Sunday, May 29, 2016

आई-टॉनिक पत्रिका।

- वीर विनोद छाबड़ा
हमारे एक बुज़ुर्ग अधिकारी हुआ करते थे - बड़े साहब। दुबले पतले और छोटे कद के। सर पर बाल कम और आंखों पर पतले फ्रेम का आधा चश्मा। वज़न होगा महज़ ४५-४६ किलो का। पतलून बार-बार नीचे सरकती रहती। लोग कहते थे, कमर हो तो टिके न।

उम्र भी उनकी हो चली थी। दो साल बाद रिटायरमेंट था। लेकिन हमें लगता था कि इससे पहले ही वो दुनिया से कूच फ़रमा जायेंगे। सिगरेट हमेशा मुट्ठी में दबा कर पीते थे। धुरंधर अंग्रेजी भी बोलते थे। हमने उन्हें हमेशा फाईलों में गुम पाया। घर से आने-जाने के लिए एक अदद मोपेड थी - विक्की-२. यह किक से स्टार्ट हुआ करती थी।
सत्तर के दशक का मध्य था वो दौर। हमारे ऑफिस में कुल जमा तीन दो पहिया वाहन ही हुआ करते थे। उसमें यह विक्की भी थी। बहरहाल, बड़े साहब को हमने हमेशा चलती हुई विक्की पर पाया। ऑफिस पहुँचते तो चपरासी विक्की संभाल लेता। वही बंद करता और शाम को स्टार्ट करके बैठा देता। उधर घर में बेटा गाड़ी पर बैठा देता। उन्हें किक मारना मना था। एक ही किक में हांफ जाते। एक दिन सांस गले में अटक गई थी। बड़ी मुश्किल से लौटी थी। 
हम अक्सर सोचा करते थे कि अगर इस बीच तेज़ आंधी-तूफ़ान आ गया तो क्या होगा? हलके-फुल्के बड़े-साहब तो उड़ ही जाएंगे। लेकिन हमारी इस आशंका को एक सीनियर ने दूर कर दिया। इनकी विक्की के अगल-बगल दो बैग लटके दिखाये। हर बैग में दो-दो ईंट रखी हुई थीं।
एक दिन हमें पे-सर्टिफिकेट की ज़रूरत पड़ी। संबंधित बाबू ने बना कर हमें थमा दिया। बड़े साहब से दस्तखत खुद ही करा लो। लंच का टाईम था और हमें थोड़ी जल्दी थी। और फिर जवानी का जोश। घुस गए हम उनके कमरे में। फ़ाईलों के ढेर के बीच से उठता धुंआ उनकी मौजूदगी का अहसास करा रहा था। हम क़रीब गए तो देखा बड़े-साहब कुर्सी पर चौकड़ी मार कर बैठे हैं और उनकी गोद में एक 'रंगीन तस्वीरों' वाली पत्रिका है। वो बड़ी तल्लीनता के साथ मुस्कुराते हुए नज़रें गड़ाए उन्हें निहार रहे थे।

हमें इस पत्रिका के बारे में जानकारी थी। यह चिकने पृष्ठ वाली विदेशी पोर्नो पत्रिका थी। जहां अंग्रेज़ी की आम देशी पत्रिका दो या तीन रूपये की होती थी वहीं यह सौ रूपए की होती थी। लंच टाईम में बड़े-बड़े अफ़सरान कमरे में सिटकनी चढ़ा कर इसे निहारा करते थे। अचानक बड़े साहब को हमारी मौजूदगी का अहसास हुआ। उन्होंने हड़बड़ा कर फ़ौरन पत्रिका बंद की और एक फ़ाईल के नीचे दबा दी। और तनिक हकलाते हुए पूछा - क्या है?
हमने पे-सर्टिफिकेट उनके सामने कर दिया। उन्होंने फ़ौरन दस्तखत किये और कुछ समझाने वाले अंदाज़ में बोले - बेटा, लंच के टाईम में दरवाज़ा नॉक करके आया करते हैं। और हां, जो देखा, बताना नहीं किसी को।
और हमने उनका मान रखा। जब तक वो रिटायर नहीं हुए, हमने किसी को कुछ भी नहीं बताया। बाद में पता चला कि पत्रिका में छपी रंगीन तस्वीरों को देखने से कई लोगों को आई-टॉनिक तो मिलता ही है, पॉजिटिव एनर्जी भी बढ़ती है। 
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29-05-2016 mob 7505663626
D-2290 Indira Nagar
Lucknow - 226016

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