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वीर विनोद छाबड़ा
अपने परिजन का हालचाल जानने हम अस्पताल गए। आज वहां कुछ दूसरी ही किस्म की हलचल
थी। स्टाफ के चेहरे पर ख़ुशी थी। एक वृद्धा मरीजा का जन्मदिन था। उस बेचारी को मालूम
ही नहीं था। वो न बोल पाती थी और सुन सकती थी। शायद समझ भी नहीं पा रही थी। इसीलिए
चेहरे पर कोई भाव नहीं थे। हमें मालूम नहीं कि क्या बीमारी है इसे। सूख कर कांटा हो
चुकी थी। कुर्सी पर बैठी हिल रही थी। उसे बार बार सहारा दिया जा रहा था। दो केक रखे
थे सामने। एक पर लिखा था - लव मम्मी। उसके बच्चों ने भेजा था। वो बाहर थे कहीं। दूसरा
पति की तरफ से था। वो पास ही खड़ा था। भनभना रहा था कि केक पर कुछ लिखा ही नहीं है।
वृद्धा मरीजा की शारीरिक अवस्था बता रही थी कि शायद यह अंतिम जन्म दिन है उसका।
हमने उसके पति को बधाई देते हुए पूछा कि क्या मैं तस्वीर ले सकता हूं?
उसने हमें घूर कर देखा। क्या आप मुझे जानते हैं?
हमने कहा - नहीं। इस अच्छे पल को शेयर करना चाहता हूं।
उसने बहुत सूखे और अशिष्ट स्वर में कहा - कोई ज़रूरत नहीं है?
हमें उसके व्यवहार पर दुःख हुआ और आश्चर्य भी। कैसा पति है जो अपनी पत्नी के अंतिम
हैप्पी बर्थडे की ख़ुशी को किसी अजनबी से शेयर करना क्यों नहीं चाहता? हमारे तो बड़े बुज़ुर्ग
यही कहा करते थे कि ख़ुशी शेयर करने से बढ़ती है।








