। फ़ूफ़ी एकाकी हो गयी। लेकिन चोरी-चुपके बचत वाली आदत न गयी। सलवार के नेफ़े में अब भी हज़ार-पांच के कई नोट मोड़-मूड़ छुपा रखती।
उस दिन सुबह दूधवाला आया। बहुत देर तक कुंडा खड़खड़ाया। अड़ोस-पड़ोस में खबर दी। आख़िरकार दरवाज़ा तोड़ा गया। फ़ूफी नींद में ही परलोक सिधार चुकी थी। बाल-बच्चों को ख़बर दी गयी। शमशान पर पूरा मोहल्ला गवाह बना।

Friday, September 11, 2015

कृष्णा ओ काले कृष्णा…

-वीर विनोद छाबड़ा
सभी भगवान श्री कृष्ण के जन्म के उत्सव में तल्लीन हैं। कोई गिरधर गोपाला बोल रहा है तो कोई यशोदानंदन हुआ जा रहा है। आस्थाओं का सैलाब उमड़ रहा है।
खबरिया चैनलों ने बाद मुद्दत के एक नेता विशेष की जय/पूजा को किनारे कर दिया है। पड़ताल कर रहे हैं - राधा क्यों गोरी और कृष्ण क्यों काला?

भारतीय संस्कृति का अटूट हिस्सा है ये त्यौहार। बचपन में खूब बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया है। बाद में मूक दर्शक हो गए। इंतिज़ार करते रहे, कब आधी रात हो, कृष्ण जी जन्में और चरणामृत गटकने को पंजीरी फांकने को मिले।
अब मैं आपको इक्यावन साल पीछे ले जा रहा हूं। नायिका भगवान कृष्ण के समक्ष शिकायत कर रही है - मुझे काला क्यों बनाया? बनाया भी तो दूसरों को उजला दिल देखने वाली नज़र क्यूं नहीं दी?
यों ऐसे शुभ अवसर पर ऐसा प्रलाप करना तो नहीं चाहिए। लेकिन नायिका की नहीं, उस जैसे लाखों की मजबूरी है। हालात कतई नहीं बदले हैं। काले वर्ण  वालों को गौर वर्ण के समक्ष आज भी हीन भावना से देखा जाता है।
शायद भगवान आज इस दुखयारी का करुण रुदन सुन कर इंसाफ कर दें। 
मेरे ज़माने के बंदो को याद होगा कि दक्षिण भारत का एक प्रोडक्शन हाऊस  हुआ करता था - एवीएम। आंसू बहाऊ पारिवारिक फ़िल्में बनाने में माहिर। इसी हाऊस से आई थी - मैं भी लड़की हूं।
लड़की को अपने काले रंग के कारण समाज/मायके/पति आदि से बहुत कुछ सुनने को मिला, तमाम ज़िल्लतें सहनी पड़ीं।

Thursday, September 10, 2015

देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयी भगवान!

-वीर विनोद छाबड़ा
१९४७ में भारत के विभाजन से उत्पन्न दंगों की विभीषका को देखने और झेलने वाले चंद बंदे ही अब इस दुनिया में शेष हैं।
उस दौर में इंसान को हैवानियत की हद से गुज़रते देख कई लोगों का तो भगवान पर से यकीन ही उठ गया था।

ऐसा ही नज़ारा इंद्र सेन उर्फ़ आईएस जौहर ने भी देखा था। उनका घर-बार लुट गया। इसी पर उन्होंने एक कहानी लिखी - नास्तिक। उस पर फिल्म बनी। इसे ख़ुद जौहर ने ही निर्देशित किया।
विभाजन से उत्पन्न दंगो माता-पिता को क़त्ल होते देखने वाला परेशान अजीत छोटे भाई-बहन के साथ भारत लौट रहा है। उसका भगवान से भरोसा ही उठ गया है।
उसी समय बैकग्राउंड में ये गाना चल रहा है जो अजीत ही नहीं हज़ारों लोगों के दिल में उठ रहे तूफ़ान को प्रतिबिंबित और रेखांकित करता है।
इसे कविवर प्रदीप ने लिखा और अपने ही अंदाज़ में गाया। संगीत उनके पसंदीदा चितलकर रामचन्दर का है।
आज भी ये गाना ताज़ा है। इसका शायद यह है कि आज एक बार फिर इंसान को हैवान बनाने की तैयारी जोर-शोर से चल रही है।  

देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयी भगवान
कितना बदल गया इंसान
सूरज न बदला, चांद न बदला, न बदला आसमान
कितना बदल गया.....

आया समय बड़ा बेढंगा
आज आदमी बना लफंगा
कहीं पे झगड़ा कहीं पे दंगा
नाच रहा नर होकर नंगा
छल और कपट के हाथों
अपना बेच रहा ईमान
कितना बदल गया.....

Wednesday, September 9, 2015

सूनी बॉलकनी।

-वीर विनोद छाबड़ा
दो साल पहले। शायद आज ही का दिन। त्रिवेदी नहीं सिर्फ़ कमल कुमार लिखता था वो। मेरा हमउम्र। मेरे घर के ठीक पीछे उसका घर और उसके घर के ठीक पीछे मेरा घर। पिछवाड़े की दीवारें जुडी हुईं।
१९८२ में जब मैं इंदिरा नगर आया तो एक नज़र में ही तय हो गया था कि वो सिर्फ़ पड़ोसी नहीं रहेगा, गहरा दोस्त भी बनेगा और हमराज़ भी। ज़िंदगी के ढेर फ़साने, सुख-दुःख शेयर किये। बावजूद अलग-अलग राजनैतिक विचारधारा के वो ऐसा दोस्त रहा जिसके साथ दोस्ती निभाई जा सकती
थी। मैं कांग्रेस समर्थक और वो भाजपा समर्थक अटलजी का घनघोर भक्त।
हम उसे प्यार से पंडितजी कहते। हम आमतौर पर सामाजिक और पारिवारिक मुद्दों पर ही बात करते थे। लेकिन हम दोनों में जिसकी भी पार्टी जीतती, लपक कर बधाई देने और मिठाई खाने में देर नहीं लगाते थे। क्रिकेट का शौक़ीन होना एक और कॉमन इंटरेस्ट। ऑस्ट्रेलिया में वन डे सीरीज़ चलती थी। वो सुबह पांच बजे जगाने आ जाता था। साथ-साथ बैठ कर मैच देखने का मज़ा ही दूसरा होता है।
दीवाली के दिन होते तो 'शुरू' हो जाते। गंगा स्नान तक कार्यक्रम चलता। और होली पर तो तरंग तरंग होती। देसी-विलायती सब चलती। याद ही नहीं रहता था कि कहां-कहां घूंट मार आये। महीने में एक दफ़े संगीत की महफ़िल 'खान-पीन' के साथ हो जाती। उसका माउथ ऑर्गन पर 'मेरा जूता है जापानी…' सुनना बहुत अच्छा लगता।
कभी कभी डर लगता था कोई नज़र न लगे। और सचमुच एक ज़लज़ला आया। सब खत्म हो गया। पंडितजी को लेफ्ट साइड पर पैरालिसिस हुआ। मगर कमाल का जीवट था उसका। नए सिरे से ज़िंदगी की शुरुआत की। आधी ज़िंदगी को भी पूरी तरह एन्जॉय किया।
३१ साल की दोस्ती में शायद मैं ही था जिसने सबसे ज्यादा उसे विजिट किया। आख़िरी दस साल तो अपवाद स्वरुप ही कोई शाम रही हो जब मैं उससे मिलने नहीं गया। वो अक्सर बालकनी में बैठा मेरा इंतज़ार करता होता। मेरे आने की उम्मीद ख़त्म होने पर ही वो चाय पीता। अच्छे खाने का शौक़ीन। अकेले-अकेले खाने में में मज़ा नहीं। मुझे साथ देना पड़ता। घंटा -डेढ़ घंटा गप्प-शप्प।
जिस दिन मैं नहीं जाता वो बेचैन हो जाता। क्या हुआ? ठीक तो हो न? 
उन दिनों मैं कमरा ठीक करा रहा था। रोज़ शाम प्रोग्रेस पूछता। एक दिन मैंने कहा - तैयार हो गया है। कल सुबह आता हूं। कार से ले चलूंगा दिखाने।
लेकिन किसी वज़ह से नहीं जा पाया। उस शाम फोन से पूछा भी नहीं कि मैं कहां रह गए।
रात सवा दस बजे भाभी का फ़ोन आया - जल्दी आइये। तबियत बहुत ख़राब है।

Tuesday, September 8, 2015

नैय्यर ने बनाया आशा को आशा दी!

-वीर विनोद छाबड़ा
आज आशा भोंसले का ८२ साल की हो गयीं हैं।
आशा दी जिन बुलंदियों पर हैं वहां तक पहंचने के लिए निसंदेह उन्होंने अथक मेहनत की है। आशा दी ने जब गायन क्षेत्र में कदम रखा तो बहुत
बड़ी चुनौती थी उनके सामने। बड़ी बहन लताजी की छोटी बहन होने का उनको कोई लाभ नहीं मिला। इसके अलावा शमशाद बेगम और गीता दत्त का भी बोलबाला था। ख़राब औरत पर फिल्माए जाने वाले गानों के लिए उन्हें मौका मिला। उस दौर में बड़ी गायिकाओं को पसंद नहीं होता था कि उनकी आवाज़ खलनायिका को दी जाये। ज्यादातर बी और सी ग्रेड की फ़िल्में उनके हिस्से आयीं।
आशा दी की ओपी नैय्यर से मुलाक़ात हुई। आशा दी का मुकद्दर ही बदल गया गया। सीआईडी के युगल गीत - ले के पहला पहला प्यार… में उनको रफ़ी और शमशाद बेगम के साथ कुछ पंक्तियां मिलीं। नैय्यर और लताजी में पैदाइशी अनबन थी। एक दूसरे के साथ काम न करने की अलिखित क़सम खा रखी थी। नैय्यर ने तो पूरी तरह से ठान ली कि एक दिन लता से बड़ी लता दुनिया को दिखा देंगे। उन्हें अपनी आशा को आशा में पूरा होते दिखा।
नैय्यर ने आशा की आवाज़ और सुर को सुधारना और संवारना शुरू किया। इस नई प्रतिभा को उपयोग बीआर चोपड़ा की 'नया दौर' में किया। हालांकि उसमें कोई सोलो नहीं था। लेकिन रफ़ी के साथ युगल गीतों में आशा की जोड़ी जम गयी। साथी हाथ बढ़ाना…उड़े जब जब ज़ुल्फ़ें तेरी…मांग के साथ तुम्हारा…ने तहलका मचा दिया।
आशा की आवाज़ का जादू दिल-ओ-दिमाग़ पर चढ़ कर बोलने लगा। इसके
बाद रफ़ी के साथ नैय्यर ने उन्हें - मैं प्यार का राही हूं (में मुसाफिर एक हसीना).…इशारों इशारों में दिल लेने वाले…और दीवाना हुआ बादल (कश्मीर की कली)…आये हैं दूर से मिलने हुज़ूर से…सर पे टोपी लाल हाथ में रेशम का रुमाल…और देखो कसम से देखो कसम से…(तुमसा नहीं देखा) गवाया।
सोलो में आशा को आइये मेहरबान (हावड़ा ब्रिज) …ये है रेशमी ज़ुल्फ़ों का अंधेरा…और जाइए आप कहां जायेंगे (मेरे सनम)…आओ हुज़ूर तुमको बहारों में ले चलूं…नैय्यर ने बुलंदियों पर पहुंचा दिया।
बताया जाता है कि आशा के पारिवारिक जीवन में उन दिनों भारी उथल पुथल थी। ऐसे में नैय्यर ने उन्हें न सिर्फ इमोशनली मज़बूत किया बल्कि प्रोफेशनली भी मज़बूत किया। यह एक और ट्रेजेडी है कि बाद में किन्हीं नामालूम कारणों से नैय्यर और आशा में १९७२ में अलगाव हो गया।
नैय्यर के साथ आशा दी ने आख़री दफ़े 'प्राण जाये पर वचन न जाये( रिलीज़ १९७३) के लिए ये गाना रेकॉर्ड किया था - चैन से हमको कभी जीने न दिया… मज़े की बात ये है कि आख़िरी लम्हों में ये गाना फिल्म से हटा दिया गया। परंतु यहां एक और विचित्र घटना हुई। आशा दी को सर्वश्रेष्ठ गायिका का फिल्मफेयर अवार्ड इसी गाने के लिए मिला।
ज्योतिष विद्या में यकीन करने वाले नैय्यर ने एक इंटरव्यू में बताया था - मुझे शुरू से मालूम था कि मैं और आशा हमेशा साथ नहीं रहेंगे। हमें अलग होना ही होगा। आशा से अच्छा कोई दूसरा मेरी ज़िंदगी में नहीं आया।
लेकिन आशा दी ने अपने जीवन में ओपी नैय्यर के महत्व को स्वीकार नहीं किया। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा - मुझे जो कुछ मिला मेरी प्रतिभा के दम पर। 'नया दौर' में कैरियर के बूस्ट का कारण प्रोड्यूसर-डायरेक्टर बीआर चोपड़ा हैं न कि कोई और।
आशा दी से संबंधित एक और मशहूर वाक्या।