Wednesday, May 18, 2016

मार दिया जाए....गर्ल लक्ष्मी छाया।

-वीर विनोद छाबड़ा
'मेरा गांव मेरा देश' (१९७१) की स्क्रिप्ट आशा पारिख ने जब पढ़ी थी तो उन्हें अहसास हुआ कि यह फिल्म उन्हीं के लिए है। निर्देशक राजखोसला का भी यही ख्याल था। लेकिन फिल्म का बनना नदिया की धार है। जिधर मिले रस्ता, उधर मुड़े धारा। क्या बनाना चाहा और क्या बना। स्वयं निर्देशक राज खोसला भी हतप्रद थे। फ़िल्म सुपर-डुपर हिट हुई। मगर इसका श्रेय आशा को नहीं बल्कि एक कम जानी-पहचानी लक्ष्मी छाया को मिला।

यों तो इसके सभी गाने हिट थे, लेकिन जान बना यह गाना...मार दिया जाए या छोड़ दिया जाए...और इसे लक्ष्मी छाया पर फिल्माया गया था। बच्चा बच्चा जान गया था उसे। इसके अलावा दो और हिट गाने भी लक्ष्मी छाया के हिस्से आये....हाय शरमाऊं किस-किस को बताऊं अपनी प्रेम कहानियां…आया आया अटरिया पे कोई चोर....
बताया जाता है कि राज खोसला समझ गए थे आशा की बजाये अगर लक्ष्मी छाया के किरदार पर फोकस किया जाए तो फिल्म को ज्यादा फायदा होगा। यों कभी कभी ऐसा भी होता है कि बाज़ छोटे अदाकारों को परफॉर्म करने का मौका मिलता है तो बड़े-बड़े पीछे छूट जाते हैं। और यही फैक्टर फिल्म के हिट होने सा सबब बनता है। यों लक्ष्मी छाया की एक और छोटी सी पहचान थी। एनसी सिप्पी की रहस्यमई 'गुमनाम' (१९६५) में लक्ष्मी पर फिल्माया एक मास्क पॉप बहुत पॉपुलर हुआ था - जान पहचान हो, जीना आसान हो.…बरसों बाद ये गाना २००१ में रिलीज़ हॉलीवुड फिल्म 'घोस्ट वर्ल्ड'  की ओपनिंग में जस का तस रखा गया। बहरहाल इस हिट मास्क पॉप के बावजूद लक्ष्मी छाया नायिका की सहेली के छोटे-मोटे रोल से आगे नहीं बढ़ सकी। और मज़े की बात ये थी ये नायिका ज्यादातर आशा पारेख ही रही।
दुर्भाग्य को छुड़ाना मुश्किल होता है। मार दिया जाए....गर्ल लक्ष्मी छाया बेहतरीन परफॉरमेंस के बावजूद कोई तीर नहीं मार पायी। उसे 'रास्ते का पत्थर' में ज़रूर अच्छी फुटेज मिली। उसके नशे में हर वक़्त चूर लड़की के किरदार को क्रिटिक्स ने बहुत सराहा। इसमें अमिताभ बच्चन नायक थे और नवोदिता नीता ख्याणी नायिका। लेकिन बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड नाकामी ने लक्ष्मी छाया के अरमानों पर पानी फेर दिया। उसकी पहचान नायिका की सहेली से आगे नहीं बढ़ पायी।  
हर फ़िल्मी और गैर फ़िल्मी शख्स ये मानता था कि वो बहुत अच्छी डांसर तो है ही, उसमें ज़बरदस्त एक्टिंग पोटेंशियल भी है। डांसर-एक्ट्रेस का उन दिनों बोलबाला था। मगर वो हेलेन नहीं बन पायी। उसे सह-नायिका के बड़े रोल इसलिए भी नहीं मिले क्योंकि स्थापित नायिकाओं को डर था कि लक्ष्मी छाया की 'मेरा गांव...' जैसी परफॉरमेंस अगर रिपीट हो गई तो उन्हें तो ग्रहण लगा समझो। 

Tuesday, May 17, 2016

वो शाम कुछ अजीब थी।

- वीर विनोद छाबड़ा
जब भी यूपी बोर्ड का इंटरमीडिएट और हाई स्कूल का रिजल्ट आता है, हम पुराने दौर में चले जाते हैं।

उन दिनों रिजल्ट अलग अलग आया करते थे। हमें याद है जब हाई स्कूल का रिजल्ट आया था। सन १९६५ का जून महीना। शाम का समय था। सुबह से ही टकटकी लगाए बैठे थे। एकाएक शोर मचा। हम पलक झपकते ही तिमंजिले से नीचे आ गए। सब अख़बार वाले पर झपट पड़े थे। याद नहीं कि अख़बार अठन्नी का था या एक रूपए का। लेकिन वास्तविक मूल्य कम होता था। ब्लैक में बिका करता था। बहरहाल हमने भीड़ को चीरते हुए अख़बार खरीदा। भागे घर की ओर। हमारे पीछे-पीछे आठ-दस लोग और थे। कुछ मोहल्ले के और कुछ बाहर के। सबको मुफ़्त में रिजल्ट देखना था। सब घुस गए अख़बार में। पहले मैं, पहले मैं।
एक चीखा - मिल गया, मिल गया। दूसरा और तीसरा भी। हमें बहुत बाद में देखने को मिला। लेकिन हम नहीं चीखे। हमारा तो नाम ही नहीं था। न सेकंड डिवीज़न में और न थर्ड डिवीज़न में। फर्स्ट डिवीज़न देखने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता था। हमारे विद्यांत कॉलेज में मुश्किल से दो-चार होते थे।
हम बहुत उदास हो गए। सहसा किसी ने हमारी पीठ पर हाथ रखा - हार्ड लक। बट डोंट वरी। नेक्स्ट टाईम सही। वो हमारे पड़ोसी रमेश श्रीवास्तव थे। बाद में वो डॉक्टर बने।
हम रुआंसे होकर खिड़की के पास खड़े हो गए। बाहर आते-जाते और खुश होते हुए लोगों को देखने लगे। मां ने बड़बड़ाना शुरू कर दिया था। बड़ी बहन सांत्वना देने में लगी थी। छोटी वाली खुश थी। और मारो मस्ती। पिटाई तो ज़रूर होगी। आने दो पिताजी को।
थोड़ी देर में पिताजी भी आ गए। बहुत खुश खुश। ज़रूर बेटे ने बड़ा नाम किया होगा। लेकिन घर में पसरे सन्नाटे को देख कर वो समझ गए कि बेटे ने शर्मिंदा किया है।
बहुत देर तक कोई किसी से कुछ नहीं बोला था। फिर पिताजी ने बहुत उदास लहज़े में कहा - लगता है घर की प्रोग्रेस रुक गई है। साल भर पीछे चले गए हैं हम सब।

Monday, May 16, 2016

लल्लू जी के घर सियापा।

-वीर विनोद छाबड़ा
लल्लू जी आज फिर सुबह सुबह आ धमके। लटकता हुआ उदास चेहरा। पत्नी के शब्द बाणों से ही छिदे हैं। उनकी दुःखी आत्मा ने पलटी की। कल रात हम कर्नल रंजीत का पुराना नावल पढ़ रहे थे। इधर क़त्ल बस होने को ही था कि उधर बेगम हुंकारी कि बर्तन धोने जा रही हूं। जब दूध उबल जाये तो गैस बंद कर देना। हम अपनी धुन में थे। समझे कि पड़ोस में बर्तन धोने जा रही हैं। बस यही पूछ लिया। ज़लज़ला आ गया। हम कामवाली बाई हैं क्या? लाखों के दहेज़ का एक बार फिर हिसाब बता दिया। हमने लाख माफ़ी मांगी। चरण तक स्पर्श करने का विद सेल्फ़ी ऑफर दिया। मगर बेगम की ज़िद्द लॉक है। तमाम चाबियां लगाईं, लेकिन बेअसर। आज तो चाय भी नहीं बनी।
लल्लू जी की आंखों के साथ-साथ नाक भी भर आई। बंदा समझ गया कि लल्लू जी का अगला स्टेप उनका कंधा गंदा करना होगा। उन्होंने मेमसाब को ऊंचे स्वर में आर्डर दिया। बढ़िया सी चाय-शाये तो बनाओ।
उधर नेपथ्य में अप्रत्याशित गर्जना हुई। खुद बना लो। मुझे फुरसत नहीं है। बंदे का जी धकक् हो गया। यह तो अनहोनी है। लल्लू जी के घर की आग ने इधर भी आंच दिखाई है।  
बंदे ने हिम्मत की। लल्लू जी के लिए चाय बनाई। कुछ बिस्कुट उनके सामने प्रस्तुत किये। लल्लू जी बिस्कुट की ओर उंगली दिखाई। बंदा उनका आशय समझ गया। उनको आश्वस्त किया कि यह कुत्ते के खाने वाले नहीं हैं। लल्लू जी ने चाय में डुबो कर बेआवाज़ बिस्कुट खाए और सुड़कने के स्थान पर सिप करके चाय पी। इस दौरान चुप्पी रही। आख़िर दीवारों के भी कान होते हैं। 'चूं' करना भी महंगा साबित हो सकता है। फिर ज़माना भी सीसीटीवी का है। थोड़ी देर बाद लल्लू जी ने कलाई घड़ी देखी। दफ्तर का टाईम हो चला था। दबे पांव खिसक लिए। लेकिन लल्लू जी के चक्कर में बंदा पिस गया। उस दिन नाश्ता नहीं बना। भूखे ही दफ्तर जाना पड़ा।

Sunday, May 15, 2016

शुरुआती दिन।

- वीर विनोद छाबड़ा
बात हमारी युवावस्था की है। उन दिनों हम अपने शहर लखनऊ के प्रसिद्ध दैनिक 'स्वतंत्र भारत' में सिर्फ सिनेमा पर लेख लिखा करते थे। हम गेट पर बैठे परिचर को लेख पकड़ा कर चल देते थे।

एक दिन परिचर वहां उपस्थित नहीं था। हम हिम्मत करके भीतर चले गए। एक कमरा दिखा। भीतर एक झाड़ की तरह उगी सफ़ेद -काली दाढ़ी वाले सज्जन एक किशोर को डांट रहे थे। 
वो हमारी ओर मुख़ातिब हुए और वहां पहले से मौजूद किशोर की ओर ईशारा करते हुए बोले - इनसे मिलिए। आप हैं, मशहूर लेखक मुंशी प्रेमचंद। 'ईदगाह' कहानी की हु-बहु नकल कर लाये हैं।
वो किशोर बार बार उनसे माफ़ी मांग रहा था। उन सज्जन ने उस किशोर को इस ताक़ीद के साथ भगा दिया कि दोबारा से यहां मत आना। फिर उन्होंने हमसे पूछा - हां तो तुम क्या लाये हो?
हमने कहा - साल भर की फिल्मों का लेखा-जोखा। हमारे कई लेख आपके अख़बार में छप चुके हैं।
यह हमने इसलिए बताया कि ताकि हम पहले ही स्पष्ट कर दें कि हम कोई महान लेखक नहीं हैं। 
उन्होंने हमारे हाथ से पांडुलिपि ली। सरसरी निगाह डाली। और लेख को हमारी ओर वापस फ़ेंक दिया। इसी विषय पर हमारे पास गिरधारी लाल पाहवा जी का लेख पहले से ही चुका है।
उन दिनों गिरधारी लाल पाहवा जी मशहूर पत्रकार हुआ करते थे। 
हम मायूस हुए। लेकिन हिम्मत नहीं हारी - लेकिन सर एक बार देख लीजिये। दोनों में जो अच्छा लगे छाप दीजियेगा।
उन्होंने आंखें तरेरी - जानते हो कितने सीनियर हैं पाहवा जी।
लेकिन हम टले नहीं। इतनी मेहनत से लिखा लेख यों ही कैसे बर्बाद जाने देते - सर मेरा भी थोड़ा अनुभव...
अचानक वो उबल पड़े - अनुभव! कितनी आयु है तुम्हारी? ज्यादा से ज्यादा १८ साल या फिर १९ साल....
और उसके बाद अगले तीस मिनट तक वो हमें डांटते हुए 'अनुभव' पर धाराप्रवाह प्रवचन देते रहे। और हम सन्न खड़े सुनते रहे। फिर उन्होंने हमें गेट आउट वाले अंदाज़ में कहा - जाईये।
हम लगभग रुआंसे हो गए। लेकिन जाने से पहले एक चांस और लिया - ठीक है सर, आप न छापें मगर एक बार पढ़ तो लें। बड़ी मेहनत की है। 
उन्हें हमारे रुआंसेपन पर तरस आ गया। हमारी पांडुलिपि के पृष्ठ फिर पलटे और बोले - अच्छा है। लेकिन पाहवा जी से हमने विशेषतौर पर लिखवाया है। तुम  नवजीवन में दे दो। वहां छप जाएगा।
हमें थोड़ी संतुष्टि मिली। हम फ़ौरन नवजीवन पहुंचे। गेट पर अपना लेख दिया और चल दिए। तीन दिन बाद रविवार के दिन हमारा लेख छप गया। मेहनत सफल हुई। लेकिन सबसे बड़ा सबक यह मिला कि किसी अनुभवी विद्वान के सामने अपनी विद्वता नहीं बखारनी चाहिए।

Saturday, May 14, 2016

दो बीघा ज़मीन के बलराज।

-वीर विनोद छाबड़ा
दो साल हो गए, आसमान से पानी की एक बूंद नहीं टपकी है। किसान शंभू महतो के दो बीघे का खेत ज़मीदार के पास गिरवी है। ज़मींदार ने धोखाधड़ी करके उसे बेदखल कर दिया। पुरखों की ज़मीन है। शंभू तय करता है कि खूब मेहनत-मज़दूरी करेगा और क़र्ज़ अदा करेगा। वो कलकत्ता आता है। वहां वो 'हाथे ताने रिक्शा' है यानी आदमी को आदमी खींचता है। ज़िंदगी इतनी आसान नहीं है। हालात इतने विषम हो जाते हैं कि शंभू कुछ हासिल करने की बजाये सब कुछ गंवा बैठता है।

बिमल रॉय इस प्लाट पर फिल्म बना रहे हैं - दो बीघा ज़मीन (१९५३). शंभू के चरित्र के लिए उन्हें किसी दुबले-पतले परिश्रमी चेहरे की ज़रूरत है। ज़हन में कई एक्टर हैं। धार्मिक फिल्मों के त्रिलोक कपूर, ऐतिहासिक फिल्मों के जयराज और दीन-हीन व रोनी सूरत वाले नज़ीर हुसैन। मगर बात कुछ जमी नहीं।
एक दिन किसी ने बिमल दा के सामने बलराज साहनी को खड़ा कर दिया। थिएटर के आदमी। कुछ फ़िल्में भी की थीं। बीबीसी पर रहे थे और शांतिनिकेतन में प्रोफेसर थे। सूट-बूट के साथ टाई और फिर ऊपर से फर्र फर्र अंग्रेज़ी। बिमल दा को जैसे करंट लग गया। लाटसाहब नहीं मेहनती मज़दूर चाहिए।
अगले दिन बलराज ने रिक्शे वाले का मेक-अप किया। एक रिक्शा किराए पर लिया और बिमल दा के सामने खड़े हो गए। हांफते हुए और पसीने से तरबतर। बिमल दा हैरान हो गए। अरे बाबा, यही आदमी चाहिए। 
लेकिन कठिनाइयों का दौर तो अभी प्रारंभ होना था। शूटिंग शुरू हुई। झुलसाने वाली गर्मी, तपती सड़क और नंगे पांव बलराज 'हाथे ताने रिक्शा' खींचने के लिए तैयार खड़े हैं।
बेतरह भागदौड़ वाला शहर कलकत्ता। अगर पता चले कि शूटिंग चल रही है तो पूरे शहर की ज़िंदगी ठप्प। बिमल दा ने इसीलिए चुपचाप प्लान बनाया। कार में कैमरा कुछ ऐसा छुपाया कि किसी की दृष्टि न पड़े। 'एक्शन' सुनते ही बलराज रिक्शा लेकर सरपट दौड़।
 
तभी एक भारी-भरकम आदमी उन्हें रोकता है। पूरे अधिकार से रिक्शे पर बैठता है और बोलता है, फलां जगह चलो। लेकिन यह तो स्क्रिप्ट का हिस्सा नहीं! मगर बिमल दा कट नहीं बोलते हैं। चलने दो। रीयल्टी आएगा।
इधर बलराज ने रोल पाने के लिए थोड़ा रिक्शा चलाया ज़रूर था, लेकिन कभी इंसान को बैठा कर नहीं खींचा था। बहरहाल, उन्होंने आपत्ति नहीं की। वो रिक्शेवाले की खाल में घुस कर रिक्शेवाले को मात देने पर उतारू हो गए। माथे, चेहरे और शरीर के हर हिस्से से चूता बेहिसाब पसीना। बुरी तरह हांफ रहे हैं। थकान से टांगे कांप रही हैं। लेकिन बलराज रुकते नहीं हैं। कलाकार पर चरित्र सवार है। गंतव्य पर पहुंच कर मोटा सेठ जेब से चंद निकालता है। बलराज हथेली फैला देते हैं। वो उस राशि को देखते हैं। उनकी आंखों में चमक है। जीवन में पहली बार पता चला कि यंत्रणा से गुज़रना क्या होता है। बलराज का सीना गर्व से फूल गया। इधर कार में बैठे बिमल दा बोलते हैं - कट। बिमल दा बेहद खुश हैं। क्लासिक सीन शूट किया है।

Friday, May 13, 2016

मुश्किल में इंसान की मदद।

- वीर विनोद छाबड़ा
अपना शहर लखनऊ। गंगा-जमुनी तहज़ीब और इल्म-ओ-अदब का मरकज़ है। यहां लोग बहुत फुर्सत में होते हैं। रास्ता पूछिए तो घर तक छोड़ कर आते हैं। कलम की ज़रूरत पड़े तो किसी भी पान-बीड़ी सिगरेट की दुकान पर टंगी दिख जाएगी। सब ब्रांडेड कलम, तरह तरह की। और प्यास लगे तो भी दिक्कत नहीं है। नामी कंपनियों की ब्रांडेड वाटर बॉटल भी पान-बीड़ी की दुकानों में उपलब्ध हैं। 

खाने के सामान की तो इफ़रात है। कदम कदम पर ढाबे हैं। च्यास बुझाने का भी इंतज़ाम है। अवैध कब्ज़ा है तो क्या हुआ। सस्ते-मद्दे में दे रहा है। ई कोई वैट है और न कोई सरचार्ज। पंद्रह-बीस में पेट भर जाएगा। रेस्तरां में चले जायेतो ढाई-तीन सौ का बिल बन जाएगा। टेस्ट भी ढाबे जैसा चटपटा नहीं मिलेगा। लेकिन इस शहर की त्रासदी यह है कि अगर राह चलते मूत्र विसर्जन की ज़रूरत महसूस हो तो कोई माकूल जगह नहीं मिलेगी। शुगर और बढ़ी हुई प्रोस्ट्रेट ग्रंथी वालों सहित कई लोगों को तो नाक़ाबिले बर्दाश्त प्रेशर बनता है। रामभरोसे ही रहना पड़ता है। सुलभ शौचालय हैं तो लेकिन बहुत दूर-दूर।
ऐसे में करे तो क्या? कब तक रोके? किसी के घर का द्वार तो खटखटाने पर लेने के देने की पूर्ण संभावना है। कुछ सुनने को भी मिल सकता है। अमां घर से करके क्यों नहीं चले थे? थैली या खाली बोतल लेकर चला करो।
आदमी को अंततः बेशर्म बनना पड़ता है। मज़बूत दिल वाले किसी दीवार से लग लेते हैं। भीड़ भरे बाज़ार में तो कई गलियां हैं इस काम के लिए। आसपास का माहौल बदबू से हर समय गंधाता रहता है। वहां रहने वाले परेशान रहते हैं। बदबू से एलर्जी रखने वालों के लिए तो बहुत ही मुश्किल पैदा हो जाती है। दीवारों की नींव भी कमजोर हो जाती हैं।
मगर दीवार का सहारा या बदबूदार गलियां भी सबके बस की बात नहीं। इस मामले में हमने बड़े बड़े दिल वालों को भी कमजोर पाया है। कहते हैं - यार दिन दहाड़े बहुत शर्म महसूस होती है। कुछ लोगों को तो बड़ी जोर से लगी होने के बावजूद उतरती ही नहीं।

Thursday, May 12, 2016

पेजर का भी ज़माना था।

- वीर विनोद छाबड़ा
हमें याद आता है पेजर का ज़माना। नब्बे के दशक में बहुत मशहूर हुआ था। मैसेज भेजने का त्वरित साधन।
Pager with cover
टेलीफोन से इमर्जेंसी सूचना भेज दीजिये - जल्दी घर आओ, पिताजी अस्वस्थ हैं...
प्रेमिका हुकुम भेजती थी - डार्लिंग मेफेयर पहुंच कर टिकट लो, मैं पहुंच रही हूं...
कभी डांट भी पड़ती थी - ब्रेड-मक्खन लेने भेजा था तुम्हें। बच्चों को भूख लगी है। कहां हो तुम?...
ऐसे ही अनेक मैसेज भेजे जाते थे। बंदा किसी भी निकटवर्ती टेलीफोन बूथ या पीसीओ से संपर्क कर लेता था। एसएमएस प्रेषित करने का प्रारंभिक तरीका था यह।
सरकारी दफ्तरों में बड़े-बड़े अधिकारियों को मुफ्त में पेजर उपलब्ध कराया जाता था। काम कराने या करने की एवज़ में 'भेंट' स्वरूप भी दिया जाता था।
हमारे एक दोस्त की प्रेमिका ने गिफ्ट में पेजर मांगा। लेकिन वो ४२०० रुपया नहीं जुटा पाया। दोस्ती टूट गई।
हमारा एक सहकर्मी टॉयलेट के बहाने निकलता था और वहीं से फुर्र हो जाता। साहब ने उसे 'विशेष परिस्थिति' के अंतर्गत ऑफिशियली पेजर उपलब्ध करा दिया। बच कर कहां जाओगे? जहां भी हो फ़ौरन रिपोर्ट करो। 
यह था बहुत उपयोगी। छोटा सा आईटम। पैंट की जेब में रख लोग या बेल्ट के साथ बांध लो। हमारे कई मित्रों के पास था। कई बार पार्टी-शार्टी में लेट हुए तो मित्रों के पेजर पर घर से मैसेज आया - जल्दी घर भेजो इन्हें।
याद आता है १९९४ का मशहूर यूपी का गैस्ट हॉउस कांड। बहन मायावती की जान इसी पेजर के कारण ही बची थी। इसी के बाद तो बहन जी बीजेपी के सहयोग से पहली बार मुख़्यमंत्री बनीं थीं।