Wednesday, February 22, 2017

पृथ्वी जाता है, अकबर आता है

- वीर विनोद छाबड़ा
१९२८ के आस-पास का एक दिन। बंबई के कोलाबा स्टेशन पर पेशावर से आई फ्रण्टियर मेल रूकती है। उसमें से एक खूबसूरत, ऊंचे कद-बुत का पठान उतरता है। उसकी भूरी आंखों में एक हसीन ख्वाब है, उमंग है, विश्वास है। वो सीधे इंपीरियल स्टूडियो पहुंचता है। वहां उसकी मुलाकात डायरेक्टर अर्दिशिर ईरानी से होती है। वो उसे बाहर टंगा बोर्ड दिखाते हैं, जिस पर लिखा है - नो वेकैंसी। वो हट करता है कि उसे काम चाहिए। वो नौजवान अपनी खूबियां बताता है। वो ग्रेजुएट है। पंजाबी, उर्दू, पश्तो और अंग्रेज़ी पर उसकी बहुत अच्छी पकड़ है। उसने कई नाटकों में काम किया है। उसका व्यक्तित्व तो आकर्षक है ही। अर्दिशिर तंग आ जाते हैं। ठीक है, लेकिन अनपेड एक्स्ट्रा का काम है। नौजवान पूछता है कि मुझे करना क्या होगा। अर्दिशिर झल्ला कर बताते हैं, महत्वहीन, भीड़ का हिस्सा। और वो नौजवान ख़ुशी-ख़ुशी तैयार हो जाता है। अर्दिशिर उसके कंधे पर हाथ रखते हैं। तुम बहुत दूर तक जाओगे। उस नौजवान का नाम था - पृथ्वीराज कपूर। 
पूरे १० दिन हो चुके थे पृथ्वी को भीड़ में खड़े हुए। 'सिनेमा गर्ल' फिल्म की शूटिंग चल रही थी। उस दिन फिल्म का हीरो नहीं आया। डायरेक्टर बहुत क्रोधित  हुआ। हीरो को बदल डालो। हीरोइन से कहा कि सामने एक्स्ट्रा आर्टिस्ट्स की भीड़ में किसी को अपना हीरो चुन लो। हीरोइन ने पृथ्वीराज की ओर ईशारा कर दिया। और इस तरह वो नायक बन गए - १०० रूपये महीने के वेतन पर।

१९३१ में अर्दिशिर ईरानी ने भारत की पहली बोलती फिल्म 'आलमआरा' बनायीं। इसमें पृथ्वीराज की भी सेकंड लीड में भूमिका थी। उन दिनों 'फ़िल्म इंडिया' के प्रकाशक-संपादक बाबूराव पटेल जाने क्यों पृथ्वीराज से खुंदक रखने लगे। उन्होंने एक आर्टिकल में लिखा - पठान जैसे चेहरे वाले पृथ्वीराज बांबे में चल नहीं पाओगे। बेहतर है तुम फ्रंटीयर मेल से पेशावर लौट जाओ। पृथ्वीराज ने जवाब दिया था - मैं पेशावर नहीं लौटूंगा। बल्कि तैर कर सात समंदर पार हॉलीवुड चला जाऊंगा। उसके बाद बाबूराव पटेल ने उनसे पंगा नहीं लिया।
इस बीच पृथ्वीराज की निजी ज़िंदगी में एक के बाद एक दो बहुत बड़ी त्रासदियां हुईं। उनके एक बेटे को डबल निमोनिया ने निगल लिया और दो साल के अन्य बेटे ने भूल से चूहे मारने वाली दवा खा ली। उस समय उनकी पत्नी के गर्भ में चौथा बच्चा था।
Prithviraj Kapoor
 
१९४१ में रिलीज़ सोहराब मोदी की 'पुकार' पृथ्वीराज के कैरियर में मील का पत्थर बनी। अपने रंग-रूप, डील-डौल और बुलंद आवाज़ के कारण वो आक्रांता सिकंदर की भूमिका में खूब जंचे। सोहराब मोदी इसमें राजा पुरु की भूमिका में थे। इसी में वो कालजयी संवाद थे। सिकंदर ने कैदी पुरु से पूछा था - तेरे साथ क्या सलूक किया जाए? पुरु ने गर्व से जवाब दिया था - वही जो एक राजा, दूसरे राजा के साथ करता है। और सिकंदर जीता हुआ राजपाट पुरु को लौटा कर अपने देश वापसी का फैसला करता है। बरसों बाद १९६५ में 'पुकार' एक बार फिर बनी, लेकिन 'सिकंदर' के नाम से। इस बार सिकंदर दारासिंह और पुरु पृथ्वीराज थे।
'पुकार' के बाद पृथ्वीराज स्वर्णिम काल शुरू हो गया। लेकिन बिना नाटक के उन्हें संतुष्टि नहीं मिल रही थी। और अंततः १९४६ में उन्होंने पृथ्वी थिएटर की नींव रख कर अपने लंबित सपने को पूरा कर ही डाला। पूरे भारत में उन्होंने करीब ६०० शो किये जिसमें अधिकतर में वो स्वयं हीरो रहे।

Tuesday, February 21, 2017

सुदर्शन - मुसाफिरों के लिए बढ़िया टाइमपास

-वीर विनोद छाबड़ा
लखनऊ के चारबाग़ रेलवे स्टेशन के सामने रेलवे की एक रिहाइशी इमारत होती थी मल्टी स्टोरी। पिताजी रेलवे मुलाज़िम थे। मैं इसमें १९६१ से १९८२ तक करीब २१ रहा हूं। इसके पीछे एक सिनेमाहाल था सुदर्शन। हाफ रेट का सिनेमाहाल। अभी कोई पंद्रह दिन पहले ये नयी साज-सज्जा के साथ सुदर्शन चारबाग़ के नाम से फिर शुरू हुआ है।
संयोग से आज मेरा मेरा इधर से गुज़ारना हुआ। कई यादें ताज़ा हो गयीं।
मैंने यहां ढेर फ़िल्में देखी हैं। गेट कीपर से सेटिंग कर रखी थी। आधी फिल्म आज और बाकी कल। घर में कानोंकान खबर नहीं होने पाती थी।
जब तक मैं मल्टी स्टोरी में रहा यही पाया कि सुदर्शन में विजिट करने वालों में कुछ तो आस-पास के रहने वाले लोकल थे। ये वो थे जिन्हें खटमलों से बेहद  इश्क़ था। या जिन्हें खटमल के होने से फर्क नहीं पड़ता था। घर में भी खटमल और यहां भी।
ज्यादातर तमाशबीन रिक्शा-तांगेवाले। होटलों और ऑटोगैराज में काम करने वाले कामगार। खोमचा लगाने वाले कमउम्र बच्चे।
अलावा इसके एक अच्छी संख्या उन व्यापारी मुसाफिरों की थी जिन्हें दिन भर की खरीदारी करने के बाद लखनऊ जंक्शन से रात बारह बजे वाली गोरखपुर वाली ट्रेन पकड़नी होती थी।
और वो मज़दूर भाई भी जो सुबह दिल्ली-बम्बई से आकर लखनऊ उतरता था। दिन भर परिवार के लिए उपहार खरीदता था। खूब ठगा जाता। और वही रात बारह बजे गोरखपुर की ट्रेन।
सुदर्शन फिल्मिस्तान लिमिटेड की सिनेमा चैन में था। इसलिए फ़िल्में अच्छी ही होती थीं। प्रिंट बस गुज़ारे लायक होते थे।
जिस मक़सद से मैं ये पोस्ट लिख रहा हूं वो ये बताने के लिए है कि टाइम पास के लिए सुदर्शन सिनेमा से बढ़िया और सस्ती कोई मुफ़ीद जगह नहीं थी।आसपास कोई और सिनेमाहाल या रमणीक स्थल भी नहीं। जिसको फिल्म देखनी है, देखे बड़े शौक से और जिसे सोना है, तीन घंटे सो ले आराम से। ट्रेन चलने से ठीक १५-२० मिनट पहले उठ लेना है। फिल्म छूट जाए तो छूटे। बस गड्डी न छूटे।
वहां इसी चक्कर में हंगामे भी होते रहते थे। फिल्म देखते-देखते ऐसी ज़बरदस्त नींद आती थी कि ट्रेन छूट जाती थी। शामत बेचारे गेटकीपर की आती कि उठाया क्यों नहीं। बेचारे गेटकीपर का यही जवाब होता था - साहब इतनी वाहियात फिल्म थी कि मैं खुद ही सो गया।

Monday, February 20, 2017

ओम गणेशाय नमः

- वीर विनोद छाबड़ा
कोई पैंतीस साल पहले की बात है। हम लखनऊ में कुटिया बनवा रहे थे। तब से अब तक इसमें कई बदलाव हुए हैं। कई मिस्त्रियों और मज़दूरों ने पसीना बहाया है। और हमारा तो खून और पसीना दोनों बहा है। दीवारें बोलती होतीं तो ज़रूर बतातीं कि इस मकान की पहली तामीर वली मोहम्मद मिस्त्री ने की थी। रिहाईश ज़िला गोपालगंज, बिहार। 
वो बड़े विचित्र प्राणी थे। काफ़ी वृद्ध भी। उनके चेहरे पर खिंची गहरी झुर्रियां उनके इतिहास और लंबे तजुर्बे का अहसास कराती थीं। किस्से-कहानियों से भरपूर। इन्हीं का लिहाज़ करते हुए हमने उन्हें हमेशा आप कहा। लेकिन कमाल का जीवट था। काम करने और कराने में उस्ताद। और एक नंबर के फेंकू भी।
वो हमारे पिताजी से हमेशा बात करते रहते थे। हमने पिताजी को कई बार कहा भी। इनसे बातें कम किया करें। काम के पैसे देते हैं, बातों के नहीं। लेकिन न तो पिताजी माने और न ही मिस्त्री चचा। हम उन्हें चचा कहते थे। 
मकान बनाने के दौरान वो कई बार बीमार भी पड़े। उनका बुढ़ापा देख कर हमें हमेशा डर लगता कि कहीं लुढ़क न जायें। भगवान से मनाते थे कि वो जल्दी से ठीक हो जायें। एक बार लंबे बीमार पड़े। घर पर डॉक्टर को बुलाना पड़ा। टाइफाईड निकला। पिताजी ने दवा-दारू का पूरा खर्च उठाया। अपने अर्धनिर्मित मकान में पनाह दी। बिजली-पानी, मूंग की दाल की खिचड़ी और मच्छरदानी भी। महीना भर लग गया उन्हें ठीक होकर काम पर आने में। इस बीच उनके निर्देशन में दूसरे मज़दूर-मिस्त्री काम करते रहे। उनके साथ-साथ पिताजी ने मिस्त्री चचा को भी दिहाड़ी दी।

एक दिन हमारी उनसे झड़प हो गयी। वो रोज़ पिता जी को नए-नए आईडिया दिया करते थे। इधर पिता जी को भी तकरीबन ब्रेन-वेव आया करती थीं। नतीजा यह हुआ कि काम बढ़ता गया और साथ में दाम भी। तीन महीने की बजाय छह महीने हो गए और फिनीशिंग अभी बाकी थी। हमने कह दिया कि पैसा ऐंठ रहे हैं आप। चचा एक लंबी 'जी' खींच कर चुप हो गए। वो रूठ गए। तीन दिन तक आये ही नहीं। काम रुक गया। इधर पिताजी हम पर गुस्सा हो गए। हम उन्हें मना कर लाये। इसके लिए हमें अपने कान पकड़ने पड़े।  
उनकी गंवई भोजपुरी भाषा बहुत अच्छी लगती थी। वो अपने साथियों से ही नहीं हम सब से भी इसी भाषा में बात करते थे। जब प्यार से बोलते होते तो लगता था कि किसी ने चीनी घोल दी हो।

Sunday, February 19, 2017

लड़की ने रिजेक्ट कर दिया

-वीर विनोद छाबड़ा
पुत्र जब बड़ा होकर कमाना-धमाना शुरू कर देता है तो माता-पिता को उसकी शादी की फ़िक्र लगनी शुरू होती है। हमारे माता-पिता भी उससे अलग नहीं थे। लेकिन हम एक-दो साल और स्ट्रगल करना चाहते थे।
ज़बरदस्ती एक लड़की दिखाई। हमने फिर वही कहा- लड़की अच्छी है। लेकिन हमें दो साल का वक़्त दीजिये।
लड़की ने समझा कि हमने उसे रिजेक्ट किया है। उसने ज़रूर हमें हज़ार-हज़ार गलियां दी होंगी। माता-पिता भी बहुत नाराज़ हुए। घर में काफ़ी तनावपूर्ण माहौल था।
ऐसे में मेरे मामा की भोपाल से चिट्ठी आई - यहां आ जाओ। दिल बहल जायेगा। हमने ऑफिस से छुट्टी ली और भोपाल पहुंच गए।
भोपाल पहुंचे तो पता चला कि मामा ने एक लड़की देख रखी है। उनके दोस्त कपूर साब की बहन है। परिवार इंदौर में है। काफ़ी पढ़ा-लिखा खानदान है।
हमने कहा - मामाजी ये माज़रा क्या है? मुझे अभी नहीं करनी शादी।  
वो बोले - भांजे, मैं प्रॉमिस कर चुका हूं। एक बार चल कर देख तो लो। शादी के लिए जोर नहीं दूंगा। हां या न तुम्हारे पाले में है। जब मामी ने भी जोर डाला तो हम तैयार हो गए।
हम इंदौर पहुंचे। सीधे लड़की के घर। बहुत अच्छा घर था। लेकिन हमें हैरानी हुई कि न चाय, न पानी। सीधा लंबा-चौड़ा इंटरव्यू। लड़की के माता-पिता संतुष्ट हुए कि लड़का सही है।
अगला सीन शूट किया गया। परंपरानुसार लड़की चाय की ट्रे लेकर आई। हमने हौले से गर्दन ऊपर उठाई। लड़की अच्छी थी। लेकिन ऐसे मौकों वाली लाज गायब थी। बल्कि तनाव था। शायद उसे ये सब तमाशा पसंद नहीं। चाय की ट्रे भी मानो पटक दी। सोफे पर धम्म से बैठी। हमें सब अटपटा लगा। पांच मिनट वो बैठी। इस बीच मामी उससे गुफ्तगू करती रही। फिर वो अचानक चली गई।
हमने देखा एक छोटी लड़की बार बार अंदर आ कर मुझे गौर से देखती, जीभ निकाल कर चिढ़ाती, ठेंगा दिखाती और फिर भाग जाती।
अगला सीन - लंच। लड़की भी मौजूद है। अनमनी सी। भोजन के बाद हम हाथ धोने बाहर वाशबेसिन पर गए। वहां वो लड़की खड़ी थी। लगा कुछ कहना चाहती है। लेकिन पीछे-पीछे उसका भाई आ गया। 
हमें यकीन हो गया। उसे ये संबंध मंज़ूर नही। मना नहीं कर पा रही। किसी और को चाहती है। तय कर लिया कि मना करके उसकी परेशानी दूर कर देंगे।

Saturday, February 18, 2017

दिलीप और कामिनी की प्रेम कहानी थी 'गुमराह'

- वीर विनोद छाबड़ा
प्रेम के मामले में दिलीप कुमार की लाईफ़ रील में ही नहीं रीयल में भी त्रासद रही है। फिल्म में जान डालने के लिए वो अपनी नायिकाओं के इतने करीब चले जाते थे कि कई को सचमुच ही दिल दे बैठे। कामिनी कौशल उनका पहला प्यार था। कामिनी ने चालीस के दशक में लाहोर यूनिवर्सिटी से अंग्रेज़ी में बीए आनर्स किया था। वो उन चंद लड़कियों में थी जो फर्राटेदार अंग्रेज़ी बोलती थीं। १९४६ में उन्हें चेतन आनंद 'नीचा नगर' से लेकर आये थे। इस फिल्म को अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हुई थी।
कामिनी का असली नाम उमा कश्यप था। उनका दिलीप कुमार से परिचय 'नदिया के पार' के सेट पर हुआ। लेकिन 'शहीद' (१९४९) उन दोनों की पहली रिलीज़ फिल्म थी। यह सुपर हिट फिल्म थी। इसके बाद उन्होंने शबनम और आरज़ू में काम किया। उनका प्यार परवान चढ़ने लगा।
लेकिन कामिनी के साथ एक समस्या थी। वो विवाहित थी। उनका विवाह असामान्य परिस्थितियों में हुआ था। उन दिनों वो उमंगों के रथ पर सवार रहती थीं।  नित नई ऊंचाई को छूने की तमन्ना रखती थी। सहसा परिवार में एक बहुत बड़ी ट्रेजडी हुई। उनकी बड़ी बहन का एक सड़क दुर्घटना में निधन हो गया। बहन की दो छोटी बेटियां थीं। यक्ष प्रश्न उठा कि कौन पालेगा इन्हें? सबकी आंखें कामिनी की ओर उठ गयीं। उनके पास कोई विकल्प नहीं था। और इस तरह वो अपनी बहन के विधुर पति की पत्नी बनी थीं।
मगर उमंगें यूं आसानी से मरा नहीं करतीं। कामिनी को पता ही नहीं चला कि वो दिलीप कुमार को दिल दे बैठीं। दिलीप कुमार भी उनके बिना बेचैन रहते थे। कामिनी के परिवार को भी खबर हुई। उनका भाई बंदूक लेकर सेट पर पहरा दिया करता था। लेकिन प्यार पहरों से नहीं रुका करता। परंतु इससे पहले कि मामला हद से आगे गुज़रता दोनों को अहसास हुआ कि इस रिश्ते का कोई भविष्य नहीं है। कई ज़िंदगियां तबाह होंगी। बेहतर होगा कि प्यार को कुर्बान कर दिया जाए।
दिलीप कुमार के परिवार से बहुत निकट संबंध रखने वाली सितारा देवी ने एक लेख में लिखा है कि उस दिन दिलीप कुमार बहुत उदास थे। वो बात बदलने की बहुत कोशिश कर रहे थे। लेकिन आंखों से आंसू आना बंद नहीं होना चाहते थे। कई साल बाद कामिनी ने भी एक इंटरव्यू में स्वीकार किया कि उनका दिलीप कुमार से स्नेह था। लेकिन सब कुछ मिल तो नहीं जाता। यह जीवन ऐसा ही होता है।
१९६३ में एक फिल्म आयी थी गुमराह। यह इसी त्रासद प्रेम कथा पर आधारित थी। डायरेक्टर बीआर चोपड़ा चाहते थे कि दिलीप कुमार इसमें काम करें। लेकिन दिलीप ने मना कर दिया। दफ़न इतिहास को उखाड़ना नहीं चाहते थे।

Friday, February 17, 2017

तलब ने गिराया था

-वीर विनोद छाबड़ा
बाज़ तलब बड़ी ख़तरनाक होती हैं। अजीब हरकतें करने को मजबूर करती हैं?
मैं १९७० की सर्दियों में राजस्थान के बीकानेर शहर में ब्याही अपनी बड़ी बहन से मिलने जा रहा था। मैं बी.ए. में था तब।
उस दिन तो बलां की सर्दी थी। ट्रेनों में सन्नाटा था। लखनऊ से दिल्ली और फिर वहां से मीटरगेज की ट्रेन से सीधा बीकानेर। थ्री-टियर में जगह तो बिना रिजर्वेशन मिल गयी।
दिल्ली रेलवे स्टेशन पर पांच अदद सिगरेट और माचिस की डिब्बी का इंतेज़ाम किया। इतने में रात कट जायेगी। ट्रेन में मुझे नींद नहीं न तब आती थी और न आज आती है। मगर सर्दी इतनी ज्यादा थी कि पांच सिगरेट नाकाफी पड़ीं। डेढ़-दो घंटे में ही फूंक गयीं।
आगे सादलपुर जंक्शन था। वहां ज़रूर मिलेगी। लेकिन बदकिस्मती की मार। ट्रेन जिस प्लेटफार्म पर रुकी थी, वहां सर्दी के मारे सारे टी-स्टाल बंद। सिगरेट की तो बात ही न पूछिए।
एक चलते-फिरते ने बताया - उधर एक नंबर पर सब मिलेगा। इधर तो कुत्ता भी ना होवे। 
रात आधी गुज़र चुकी थी। मगर सफ़र तो अभी आधे से ज्यादा बाकी था। और सर्दी की कुड़कुड़ाहट रुक न रही थी। लगता था, जान ही निकल जाएगी। तीन स्वेटर थे। दो हाफ आस्तीन और एक फुल्ल। अलावा इसके एक अदद कंबल। सर्दी रोकने के लिए नाकाफ़ी हो रहे थे।  
सादलपुर के बाद कई स्टेशन आये। लेकिन चाय नहीं मिली। सिगरेट तो दूर की बात थी।
जब कोई स्टेशन आता था तो बड़ी उम्मीद से प्लेटफार्म पर उतरता था। लेकिन हर बार गहरा सन्नाटा पसरा मिला। वहां की मिट्टी और आबो-हवा की गंध नथुनों में भरने का सुख ही हासिल कर पाता। इस बीच ड्रैक्युला की कई डरावनी फिल्मों की भी बेसाख्ता याद आती। पूरा बदन ऊपर से नीचे तक सिहर उठता। मैं फौरन डिब्बे में वापस हो लेता था।

ब्रॉडगेज के मुकाबले मीटरगेज की ट्रेन बड़ी मंथर गति से चलती है। उस दिन तो वक़्त ही जैसे ठहर गया हो।  
स्लीपर डिब्बे में भी तकरीबन सन्नाटा था। कुल पांच-छह यात्री रहे होंगे मुझे मिला कर। सब कंबल और रजाइयों में खुद को पैक करके सो रहे थे। एक तो गठरी बना हुआ एक बर्थ के कोने में दुबका हुआ था।
बिना सिगरेट-चाय के मेरा तो बुरा हाल। मिल जाए तो कड़ाके की ठंड का मुकाबला करना आसान हो जाता। हे भगवान दिला दो। सवा रूपए का प्रसाद कल ही हनुमान जी को चढ़ाऊं।
जरूरत अविष्कार की जननी होती है। हाई स्कूल परीक्षा में लिखा ये निबंध याद आया।
मैंने डिब्बे में सो रहे यात्रियों को ध्यान से देखना शुरू किया। शायद उसमें कोई सिगरेट पीने वाला हो या किसी के सिरहाने रखी डिब्बी मिल जाये।
दैवयोग से एक मिल ही गया। वही गठरी बना सोता हुआ बंदा। नीचे सिगरेट के ढेर सारे अधपिये टुर्रे बिखरे पड़े थे। वो ज़ोर-ज़ोर से खर्राटे मार रहा था जो ट्रेन चलने के शोर के बावजूद साफ़-साफ़ सुनाई दे रहे थे।

Thursday, February 16, 2017

तात्या टोपे ने फांसी का फंदा खुद गले में डाला था

-वीर विनोद छाबड़ा
तात्या टोपे का जन्म १८१४ में नासिक में हुआ था। १८१८ में मराठा पेशवाई का अंत हो गया। पेशवा बाजीराव-दिवित्य को आठ लाख रुपए की पेंशन देकर बिठूर भेज दिया गया। तात्या टोपे के पिता पांडुरंग पंत बाजी राव के  दरबार में महत्वपूर्ण पद पर थे। तात्या टोपे का असली नाम रघुनाथ था। वो अपने पिता के साथ कभी-कभी दरबार भी जाते थे। उनको प्यार से तात्या कहा जाता थे। एक बार बाजीराव ने खुश होकर बालक रघुनाथ के सर पर रत्न जड़ित टोपी रख दी। तब रघुनाथ तात्या टोपे हो गए।
अंग्रेज़ों के विरुद्ध १८५७ के गदर में तात्या टोपे ने एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। बाजीराव पेशवा के दत्तक पुत्र नाना साहब को अंग्रेज़ों ने पेशवाई और पेंशन देने से इंकार कर दिया। नाना ने विद्रोह का एलान कर दिया। 
नाना की सेना ने कानपुर और उसके आप-पास कब्ज़ा जमा लिया था। उसमें तात्या टोपे सेना के चीफ कमांडर थे। उनकी सेना का संपर्क ग्वालियर की रानी लक्ष्मी बाई से हुआ। इसमें भी तात्या का बड़ा हाथ था।
मगर पीठ में छुरा घोपने वालों के कारण अंग्रेज़ों के विरुद्ध मोर्चे में दरारें पड़ गयीं। नाना कहीं लुप्त हो गए। रानी लक्ष्मीबाई का झांसी दुर्ग ढह गया और उधर ग्वालियर में भी अंग्रेज़ों ने दिल तोड़ने वाली बड़ी शिकस्त दी। 
इससे तात्या टोपे को बहुत आघात लगा। वो अकेले हो गए। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। अपने मुट्ठी भर विश्वस्त साथियों को साथ लेकर अंग्रेज़ों के विरुद्ध गुर्रिला फाइट करने लगे।
तात्या अंग्रेज़ों के लिए बहुत बड़े सिरदर्द बन गए। लेकिन अपने विश्वस्त मान सिंह की मुखबरी से तात्या को अंग्रेजी फ़ौज़ ने ०७अप्रैल १८५९ को गिरफ़्तार कर  लिया। तात्या उस वक़्त वो सो रहे थे।
अंग्रेजी सेना ने उनका कोर्ट मार्शल किया। उन पर विद्रोह और हत्या का अभियोग लगाया।
जज ने पूछा - अपनी सफाई में कुछ कहना है?