Friday, October 7, 2016

गुरूद्वारे में हमारी फीलिंग बदल जाती है

- वीर विनोद छाबड़ा
पूजा स्थलों पर हमारा जाना यदा-कदा ही होता है। उस दिन हम अपनी दिवंगत छोटी बहन के शांति पाठ के लिये स्थल तलाश कर रहे थे। कुछ परेशान भी थे। सब कह रहे थे कि स्थल सम्मानजनक होना चाहिए। अचानक ख्याल आया कि गुरुद्वारा उपयुक्त स्थल होगा। इंदिरा नगर के गुरूद्वारे को संपर्क किया। बात बन गयी।
Naka-Charbagh Gurudwara
यूं पहले भी हमारे परिवार में अनेक संस्कार गुरूद्वारे में हुए हैं। इसलिए नहीं कि थोड़े में गुज़ारा हो जाता है। बल्कि यहां की साफ़-सफाई और पारदर्शिता के हम कायल हैं। ऐसा हमने कहीं और नहीं देखा। आप जो भी श्रद्धा से देंगे, स्वीकार्य होगा और उसकी रसीद मिलेगी। मांगा कुछ नहीं जाता। उस दिन भी यही हुआ। हमें यहां के सारे बंदे कार सेवा करते हुए मिले। हम भी कारसेवा में शामिल हो गए। थोड़ी देर जोड़े (जूते) साफ कर लिए। मन को बहुत सकूं मिला। ठीक टाईम पर कार्यक्रम शुरू हुआ और ठीक टाईम पर ख़त्म हो गया। प्रबंधक महोदय का कहना था कि वक़्त की क़द्र करनी चाहिए। हमें बहुत अच्छी लगी बात। बहन की आत्मा को सकून मिलेगा। उसकी ज्यादातर सहेलियां भी सिख परिवारों से थीं। खुद भी गुरूद्वारे आया-जाया करती थी।  
यूं कारसेवा हमने बचपन में खूब की है, लखनऊ के चंदर नगर और चारबाग़ के बड़े गुरूद्वारे में। यहां हमारे बचपन से लेकर जवानी तक का ढेर हिस्सा गुज़रा है।
गुरुद्वारों की हमारी ज़िंदगी में अहम भूमिका है। परिवार के बहुत से संस्कार गुरुद्वारों में ही हुए हैं। याद पड़ता है कि बचपन में छुट्टियों में नानी के घर अंबाला जाना होता था। बहुत नज़दीक था गुरुद्वारा। नानी सुबह-शाम गुरूद्वारे मत्था टेकने जाती थी। मां बताया करती थी कि कहीं जाना हुआ करता था तो हम भाई-बहनों को गुरूद्वारे में भाई के पास छोड़ दिया करती थीं। हम वहीं खेलते-कूदते थे। भूख लगती थी तो लंगर छक लिया। कड़ाह प्रसाद ग्रहण किया और घड़े का ठंडा पानी पीकर सो गए। पता ही नहीं चलता था कि कब मां हमें घर ले गयी।
Yahiyaganj Gurudwara
उन दिनों हमारे लिए गुरूद्वारे का मतलब यही होता था- कड़ाह प्रसाद यानि देशी घी में बना हलवा। घर में भी हम लोग की डिमांड रहती थी कि गुरूद्वारे वाला हलवा। मगर गुरूद्वारे के कड़ाह प्रसाद का टेस्ट हमेशा अनूठा ही रहा। हमने छह साल विद्यांत कॉलेज में पढाई की है। घर और कॉलेज के बीच बांसमंडी चौराहे पर ही था बड़ा गुरुद्वारा। वापसी पर कड़ाह प्रसाद खाना कभी नहीं भूले। हमें ससुराल भी मिला तो उसकी दीवार पानदरीबा के चूहड़ सिंह गुरूद्वारे से सटी हुई थी। यानी हमारी मेमसाब आधी तो सिखणी है ही। उसकी बनारस वाली बड़ी भाभी भी सिख परिवार की है।

Thursday, October 6, 2016

थानेदार फूफा जी

- वीर विनोद छाबड़ा
पुलिस। बचपन से ही सुनते आये हैं - न इनकी दुश्मनी अच्छी और न दोस्ती। लेकिन हमें याद है कि हमारे खानदान में एक पुलिस वाले का खूब आना-जाना था।  यह दिल्ली में किसी इलाके के थानेदार हुआ करते थे। तुर्रेदार खाकी पगड़ी। और कलफ़ लगी खाकी वर्दी। सूर्ख रौबीला चेहरा। बड़ी बड़ी मूंछें, जिसके दोनों सिरे वो अक्सर मरोड़ा करते थे। आंखें भी उनकी लाल लाल होती थीं। कमर में भूरे रंग की चमड़े की बेल्ट। जिसमें कई गोलियां टंगी रहतीं थीं और साथ में भरा हुआ पिस्तौल। सिपाही से प्रमोटेड थानेदार थे। राजेंद्र नगर या देवनगर में इनका घर हुआ करते थे।
हमारे दादा जी सरहद पार से आये थे। सरकार ने उन्हें कुतब रोड पर एक बड़ा सा मकान अलॉट कर रखा था। इसकी डियोढ़ी और बहुत लंबी और चौड़ी थी। दोनों तरफ खटिया बिछी रहती थी। बड़ा परिवार था और आस-पास कई रिफ्यूजी खोलियां बना कर रहते थे। गर्मी के दिनों में ठंडी ठंडी हवा बहती थी। उनकी दोपहर वहीं कटा करती थी। वो थानेदार फूफा भी ड्यूटी करते-करते थक जाते तो वहीं सुस्ताने चले आया करते थे। कभी फुरसत में होते थे तो अपनी एक-आध वीर गाथाएं भी सुना जाते। बड़ी उत्सुकता से सुना जाता था उन्हें। बीच में कोई टोकता तो गुस्सा हो जाते थे। उनकी पोस्टिंग कहीं आस-पास हुआ ही करती थी।
हमने सुना था कि वो बड़े सख्त किस्म के थानेदार थे। चोर-डकैतों का उनको देखते ही पेशाब छूट जाता था।
साठ के दशक में एक मुकद्दमे के सिलसिले में लखनऊ आये। हमारे ही घर पर ठहरे। हमारे आस-पास के कई लोग कौतूहलवश उन्हें देखने हमारे घर आये। उन्हें देख हम इतना डरे कि स्टोर में जाकर छिप गए। लेकिन उन्होंने हमे ढूंढ निकाला। हमें गोद में उठा लिया। हम रोने लगे थे। लेकिन जब उन्होंने प्यार से हमें चूमा और और टॉफी दी तो हम शांत हो गए।

Wednesday, October 5, 2016

मिस्ट्री गर्ल साधना

- वीर विनोद छाबड़ा
साठ के दशक की सबसे पांच खूबसूरत और टैलेंटेड नायिकाओं का जब ज़िक्र होता है तो साधना का नाम ज़रूर लिया जाता है। सिनेमा से आई वो पहली फैशन आइकॉन थी। माथे पर फैले तराशे हुए बाल, 'साधना कट' के नाम से मशहूर हुए। उनकी यह स्टाईल मशहूर हॉलीवुड एक्ट्रेस ऑड्रे हेपबर्न की याद दिलाती थी। यह उसके प्रेमी आरके नैय्यर की देन थी। 'मेरे महबूब' में साधना की फ़ैमिली कंज़र्वेटिव मुस्लिम थी। ऐसे में भला फैशन से क्या मतलब? लेकिन डायरेक्टर एचएस रवैल ने तमाम एक्सपर्ट विरोध के बावज़ूद उसकी हेयर स्टाईल को जारी रखा। साधना की बुर्के से झांकती नशीली आंखों ने कहर ढा दिया। वाह, सिर्फ़ आंखें ही काफ़ी हैं खूबसूरती का ज़रूरी इफ़ेक्ट डालने के लिए। इसी फ़िल्म में उनका चूड़ीदार पायजामा-कुरता भी घर-घर में चर्चा पा गया। महिलाएं दर्जियों को साधना की फ़िल्में देखने की सलाह देती थीं।   
साधना का जन्म ०२ सितंबर १९४१ को कराची में हुआ था। साधना उनका नाम इसलिए पड़ा क्योंकि साधना बोस उनके पिता की फ़ेवरिट सिंगर थीं। होश संभालते ही उन पर फिल्मों का भूत सवार हुआ। उनके एक्टर कज़िन हरि शिवदासनी मदद की। मुड़ मुड़ के न देख मुड़ के....नादिरा और राज कपूर पर फ़िल्माये 'श्री ४२०' के इस गाने में उनकी बतौर एक्स्ट्रा कुछ झलकियां दिखी। किस्मत देखिये कि बरसों बाद 'दूल्हा-दुल्हन' में वो राजकपूर की नायिका थीं।

कुछ समय बाद साधना को सिंधी फिल्म 'अबाना' में नायिका शीला रमानी की छोटी बहन का रोल मिला। उन्होंने शीला से ऑटोग्राफ मांगे। शीला ने आशीर्वाद दिया था - देखना, एक दिन मैं तुमसे ऑटोग्राफ लेने आऊंगी। एचएस रवैल ने साधना की आंखों में नशीलापन देखा तो राजखोसला को उन आंखों में रहस्यमई किरदार दिखा। एल्फ्रेड हिचकॉक की 'वर्टिगो' के आधार पर भूतिया 'वो कौन थी' में फैशन आइकॉन साधना अब मिस्ट्री गर्ल हो गयी। नैना बरसे रिम-झिम...जो हमने दास्तां सुनाई आप क्यों रोये... इसकी सफलता से उत्साहित होकर राज खोसला ने मेरा साया और फिर अनीता बना डाली। 'मेरा साया' का झुमका गिरा रे...आज भी बहुत मशहूर है।
साधना के ग्लैमर को असल में भुनाया बीआर चोपड़ा ने 'वक़्त' में....कौन आया कि निगाहों में चमक जाग उठी...और फिर 'आरज़ू' में सागर ने। फूलों की रानी बहारों की मलिका... 'गीता मेरा नाम' साधना की आख़िरी फिल्म थी। इस दोहरी भूमिका वाली फिल्म को खुद साधना ने डाइरेक्ट भी किया था।
साधना को मां-बहन के अनेक साईड रोल ऑफर हुए। लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया। मैं चाहती हूं कि अपने चाहने वालों के दिलों में जवान और सुंदर बनी रहूं। फिल्मों से रिटायरमेंट के बाद पब्लिक लाईफ़ से गायब ही हो गयीं। २०१४ में एक कैंसर चैरिटी शो में वो अपने रिश्तेदार रणवीर कपूर के साथ रैंप पर दिखीं। अपनी चिर-परिचित साधना-कट के साथ। रणवीर कपूर के ताऊ रंधीर कपूर के साथ उनकी भतीजी बबिता की शादी हुई थी। लेकिन बबिता के साथ उनकी कभी निभ नहीं पाई। आमने-सामने होने पर भी कभी हाय-हेल्लो नहीं हुई।

साधना अपनी पहली फिल्म 'लव इन शिमला' के डायरेक्टर आरके नैय्यर से शादी करना चाहती थी। लेकिन उनकी मां को यह रिश्ता मंज़ूर नहीं था। क्योंकि नैय्यर सिंधी नहीं थे। १९६६ में राजकपूर के हस्तक्षेप से वे विवाह वेदी तक पहुंचे। उनके विवाहोत्तर जीवन में बहुत उथल-पुथल रही। नैय्यर का कैरियर अच्छा नहीं चला। साधना को फिल्मों में वापस आना पड़ा। तभी साधना को थायराइड की भयानक समस्या हो गयी। ईलाज के लिए उन्हें बोस्टन जाना पड़ा। लौट कर साधना ने 'इंतकाम' की। ज़बरदस्त कामयाबी मिली। इसे नैय्यर ने डायरेक्ट किया था। फिर संजय के साथ 'एक फूल दो माली' और राजेश खन्ना के साथ पुरानी कॉमेडी 'पगड़ी' के रिमेक 'दिल दौलत और दुनिया' भी सफल हुई। इस बीच साधना को 'मिस कैरिज' हुआ। वो दोबारा मां नहीं बन पायी। एक लंबी बीमारी के बाद १९९६ में नैय्यर ने उनका साथ छोड़ दिया। नैय्यर की दिली इच्छा थी कि वो साधना से पहले विदा हों। 

Tuesday, October 4, 2016

डर अब इनसे ज्यादा लगता है

- वीर विनोद छाबड़ा
कई साल पहले की बात है। हम स्टूडेंट हुआ करते थे। नाईट शो देख कर लौट रहे थे। साईकिल लहराते हुए गुनगुना रहे थे - जीवन के सफर में राही मिलते हैं बिछड़ जाने को...

सड़क पर स्ट्रीट लाईट के नाम पर कहीं कहीं बिजली के खंबों पर चालीस वाट के लट्टू जल रहे थे। एक जगह पर अंधेरा था। अचानक हम धड़ाम से गिरे। कुछ पल तक समझ ही नहीं आया कि ये क्या हुआ। तभी एक और झटका लगा। किसी ने हमें उठा कर फेंक दिया। हम चीख उठे। असंख्य तारे एक साथ दिखे थे। कुछ पलों तक तो होशो-हवास भी गुम रहे। जब जाग्रत हुए तो पता चला कि हम गौ माताओं के झुंड पर गिरे थे जो बीच सड़क बैठा जुगाली कर रहीं थीं। हमें यह याद नहीं है कि वो गौ माता थी या सांड, जिसने हमें सींगों पर उठा दूर फ़ेंक था।
ऐसे में कोई राहगीर भी उधर नहीं फटका। जैसे-तैसे खुद ही उठे। थोड़ा उछल-कूद कर भी देखा। अंग-प्रत्यंग सब सही सलामत थे। तभी मद्धिम सी रोशनी दिखी। कोई रिक्शावाला था। छोटी सी लालटेन लगी हुई थी। कहीं दीप कहीं दिल...। उन दिनों रिक्शेवालों के लिए लालटेन ज़रूरी होती थी। उसी की मद्धिम रोशनी में हमें अपनी साईकिल दिखी। गौ माताओं के झुंड के बीच में पड़ी थी। हमने उन स्कूटर वाले भाई साहब की मदद से गौ माताओं को उठाया। साईकिल उठाई। मडगार्ड पिचक कर टायर से चिपक गया था।

खरड़ खरड़ करते हुए घर पहुंचे तो पता चला कि कई जगह से खाल छिल गयी थी और नयी पैंट भी फट गयी थी। सुबह उठे तो बदन बुरी तरह से दुःख रहा था। मां हमें रेलवे के आऊटडोर हॉस्पिटल ले गयी। टिटनस का इंजेक्शन लगा और मरहम-पट्टी हुई। तीन दिन तक सुबह दोपहर शाम गोलियां और शीशी में लाल कड़वा पानी-पानी सा शरबत। 

Monday, October 3, 2016

जनसेवा गयी तेल लेने!

-वीर विनोद छाबड़ा
सुधार व विकास के वादों पर भक्तराज पुनःनिर्वाचित हुए हैं। जनता को पूरी आशा है कि इस बार ज़रूर उखड़ी सड़क बनेगी। चोक सीवर खुलेंगे। जल भराव से निजात मिलेगी। बूढ़े हो चले बदहाल बगीचों  के दिन बहुरेंगे। शुद्ध पानी पीयेंगे। प्रॉपर्टी डीलिंग और अवैध कब्जों के धंधे को समर्पित भक्तराज को ऊपरवाले पर पूरा भरोसा है। ईश्वर सब ठीक करेंगे। उन्होंने अपनी जीत को अधर्म पर जीत के पर्व में मनाने की घोषणा की। इस निमित्त उन्होंने बदहाल पार्क की घास-फूस कटवा कर वहीं फूंकवा दी। आसपास के तमाम घरों में धुआं घुस गया। लोग बेतरह खांसे। वृद्धजनों का तो दम घुटने लगा। दो अस्थमा पीड़ित मरणासन्न स्थिति में अस्पताल पहुंचाए गए।
भक्तराज बोले - आप ही की गल्ती है। खिड़कियां बंद रखनी चाहिए। फिर धर्म-कर्म का मामला है। थोड़ा-बहुत कष्ट तो सहना पड़ता है। इसे भोले का प्रसाद समझिये।
धर्म-कर्म जैसी मिसाईल के सामने भला कौन बोले। मोहल्ला सुधार समिति के अध्यक्ष जी ने भी हां में हां मिलाई। शिकायतकर्ता ढेर हो गए। 

संध्या में झमझमा भजन-कीर्तन हुआ। भक्तराज फिल्मी धुनों पर बने भजनों पर मस्त हो गए। भोंडे तरीके से झूम-झूम नाचे। बजरंगबली के मेकअप में एक भक्त भी खूब नाचा। सौ-पचास के नोट लुटाये गए। मालूम नहीं कि धर्मग्रंथों में हनुमान जी के नृत्य का ज़िक्र है कि नहीं। हो सकता है कि हो। लेकिन इतने भौंडे तरीके से तो नहीं नाचे होंगे। इस कौतुक पर जनता धन्य हुई। जम कर नकद चढ़ावा आया। ईश्वर के नाम पर कम और भक्तराज के नाम पर ज्यादा जयकारे लगे। फिर सबने जमकर स्वादिष्ट भंडारा डकारा।
डकार इस सच का प्रतीक है कि निरीह जनता ने मान लिया है - सड़क इस बार भी नहीं बनी तो कोई बात नहीं। बल्कि नई सीवर लाईन अगर डाली गयी तो मुसीबत ही आएगी। अतिक्रमण कर बनाये हुए सबके गैराज, किचेन गार्डन, दुकानें, चबूतरे टूटेंगे। 
पार्क का विकास होगा तो फूल-पत्ती लगेगी। कोई फूल तोड़ेगा, कोई पौधे रौंदेगा। ख़ामख़्वाह का झगड़ा-फ़साद। झूला लगा तो पहले झूलने की मारा-मारी। फिर कोई झूले से गिरेगा। किसी का सिर फूटा और किसी का माथा। पुलिस में रिपोर्ट और फिर कोर्ट-कचेहरी। लड़ते रहिये उम्र भर? शादी और कनछेदन की पार्टियां कहां होगीं? बच्चे क्रिकेट कहां खेलेंगे? बच्चे धोनी और विराट जैसे होनहार नहीं बनेंगे।
नल में शुद्ध पानी नहीं है, तो क्या हुआ? एक्वागार्ड तो घर घर है ही! 
भैया जैसा है, चलने दो। सब रामभरोसे छोड़ दो। इतना बड़ा कथा-कीर्तन और भंडारा हुआ है। गगनभेदी जयकारे लगे हैं। ऊपर कुछ तो आवाज़ पहुंची ही होगी। कुछ तो कृपा बरसेगी। भाव-विभोर जनता-जनार्दन एकमत में बोली - सड़क, पार्क, पानी, सीवर को मारो गोली।

Sunday, October 2, 2016

डूब कर मरना - एक वाहियात ख्याल

-वीर विनोद छाबड़ा
बरसों पहले की बात है। एक दिन बैठे-ठाले ख्याल आया कि अगर कभी गहरे अवसाद में डूबने की नौबत आई तो नदी में डूब मरना कैसा रहेगा?
तब अपने शहर की इकलौती गोमती नदी पर पांच पुल होते थे।
हम जायजा लेने निशातगंज पुल पर पहुंचे। एक विहंगम दृष्टि चारों दिशाओं में दौड़ाई। पुल से नीचे झांका। पानी बहुत कम था। वो नदी लग ही नहीं रही थी। अपितु एक नाला सा बहता दिखा। हुंह, इसमें तो आदमी डूब ही नहीं सकता।

हम हनुमान सेतु पहुंचे। वहां भी ठीक यही स्थिति थी। डालीगंज, पक्का पुल और बैराज पर भी यही हालत थी। कहीं भी डूब मरने लायक पानी नहीं था।
इतने कम पानी में काम नहीं चलने का। पक्का है कि अव्वल तो हम डूब ही नहीं पाएंगे। दूसरे, यह भी संभव है कि कोई आता-जाता देख ले और कूदने ही न दे।
चलो मानो कूद भी गए तो हो सकता है कि आस-पास घूमता कोई तैराक तुरंत बचा लेगा।
हालांकि ऐसी स्थितियों में दूर-दूर तक तैराक नहीं होते हैं। डूब जाने के बाद लाश निकालने के बाद गोताखोर बुलाये जाते हैं। लेकिन मानने में हर्ज़ ही क्या है कि तैराक आस-पास हो।
और यदि वहां तैराक नहीं हुआ तो कोई और बंदा होगा। वो तो निश्चित ही शोर मचा कर भीड़ जुटा लेगा। और ऐसा हो नहीं सकता कि उस भीड़ में कोई तैराक न हो।
.....चलिये मान लिया कि यह सब नहीं होगा। मान लिया गोमती में पानी भी अच्छा-खासा है। हमने छलांग लगा दी। ऐसे में यह भी तो हो सकता है कि कोई मगरमच्छ अपने जबड़े में फंसा ले या मछलियां नोचने लगें। ओह नो, उफ़्फ़! बड़ा कष्टप्रद होगा इस तरह से मरना।
हम थोड़ा आगे सोचते हैं। फिर ऐसे में किसी को पता भी नहीं चलेगा कि मुझे ज़मीं खा गयी या आकाश निगल गया। तलाश में पत्नी-बच्चे, माता-पिता और मित्रों-रिश्तेदारों को बहुत दौ़ड़-धूप करनी पड़ेगी। पुलिस-थाना और कोर्ट-कचेहरी करते हुए युग निकल जायेगा। ऐसे में तो मर कर भी चैन न मिलेगा। न बाबा न बाबा। हमें ऐसे मरना कतई मंज़ूर नहीं है।
और तभी हमें याद आया, डूबने से बचे हुए एक मित्र का आत्मकथ्य - डूब कर मरना अत्यंत कष्टकारी है। ढेर गंदा पानी पेट और फेफड़ों में घुस गया। दम घुटने लगा। बचाओ-बचाओ की गुहार लगानी पड़ी। यह तो अच्छा हुआ कि किसी ने सुन ली। वरना बड़ी कष्टकर मौत मिली होती। 

Saturday, October 1, 2016

लड़कियों के तकिए के नीचे होती थी देव की तस्वीर

-वीर विनोद छाबड़ा
देवानंद एक विचित्र शख्सियत थे। उनकी चलने की, बोलने की और अभिव्यक्ति की स्टाईल सबसे निराली थी। उनका असली दौर पचास और साठ का दशक था। फिर भी वो कलरफुल पर्सनाल्टी थे। उनकी इमेज सदाबहार थी। सोलह साल की लड़की भी उनके साथ हीरोईन बनने के लिए लालियत रही। यही कारण था कि वो सत्तर और अस्सी के दशक में भी चलते रहे। उनको पुरुषों से ज्यादा महिलाओं द्वारा पसंद किया था। सोलह साल की भी और साठ वाली भी। सिनेमाहाल में मर्दों से ज्यादा महिलाओं मौजूद रहती थी। इसीलिये उनसे लोग रश्क करते थे। गर्ल्स होस्टलों में तकिये के नीचे उनकी की तस्वीर पायी जाती थी।
फ़िल्मी दुनिया और उससे संबंध रखने वाले उन्हें देवसाब कहते थे। देवसाब का मशहूर एक्ट्रेस सुरैया से ज़बरदस्त इश्क चला था। मगर सुरैया की नानी तैयार नहीं थीं। धर्म आड़े आ गया। देवसाब ज्यादा इंतज़ार नहीं कर पाये और अपने बड़े भाई चेतन आनंद की खोज मोना उर्फ़ कल्पना कार्तिक से ब्याह रचा लिया। 
उस ज़माने में देवानंद कट हेयर स्टाइल के प्रति नौजवानों में जूनून की हद दीवानगी थी। देवसाब की कैप भी बड़ी मशहूर हुई। ये कैप 'ज्वेल थीफ़' (१९६७) की देन थीं। ये वो दौर था जब देवसाब की फिल्मों का बड़ी शिद्दत से इंतज़ार रहता था।
नायकों की लोकप्रियता का पता हेयर कटिंग सैलूनों की दीवारों पर चिपकी तस्वीरों से चलता था। दो राय नहीं कि हॉट फ़ेवरिट में देवानंद पहले पर होते थे और दिलीप कुमार दूसरे पर। अशोक कुमार, राजकपूर, प्रदीप कुमार, राजेंद्र कुमार, सुनील दत्त आदि पीछे-पीछे।  

मज़े की बात यह है कि दिलीप और देव परदे के पीछे गहरे दोस्त थे। संघर्ष के दिनों में एक ही लोकल से आया-जाया करते थे। इनको एक साथ 'इंसानियत' (१९५५) में देखा था।
कई नायिकाओं का कैरियर बनाने का श्रेय देवसाब को जाता है। ज़ीनत अमान हालांकि ओपी रल्हन की खोज थी। परंतु उसे ज़मीन से आसमान पर बैठाने का काम देवसाब ने किया। 'हरे रामा हरे कृष्णा में' वो उनकी बहन थीं। बताया जाता है कि निर्माण के दौरान ज़ीनत परेशान थी कि कहीं ऐसा न हो कि फिल्म सफल हो जाये और उस पर बहन होने का ठप्पा लग जाए। देवसाब ने उसकी मुश्किल दूर कर दी। अगली फिल्म 'हीरा पन्ना' में घोषित कर दी जिसमें नायिका ज़ीनत थी। कलाबाज़, डार्लिंग डार्लिंग, वांटेड आदि कई फिल्मों में भी दोनों नायक-नायिका रहे। लेकिन बात कुछ हज़म नहीं हुई। दरअसल, उन दिनों पचास की उम्र में  कलाकार आमतौर पर चरित्र भूमिकाओं में देखे जाते थे और देवसाब हीरो बने घूम रहे थे। लेकिन जब 'देस परदेस' में जब ५५ की पिता समान उम्र में देवसाब १७ की टीना मुनीम से इश्क फरमाते देखे गए तो उनके घनघोर दीवानों को भी उलटी हो गयी। देवसाब की चिरयुवा छवि छिन्न-भिन्न हो गयी। लेकिन उन पर कोई फर्क नही पड़ा। वो खुद को नायक रख कर बद्दस्तूर फ़िल्में बनाते रहे।
'हम दोनों' (१९६१) में वो डबल रोल में थे। इसे लेकर विवाद भी हुआ। परदे पर इसे निर्देशित करने का क्रेडिट अमरजीत को दिया गया। लेकिन देवसाब का कहना था कि वास्तविक निर्देशक उनके छोटे भाई विजयानंद थे। इसकी अहमियत का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि इस सुपरहिट ब्लैक एंड व्हाईट फ़िल्म का २०११ में रंगीन वर्जन रिलीज़ हुआ।

जॉनी मेरा नाम (१९७०) बहुत बड़ी हिट थी। लेकिन इस फ़िल्म के बाद से देवसाब की मशहूर हेयर स्टाइल काफी हद तक छंट गयी। उनके बाल पहले जैसे नहीं रहे। इसी के साथ उनके प्रति दीवानगी में भी कमी आई। दरअसल एक नई पीढ़ी आ चुकी थी जो धर्मेंद्र, जीतेंद्र, राजेश खन्ना की दीवानी थी और अमिताभ बच्चन दस्तक दे रहे थे। इसके बाद हालांकि देवसाब ने कई फ़िल्में बनायीं मगर अपने सुख के लिए। वो कहते थे कि इससे मुझे एनर्जी मिलती है।
साठ के दशक की सफलतम फिल्मों की सूची में देवसाब की 'ज्वेल थीफ़' का नाम भी दर्ज है। इसका आख़िरी डायलॉग भी बहुत मशहूर हुआ था - और एक था, ज्वेल थीफ़। सचमुच दूसरा ज्वेल थीफ़ पैदा नहीं हुआ और शायद होगा भी नहीं। किसी भी कलाकार को उन्हें कॉपी करना बहुत मुश्किल रहा है। लेकिन मिमिक्री आर्टिस्टों ने उनके नाम पर बहुत पैसा कमाया।