Sunday, February 14, 2016

सस्ते डॉक्टर के पास लोग आते ही नहीं।

- वीर विनोद छाबड़ा
मुद्दत पहले की बात है। एक दिन एक साईकिल वाले ने हमें पीछे से ठोक दिया। दायीं टांग पर चोट लगी।
पड़ोस के डॉक्टर के पास गया। मरहम पट्टी की उन्होंने। फिर ढेर खुली गोलियां दे दीं।
हमने पूछा - इसमें क्या क्या है?

डॉक्टर ने कहा - आम खाईये, पेड़ मत गिनें।
हमने कहा - बताना ज़रूरी है। हमें कुछ दवाएं सूट नहीं करती हैं।
डॉक्टर साहब को ख़राब लगा - हमारी दवाएं सबको सूट करती हैं। आपको भी करेंगी। पहले खाईये। प्रॉब्लम हो तो बताईये।
परचा भी उन्होंने नहीं दिया। हमने उनकी दवा खाई, चार दिन तक। रोज़ डेढ़ सौ रुपया फीस लेते थे। उस ज़माने के हिसाब से बहुत ज्यादा थी फीस। चोट में कोई फर्क नहीं पड़ा। गहरी होने लगा। दर्द भी बहुत बढ़ गया। टांग भी अकड़ सी गयी। उठने-बैठने में दिक्कत होने लगी। दवा खाने के बाद काफ़ी देर तक घबड़ाहट भी होती थी। 
हम थोड़ी दूर के दूसरे डॉक्टर के पास गए।
उन्होंने हमें दाढ़ी साफ़ करने का हुक्म दिया। फिर एक विटामिन की गोली सुबह-शाम तीन दिन तक। एक पेन किलर ज़रूरत पड़ने पर।
हमारी टांग पर भालू की तरह बाल थे।
उन्होंने सलाह दी। नए ब्लेड से शेविंग कर लो। घाव को गुनगुने पानी से धो लो। सोफ्राडेक्स क्रीम लगाओ और पट्टी और कॉटन की पैकिंग रख लो। फिर पेपर टेप से चिपका लो। रोज़ सुबह शाम तीन दिन तक करो।
फीस सिर्फ़ तीस रूपए।

Saturday, February 13, 2016

मां तुझे सलाम।

- वीर विनोद छाबड़ा
हमारे एक मित्र हैं अशोक दुबे। कांग्रेस के कर्मठ और ईमानदार नेता दिवंगत अधीर दुबे जी के पुत्र।
अधीर दुबे जी दो बार कांग्रेस के एमएलसी रहे हैं। एनडी तिवारी जब सीएम बने थे तो दुबे जी ने उनके लिए सीट खाली की थी।
उन दिनों चुनाव में उन्हीं का टिकट फाईनल होता था जिसके लिए दुबे जी हरी झंडी दिखाते थे। इंदिरा जी के बहुत करीबी दुबे जी ताउम्र पक्के गांधीवादी रहे। अपने लिए न कमाया और न बनाया। पुत्रों के लिए भी कुछ नहीं किया। सब अपने पैरों पर खड़े हुए।
दुबे जी ने अपनी विधवा पत्नी श्रीमती मोहिनी दुबे जी के लिए कुछ भी नहीं छोड़ा। लेकिन खुद्दार पत्नी को यकीन था कि पेंशन तो है ही। उसी पर निर्वाह करेंगी। मगर ट्रैजेडी यह रही कि कांग्रेस को ज़िंदगी अर्पण कर देने वाले दुबे जी पेंशन योजना से वंचित रहे। दुबे जी मार्च १९९० में ब्रम्हलीन हुए थे और तत्कालीन नियमों के कारण पेंशन योजना से आवरित नहीं हो पाये। यह बात पुत्र-पुत्रियों ने मां को नहीं बताई ताकि उन्हें दुःख न हो।
सभी पुत्र मिलकर उन्हें हर माह तीन हज़ार रूपये देते रहे। यह रख ले मां, बाबू जी की पेंशन आई है। मां खुश हो जाती। हज़ार बार माथे को लगाती और चूमती कि पति की कमाई आई है। पाई पाई का हिसाब रखतीं। नाती-पोतों को दुलारतीं और उन पर दिल खोल कर खर्च करतीं। शादी आदि उत्सवों में अपना हिस्सा देतीं। बेटों को डांट लगातीं कि वो दो रुपया दिए थे उसका हिसाब दो। यह पार्टी को समर्पित मेरे कर्मठ पति की ईमानदारी की कमाई है। इसके एक एक पैसे पर मुझे गर्व है। इन पर सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरा ही हक़ है।
इन पैसों में से वो अपनी सेवा करने वाली आया को भी दो सौ रूपए महीना दिया करती थीं। जबकि वास्तव में उसका मेहताना १५०० रूपए था। बाकी १३०० रूपए पुत्र दिया करते थे। आया को सौगंध दिला रखी थी कि असलियत माताजी के सामने कभी नहीं आये।
लेकिन एक दिन वो हो गया जिसे पुत्रों ने पिछले कई वर्षों से मां से छुपा रखा था। दोनों राज एक के बाद एक खुल गए। 

Friday, February 12, 2016

आदत से मजबूर।

- वीर विनोद छाबड़ा
यह बात उन दिनों की है जब सिगरेट, अख़बार और टॉयलेट का ज़बरदस्त कनेक्शन हुआ करता था। एक दिन पत्नी ने अंकुश लगा दिया। शर्म नहीं आती, बच्चे बड़े हो रहे हैं। ग़लत प्रभाव पड़ेगा।

हमारे घर से करीब सौ मीटर पर गुमटी थी। सुबह चाय-शाय पीने के बाद वहीं चले जाते थे। दनादन एक सिगरेट फूंकी और भागे सीधा घर। रास्ते में कोई मिल गया तो चलते-चलते टाटा बोल दिया- गुरू आज नहीं कल मिलना। ज़बरदस्त लगी है।
कुछ जानने वाले तो हाथ हिला कर आगे निकल लेते - अपना भी यही हाल है।
यों लगता बड़ा ख़राब था और डरते भी थे कि ऐसा न हो कि रास्ते में अंडरवियर पायजामे सहित खराब हो जाए।
तब हमने नया तरीक़ा निकाला। पंद्रह मिनट पहले ऑफिस पहुंच, इस उम्मीद में कि टॉयलेट खाली मिलेंगे। लेकिन हमें न मालूम था कि आगे की दुनिया भी पिछली दुनिया से कम नहीं है। बीवी से डरने वालों से भरी हुई। ऑफिस में दो ब्लॉक होते थे। एक में सात मंज़िलें और दूसरे में पंद्रह। हर फ्लोर पर चार-चार। कोई भी खाली नहीं। हर शाख़ पे उल्लू बैठा है।
ठाठ तो साहब लोगों के थे - अटैच। मगर वो भी फुल्ल। हमने सर्च किया कि कोई तो होगा पहलवान, जो बीवी से नहीं डरता होगा। देखें किसमें कितना है दम? आख़िर एक मिल ही गया। मगर वैसा नहीं जैसा हमने सोचा था। उसकी पत्नी दूसरे शहर में रहती थी। लेकिन हमें उससे क्या मतलब? अपना उल्लू सीधा होना चाहिए। आते भी वो देर सवेर थे। अपना काम तो हो गया। महीनों यह सिस्टम चला।

Thursday, February 11, 2016

तारीख़ पे तारीख़...

- वीर विनोद छाबड़ा
स्क्रैप बटोरने वाले की १३ साल की बेटी ज़ाहिरा ने कभी सोचा भी न था कि ०२ मई २००५ का वो दिन उसके लिए भयावह साबित होगा। एक नहीं छह अमीरजादों ने उसे अगवा करके कार में घसीट लिया।
रेप किया, सिगरेट के जला कर बेतरह प्रताड़ित भी किया और फिर उसके हाथ में बीस रूपये देकर सुनसान सड़क पर फ़ेंक दिया।
शायद यह घटना अमीरजादों के रोज़मर्रा आखेट का हिस्सा बन कर किसी कोने में दफ़न हो गयी होती, अगर अडवा और सांझी दुनिया की मधु गर्ग और रूप रेखा वर्मा जैसी जुझारू महिला नेत्रियों और प्रिंट मिडिया ने इसे अंजाम तक पहुंचाने की सौगंध न खाई होती।
यह काण्ड आशियाना रेप केस के नाम से चर्चित हुआ। चूंकि इसमें एक बड़े राजनैतिक दल के कद्दावर नेता का भतीजा भी शामिल था लिहाज़ा कानून के महान माहिर वकीलों ने भतीजे को नाबालिग साबित करने की एक नहीं कई चालें चलीं। तारीख़ पे तारीख़, तारीख़ पे तारीख़, तारीख़ पे तारीख़...
इस बीच दो अभियुक्तों की मौत हो गयी और तीन तो सजा। लेकिन उस कद्दावर नेता का भतीजा बचा रहा।
दिल्ली में निर्भया कांड हो गया। जनता सड़क पर उतर आई। नया कानून बना कर रेप करने वाले नाबालिगों को फांसी की सजा देने की मांग उठने लगी। असर आशियाना रेप केस पर भी पड़ा। मंथर गति से चल रहे इस केस ने रफ़्तार पकड़ी। इंसाफ़ की गुहार होने लगी।
अनेक दांव-पेंच चले। लंबे इंतज़ार के बाद आख़िरकार जुवेनाइल कोर्ट ने भतीजे को २१ मार्च २०१४ को बालिग़ करार दिया। मामला फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट के सिपुर्द किया गया। मगर इसके बावजूद मूल पत्रावली के न मिलने के कारण मामला फिर अटका। १६ नवंबर २०१५ को हाई कोर्ट ने तीन महीने में ट्रॉयल पूरा करने को कहा। 
पीड़िता को ट्रायल के दौरान कितने ज़बरदस्त मानसिक संत्रास से गुज़रना पड़ा, इसका अंदाज़ा वो भली भांति लगा सकते हैं जिन्होंने 'दामिनी' फ़िल्म देखी है।
कल फैसले की घड़ी थी। भारी भीड़ जमा थी कोर्ट के अंदर और बाहर। मीडिया का भी ज़बरदस्त जमावड़ा। सबके दिलों की धड़कनें तेज़। लेकिन कहीं डर भी छुपा था कि कुछ गड़बड़ न हो जाए। और...

Wednesday, February 10, 2016

भालू दिवस बोले कि टैडी बीयर डे।

- वीर विनोद छाबड़ा
हमारा ज़माना होता तो आज के दिन को हम 'भालू दिवस' कहते। लेकिन आज का युग हिंगलिश का है। बिल्ली नहीं कैट है और चूहा रैट। भालू भला कैसे पीछे रहता। बीयर हो गया। अंग्रेज़ी स्कूल के बच्चे ही नहीं मलिन बस्ती में भी उसे बीयर के नाम से पहचाना जाता है।

हमें अपना बचपन याद आता है। जब गली-गली में भालू का नाच दिखाने वाले मदारी डमरू बजाते घूमते फिरते थे। मां हमारे दिल से डर भगाने के लिए भालू का बाल तकिये के नीचे रख दिया करती थी। कहती थी नज़र से भी बचा रहेगा मेरा लाल।
यों हमने बंदर-बंदरिया का नाच भी खूब देखा है, लेकिन भालू को देखना ज्यादा सुखद रहा। मदारी और भालू की कुश्ती में मदारी ही हारता देखा। हम बच्चों ने खुश होकर नाचते हुए खूब ताली पीटी।
जंगल में खो गयी एक बच्ची और तीन भालूओं की कहानी की धुंधली याद भी है। बच्ची भालूओं के घर में घुस गयी थी। उनमें एक नन्हा भालू भी था। बच्ची ने नन्हे भालू की खीर भरी कटोरी चट कर ली थी। फिर वो नन्हे भालू के बिस्तर पर ठाठ से सो गयी। कुछ देर बाद भालू परिवार घर लौटा। नन्हा भालू अपनी खाली कटोरी देख कर रोने लगा। इतने में बच्ची जाग गयी।  भालू परिवार को देखकर वो डर गयी। जल्दी से वो वहां से भागी और फिर कभी उस घर में नहीं लौटी।
बच्चे सभी के प्यारे होते हैं। गधे के भी। लेकिन न मालूम क्यों भालू का बच्चा सबसे ज्यादा प्यारा लगता है। लेकिन कुछ बात है ज़रूर। तभी तो आज कल बड़े माल्स से लेकर गली-गली में टेडी बीयर के सॉफ्ट टॉयज बिक रहे हैं। शायद ही कोई ऐसा घर हो जहां टेडी बीयर मौजूद न हो।

Tuesday, February 9, 2016

न पीने की सज़ा।

- वीर विनोद छाबड़ा
एक ज़माना था जब हम अक़्सर दारू वाले मित्रों को अपनी गाड़ी में ढोकर उनके घर छोड़ा करते थे। यह दारू न पीने की सज़ा थी। ज़ाहिर है ऐसा हम शौक से नहीं करते थे। मजबूरी होती थी कि अगर हम ऐसा नहीं करेंगे तो पड़े रहेंगे। नुकसान भी हो सकता है। ऐसे में हम कभी खुद को माफ़ नहीं कर पायेंगे।

सत्तर के दशक में ऐसा हादसा हो चुका था। इस नाते भी हम सतर्क रहते थे। हुआ यह था कि उस ज़माने में हम साईकिल से चला करते थे। शाम को ऑफिस बंद हुआ। एक सहकर्मी मिले, बिलकुल फुलटॉस। रिक्शे पर थे। ज़िद करने लगे हमारे साथ घर चलो। हमने सख्ती से मना कर दिया। और जैसे-तैसे पिंड छुड़ा कर भाग निकले।
दूसरे दिन सुबह ऑफिस पहुंचे तो पता चला कि वो सहकर्मी इंतकाल फ़रमा गए हैं। पिछली रात दारू के अड्डे पर बेहोश पड़े मिले। अस्पताल पहुंचाये गए। वहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।
हम बहुत पछताए कि अगर हम साथ चले गए होते तो शायद यह 'होनी' टल जाती। जब हमने अपने एक अज़ीज़ मित्र से अपनी यंत्रणा को शेयर किया तो उसका कहना था - यह भी तो हो सकता था कि तुम भी उसके साथ दारू के अड्डे पर बैठ गए होते।
बहरहाल, हम कह रहे थे टुन्न दोस्तों को ढोने की बात।
एक दिन एक प्रीतिभोज में मित्रों ने जम कर दारू पी। उनमें से एक तो हम पिक करके लाये थे। उनकी पत्नी ने कहा था - भाई साहब, इनको लेकर भी आइयेगा। बाकी दो तो स्कूटर से थे। लेकिन चलाने की मुद्रा में कतई नहीं। मेजबान ने भी रिक्वेस्ट की कि इनको घर छोड़ दो। दोस्त और फिर मानवीय दृष्टिकोण। हमने कहा - नो प्रॉब्लम।
एक टुन्न तो कार ड्राईव करने की ज़िद करने लगे। बड़ी मुश्किल से उन्हें पीछे डंप किया।
बहरहाल, हमने एक-एक करके उनको घर छोड़ा। तीसरे साहब ज्यादा ही टुन्न थे। उनकी पत्नी ने कहा - प्लीज़ इन्हें हॉस्पिटल पहुंचा दें।
इसी कारण रात काफ़ी देर हो गयी। मोबाईल का ज़माना नही था। रात ज्यादा होने के कारण कहीं पीसीओ खुला नहीं दिखा। वैसे हमने चलते वक़्त मेजबान से बोल ही दिया था कि हमारे घर फ़ोन कर देना कि बारह बजे तक पहुंच जाऊंगा। अगर थोड़ी ज्यादा देर भी हो गयी तो चिंता मत करें। हम आश्वस्त थे कि हमारे घर फ़ोन हो चुका है।

Monday, February 8, 2016

भुतही कोठी का कटहल!

-वीर विनोद छाबड़ा
मुद्दत बाद जाना हुआ उस कोठी की तरफ। जगह-जगह प्लास्टर उखड़ चुका है। लखोरी
ईंटें दिख रहीं हैं। सूखी बेलों और घने मकड़ी के जाल से ढकी है कोठी। लेकिन कटहल का पेड़ ज्यों का त्यों है। अब भुतही कोठी कहलाती है यह। बंदा डाउन मेमोरी लेन में चला जाता है.... 
चालीस साल पहले। कटहलों से लदा पेड़ और नीचे बंदा। बंदे के मित्र ने उसे खींच न लिया होता तो धम्म से एक मोटा कटहल खोपड़ी फोड़ गया होता। चाय-शाय के बाद जब बंदा वापस होने को हुआ था तो साईकिल के कैरियर पर उसी मोटे कटहल को बंधा हुआ पाया। पहली दफे आने का प्रतीक चिह्न। 
उसके बाद भी कई बार कटहल के साथ वापसी हुई। लेकिन त्रासदी देखिये। सात पुश्त पहले कटहल चोरी में बंदे का कोई पूर्वज धरा गया था। मालिन ने श्राप दिया था कि कटहल खाया नहीं कि सिर के टुकड़े-टुकड़े हुए। किसी को बताते भी शर्म आती थी। ऐसे में कटहल पड़ोसियों में टुकड़े-टुकड़े होकर बंटता। 
मित्र किसी के घर विजिट करते थे तो मिठाई की जगह कटहल उपहार में ले जाते थे। हम जब कटहल के साथ लौटते तो पूछने की ज़रूरत न पड़ती थी कि कहां से आये हो? बंदे के विवाह की दसवीं वर्षगांठ पर उपहार स्वरूप बोरे में दस कटहल बांध लाये। प्रथानुसार अगले दिन पड़ोसियों में बांट दिए।
शाम को पड़ोस की मिसेस त्रिवेदी आयीं। बड़े कटोरे में सब्जी लेकर। बंदे ने डरते-डरते एक चम्मच मुंह में डाला। बहुत अच्छी लगी। बंदे ने पूछा - काहे की है यह सब्ज़ी?
मिसेस त्रिवेदी खिलखिला कर हंस दीं - कटहल की। आपही के घर से तो गया था कटहल।
बंदे को तो काटो खून नहीं। सबसे पहले खोपड़ी टटोली। बिलकुल महफूज़ थी। बंदे ने हज़ार बार खुद को कोसा - यार हमें क्या मालूम था कि इतना स्वादिष्ट होता है कटहल? सालों से मित्र द्वारा प्यार से दिए कटहल पड़ोसियों में बांटते फिरते हो। लानत है तुझ पर।
यह तो अच्छा हुआ कि पिछवाड़े वाले भारती जी के घर ताला पड़ा  था। इस कारण दो कटहल बच गए। मेमसाब तो फ़ौरन मिसेस त्रिवेदी के घर रवाना हो गयीं, कटहल बनाने की रेसिपी लेने। 
बहरहाल, उस दिन के बाद से बंदे का परिवार ज़बरदस्त कटहल प्रेमी हो गया। सुबह-दोपहर-शाम कटहल ही कटहल। नाना प्रकार के व्यंजन। पिछले कई बरस से कटहल मिस करने का ग़म भी मिटाना था। मेमसाब अक्सर कहने लगीं - शाम मित्र के घर से होते हुए लौटना। शायद एक-आध कटहल मिल जाए।