Wednesday, October 7, 2015

आज बुधवार है.…नहीं बनेंगे बुद्धू।

-वीर विनोद छाबड़ा 
हमारा शहर लखनऊ। कभी बुध बाज़ार तो कभी मंगल बाज़ार। शनिवार को यह तेलीबाग़ में तो गुरूवार को नजीराबाद में। यानी नगर के जिस हिस्से में साप्ताहिक बंदी होती है उसी हिस्से में सज जाता है यह बाज़ार। चलते-
फिरते बाज़ार। आपके क़दमों पर बाज़ार।
इतवार को नक्खास में तो ख़ास ही नज़ारा होता है। यहां सुई से लेकर राजे-महाराजों और बादशाह सलामत तक का सोफ़ा सेट भी मिल जाये। एक बार हमारे  एक बुज़ुर्ग पड़ोसी के बादशाहों के ज़माने से संभाल कर रखे लैंप की चिमनी टूट गयी। बड़े उदास थे। हमने उन्हें इतवार के रोज़ नक्खास जाने की सलाह दी। शाम को उनके चेहरे पर रौनक तैर रही थी। उम्र दस साल घट गयी। जब तक सांस चलती रही इतवार नक्खास में गुज़रता रहा।
पुरानी किताबें पढ़ने के शौक़ीन भी इतवार के रोज़ छुट्टी यहीं गुज़ारते हैं। एक समय था कि किसी के तन पर या घर में घटिया चीज़ देखी नहीं कि मज़ाक उड़ गया। नक्खासी माल है क्या!
लेकिन अब वो ज़माना नहीं रहा। प्रतिस्पर्धा बड़े-बड़े बाज़ारों और शॉपिंग कॉम्पलेक्सों दे दरम्यां हो रही है। आलमबाग हो या गोलमार्किट से बादशाहनगर तक फैला बुध बाज़ार, एक से बढ़िया एक रेडीमेड और कपड़े मिल जाएंगे। सूट से लेकर पटरेवाला कच्चा तक। रसोई का सामान हो या ड्राइंग रूम का। किस्म-किस्म की घास और बेला चमेली के बेल-बूटे बेचने वाले मिलते हैं। यानी मुंह से नाम बोलो और वो वस्तु हाज़िर।
मूल रूप से निम्न वर्ग का शॉपिंग मॉल है। लेकिन वास्तव में सबका बाज़ार है। ध्यान से देखें तो बड़ी-बड़ी कोठियों वाली भी कार कहीं दूर किनारे खड़ी कर यहीं घूमा करती हैं। एक-दूसरे को देख लेती हैं तो मुंह चुरा लेती हैं जैसे देखा ही नहीं। पोल खुलती है किट्टी पार्टियों में। वो भी तब जब कोई कह दे मेरी साड़ी तेरी से सफ़ेद ज्यादा।
कई तो बुरका ओढ़ कर आती हैं। मजबूरी है क्योंकि नौकरानी भी अपने बच्चों के साथ आज शॉपिंग पर है। महिलाओं की खासी तादाद दिखती है। पर्स में से बड़ी चतुराई से माल भी महिलायें उड़ाती हैं।
कभी यह हाट कहलाते थे। राजे-महाराजों के काल में बार्टर सिस्टम था यानी वस्तु-विनियम प्रणाली। यानी अपना सामान तू मुझे दे, मेरा तू ले। अब आधुनिक युग है। 
दाम तो पूछिये मती। अगर शॉपिंग काम्प्लेक्स में पांच सौ रूपए की शर्ट है तो यहां पचास से लेकर सौ तक में हो जायगी। एक से बढ़ एक धांसू और क्वालिटी प्रोडक्ट। हर ब्रांडेड आइटम से भी मजबूत। ड्राइंग रूम में रख दो क्या मज़ाल कि कोई कह दे कि नक्खास का है या बुध बाज़ार का।

Tuesday, October 6, 2015

गाड़ी द्वार पर और गऊ कूड़ाघर पर!

-वीर विनोद छाबड़ा 
मैं लखनऊ में रहता हूं। संख्या तो नहीं बता सकता लेकिन जहां भी जाईये, गऊ-माताओं, उनके बच्चों और सांडों के खुले दर्शन हो जायेंगे। ज्यादातर बीमार-ठीमार। हड्डियां गिन लो। जनता तरस खाती है। मगर क्या मज़ाल
कि कोई अपने घर के आगे खड़ा होने दे- गंदगी फ़ैलाती हैं।
उन पर तरस खाने वाले लोग भी हैं। नज़र बचा कर इधर-उधर देखा और बची हुई रोटियां, दाल-सब्जी पड़ोसी के घर के बाहर डाल दी। मटर के छिलके और तुरई-लौकी की छीलन भी। ऐसे ही तमाम आईटम। इधर-उधर विचरती गऊ मातायें साफ़ कर देंगी।
धर्म के अलमबरदार बहुत गुस्सा करते हैं - क्यों देते हैं इन्हें खाने को? सालियां यहीं गोबर और मूत्र त्याग कर गंदगी फ़ैलाती हैं।
वो सुबह से शाम तक डंडा लेकर दौड़ाते-फिरते हैं- कांजी हॉउस में क्यों नहीं बंद करती सरकार?
कभी यह हज़रत गऊ पाले थे। जैसे ही दुहने बैठते गऊ उन्हें लात मार देती। झल्ला कर खूब पीटते गऊ को। हार कर गऊ बेच दी। तब से उनकी गऊ से अदावत है। लेकिन कोई दूसरा गऊ को बुरा-भला कहे तो मिर्ची लग जाती है।
एक दूसरे सज्जन आपत्ति करते हैं- कांजी हाउस में भूखी मर जायेंगी। यहां कुछ तो मिलता है। खदेड़ देतें हैं सड़क के उस पार।
हमदर्दी जताने वाले एक और भी हैं- अरे एक आध रहने दीजियेगा।
उनको किसी ज्योतिषी ने बता रखा है गाय को रोज़ दो रोटी और पांच किस्म की दाल महीना भर खिलाओ। कृपा आएगी। सारे दुःख-दलिद्दर ख़तम समझो। 

मुझे याद है वो ज़माना जब चोकर गऊ माता को डाला जाता था। एक नहीं कई-कई गऊएं एक साथ टूट पड़ती थीं। एक दुकान के बाहर आटे के बोरे में गऊ माता ने मुंह मार दिया। दुकानदार ने बहुत मारा उसको। बेचारी लहू-लुहान हो गिर पड़ी। टांग टूटी थी। राहगीरों ने विरोध किया तो मार्किट के सारे दुकानदार एकजुट हो गये। 
मंदिरों में मोटी रक़म चढ़ाएंगे, मगर न गऊशाला बनवायेंगे और न ही चंदा देंगे। चंदा लेने वाले भी शक़ के घेरे में हैं। गऊ नहीं खुद खायेंगे।
जन्म हो या मरण या शादी-ब्याह। पूजा-पाठ वाले पंडित जी गऊ दान के नाम पर १०१ रुपया वसूल लेते हैं। आवारा विचर रही गऊ को दान में नहीं लेंगे।
मुझे वो रात भी याद है। मैं साईकिल से आ रहा था। गाना गुनगुनाता हुआ - कभी तो मिलेगी बहारों की मंज़िल राही…अचानक धड़ाम से जा गिरा। गऊओं के झुंड पर। किसी गाय ने मुझे सींग पर खड़ा कर दिया था। बहुत रोया था मैं। दर्जन भर टांके भी लगे थे।

Monday, October 5, 2015

मोह-माया भरम है, मिथ्या है संसार!

-वीर विनोद छाबड़ा
मां सारी ज़िम्मेदारियां पूरी करके गयीं हैं। हमें ज़िंदगी नाम की नेमत दे गयी.…ये बताते हुए उनकी आंखें सजल हैं।

अंतिम बिदाई देने तमाम रिश्तेदार, अड़ोसी-पड़ोसी और इष्टमित्र शामिल हैं। ज्यादातर सीधे घाट पर पहुंचे हैं। कोई घर से, कोई ऑफिस से। कौन पहले घर जाए और फिर घाट। इतना टाईम ही कहां!
ज्यादातर में जाने कहां से परमज्ञान आ गया। बुद्ध हो गए.…मोह-माया भरम है, मिथ्या है.…आत्मा का परमात्मा में मिलन ही अंतिम निष्कर्ष है.…ईश्वर की मर्जी के आगे किसकी चली.…कमा ले जितना भी, सब यहीं छूटना है.…खाली हाथ आया है, खाली हाथ जाना है.…पाप का घड़ा इसी जन्म में फूटता है.…देखो तमाम जाने-माने कुबेर और धर्मात्मा सलाखों के पीछे हैं.…कई मारे-मारे छुपते घूम रहे हैं.…पहुंच वाले तो छुट्टा हैं.… कइयों पर जाने क्यों थाना-कचेहरी की रहमत बरसती है.…कुछ नहीं मुकद्दर की बात है.…टाईम ख़राब आया, धर लिए गए....मंत्री-संत्री भी बुरे वक़्त में सरक लिए।
कुछ राजनीति पर बहस रहे हैं.…लॉ एंड आर्डर बहुते ख़राब है.… अगले चुनाव में सरकार साफ़.…
एक साहब को टूटी नाली से परेशानी है। मुख्यमंत्री को लिखी दर्जनों चिट्ठियों का हवाला दे रहे हैं। उनकी बात सुन कर एक पिनपिनाता है। नाली बनाने मुख्यमंत्री आएगा!
किसी ने प्रधानमंत्री की शान में कसीदा पढ़ दिया। संसार को मंत्रमुग्ध कर दिया। अब देखियेगा शाइनिंग इंडिया। पीछे खड़े सज्जन को बदहज़मी हो गयी। अबे अरहर की दाल के दाम कम होंगे नहीं कि नहीं।
किसी को चिंता हो गयी। शासन डीए के आदेश क्यों नहीं जारी कर रहा? वहीं खड़ा सचिवालय का बाबू बताता है। फाईल वित्त मंत्रालय में है। पैसे का जुगाड़ हो रहा है।
कुछ लोग बार बार घड़ी देख रहे हैं। वर्किंग डे है। ऑफिस से घंटे भर की छुट्टी लेकर आये हैं। अभी तक लकड़ी ही तुल रही है। चिता को मुखाग्नि देते-देते तो दो  बज जाएगा। गया लंच भी। रिटायर्ड लोग मानो पिकनिक में हैं। कल उन्हें भी जाना है। थोड़ा हंसी-ठट्ठा कर लें।
इस मध्य चिता तैयार हो गयी। मुखाग्नि देने का समय। कुछ ही लोग करीब आये। बाकी अपने में मस्त।
जींस और 'किल-मी' के छापे वाली टीशर्ट धारित नौजवान पंडे ने जल्दी-जल्दी मंत्रो का उच्चारण किया। एक ने टोक दिया। साफ़-साफ़ पढ़ भाई। पंडे ने खा जाने वाली निगाहों से कहने वाले को देखा। वो डर कर पीछे खसक लिया। 
मुखाग्नि हो गयी। मृतक के पुत्र के कंधे पर किसी ने हाथ रख दिया। दुनिया आनी-जानी है।

Sunday, October 4, 2015

वीरेन डंगवाल को अलविदा नहीं कह पायेंगे।

-वीर विनोद छाबड़ा
२८ सितंबर २०१५ को हिंदी के सुविख्यात कवि वीरेन डंगवाल का कैंसर से
लड़ते हुए निधन हो गया था। उनकी याद में दिनांक ०३ अक्टूबर को लखनऊ के इप्टा ऑफिस में स्मृति सभा आयोजित हुई।
सभा की अध्यक्षता सुविख्यात कवि नरेश सक्सेना ने की।
सभा का संचालन करते हुए कवि चंद्रेश्वर पांडे ने वीरेन जी को समकालीन
Chandreshwar Pandey
कविता का सशक्त हस्ताक्षर बताया। उनकी कविता में राष्ट्रीय चेतना को लेकर सच्ची कविता सामने आती है
, छद्म राष्ट्रीयता का भंड़फोड़ करती है। वो सिर्फ कविता से नहीं जुड़े थे। शिक्षक भी रहे। पत्रकारिता से भी जुड़े। अमर उजाला कानपुर के संपादक भी रहे। कई जाने-माने विदेशी कवियों की रचनाओं का भारतीयकरण करते हुए अनुवाद भी किया। वो कहा करते थे मनुष्य को नष्ट कर सकते हो, लेकिन पराजित नहीं।
कवि श्याम अंकुरण ने बताया वीरेन जी को शासन ने कुचलने की बहुतेरी कोशिश की। लेकिन वो डटे रहे। उनकी कविता का ग़ालिब, त्रिलोचन से गहरा रिश्ता रहा। जन संस्कृति मंच की स्थापना में उनकी अहम भूमिका थी। उनकी कविताओं के अनुवाद कई भाषाओँ में हुए। अमृत प्रभात इलाहाबाद में स्तंभ लिखते रहे। उनकी कवितायेँ अलग रास्ता चुनती दिखती थीं। उनका मानना था कि इस देश को छोड़ कर नहीं जाना है इसे वापस पाना है। उनकी कविताओं में उनकी राजनैतिक चेतना झलकती थी। उनकी कविता हल्के फुल्के अंदाज़ से शुरू होती ज़रूर थी लेकिन अंत ऐसा नहीं होता था। ईश्वर को कटघरे में खड़ा करके गंभीर सवाल पूछते हैं।
समकालीन जनमत के संपादक और यूपी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महामंत्री रामजी राय ने उन्हें याद करते हुए कहा कि साथियों को बड़ी आत्मीयता से दोस्त, पार्टनर और प्यारे से संबोधित करते हुए वीरेन अपने और दूसरों के बीच दीवार ढहाते थे। उनका व्यवहार अनौपचारिक था। उनकी कविता में अंतरंग मित्र की भाषा है। सख्ती भी है उनमें। व्यंग्य और कटाक्ष भी। आदमी ही आदमी को निर्मित करता है। वो कविता को पिपहरी कहते थे, जैसे बिस्मिल्लाह खां कहते थे मैं शहनाई नहीं बजता पिपहरी बजाता हूं। उनकी कविता में सपने की पीछे की सच्चाई होती थी। सामान्यबोध की अभिव्यक्ति है। वीरेन को अलविदा नहीं कह पाएंगे।
VirendraYadav, Naresh Saxena and Shyam Ankuran
सुप्रसिद्ध समालोचक वीरेंद्र यादव ने कहा कि वीरेन अलग कवि थे। कविता के माध्यम से सामाजिक चेतना लाये। उनके व्यक्तित्व से उनकी कविता को अलग करना मुश्किल है। आत्मीय और निश्छल थे। कुछ ओढ़े हुए नहीं मिले। जैसे वो थे वैसी ही कविता थी। कैंसर के बावजूद वो साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय रहे, पूरी जीवंतता और प्रतिबद्धता से जुड़े रहे। ऐसे व्यक्ति का जाना किसी कड़ी का टूट जाना है। बेहद दुःखद है।
कवियत्री कात्यायनी ने कहा वीरेन जी हमेशा कुछ नया लेकर आते थे। उनसे मिल कर कभी नहीं लगा वो बहुत बड़े हैं। वो ऊर्जा देकर जाते थे। बिना शोर-शराबे के अलग ही छवि बनाई। अपने लोगों की मिट्टी की गंध मिली उनकी कविता में। उनको व्याख्यापित करना कठिन है। आशावाद अंतरधारा के रूप में बहा। उनका व्यवहार उनकी कविताओं में प्रवाहित होता रहा।
इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव राकेश को आज के दौर में उनका जाना बहुत
Rakesh, Ajai Singh 
दुखद लगा। उनकी कविता आज के परिदृश्य को बखूबी अंकित करती है। वो कविताओं में चिंतक के रूप में दिखते हैं। शिक्षक और पत्रकार के रूप में भी। वो सदैव सांप्रदायिकता पर चोट करते रहे।
युवा कहानीकार, गायन और कविता से जुड़े हरी ओम ने बताया कि वीरेन जी को ग्लैमर से दूर रहे। उनकी कविताओं पर भले तालियां नही बजती थीं लेकिन इसके बावजूद वो जेएनयू में सबके दिलों को खींचते  रहे। आज जब कुतर्क नहीं बचा, सिर्फ़ हिंसा बची है तो उनकी बहुत याद आती है। वो खास कवि थे और खास कवितायें करते थे। लोकप्रियता के लिए कविता नहीं की। कविता में समोसा और जलेबी को शामिल करके उन्होंने आमजन की चिंता तलाशी।

Saturday, October 3, 2015

मेरे लायक सेवा बतायें।

प्रस्तुति -वीर विनोद छाबड़ा
उस लेखक को अपने लेखक होने पर बहुत घमंड था। आत्मश्लाघा से पीड़ित।
एक दिन वो बड़े अरमानों से महात्मा गांधी से मिलने पहुंचा। उन दिनों गांधी जी 'हरिजन' नामक पत्रिका का संपादन भी किया करते थे।
आमतौर पर गांधी जी से लोग सीखने जाते थे। चुपचाप उन्हें बस सुनते रहते। लेकिन उस लेखक ने गांधीजी को बोलने का मौका ही नहीं दिया। अपनी बहादुरी के किस्से सुनाने लगा। अपने समक्ष दावे प्रस्तुत करता रहा - मैं फलां बड़े व्यक्ति को जानता हूं। और ढमकाना महान लेखक से मेरे बहुत अच्छे संबंध हैं। वे सब मेरे व्यक्तित्व और लेखन के बारे में बहुत अच्छी राय रखते हैं।
फिर उस लेखक ने भविष्य में लेखन और प्रकाशन के संबंध अपनी बड़ी-बड़ी योजनाओं के बारे में बताया।
वो लेखक सोच रहा था कि उसकी से शेखी से अब तक गांधीजी प्रभावित हो चुके होंगे, अब तक महान बन चुका होगा।
गांधीजी चुपचाप अपने घरेलू काम करते रहे और साथ ही धैर्य से उसकी बातें सुन कर मुस्कुराते रहे। लेकिन कोई जिज्ञासा प्रकट नहीं की।
गांधीजी ने जब उसके प्रति कोई रुचि नहीं दिखाई तो लेखक थोड़ा व्यथित हुआ। अब उसके पास बताने को कुछ बचा भी नहीं था। तब उसने वहां से जाना ही बेहतर समझा। अचानक उसके ज़हन में एक विचार आया। उसे यकीन था कि यह ब्रम्हास्त्र खाली नहीं जायेगा। महात्मा जी, मेरे लायक कोई सेवा हो तो अवश्य बतायें।
उसने सोचा गांधी जी अवश्य ही उसे 'हरिजन' में लेख लिखने को कहेंगे।
लेकिन गांधी जी ने ऐसा कुछ नहीं कहा।
उस लेखक ने एक बार फिर जोरपूर्वक आग्रह किया।

Friday, October 2, 2015

लाल बहादुर शास्त्री - समारोह से ज़रूरी ज़िंदगी।

-वीर विनोद छाबड़ा
लाल बहादुर शास्त्री। जब भी यह नाम ज़बान ज़ुबां पर आता है तो दिल असीम श्रद्धा से भर उठता है। सर नमन करने को झुक जाता है। छोटे सी
कद-काठी, दुबला पतला जिस्म और मज़बूत इरादों वाला यह शख़्स अपनी सादगी, सामाजिक समता और ईमानदारी के लिए कटिबद्ध था। और इसीलिये प्रसिद्ध भी।
इसी प्रतिबद्धता के बूते शास्त्रीजी कांग्रेस पार्टी में मामूली कार्यकर्ता से उभर कर पंडित नेहरू के बहुत करीब आये। भारत सरकार के रेल मंत्री बने और फिर नेहरूजी के देहांत के बाद प्रधानमंत्री। 
शास्त्रीजी अपनी उदारता के लिए भी बहुत प्रसिद्ध थे। इस संबंध में उन दिनों एक वाक्या बड़ा चर्चित हुआ करता था। 
यह उन दिनों की बात है जब शास्त्री जी रेलमंत्री हुआ करते थे। उत्तर प्रदेश के सरदार नगर में पार्टी का कोई समारोह था। शास्त्री जी की उसमें शिरक़त ज़रूरी थी।
रास्ते में एक घना जंगल पड़ा। चोर-डकैतों के लिए मशहूर। उन दिनों मंत्रीगण के साथ कोई भारी लाव-लश्कर का प्राविधान नहीं था। प्रोटोकॉल के अनुसार छोटा सा पुलिस दस्ता साथ था। किसी की क्या मज़ाल कि उन्हें रोके।
लेकिन अचानक उनका कारवां रुक गया। बीच सड़क पर कुछ लोग खड़े थे।
शास्त्रीजी का अंगरक्षक कार से उतरा। कड़क कर पूछा - कौन हो तुम लोग? और इस तरह रोकने का सबब?
उनमें से एक आदमी आगे आया - साहब, हम पास के गांव के हैं। बहुत गरींब किसान हैं। पत्नी प्रसव पीड़ा से तड़प रही है। आप उसे सरदार नगर के अस्पताल पहुंचा दें। बड़ी कृपा होगी।
शास्त्रीजी के मित्र ने घोर आपत्ति की। वो प्रदेश सरकार में मंत्री थे। उन्हें शास्त्री जी का उदारता का अच्छी तरह भान था। अगर हुआ तो विलंब हो जाएगा।
लेकिन शास्त्रीजी अड़ गए - समारोह में देर-सवेर पहुंचने से अधिक महत्वपूर्ण है प्रसूति के लिए तड़पती यह बहन। ज़िंदगी समारोह से ज्यादा ज़रूरी है। ले आओ उस बहन को। हम सरदार नगर ही जा रहे हैं।
और उस प्रसूता की ज़िंदगी बच गयी।
कुछ दिनों बाद एक बहुत बड़ा ट्रेन हादसा हुआ। शास्त्रीजी बहुत आहत हुए। नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए उन्होंने फ़ौरन इस्तीफ़ा दे दिया। नेहरूजी ने उनका इस्तीफ़ा स्वीकार करते हुए पार्लियामेंट में कहा - शास्त्रीजी इस दुर्घटना के लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं। उनकी सत्यनिष्ठा और ईमानदारी पर मुझे कतई संदेह नहीं है। लेकिन इसके बावजूद मैं इसलिए स्वीकार कर रहा हूं ताकि दूसरों के लिए वो आदर्श और उदाहरण बनें।  
कैबिनेट में न होते हुए शास्त्रीजी पार्टी संग़ठन के अनेक महत्वपूर्ण कार्य देखते रहे। उन्हें नेहरूजी दाहिना हाथ कहा जाता था। शायद यही वज़ह रही कि नेहरूजी निधन के बाद पार्टी ने उन्हें नेहरूजी का उत्तराधिकारी माना और कंज़र्वेटिव मोरारजी देसाई के गुट के दावे को दरकिनार कर प्रधानमंत्री बनाया।

Thursday, October 1, 2015

इधर अरहर १५० रूपए किलो, उधर फटी बनियाइन को सेवाविस्तार।

-वीर विनोद छाबड़ा
हमारा परिवार १९४७ के पार्टीशन के फलस्वरूप पाकिस्तान से भारत आ कर बसा। पहले बनारस और फिर लखनऊ के नक्खास, चंदर नगर के मोहल्लों में।
Arhar Dal
लौकी डाल कर चने की दाल। मूंग की दाल में बारीक़ प्याज़ मिलाना। उड़द और मसूर की दाल। राजमां, काबुली चना और छोले। कभी-कभी चावल। यही था आहार। कभी अरहर की दाल का नाम नहीं सुना था। और न कभी किसी पार्टी में खायी। नक्खास में चार बरस की रिहाईश छोड़ कर इस दौरान ज्यादातर पंजाबियों के साथ रहना हुआ।
१९६२ में जब हम चारबाग़ शिफ़्ट हुए। आस-पास सब यूपी के मूल बाशिंदे। हिंदी भाषी। हमारे पड़ोस में अगले दरवाज़े राजवत फैमिली रहती थी। उनके घर में अरहर की दाल तक़रीबन रोज़ बनती थी। भीनी-भीनी खुशबू हमारे घर भी पहुंच जाती। एक दिन मां ने पूछ ही लिया। अगले दिन एक बड़ी कटोरी भर छौंक लगी अरहर की दाल आ गयी। उस पर देसी घी भी तैर रहा था।
जाने कैसा हो स्वाद? डरते-डरते मुंह में एक चम्मच दाल डाली। अब क्या बताऊं? वो दिन है और आज का दिन। हम अरहर की दाल के बिना नहीं रह सकते। बाद में पता चला कि गरीब लोग इसे बहुत पसंद करते हैं। गरीबों की दाल कहते थे इसे हमारी बिरादरी वाले। बिरादरी का कोई बंदा आता था उसे नहीं परोसते थे। कहीं वो हमारा स्टेटस डाऊन न समझे। और अपनी नाक कटी न समझ ले।

लेकिन कुछ ही अरसे बाद हमने देखा कि अरहर ने हमारी बिरादरी में भी नंबर-वन की जगह ले ली है। राजमां दस-पंद्रह दिन में एक बार और अरहर हफ़्ते में तीन-चार बार। सस्ती भी और जल्दी भी बनती थी। चावल के साथ तो बहुत ही भाती। लम्बे अरसे तक हमने सोलर कुकर में बनी अरहर खूब खाई। लाज़वाब स्वाद। अब आस-पास ऊंचीं इमारतें बन गयीं हैं। भरपूर धूप के लिए तिमंजिले कौन चढ़े?
इधर पिछले कई दिनों से अरहर का नंबर हफ़्ते में एक बार लग रहा है। मूंग और चने की दाल, और बाकी सस्ती-मद्दी दालों के फेरे बढ़ रहे हैं। पत्नी कहती है, १५० रूपए किलो है। डॉक्टर ने तो कहा नहीं कि खाओ।
अभी कल ही अरहर का नंबर आया था। इतनी पतली कि गोता लगाना पड़ा। होटलों और ढाबों में खाने के दिन याद आ गए।
उस दिन एक मित्र मिले। सलाह दी कि खानी बंद कर दो। भाव खुद-ब-खुद गिर जाएंगे?
क्या-क्या बंद करें यारो? कल को कहोगे जीना बंद कर दो। कुछ तो खाओगे ही। उसी के दाम बढ़ जाएंगे। प्याज खाना कम किया। कहां गिरे दाम? सालों से देसी घी सूंघ कर गुज़ारा करते हैं। दाम तो बढ़ते ही गए। कई लोगों की थाली में अरहर कटोरी यदा-कदा नज़र आती है। कम हुए दाम?