Sunday, February 21, 2016

मन में हो विश्वास।

- वीर विनोद छाबड़ा
एक बुज़ुर्ग ने हमें कभी समझाया था हर सवेरा और नया जन्म है। दुःख भी हैं और सुख भी, जिसे आना है उसे कोई रोक नही सकता। नियति का खेल किसी न जाना। जो भी है, जैसा है उसे एन्जॉय करो।

हमारे पिताजी को कैंसर था। मृत्यु दो-तीन महीने में सुनिश्चित थी। ऐसा तमाम डॉक्टरों ने बताया। सारे जतन भी कर लिए। लेकिन बावजूद इसके उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। एक होमियोपैथ से कंसल्ट किया। उसने दवा दी। लेकिन उससे ज्यादा एक विश्वास पैदा किया कि आप ठीक जायेंगे। गारंटी है मेरी। हर तीन महीने बाद एक अल्ट्रा साउंड कराते थे और बताते थे कि आपकी किडनी का कैंसर लंप ज़रा-ज़रा करके कम हो रहा है, फ़ैल नहीं रहा। पिताजी ने इसे सच माना। ज़िंदगी एन्जॉय की। हालांकि होनी टल नहीं सकी, लेकिन उम्र में साढ़े तीन साल का इज़ाफ़ा हो गया। हंसते-खेलते बिना तकलीफ़ दिए चले गए।
हम यह नहीं कहते कि होमियोपैथी की दवा से फ़ायदा हुआ या नहीं। लेकिन उनका आशा के विपरीत ज्यादा जीना कोई चमत्कार ज़रूर रहा।
मेरे विचार से अगर डॉक्टर और मरीज़ में परफेक्ट अंडरस्टैंडिंग हो। डॉक्टर मरीज़ को यकीन दिला दे कि वो बिलकुल ठीक हो जायेगा। उससे हंसी-मज़ाक भी करे। उसके शौक के बारे में पूछे और रूचि ले तो मरीज़ जल्दी ठीक होता है और मेडिकल साइंस

Saturday, February 20, 2016

आप आये बिजली गयी।

- वीर विनोद छाबड़ा 
एक्स बिजली कर्मी हूं। हमेशा डर लगा रहता है कि ऐसा न हो कि हम बिंदास गले मिल कर हाल-पूछें और वो पलटवार कर दे - आप बिजली वालों के राज में जी रहे हैं, बस।

बिजली वालों की गलतियों और हिमाकतों को डिफेंड करते-करते हमारी बैंड बज चुकी है। किसी का बिल ठीक कराना टेढ़ी खीर है। आज तक बिल ठीक करने वालों ने अपने पिताजी की नहीं सुनी तो हम रिटायर की क्या सुनेंगे?
जब-जब बत्ती जाती है तो मेमसाब और बेटी बत्ती वालों की पुंगी बजा देती हैं। लपेटे में हम भी आ जाते हैं - इन्हीं के भाई-बंधु तो हैं। जैसे ये निठल्ले वैसे वो भी। तभी तो आये दिन पिटते हैं।
बिजली महंगी होती है तो मोहल्ले वाले हमें घूर कर देखते हैं। अरे भाई इसमें हमारा क्या कसूर? लेकिन बड़बड़ाने से हम भी बाज़ नहीं आते - साबुन की बट्टी एक रुपया महंगी हो गयी और चीनी दो रूपये, तब तो गाली नहीं देते हो?
उस दिन एक मित्र के घर गए। अभी बैठने को हुए ही थे कि बिजली चली गयी। कमेंट सुनने को मिल गया - लो आप आये और बिजली गयी।
ऐसा अक्सर होता है कि हम किसी मित्र/रिश्तेदार के घर अगर १५-२० मिनट बैठे तो एक बार बिजली ज़रूर जाती है।
जितने घर उससे ज्यादा बत्ती की समस्याएं और उनकी शिकायतें। उस दिन एक साहब बता रहे थे - महंगाई से ज्यादा मैं बत्ती वालों से परेशान हूं। 
इन सब से इतर हमारे मित्र राजन प्रसाद निकले। एक मोटी सी फाईल निकाल लाये। उस पर लिखा था - इलेक्ट्रिसिटी।
हम घबरा गए - हे भगवान! फिर बिजली का बिल।
राजनजी हमारे मन की व्यथा को पढ़ लेते हैं - अरे बाबा, ऐसा कुछ नहीं है। मैं तो बस ये बताना चाहता हूं कि हम १९६३ में लखनऊ आये। तब से अब तक के बिजली के बिल इस फाइल में संभाल कर रखे हैं।

हमारे दिल को राहत मिली। सांस भी लौट आई।
हमें याद आता है कि १९६३ में लखनऊ की बिजली सप्लाई एक प्राइवेट कंपनी के हवाले थी। जिसका मुख्यालय कलकत्ता में होता था।
उन दिनों हम स्टेशन के सामने मल्टी स्टोरी रेलवे कॉलोनी में रहते थे। हमारी बिजली की लाईन रेलवे स्टेशन से जुड़ी थी। मौजां ही मौजां थीं।

Friday, February 19, 2016

जब हम होंगे पांच हज़ारी।

- वीर विनोद छाबड़ा
सितंबर २०१३, फेस बुक पर मेरा पदार्पण हुआ। हम बहुत उत्साहित थे। पता चला कि पांच हज़ारी होना फख्र की बात होती है। ठीक वैसे ही जैसे बरसों पहले बिनाका/सिबाका गीत माला में १८ बार बजने वाला गाना सरताज बन जाता था।


हमने सोचा - पांच क्या, दस हज़ारी भी बन के दिखा दूंगा। बस चुटकी बजाने की देर है। लेकिन हमें न मालूम था कि यहां खुशियां हैं कम, बेशुमार हैं ग़म। बहुत दुश्वारियां पेश आईं। रोज़ना ढेर रिक्वेस्ट भेजते। और सारा-सारा दिन झांकते रहते कि शायद कोई आया है। ज़रा सी आहट होती तो  दिल सोचता कि कहीं ये वो तो नहीं। कोई आया, धड़कन कहती है। 
कई बार तो हफ़्ता भर गुज़र जाता। पत्ता तक न खड़कता। दो बार तो फेस बुक के मालिक ज़ुकेरबर्ग ने भी डांट दिया, चुपचाप बैठो वरना कान पकड़ कर बाहर कर दूंगा।

उन दिनों हमें अपनी किशोरवस्था के वो दिन याद आए जब हम शीशी में भटकती आत्मा, भुतही कोठी का जिन्न, ढक्कन वाली भूतनी, ज़हरीली चुड़ैल जैसी वाहियात भुतई कहानियां लिखते थे। इन्हें हम मुल्क की नामी पत्रिकाओं में भेजते थे। लेकिन न छपीं और न कभी लौट कर ही आयीं। हो सकता है कि संपादक महोदय डर गए हों। हमारा दूसरा पाठक हमारा एक मित्र होता था। वो चाय और सिगरेट की शर्त पर इन्हें सुनता था।

बहरहाल, डिप्रेशन के उस दौर में हम एक दिन गुनगुना रहे थे - आंसू भरी हैं ये जीवन की राहें, कोई उनसे कह दे, हमें भूल जाये... तभी एक मित्र आये। उन्होंने हौंसला बढ़ाया फ़िक्र नहीं करो। बस क़लम चलाते रहो। छापने वाला संपादक भी मिलेगा और पाठक भी।

चूंकि हम सकारात्मकता हमारे डीएनए में रही है इसलिए अच्छे बच्चे की तरह हम अपना काम करते रहे और कारवां बढ़ता रहा। इस दौरान निज़ी ज़िंदगी में बहुत उठा-पटक देखीं। खुद को पुनः खोजा। परिमार्जित करता रहा। फेस बुक के मित्रों के दुःख-सुख को अपना समझने का अहसास किया। दुनिया में सुख है तो दुःख है और दुःख है तो सुख भी।

अब सफ़र तकरीबन पूरा होने को है। पिछले कई दिनों से हम पांच हज़ारी के आस-पास टहल रहे हैं। ढेर रिक्वेस्ट रखी हैं। रोज़ तीन-चार पर मोहर लगती है और इतने ही निष्क्रिय लोगों को बहुत दुःख के साथ बाहर होना पड़ता है। गाली-गलौज करने वालों और बीपी बढ़ाने वाले कुतर्कियों की सफ़ाई भी जारी है।

Thursday, February 18, 2016

बॉर्न टैलेंट बनाम गॉड गिफ्टेड टैलेंट।

-वीर विनोद छाबड़ा
एक बहुत बड़े व्यापारिक संस्थान में सहायक की पोस्ट के लिए विज्ञापन प्रकाशित हुआ।
नौकरी क्या स्वयंवर जैसा खुला खेल था।

इंटरव्यू में पूछा जाने वाला सवाल पहले ही बता दिया गया। शर्त यही थी कि जो उदाहरण सहित सही जवाब देगा नौकरी उसी को मिलेगी।
सवाल यह था - पैदाइशी टैलेंट और गॉड गिफ्टेड टैलेंट क्या होता है?
सबको मालूम था कि इस कंपनी के बॉस की एक खूबसूरत बेटी है। उसे सहायक की नहीं दामाद यानि वारिस की ज़रूरत है।
लाखों अर्जियां आ गयीं। एक से बढ़ कर एक टैलेंट वाले। खूबसूरत और अकलमंद। लाखों करोड़ों की नौकरी करने वालों ने भी अप्लाई किया।
सिफारिशें भी हज़ारों में आयीं- घर की कामवाली बाई से लेकर नंबर हीरो-हीरोइन और मंत्री-संत्री तक से। विदेश के मुखिया भी रूचि लेने लगे।
लेकिन कंपनी के बॉस ने इन सबको किनारे कर दिया। सिफारिश मतलब डिस-क्वालिफिकेशन।  
शार्ट लिस्ट करने के बाद कई हज़ार अभ्यर्थियों को इंटरव्यू के लिए बुलाया गया। कोई भी स्पष्ट और सटीक उदाहरण नहीं दे पाया। बॉस उदास हो गए - शायद मेरी कंपनी की किस्मत में काबिल सहायक नहीं है, जिस पर मैं ऐतबार कर सकूं।
तभी सेक्रेटरी ने कहा - सर, एक आख़िरी कैंडिडेट बचा है।
बॉस ने भारी मन से कहा - भेजो। इसे भी देख लें। शायद मेरा नसीब अच्छा हो।
एक दुबला-पतला साधारण शक्ल-सूरत वाला नौजवान दाखिल हुआ। उसके चेहरे पर आत्मविश्वास की चमक झलक रही थी।
बॉस ने एक हजारवीं दफ़े सवाल किया - क्या तुम्हें यकीन है कि तुम्हारे पास मेरे सवाल का जवाब है?
नौजवान ने सीना ठोंक कर जवाब दिया - यस सर।
बॉस ने जम्हाई ली - तो बताओ।
नौजवान ने बताया - सर, मैं किसी भी टॉपिक पर मैक्सिमम दो घंटे भाषण दे सकता हूं। सर, यह तो हुआ पैदाइशी टैलेंट।

Wednesday, February 17, 2016

विदूषक बनाम खलनायक!

-वीर विनोद छाबड़ा  
दि ग्रेट डिक्टेटर - चार्ली चैपलिन की सबसे कामयाब और उद्देश्यपूर्ण फिल्म है।
यह चैपलिन की पहली बोलती फिल्म भी थी। हालांकि फिल्म का एक अच्छा हिस्सा साइलेंट है, चैपलिन की पिछली फिल्मों की तरह।
१९४० की यह फिल्म चैपलिन ने उस दौर के एक वीभत्स सोच के जर्मन नस्लवादी और खब्ती किस्म के इंसान एडॉल्फ हिटलर का मखौल उड़ाने की ग़रज़ से बनाई थी, जिसके सनकपन ने दुनिया को दूसरे विश्वयुद्ध में धकेला था।
लेकिन चैपलिन को कई तरह का भय था। ऐसा न हो बजाये हिटलर के उनका और उनकी फिल्म का मखौल उड़े। और नाज़ी सोच के लोग उनको दुनिया से उड़ा दें।
इस सिलसिले में उन्होंने एक लंबा रिसर्च भी कराया। अपने दोस्तों से सलाह ली।
कई ने मना किया कि रिस्क है। हो सकता है कि कई देशों में यह फिल्म प्रतिबंधित हो जाए। नाज़िओं के समर्थकों और विरोधियों के बीच भीषण दंगे भी हो सकते हैं। युद्ध की विभीषिका झेल रहा यूरोप ज्यादा बड़े संकट में आ जाये। यह भी संभव है कि इस युद्ध में नाज़िओं की जीत हो और चार्ली चैपलिन को सूली पर चढ़ना पड़े।
मगर तमाम तरह से डराने वालों की सलाह को दरकिनार करते हुए उन्होंने अपने मित्र डगलस फेयरबैंक्स की सलाह पर फैसला किया कि दुनिया के महाखलनायक का मुक़ाबला उसी की शक्ल का दुनिया का महाविदूषक करेगा। ऐसा करना उनका फ़र्ज़ है और मानवता व सच की सेवा भी। जान जाती है तो जाए। संसार की सबसे बड़ी घटना के तौर पर ज़माना इसे याद रखेगा।

Tuesday, February 16, 2016

हम मुंह से नहीं, नज़रों से पीते हैं।

- वीर विनोद छाबड़ा
एक्सीडेंट्स से हमारा पुराना नाता है। कई बार एक्सीडेंट हुए। लेकिन हर बार बच गए, अगले एक्सीडेंट के लिए।

वो ३१ दिसंबर, १९९६ की शाम थी। सर्दी पूरे शबाब पर थी। देर शाम का वक़्त था। चिराग जल उठे थे। कई लोग नए साल का जश्न मनाने के लिए शाम होते ही सरूर में आ चुके थे। दफ़्तर का काम समेट कर हम घर लौट रहे थे। रास्ते में पॉलीटेक्निक के कुख्यात मोड़ से हम गुज़रे ही थे - ज़िंदगी एक सफ़र है सुहाना…
अचानक हम किसी मजबूत चट्टान से टकराए। हमारी आंखों के सामने अंधेरा छा गया। स्कूटी का हैंडल हमारे हाथ से छूट गया। हमने हवा में कई कलाबाजियां खायीं। और फिर धड़ाम से ज़मीन पर आ गिरे। लगा किसी ने पटक दिया है।
इस बीच हमें यमराज जी हो-हो कर हंसते नज़र आये। एक किनारे चित्रगुप्त जी हाथ में पोथा-पत्री लिए खड़े दिखे। स्वर्गलोक के तमाम देवी-देवता दोनों हाथ में पुष्प लिए दौड़े चले आये कि कोई अपना बंदा तो नहीं आया। नरक वाले भी भयंकर अट्टहास कर रहे थे - आजा मेरी गाड़ी में बैठ जा। अनेक चांद-सितारों के दर्शन भी हुए।
यह नाना प्रकार के दृश्य हमें क्षणिक बेहोशी के दौरान दिखे। यह तो अच्छा हुआ कि हमने जोश नहीं खोया। वरना एक बार यमराज जी के हत्थे चढ़ गए होते तो वापसी नामुमकिन हो जाती। बहरहाल, हम धड़ाम से गिरे और अगले ही पल उठ बैठे। इससे पहले कि हम सवाल करते कि यह कौन सी जगह है और यह सब कैसे हुआ, एक साहब ने बताया कि आप ज़मीं पर हैं और हमें उन्होंने अहमक़ और गलीज़ सूअर से टकराते देखा था। 
हमें चोट काफी लगी थी। घुटने, हथेलियां, कोहनियां और ठोड़ी छिल गयी थी। हमें महसूस हो रहा था कि हमारे कई दांत हिल हैं। जबड़ा भी दर्द कर रहा है। और यह सब तब हुआ जबकि हम हेलमेट धारण किये हुए थे। एक साहब ने हेलमेट उतारने में मदद की। हेलमेट के सामने बड़ा सा छेद था। शायद किसी नुकीले पत्थर ने घुसने की कोशिश की थी। शुक्र है कि आर-पार नहीं हुआ, वरना माथे पर भी गहरी चोट होती। हो सकता है कि ज़िंदगी से हाथ धो बैठे होते और किसी नरक में अगर हज़्ज़ाम न होते तो किसी देवता के दफ़्तर में बाबूगिरी करते होते।
बहरहाल, हम लंगड़ाते हुए घर पहुंचे। दो नौजवान हमें घर तक छोड़ने आये। हमारी हालत देख कर पत्नी को हैरानी हुई हम ज़िंदा कैसे हैं?

Monday, February 15, 2016

खुजलीवाले की खुजली।

-वीर विनोद छाबड़ा
बंदे के घर के बाहर बालू-मोहरंग गिरी देखी तो पिछली गली के नुक्कड़ वाले प्रेमीजी को खुजली शुरू हो गयी। अभी पिछले ही महीने रसोई में टाईल्स लगीं थीं। लगता है टॉयलेट लीक हो गया है या फिर गूं वाले विज्ञापन का असर।
मांस-मच्छी खाएंगे तो दिन-भर लोटा लेकर दौड़ेंगे ही न! कभी लीकेज तो कभी जाम। फिर सरकारी बाबू हैं, जुगाड़ लगा कर सब्सिडी पा लिए होंगे।
बंदा प्रेमीजी के तन-बदन में अक्सर होने वाली खुजली और दूसरों को खुजलाने की आदत से परिचित हैं। फिर भी बंदे ने ऐसे चिपकू खड़ूस को एकदम से भगाना उचित नहीं समझा। आखिर विरासत में मिली आदर-सत्कार संस्कार की परंपरा भी कोई चीज़ है।
प्रेमीजी तीखी नज़र से मुआयना करते हैं। सुना मकान बनवा रहे हैं? यह पूछते हुए वो मकान के अंदर घुस गए।
बंदे के जी में आया, कमबख्त को दो अदद रसीद दूं कान नीचे। देख रहा है, निर्माण हो रहा है। फिर भी पूछ रहा है। अंधा कहीं का।
प्रेमीजी के मुंह में पेचिश लगी है...अच्छा, तो यूं न कहिये कि ऊपर कमरा बनवा रहे हैं। आपको खुद तो ज़रूरत है नहीं। लगता है, किरायेदार रखेंगे। लेकिन बहुत सोच समझ कर रखियेगा। आजकल किरायेदार ही लूट- पाट, चोरी-डकैती, हत्या वगैरह कर रहे हैं। हम तो हर तीसरे महीने बदल देते हैं। अब तो अपने भी लुटेरे होने लगे। किसी का क्या भरोसा?
लेकिन प्रेमीजी की असलियत तो बंदा जानता है। एक नंबर के लीचड़ हैं। ऐसा वाहियात डिज़ाइन है इनके घर का कि काकरोच भी वहां तौबा करे। न हवा, न पानी। सीवर तो अक्सर चोक ही रहता है। धूम्रपान, मदिरापान और नॉन-वेज की बंदिश अलग से। सुबह-दोपहर कुकुर भांति सूंघते फिरें। कोई जिए तो कैसे? बड़े-बड़े चोर-डकैत किरायेदार भी तौबा करें।  
प्रेमीजी धाराप्रवाह खुद से सवाल-जवाब कर रहे हैं। ईंटा कहां से लिया? अच्छा नही है। हमसे कहे होते। हमारे दामाद के दोस्त के भाई का भट्टा है। सस्ता दिलवा देते। ये सीमेंट खजुआ बेकार है। टीएंडटी का लेते, बिलकुल लोहा-लाट। सरिया…प्रेमीजी नुक्स पे नुक्स निकाल रहे हैं। बंदे ने टीवी की आवाज़ ऊंची कर दी। न सुनो न जी जलाओ। याद नहीं प्रेमीजी कब तक पोस्टमार्टम करते रहे।  
अचानक प्रेमीजी ने रिमोट से टीवी बंद कर दिया। आप सुन रहे हैं न कि हम क्या कह रहे हैं। 
बंदा हड़बड़ा जाता है। प्रेमीजी ने एक और पांसा फेंका। प्रेमीजी वास्तु-शास्त्र पर उतर आये। एंट्री लेफ्ट से लें। दीवार चार इंची नहीं, नौ इंची। टॉयलेट बायें लें और किचेन पीछे…प्रेमीजी ने पूरा नक्शा ही बदल डाला। बंदे ने अंदाज़ा लगा लिया कि इनके हिसाब से चले तो एक लाख का चूना लगा समझो।