Thursday, February 18, 2016

बॉर्न टैलेंट बनाम गॉड गिफ्टेड टैलेंट।

-वीर विनोद छाबड़ा
एक बहुत बड़े व्यापारिक संस्थान में सहायक की पोस्ट के लिए विज्ञापन प्रकाशित हुआ।
नौकरी क्या स्वयंवर जैसा खुला खेल था।

इंटरव्यू में पूछा जाने वाला सवाल पहले ही बता दिया गया। शर्त यही थी कि जो उदाहरण सहित सही जवाब देगा नौकरी उसी को मिलेगी।
सवाल यह था - पैदाइशी टैलेंट और गॉड गिफ्टेड टैलेंट क्या होता है?
सबको मालूम था कि इस कंपनी के बॉस की एक खूबसूरत बेटी है। उसे सहायक की नहीं दामाद यानि वारिस की ज़रूरत है।
लाखों अर्जियां आ गयीं। एक से बढ़ कर एक टैलेंट वाले। खूबसूरत और अकलमंद। लाखों करोड़ों की नौकरी करने वालों ने भी अप्लाई किया।
सिफारिशें भी हज़ारों में आयीं- घर की कामवाली बाई से लेकर नंबर हीरो-हीरोइन और मंत्री-संत्री तक से। विदेश के मुखिया भी रूचि लेने लगे।
लेकिन कंपनी के बॉस ने इन सबको किनारे कर दिया। सिफारिश मतलब डिस-क्वालिफिकेशन।  
शार्ट लिस्ट करने के बाद कई हज़ार अभ्यर्थियों को इंटरव्यू के लिए बुलाया गया। कोई भी स्पष्ट और सटीक उदाहरण नहीं दे पाया। बॉस उदास हो गए - शायद मेरी कंपनी की किस्मत में काबिल सहायक नहीं है, जिस पर मैं ऐतबार कर सकूं।
तभी सेक्रेटरी ने कहा - सर, एक आख़िरी कैंडिडेट बचा है।
बॉस ने भारी मन से कहा - भेजो। इसे भी देख लें। शायद मेरा नसीब अच्छा हो।
एक दुबला-पतला साधारण शक्ल-सूरत वाला नौजवान दाखिल हुआ। उसके चेहरे पर आत्मविश्वास की चमक झलक रही थी।
बॉस ने एक हजारवीं दफ़े सवाल किया - क्या तुम्हें यकीन है कि तुम्हारे पास मेरे सवाल का जवाब है?
नौजवान ने सीना ठोंक कर जवाब दिया - यस सर।
बॉस ने जम्हाई ली - तो बताओ।
नौजवान ने बताया - सर, मैं किसी भी टॉपिक पर मैक्सिमम दो घंटे भाषण दे सकता हूं। सर, यह तो हुआ पैदाइशी टैलेंट।

Wednesday, February 17, 2016

विदूषक बनाम खलनायक!

-वीर विनोद छाबड़ा  
दि ग्रेट डिक्टेटर - चार्ली चैपलिन की सबसे कामयाब और उद्देश्यपूर्ण फिल्म है।
यह चैपलिन की पहली बोलती फिल्म भी थी। हालांकि फिल्म का एक अच्छा हिस्सा साइलेंट है, चैपलिन की पिछली फिल्मों की तरह।
१९४० की यह फिल्म चैपलिन ने उस दौर के एक वीभत्स सोच के जर्मन नस्लवादी और खब्ती किस्म के इंसान एडॉल्फ हिटलर का मखौल उड़ाने की ग़रज़ से बनाई थी, जिसके सनकपन ने दुनिया को दूसरे विश्वयुद्ध में धकेला था।
लेकिन चैपलिन को कई तरह का भय था। ऐसा न हो बजाये हिटलर के उनका और उनकी फिल्म का मखौल उड़े। और नाज़ी सोच के लोग उनको दुनिया से उड़ा दें।
इस सिलसिले में उन्होंने एक लंबा रिसर्च भी कराया। अपने दोस्तों से सलाह ली।
कई ने मना किया कि रिस्क है। हो सकता है कि कई देशों में यह फिल्म प्रतिबंधित हो जाए। नाज़िओं के समर्थकों और विरोधियों के बीच भीषण दंगे भी हो सकते हैं। युद्ध की विभीषिका झेल रहा यूरोप ज्यादा बड़े संकट में आ जाये। यह भी संभव है कि इस युद्ध में नाज़िओं की जीत हो और चार्ली चैपलिन को सूली पर चढ़ना पड़े।
मगर तमाम तरह से डराने वालों की सलाह को दरकिनार करते हुए उन्होंने अपने मित्र डगलस फेयरबैंक्स की सलाह पर फैसला किया कि दुनिया के महाखलनायक का मुक़ाबला उसी की शक्ल का दुनिया का महाविदूषक करेगा। ऐसा करना उनका फ़र्ज़ है और मानवता व सच की सेवा भी। जान जाती है तो जाए। संसार की सबसे बड़ी घटना के तौर पर ज़माना इसे याद रखेगा।

Tuesday, February 16, 2016

हम मुंह से नहीं, नज़रों से पीते हैं।

- वीर विनोद छाबड़ा
एक्सीडेंट्स से हमारा पुराना नाता है। कई बार एक्सीडेंट हुए। लेकिन हर बार बच गए, अगले एक्सीडेंट के लिए।

वो ३१ दिसंबर, १९९६ की शाम थी। सर्दी पूरे शबाब पर थी। देर शाम का वक़्त था। चिराग जल उठे थे। कई लोग नए साल का जश्न मनाने के लिए शाम होते ही सरूर में आ चुके थे। दफ़्तर का काम समेट कर हम घर लौट रहे थे। रास्ते में पॉलीटेक्निक के कुख्यात मोड़ से हम गुज़रे ही थे - ज़िंदगी एक सफ़र है सुहाना…
अचानक हम किसी मजबूत चट्टान से टकराए। हमारी आंखों के सामने अंधेरा छा गया। स्कूटी का हैंडल हमारे हाथ से छूट गया। हमने हवा में कई कलाबाजियां खायीं। और फिर धड़ाम से ज़मीन पर आ गिरे। लगा किसी ने पटक दिया है।
इस बीच हमें यमराज जी हो-हो कर हंसते नज़र आये। एक किनारे चित्रगुप्त जी हाथ में पोथा-पत्री लिए खड़े दिखे। स्वर्गलोक के तमाम देवी-देवता दोनों हाथ में पुष्प लिए दौड़े चले आये कि कोई अपना बंदा तो नहीं आया। नरक वाले भी भयंकर अट्टहास कर रहे थे - आजा मेरी गाड़ी में बैठ जा। अनेक चांद-सितारों के दर्शन भी हुए।
यह नाना प्रकार के दृश्य हमें क्षणिक बेहोशी के दौरान दिखे। यह तो अच्छा हुआ कि हमने जोश नहीं खोया। वरना एक बार यमराज जी के हत्थे चढ़ गए होते तो वापसी नामुमकिन हो जाती। बहरहाल, हम धड़ाम से गिरे और अगले ही पल उठ बैठे। इससे पहले कि हम सवाल करते कि यह कौन सी जगह है और यह सब कैसे हुआ, एक साहब ने बताया कि आप ज़मीं पर हैं और हमें उन्होंने अहमक़ और गलीज़ सूअर से टकराते देखा था। 
हमें चोट काफी लगी थी। घुटने, हथेलियां, कोहनियां और ठोड़ी छिल गयी थी। हमें महसूस हो रहा था कि हमारे कई दांत हिल हैं। जबड़ा भी दर्द कर रहा है। और यह सब तब हुआ जबकि हम हेलमेट धारण किये हुए थे। एक साहब ने हेलमेट उतारने में मदद की। हेलमेट के सामने बड़ा सा छेद था। शायद किसी नुकीले पत्थर ने घुसने की कोशिश की थी। शुक्र है कि आर-पार नहीं हुआ, वरना माथे पर भी गहरी चोट होती। हो सकता है कि ज़िंदगी से हाथ धो बैठे होते और किसी नरक में अगर हज़्ज़ाम न होते तो किसी देवता के दफ़्तर में बाबूगिरी करते होते।
बहरहाल, हम लंगड़ाते हुए घर पहुंचे। दो नौजवान हमें घर तक छोड़ने आये। हमारी हालत देख कर पत्नी को हैरानी हुई हम ज़िंदा कैसे हैं?

Monday, February 15, 2016

खुजलीवाले की खुजली।

-वीर विनोद छाबड़ा
बंदे के घर के बाहर बालू-मोहरंग गिरी देखी तो पिछली गली के नुक्कड़ वाले प्रेमीजी को खुजली शुरू हो गयी। अभी पिछले ही महीने रसोई में टाईल्स लगीं थीं। लगता है टॉयलेट लीक हो गया है या फिर गूं वाले विज्ञापन का असर।
मांस-मच्छी खाएंगे तो दिन-भर लोटा लेकर दौड़ेंगे ही न! कभी लीकेज तो कभी जाम। फिर सरकारी बाबू हैं, जुगाड़ लगा कर सब्सिडी पा लिए होंगे।
बंदा प्रेमीजी के तन-बदन में अक्सर होने वाली खुजली और दूसरों को खुजलाने की आदत से परिचित हैं। फिर भी बंदे ने ऐसे चिपकू खड़ूस को एकदम से भगाना उचित नहीं समझा। आखिर विरासत में मिली आदर-सत्कार संस्कार की परंपरा भी कोई चीज़ है।
प्रेमीजी तीखी नज़र से मुआयना करते हैं। सुना मकान बनवा रहे हैं? यह पूछते हुए वो मकान के अंदर घुस गए।
बंदे के जी में आया, कमबख्त को दो अदद रसीद दूं कान नीचे। देख रहा है, निर्माण हो रहा है। फिर भी पूछ रहा है। अंधा कहीं का।
प्रेमीजी के मुंह में पेचिश लगी है...अच्छा, तो यूं न कहिये कि ऊपर कमरा बनवा रहे हैं। आपको खुद तो ज़रूरत है नहीं। लगता है, किरायेदार रखेंगे। लेकिन बहुत सोच समझ कर रखियेगा। आजकल किरायेदार ही लूट- पाट, चोरी-डकैती, हत्या वगैरह कर रहे हैं। हम तो हर तीसरे महीने बदल देते हैं। अब तो अपने भी लुटेरे होने लगे। किसी का क्या भरोसा?
लेकिन प्रेमीजी की असलियत तो बंदा जानता है। एक नंबर के लीचड़ हैं। ऐसा वाहियात डिज़ाइन है इनके घर का कि काकरोच भी वहां तौबा करे। न हवा, न पानी। सीवर तो अक्सर चोक ही रहता है। धूम्रपान, मदिरापान और नॉन-वेज की बंदिश अलग से। सुबह-दोपहर कुकुर भांति सूंघते फिरें। कोई जिए तो कैसे? बड़े-बड़े चोर-डकैत किरायेदार भी तौबा करें।  
प्रेमीजी धाराप्रवाह खुद से सवाल-जवाब कर रहे हैं। ईंटा कहां से लिया? अच्छा नही है। हमसे कहे होते। हमारे दामाद के दोस्त के भाई का भट्टा है। सस्ता दिलवा देते। ये सीमेंट खजुआ बेकार है। टीएंडटी का लेते, बिलकुल लोहा-लाट। सरिया…प्रेमीजी नुक्स पे नुक्स निकाल रहे हैं। बंदे ने टीवी की आवाज़ ऊंची कर दी। न सुनो न जी जलाओ। याद नहीं प्रेमीजी कब तक पोस्टमार्टम करते रहे।  
अचानक प्रेमीजी ने रिमोट से टीवी बंद कर दिया। आप सुन रहे हैं न कि हम क्या कह रहे हैं। 
बंदा हड़बड़ा जाता है। प्रेमीजी ने एक और पांसा फेंका। प्रेमीजी वास्तु-शास्त्र पर उतर आये। एंट्री लेफ्ट से लें। दीवार चार इंची नहीं, नौ इंची। टॉयलेट बायें लें और किचेन पीछे…प्रेमीजी ने पूरा नक्शा ही बदल डाला। बंदे ने अंदाज़ा लगा लिया कि इनके हिसाब से चले तो एक लाख का चूना लगा समझो।

Sunday, February 14, 2016

सस्ते डॉक्टर के पास लोग आते ही नहीं।

- वीर विनोद छाबड़ा
मुद्दत पहले की बात है। एक दिन एक साईकिल वाले ने हमें पीछे से ठोक दिया। दायीं टांग पर चोट लगी।
पड़ोस के डॉक्टर के पास गया। मरहम पट्टी की उन्होंने। फिर ढेर खुली गोलियां दे दीं।
हमने पूछा - इसमें क्या क्या है?

डॉक्टर ने कहा - आम खाईये, पेड़ मत गिनें।
हमने कहा - बताना ज़रूरी है। हमें कुछ दवाएं सूट नहीं करती हैं।
डॉक्टर साहब को ख़राब लगा - हमारी दवाएं सबको सूट करती हैं। आपको भी करेंगी। पहले खाईये। प्रॉब्लम हो तो बताईये।
परचा भी उन्होंने नहीं दिया। हमने उनकी दवा खाई, चार दिन तक। रोज़ डेढ़ सौ रुपया फीस लेते थे। उस ज़माने के हिसाब से बहुत ज्यादा थी फीस। चोट में कोई फर्क नहीं पड़ा। गहरी होने लगा। दर्द भी बहुत बढ़ गया। टांग भी अकड़ सी गयी। उठने-बैठने में दिक्कत होने लगी। दवा खाने के बाद काफ़ी देर तक घबड़ाहट भी होती थी। 
हम थोड़ी दूर के दूसरे डॉक्टर के पास गए।
उन्होंने हमें दाढ़ी साफ़ करने का हुक्म दिया। फिर एक विटामिन की गोली सुबह-शाम तीन दिन तक। एक पेन किलर ज़रूरत पड़ने पर।
हमारी टांग पर भालू की तरह बाल थे।
उन्होंने सलाह दी। नए ब्लेड से शेविंग कर लो। घाव को गुनगुने पानी से धो लो। सोफ्राडेक्स क्रीम लगाओ और पट्टी और कॉटन की पैकिंग रख लो। फिर पेपर टेप से चिपका लो। रोज़ सुबह शाम तीन दिन तक करो।
फीस सिर्फ़ तीस रूपए।

Saturday, February 13, 2016

मां तुझे सलाम।

- वीर विनोद छाबड़ा
हमारे एक मित्र हैं अशोक दुबे। कांग्रेस के कर्मठ और ईमानदार नेता दिवंगत अधीर दुबे जी के पुत्र।
अधीर दुबे जी दो बार कांग्रेस के एमएलसी रहे हैं। एनडी तिवारी जब सीएम बने थे तो दुबे जी ने उनके लिए सीट खाली की थी।
उन दिनों चुनाव में उन्हीं का टिकट फाईनल होता था जिसके लिए दुबे जी हरी झंडी दिखाते थे। इंदिरा जी के बहुत करीबी दुबे जी ताउम्र पक्के गांधीवादी रहे। अपने लिए न कमाया और न बनाया। पुत्रों के लिए भी कुछ नहीं किया। सब अपने पैरों पर खड़े हुए।
दुबे जी ने अपनी विधवा पत्नी श्रीमती मोहिनी दुबे जी के लिए कुछ भी नहीं छोड़ा। लेकिन खुद्दार पत्नी को यकीन था कि पेंशन तो है ही। उसी पर निर्वाह करेंगी। मगर ट्रैजेडी यह रही कि कांग्रेस को ज़िंदगी अर्पण कर देने वाले दुबे जी पेंशन योजना से वंचित रहे। दुबे जी मार्च १९९० में ब्रम्हलीन हुए थे और तत्कालीन नियमों के कारण पेंशन योजना से आवरित नहीं हो पाये। यह बात पुत्र-पुत्रियों ने मां को नहीं बताई ताकि उन्हें दुःख न हो।
सभी पुत्र मिलकर उन्हें हर माह तीन हज़ार रूपये देते रहे। यह रख ले मां, बाबू जी की पेंशन आई है। मां खुश हो जाती। हज़ार बार माथे को लगाती और चूमती कि पति की कमाई आई है। पाई पाई का हिसाब रखतीं। नाती-पोतों को दुलारतीं और उन पर दिल खोल कर खर्च करतीं। शादी आदि उत्सवों में अपना हिस्सा देतीं। बेटों को डांट लगातीं कि वो दो रुपया दिए थे उसका हिसाब दो। यह पार्टी को समर्पित मेरे कर्मठ पति की ईमानदारी की कमाई है। इसके एक एक पैसे पर मुझे गर्व है। इन पर सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरा ही हक़ है।
इन पैसों में से वो अपनी सेवा करने वाली आया को भी दो सौ रूपए महीना दिया करती थीं। जबकि वास्तव में उसका मेहताना १५०० रूपए था। बाकी १३०० रूपए पुत्र दिया करते थे। आया को सौगंध दिला रखी थी कि असलियत माताजी के सामने कभी नहीं आये।
लेकिन एक दिन वो हो गया जिसे पुत्रों ने पिछले कई वर्षों से मां से छुपा रखा था। दोनों राज एक के बाद एक खुल गए। 

Friday, February 12, 2016

आदत से मजबूर।

- वीर विनोद छाबड़ा
यह बात उन दिनों की है जब सिगरेट, अख़बार और टॉयलेट का ज़बरदस्त कनेक्शन हुआ करता था। एक दिन पत्नी ने अंकुश लगा दिया। शर्म नहीं आती, बच्चे बड़े हो रहे हैं। ग़लत प्रभाव पड़ेगा।

हमारे घर से करीब सौ मीटर पर गुमटी थी। सुबह चाय-शाय पीने के बाद वहीं चले जाते थे। दनादन एक सिगरेट फूंकी और भागे सीधा घर। रास्ते में कोई मिल गया तो चलते-चलते टाटा बोल दिया- गुरू आज नहीं कल मिलना। ज़बरदस्त लगी है।
कुछ जानने वाले तो हाथ हिला कर आगे निकल लेते - अपना भी यही हाल है।
यों लगता बड़ा ख़राब था और डरते भी थे कि ऐसा न हो कि रास्ते में अंडरवियर पायजामे सहित खराब हो जाए।
तब हमने नया तरीक़ा निकाला। पंद्रह मिनट पहले ऑफिस पहुंच, इस उम्मीद में कि टॉयलेट खाली मिलेंगे। लेकिन हमें न मालूम था कि आगे की दुनिया भी पिछली दुनिया से कम नहीं है। बीवी से डरने वालों से भरी हुई। ऑफिस में दो ब्लॉक होते थे। एक में सात मंज़िलें और दूसरे में पंद्रह। हर फ्लोर पर चार-चार। कोई भी खाली नहीं। हर शाख़ पे उल्लू बैठा है।
ठाठ तो साहब लोगों के थे - अटैच। मगर वो भी फुल्ल। हमने सर्च किया कि कोई तो होगा पहलवान, जो बीवी से नहीं डरता होगा। देखें किसमें कितना है दम? आख़िर एक मिल ही गया। मगर वैसा नहीं जैसा हमने सोचा था। उसकी पत्नी दूसरे शहर में रहती थी। लेकिन हमें उससे क्या मतलब? अपना उल्लू सीधा होना चाहिए। आते भी वो देर सवेर थे। अपना काम तो हो गया। महीनों यह सिस्टम चला।