Friday, August 7, 2015

जब वो जूता चोरी की रपट लिखाने पहुंचे।

-वीर विनोद छाबड़ा
पड़ोसी मित्र का चेहरा उतरा हुआ है। उन्होंने बताया।
कल ही नया-नया जूता खरीदा था। पूरे १९९५ का। पैंट-कमीज़ की सिलाई सहित टोटल कीमत से ज्यादा का।
प्रभात खबर 
आज सुबह मंदिर गए। बहुत भीड़ भी नहीं थी। जूता बाहर द्वार पर उतार दिया। भगवान जी के दर्शन किये। ढेर खुशियां और दौलत मांगी।
वापस आये तो दिल धक्क सा हो गया। जूता गायब हो गया। या यूं कहें चोरी हो गया। बदले में ये पुरानी चप्पल छोड़ गया।
हे भगवान, यह कैसा अंधेर? अंदर आप और बाहर चोर घूम रहे हैं। सिपाही का कहीं अता-पता नहीं।
पास की पुलिस चौकी गए। पुलिस नदारद।
एक भिखारी खड़ा था वहां। बोला, मुंशी जी सुलभ शौचालय गए हैं, निपटने।
पूछा - तुम यहां ड्यूटी देने आये हो?
भिखारी बोला - नहीं। हमें तो मंदिर के सामने दिन भर भीख मांगनी है। सर्टिफिकेट लेने आया हूं। मुंशी जी यहां खड़ा कर गए हैं। तुम्हें क्या चाहिए? पहले तो कहीं देखा नहीं। भीख का सर्टिफिकेट या पॉकेटमारी का!
हम यह सुन कर दंग रह गए। जिसकी दुम उठाओ वही मादा। हमने कहा - नहीं हमारा जूता चोरी हुआ है। रपट लिखाने आये हैं। क्या तुम किसी जूता चोर को जानते हो?
भिखारी हंसा - जूता चोर? मुंशी जी का खुद का जूता गए दिन चोरी हुआ है, यहीं चौकी से। बाहर खटिया डाले सो रहे थे।
इत्ते में मुंशी जी आ गए। हमने अपनी व्यथा बताई।
मुंशी जी बोले - रिपोर्ट तो थाने में दीवान जी लिखेंगे।
फिर मुंशी ने सौ टके की बात बताई - रिपोर्ट लिखाने से कुछ नहीं होने वाला। लाखों की चोरी चकारी, हत्या, डकैती, लूटपाट की खोज-खबर तो कर नहीं पाते हम। आपके १९९५ रूपए जूते की क्या बिसात। एक काम करो। शाम को आप फिर मंदिर आओ। कोई न कोई जुगाड़ तो हो ही जायेगा। आज नहीं तो कल। हो सकता है आपका जूता चुराने वाला जूता चोर रहा ही न हो आप जैसा कोई भुक्तभोगी हो।

पडोसी की विपदा पर हमें अपनी विपदा याद आई - हमारे भी दो जोड़ी जूते मंदिर से चोरी हो चुके हैं। अभी महीना भर भी तो नहीं हुए हैं चोरी हुए। चार दिन हुए हैं नया खरीदे। पूरे १४९५ का। गाढ़े खून पसीने की कमाई का है।

Thursday, August 6, 2015

सिल्वर जुबली - सपने में दिखती है!

-वीर विनोद छाबड़ा
मुझे याद आता है ६० और ७० के दशक। मनोरंजन का एक मात्र साधन सिनेमा। ठसा-ठस भरे सिनेमा हाल।
बढ़िया फ़िल्म हो बात ही निराली। सौ दिन और फिर २५ हफ़्ते यानी सिल्वर जुबली। बहुत शानदार फ़िल्म की गोल्डन जुबली। सौ दिन चली फ़िल्म हिट की श्रेणी में गिनी जाती। अख़बारों में बड़े-बड़े पोस्टर छपते। सिनेमा घरों को कागज़ की रंगबिरंगी झंडियों से सजाया जाता। रात झिलमिल-झिलमिल रंगीन बत्तियां जलतीं। दर्शकों में मिठाई बटती।

हमें याद है लखनऊ के बसंत टॉकीज़ में 'आई मिलन की बेला' के सौ दिन पूरे होने पर दो लड्डू का पैकेट मिला था। इसे पाने के चक्कर में हम चौथी बार फ़िल्म देखने गए थे।
सिल्वर जुबली वाली फिल्म सुपर हिट होती और गोल्डन जुबली वाली सुपर डुपर हिट। साल में चार-पांच फ़िल्में ही वास्तविक सिल्वर जुबली तक पहुंचतीं। घिसट-घिसट कर जुबली तो कई मना लेतीं। किसी शहर में किराये पर सिनेमा हाल का इंतज़ाम कर लिया जाता था। मुगल-ए-आज़म, बॉबी, पाकीज़ा, दुल्हन वही जो पिया मन भाये, अंखियों के झरोंखों से आदि अनेक फिल्मों की गोल्डन जुबली तो हमने अपने शहर में ही देखी है।
सिनेमा हालों में बाक़ायदा शोकेस में १०० दिन, सिल्वर जुबली और गोल्डन जुबली की ट्रॉफियां सजा कर रखी जाती थीं।  
टीवी और फिर वीसीआर की आमद और नई-नई फिल्मों के पायरेटेड कैसेट की वज़ह से फिल्म बनाने वाले और दिखाने वालों का धंधा चौपट हो गया। सिनेमाहाल बंद होने लगे। 
मल्टीप्लेक्स और सिनेप्लेक्स का ज़माना आ गया। सिनेमा को नयी ज़िंदगी मिली। लेकिन सिंगल स्क्रीन सिनेमाहाल वालों को नहीं। हमारे शहर में २८ की  जगह आठ-नौ ही रह गए हैं। फ़िल्म का रन हद से हद से पांच-छह हफ़्ते। सौवां दिन मनाना सपना हो गया। बस गिना जाता है कि पहले दिन बॉक्स पर कलेक्शन और हफ़्ते भर का कलेक्शन कितना हुआ? आल इंडिया सौ करोड़ या दो सौ या तीन सौ करोड़। नफ़ा-नुकसान तो लागत के सापेक्ष।
सिल्वर जुबली और गोल्डन जुबली का पेटेंट तो शादी-शुदा ज़िंदगी के नाम हो गया।
यों जश्न मनाने का बहाना तलाशने वाले कुछ लोग शादी के १०० दिन पूरे होने पर भी जश्न मना लेते हैं। और कुछ सरकार के १०० दिन पूरे होने पर।
हां, एक अपवाद है, १९ अक्टूबर १९९५ को रिलीज़ हुई  थी 'दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे'.

Wednesday, August 5, 2015

और रावण नारा लगा रहा था - इंक़लाब, ज़िंदाबाद!

-वीर विनोद छाबड़ा
आज मैंने एक व्यक्ति देखा। ऊंचा मज़बूत कद-काठी। घनी और ऊंची उठी बड़ी काली मूंछें। आवाज़ भी भारी और बुलंद। बिलकुल वही है यह। मैं डाउन मेमोरी लेन में चला गया।

१९६० के आस-पास की बात है। लखनऊ के आलमबाग का वेजिटेबल ग्राउंड का इलाक़ा। रेलवे क्वार्टर्स की कॉलोनी। ज्यादातर पार्टीशन से आये रिफ्यूजी। यों भी करीब के चंदर नगर का इलाक़ा रिफ्यूजियों से भरा पड़ा था।
हर साल यहां रामलीला होती थी। बेहद भव्य और उस ज़माने के आधुनिक तकनीक से लैस। नए-नए प्रयोग भी होते रहते। इसमें रावण का पार्ट करने वाले का नाम था ओम प्रकाश। (नोट -उनका नाम हमें बहुत बाद में पता चला। बस रावण के नाम से ही पहचान थी।) हुलिया ठीक वही जो मैं ऊपर बयां कर चुका हूं। यह ओम प्रकाश दशरथ भी बनते थे। उनका व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि एक हनुमान जी को छोड़ रामलीला के बाकी किरदार करने वाले आर्टिस्ट दब जाते थे।
अस्सी के दशक में जब रामानंद सागर का रामायण सीरियल दूरदर्शन चल रहा था। जब मैंने रावण बने अरविंद त्रिवेदी को देखा तो बेसाख्ता मेरे मुंह से यही निकला था - अपनी वेजिटेबल ग्राउंड वाले ओम प्रकाश होते तो कुछ और बात होती।
मैं भूल नहीं करता तो १९६० के आस-पास रेल कर्मचारियों ने ज़बरदस्त हड़ताल की थी - रेल का चक्का जाम।
चंदर नगर मार्किट में हम रहते थे। हमारे घर के सामने ही कैरिज एंड वैगन वर्कशॉप का रनिंग शैड था जिसका आखिरी सिरा आलमबाग चौराहे पर ख़त्म होता था।
वो सुबह सुबह का टाइम था। चंदर नगर गेट के सामने ओम प्रकाश हड़ताल के पक्ष में धुआंधार भाषण दे रहे थे। वो रेल कर्मचारियों के बड़े और जुझारू नेता थे। ड्यूटी पर जा रहे वर्कशॉप कर्मचारियों की  भारी भीड़ उनके ओजस्वी भाषण को सुन रही थी। हम बच्चे लोग भी इसे तमाशा समझ आस-पास खड़े थे - रावण क्या ज़बरदस्त भाषण दे रहा है।

Tuesday, August 4, 2015

मास्टर निसार - अर्श से फर्श तक।

-वीर विनोद छाबड़ा
स्टूडियो में कागज़ के फूल का सेट लगा है। कई शॉट शूट होने हैं। गुरूदत्त का ड्रीम प्रोजेक्ट। खुद ही डायरेक्ट कर रहे हैं। फलां एक्स्ट्रा इस जगह होगा और फलां दूसरी जगह। इसको यह बोलना और उसको चुपचाप सिर्फ़ तमाशा भर देखना। और तुमको सिर्फ हंसना।
और हां तुम, दीवार की तरफ तुम्हारा मुंह क्यों है भाई? शॉट रेडी होने को है। मुंह इधर घुमाओ। गुरूदत्त खिजिया कर कहते हैं।

वो एक्स्ट्रा आर्डर का पालन करता है। चेहरा थोड़ा झुका है। वो गुरू से कुछ छुपाना चाहता है।
गुरू उसे ध्यान से देखते हैं। बड़बड़ाते हुए याद करते हैं। कहीं देखा है? कहां?
वो एक्स्ट्रा कुछ बोल नहीं पाता। उसकी आंखों से टप-टप आंसू टपकते हैं।
गुरू को सहसा याद आता है। अरे आप, मास्टर निसार! आप यहां कैसे?
गुरू के हाथ मास्टर निसार के पांव छूने के लिए बढ़ते हैं।
लेकिन मास्टर निसार उन्हें बीच में रोक लेता है। नहीं, नहीं। ठीक है। ठीक है। मैं इस लायक नहीं। रोज़ी रोटी की तलाश में  किस्मत ने यहां ला खड़ा किया है।
गुरू उन्हें गले लगा लेते हैं। नहीं मास्टर जी आप मेरे पूज्य हैं। आप एक्स्ट्रा का काम नहीं करेंगे। आप आराम से बैठेंगे बस।
मास्टर शंकित हो उठते हैं। बैठूंगा तो रोज़ी रोटी कैसे चलेगी?
गुरू शंका समाधान करते हैं। जितने दिन तक शूटिंग चलेगी। आप रोज़ आएंगे। इसी कुर्सी पर बैठेंगे। यही आपका काम है और इसके लिए आपको पेमेंट होगा।
यह थी गुरूदत्त की ग्रेटनेस।
और वो मास्टर निसार? वो थे तीस के दशक के मशहूर नायक मास्टर निसार। वो कलकत्ता के मदन थिएटर की खोज। प्रवाहवार उर्दू बोलना और गाने के लिए बहुत बढ़िया गला। यह खासियतें ही काफ़ी होती थीं उन दिनों किसी की किस्मत को परवाज़ चढ़ने के लिए। १९३१ में जहांआरा कज्जन के साथ उनकी जोड़ी 'शीरीं फरहाद' और 'लैला मजनूं' में हिट हो गयी। पब्लिक में उनके प्रति दीवानगी पागलपन की हद तक।
बाद में टॉकी इरा आया। मास्टर निसार का जलवा तब भी बरक़रार रहा। बहार-ए-सुलेमानी, मिस्र का खजाना, मॉडर्न गर्ल, शाह-ए-बेरहम, दुख्तर-ए-हिंद, जोहर-ए-शमशीर, मास्टर फ़कीर, सैर-ए-परिस्तान, अफज़ल, मायाजाल, रंगीला राजपूत, इंद्र सभा, बिलवा मंगल, छत्र बकावली, गुलरु ज़रीना आदि अनेक हिट फिल्मों के जनप्रिय हीरो निसार।
लेकिन ऊंचाई पर पहुंच कर खड़े रहना आसान नहीं रहता। किस्मत के रंग भी निराले होते हैं। सुनहरे दिन हवा हुए। कुंदन लाल सहगल नाम का एक सिंगिंग स्टार धूमकेतु का उदय हुआ। उसकी चमक के सामने मास्टर निसार फीके पड़ गए। वो करेक्टर रोल करने लगे और फिर छोटे-छोटे रोल से एक्स्ट्रा तक। अर्श से फर्श पर आ गए।

Monday, August 3, 2015

आग लगी हमरी झोंपड़िया में हम गावें मल्हार!

-वीर विनोद छाबड़ा
वो भी क्या सुखद दिन थे! पचास के दशक के आखरी दो साल और साठ के दशक की शुरुआत। हम लखनऊ के आलमबाग इलाके के चंदर नगर मार्किट के दुमंजिले पर रहते थे। खिड़की से ही आलमबाग का चौराहा साफ़-साफ़ दिखता था। वहीं होता था चार टांगों पर खड़ा एक विशाल ट्रांसफार्मर। 

याद पड़ता है पूरे चंदर नगर और आस-पास के कई मोहल्लों को यहीं से बिजली की सप्लाई होती थी। मार्टिन एंड बर्न नाम की एक प्राइवेट कंपनी के ज़िम्मे था लखनऊ में बिजली बनाना और सप्लाई का काम। ऐशबाग़ और तालकटोरा दो तापीय पावर हाउस थे। बिल जमा करने रेसीडेंसी तक दौड़ लगानी पड़ती। टाइम पर बिल जमा नहीं हुआ तो अगले दिन बिजली कट।
कभी-कभार ही जाती थी बिजली। जाती भी तभी जब ट्रांसफर दगता, ज़बरदस्त ब्लास्ट के साथ। चौबीस घंटे से कम वक़्त नहीं लगता था इसे बदलने में। गर्मी के दिनों में तो जान निकल जाती। लेकिन जनता भी कमाल के सब्र वाली। चूं तक न करती। विकल्प भी बहुत थे। हाथ से झलने वाले तरह-तरह के पंखे। और फिर जनता इतनी सुविधा परस्त भी नहीं हुई थी। दिन किसी तरह कट जाता और रात के लिए तो वैसे भी खुली छत। ठंडी-ठंडी हवा।
बहरहाल ट्रांसफार्मर का दगना बहुत बड़ा इवेंट माना जाता। हम बच्चे ही नहीं तमाम बड़े-बूढ़े जमा हो जाते। जले ट्रांसफार्मर को टकटकी लगाए रस्सियों के सहारे उतारते और फिर दूसरे या तीसरे दिन नया या उसी को मरम्मत होकर चढ़ते देखना। यह एक जटिल और कौतुहलपूर्ण प्रक्रिया होती। और जैसे ही बत्ती आती एक साथ कई मोहल्लों से ख़ुशी का शोर उठता। हम आस-पास खड़े लोग खूब जोर-जोर से तालियां बजाते। हाथ मिला कर बिजली कर्मियों को लोग शुक्रिया कहते। ऐसे ही आत्मिक सुख का अहसास टूटे तार को जोड़ते हुए देखने पर भी मिलता।
फिर चारबाग़ आ गए, रेलवे कॉलोनी में। वहां बिजली की दिक्कत खास नहीं रही। रेलवे की सप्लाई थी। लेकिन आस-पास के मोहल्लों में जब कभी ट्रांसफार्मर दगता तो पहुंच जाते। घंटों खड़े नज़ारा करते। भूख का अहसास तक न होता।
बड़े हुए। संयोग से नौकरी बिजली के दफ़्तर में मिली। एक से बड़े एक ट्रांसफर और विशालकाय पावर हाउस देखे। लेकिन जले ट्रांसफार्मर की जगह नया लगते देखने का सुख उठाने का जब भी मौका मिला तो चुके नहीं।
जब अस्सी के दशक में इंदिरा नगर आये तब पता चला कि बिजली की अहमियत और दिक्कत क्या है। कभी तार टूट जाता तो कभी टीपीओ उड़ जाता। कभी बस-बार तो लीड जल जाती। ट्रांसफर तो अक्सर उड़ा करते। डिमांड ज्यादा सप्लाई कम। ट्रांसफार्मर और तारें लोड न ले पातीं। ऊपर से आंधी तूफ़ान जैसी दैवीय आपदाएं।
शुरआत के सालों में तो जब बिजली जाती तो कई-कई घंटे बाद आती। टेलीफोन-मोबाइल नहीं होते थे। कई-कई बार एचएएल सब-स्टेशन की साइकिल से दौड़ लगती। लाइनमैन और दूसरा स्टाफ़ बड़े तरलों के बाद आता। मैं तो साइट पर खड़ा रहता, जब तक काम पूरा न हो जाता। 
बिन बत्ती के न दिन कटता और न रात। इन्वर्टर आये तो कुछ राहत मिली। लेकिन आत्मिक सुख उठाने की आदत तो पड़ी ही हुई है। बत्ती गयी नहीं कि सूंघते-सांघते पहुंच गए जहां लाइन टूटी है या ट्रांसफार्मर दगा है। न दिन देखा और न रात।

Sunday, August 2, 2015

अंकल 'जर्रा' पेन देना!

-वीर विनोद छाबड़ा
बैंक गए या पोस्ट ऑफिस या दफ्तर। ओह! जेब में पेन नहीं है। भूल गये। कुछ वाकई में। कुछ आदतन भुलक्क्ड़। तरह-तरह के लोग। तरह-तरह के बहाने। अब किसी न किसी से तो मांगना ही पड़ेगा।
कई को बड़ा कष्ट होता है, पेन देते हुए। सच कहें, हमने तो बड़ी ख़ुशी-ख़ुशी दिया। इस उम्मीद में कि शायद वापसी पर ऑटोग्राफ मांगे।

लेकिन हुआ उल्टा। कुछ ने पेन वापस तो किया लेकिन थैंकलैस 'थैंक्यू' कहना भूल गये। हमें ही कहना पड़ा - थैंक्यू पेन वापस करने का।
याद पड़ता है कुछेक तो पेन सहित तिड़ी हो गए और जाते-जाते हमें पेन (दर्द) दे गए।
दो-एक बार ऐसा भी हुआ कि हमीं पेन वापस लेना भूल गए। ख्याल आया तो दो-तीन किलोमीटर आगे निकल चुके थे।
बड़े-बुज़ुर्ग समझाते थे कि कभी किसी को पेन मत दो और अगर दो भी तो ढक्कन अपने पास रख लो। देने वाले को भी याद रहे और मांगने वाले को भी। लेकिन हमने कभी ध्यान नहीं दिया। पेन ही तो है। दो-तीन रूपये का। ले जाने दो। हमारी या उसकी ग़रीबी पर क्या फ़र्क पड़ेगा।
सावधानी हटी, दुर्घटना हुई। बेहद दुःख तब हुआ, जब इसी दरियादिली के चक्कर में हमने दिवंगत पिताजी द्वारा गिफ्टेड पेन गवां दिया। जाने कौन नामुराद लेकर रफ़ूचक्कर गया। बेहद बेशक़ीमती था वो। हमने इससे बीसियों आर्टिकल लिखे थे। दफ्तर में सैकड़ों लंबे-लंबे नोट और ड्राफ्ट तैयार किये। लिखते समय हमें पंख लग जाते। आत्मविश्वास से भर उठते। बुलेट माफ़िक स्पीड। सालों सीने से लगा कर रखा।  जगह-जगह ढूंढा किया। कइयों को अलर्ट किया कि पता चले तो फ़ौरन से पेश्तर ख़बर देना। कई रोज़ खाना नहीं अच्छा लगा। बड़े-बुज़ुर्गों की नसीहत नहीं मानने पर खुद को रह-रह बेहद कोसा। ले जाने वाले के लिये  बस यही दुआएं निकलती रहीं कि वो शरीफ़ हो। हिफाज़त से रखे। बेज़ा इस्तेमाल न करे।
वक़्त गुज़रता गया। धूल की मोटी परतों ने घाव भर दिए। लेकिन निशान बाकी रहा। जब तब टीस उठती है, जब कोई कहता है - अंकल 'जर्रा' पेन देना।
हमने पेन का ढक्कन अपने पास रख 'ज़र्रा' पेन दे दिया। अगले ने हमें सर से पांव तक बेतरह घूरा। मानो कह रहा हो - अबे ढाई हज़ार का जूता पहनते हो और पांच रुपए का पेन उधार देते फ.…ती है।
और काम ख़त्म होने पर जब हमने याचक बन अपना पेन वापस, मांगा तो उसने फिर उसी तरह घूरा - अबे बुढ़ऊ, मर्रा क्यूं जा रहा है ? दो रूपए का यूज़ एंड थ्रो पेन है। इतरा यूं रहा है मानो हीरा जड़ा हो। ले अपना सड़ा पेन और मर।

Saturday, August 1, 2015

मीना कुमारी - ट्रेजेडी क्वीन की ट्रेजेडी!

-वीर विनोद छाबड़ा
सिनेमा इतिहास की सर्वश्रेष्ठ ट्रेजेडी क्वीन के लिए कई बार फ़ेहरिस्त बनी। टॉप पर हमेशा दिवंगत मीना कुमारी नाम ही दिखा।
लेकिन मीना को महज़ बेहतरीन अदाकारा के लिए ही याद नहीं किया जाता। वो त्रासदी का पर्याय थीं।

मर्दों के मामले में मीना की च्वॉइस कुछ अजीब सी रही। उन्होंने पंद्रह साल बड़े कमाल अमरोही को चाहा। पहले से शादी-शुदा और बाल-बच्चों वाला। एक बटा हुआ शख़्स। शादी के बाद अहसास हुआ कि उन्होंने कमाल को कभी चाहा ही नहीं। और न कमाल ने उनको। कुछ अरसे बाद  तलाक़ हो गया।
मीना की ज़िंदगी में दूसरा शख़्स आया -धर्मेंद्र। वो भी शादी-शुदा और उम्र में कम। दोनों ने सात फ़िल्में की - पूर्णिमा, काजल, चंदन का पालना, फूल और पत्थर, मैं भी लड़की हूं, मझली दीदी और बहारों की मज़िल। मीना ने धर्मेन्द्र को बताया कि यह दुनिया उगते सूरज को सलाम करती है डूबते को नहीं। उनका शीन-काफ़ और तलफ़्फ़ुज़ दुरुस्त किया। लेकिन वो किसी और के लिए उन्हें छोड़ गया।
मीना को ज़रूरत थी एक ऐसे शख्स की जो खुद को भूल कर चौबीस घंटे उनके साथ रहे। ऐसा शख्स उन्हें न गुलज़ार (मेरे अपने) में दिखा और न सावन कुमार टाक (सात फेरे और गोमती के किनारे) में। और फिर अपनी उमगें कुचल कर उनके पास बैठने की फुर्सत किसे।  
मीना बचपन से ही फैमिली के लिए रोटी-रोज़ी जुटाने का साधन रही। खेलने-कूदने की उम्र एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो चक्कर काटते कटी। वो कब जवान हो गयी, उसे पता ही नहीं चला। दूसरों के लिए जीती रही। दूसरे उसे इस्तेमाल करते रहे और वो इस्तेमाल होती रही। अवसाद में घिरी रही। डॉक्टर ने अच्छी नींद के लिये एक घूंट ब्रांडी का नुस्खा लिखा। लेकिन मीना ने जल्दी ही उसे आधा गिलास कर दिया। जब समझाया गया तो वो डेटोल की शीशी में मदिरा  भरने लगी। खुद को मदिरा के हवाले कर दिया।
संयोग से फिल्मों में भी उन्हें सियापे और त्रासदी से भरपूर किरदार मिले। वो इसी को मुकद्दर समझ कर जीने लगी। 'साहब बीबी और ग़ुलाम' की 'छोटी बहु' सरीखी ज़िंदगी अपना ली। इतने परफेक्शन के साथ जिया इसे कि यह किरदार कालजई हो गया। हर छोटी-बड़ी नायिका के लिए रोल मॉडल बन गयी। मीना की ज़िंदगी एक किताब हो गयी। विनोद मेहता ने तो लिख भी दी - A Classic Biography (१९७२).

ट्रेजडी की लीक से हट कर ट्रेजडी किंग दिलीप कुमार के साथ 'आज़ाद' और 'कोहिनूर' की। हलकी-फुल्की कॉमेडी भूमिका। दिलीप तो अवसाद से निकल गए, लेकिन मीना नहीं बाहर हो पायीं। गहरे और गहरे डूबती गयीं। वो शायरा हो गयीं।
सुनील दत्त और नर्गिस ने मीना जी को नई ज़िंदगी देने की पहल की। छह साल से डिब्बे में बंद कमाल अमरोही की 'पाकीज़ा' फिर शुरू हुई। जब रिलीज़ हुई तो मीना की तबियत काफ़ी नासाज़ थी। फिल्म को अच्छी ओपनिंग नहीं मिली। लेकिन महीने बाद मीना को लीवर सिरॉसिस निगल गया। ट्रेजडी क्वीन को श्रद्धांजलि देने के लिए बॉक्स ऑफिस पर लंबी कतारें सज गयी। पूर्व पति मालामाल हो गए। मगर मीना का दिया जो खाते रहे उनके पास तीन हज़ार रूपए नहीं थे, हॉस्पिटल बिल चुका कर मीना की लाश उठाने के लिए।