Wednesday, March 1, 2017

बिमल रॉय की सलाह पर बदला था बीआर चोपड़ा ने फैसला

- वीर विनोद छाबड़ा
मुकम्मल मनोरंजक फिल्मों के इतिहास में बीआर चोपड़ा की 'वक़्त' मील का पत्थर है। पहले शॉट से लेकर अंतिम शॉट तक दर्शक सीट से चिपका रहा।
लाला केदारनाथ शहर के जाने माने रईस हैं। यह रईसी उन्हें विरासत में नहीं मिली है। कड़ी मेहनत मशक्त्त से कमाई है। उन्हें बड़ा गुरूर है इसका।
लाला केदारनाथ के घर में जश्न चल रहा है। एक ज्ञानी ज्योतिषी किसी मेहमान के साथ आये हैं। उन्होंने लालाजी का हाथ देखा - वक़्त कब किस्से क्या कराये कोई नहीं जानता। कभी-कभी दौलत गठरी में बंधी रह जाती है और इंसान भीख मांगता रह जाता है। हाथ में चाय प्याला होटों तक आते-आते बरसों बीत जाते हैं।
लालाजी ज्योतिष और भाग्य में यकीन नहीं रखते। मुठ्ठी में बंद भाग्य में नहीं, बाज़ुओं की मेहनत में यकीन करते हैं। उन्हें गर्व है कि लाला केदारनाथ जो चाहे, जब चाहे, खरीद सकता है। बस एक तमन्ना है, शहर का सबसे बड़ा व्यापारी बनने और एक चमचमाती कार की ताकि जब वो उसमें अपने शहजादों के साथ बैठ कर शान से निकले तो लोग दूर से ही देख कर कहें कि वो देखो, वो जा रहा है लाला केदारनाथ.…
बस यहीं वक़्त ने अपना खेल दिखाया। एक ज़बरदस्त ज़लज़ला आया। सब तबाह हो गया। लाला केदारनाथ का आलीशानं मकान-दुकान धूल-धुसरित हो गया। और उनके सुनहरे सपने भी। परिवार भी बिछड़ गया।
लाला केदारनाथ फिर सड़क पर आ गया। वक़्त ने तब भी उसका पीछा न छोड़ा। एक मर्डर के सिलसिले में लाला केदारनाथ को जेल हो गई.…
इसके बाद वक़्त ने एक लंबा ड्रामा खेल। बिछुड़े हुए बच्चे अलग-अलग वातावरण में पल-पोस कर बड़े हुए। रोमांस। हंसी-मज़ाक। चुहल बाज़ी। धांसू संवाद और गीत संगीत। कार-रेस। मार-धाड़। फिर एक मर्डर। लंबे कोर्ट ड्रामे के बाद असली कातिल का पकडे जाना और बेक़सूर का छूटना। बिछुड़ों का ड्रामाई मिलन। और 
एक बार फिर वही लाला केदारनाथ एंड संस और फिर उसी शानो-शौकत की वापसी।
बड़ा बेटा बेटा कहता है - देखते रहियेगा पिताजी, हम इसे शहर की उस आलीशान बुलंदी…
लालाजी बात काटते हैं - नहीं बेटा, नहीं। एक बार मैंने भी ऐसा ही चाहा था। मगर वक़्त ने वो तमाचा मारा कि सब तिनका-तिनका होकर बिखर गया। शायद यह बताने के लिए कि वक़्त ही सब कुछ कराता है। इंसान के हाथ में कुछ भी नहीं।
और दि हैप्पी एंड।
बीआर चोपड़ा ने अख़्तर मिर्ज़ा की इस कहानी पर १९६५ में 'वक़्त' रिलीज़ की थी। इस सुपर-डुपर हिट इस फ़िल्म ने 'खोया पाया' का नायाब फार्मूला दिया, जिस पर आगे चल कर बीसियों हिट फ़िल्में बनीं।
लाला केदारनाथ की भूमिका में बलराज साहनी बेजोड़ थे। एवरग्रीन हिट गाना - ऐ मेरी जोहरा ज़बीं तुझे मालूम नहीं…उन्हीं पर फिल्माया गया था।
यही वो फ़िल्म थी जिसमें राजकुमार ने अपनी छाप छोड़ी थी और वो बी-श्रेणी से ए-श्रेणी में प्रमोट हुए। उनके द्वारा खास अंदाज़ में बोले गए जुमले आज भी याद किये जाते हैं - चिनॉय सेठ जिसके अपने घर शीशे के होते हैं, वो दूसरों पर पत्थर नहीं फेंका करते हैं...यह बच्चों के खेलने की चीज़ नहीं, लग जाए तो खून निकल आता है...। वस्तुतः इसके बाद से ही फिल्मों में जुमलेबाज़ी का असली चलन शुरू हुआ था।

Tuesday, February 28, 2017

बाबू जी मना करते हैं

-वीर विनोद छाबड़ा
सब्जी वाले ने कहा - आंटी जी लौकी ले लो। बहुत बढ़िया है और ये परवल भी।
मेमसाब ने कहा - नहीं भैया, बाबू जी नहीं खाते।
एक और साहब आये - बहनजी हम आ गए हैं। आपने बुलाया था, पुताई के लिए।

मेमसाब - नहीं भैया, अभी सर्दी बहुत है। बाबूजी मना कर रहे हैं।
कल्लू किरयाने वाला - राजमां, अरहर, उड़द, छोले, चने की दाल, चना साबूत…सब रख दिया है। मूंग की दाल नही लिखाई थी। दे दूं।
मेमसाब - नहीं नहीं। बिलकुल नहीं। बाबू जी नहीं खाते।
सुबह सुबह गली में भंगार वाला चिल्ला रहा है - रद्दी, रद्दी दे दो, अख़बार, किताब, पुराना टीवी, कुकर, कूलर…बहन जी रद्दी है?
मेमसाब ने दरवाज़ा खोला - हां है तो। मगर अभी कुछ दिन बाद आना। बाबूजी मना कर रहे हैं। कहते हैं, अभी थोड़ी और जमा हो जाए।
थोड़ी देर बाद दरवाज़े पर खट खट खट.…
मेमसाब - क्या है भैया?
आगंतुक - जी हम प्लम्बर हैं। आपने कल कहा था एक्स्ट्रा टंकी के लिए।
मेमसाब - नहीं भैया, अभी नहीं लगवानी। सर्दी में पानी की क्या ज़रूरत? बाबूजी ने मना किया है।
दोपहर का समय है। दरवाज़े पर खट...खट...खट... होती है। 
मेमसाब - कौन है?
बाहर एक लड़का है। कहता है - आंटी जी हमारी गेंद आई है आपकी छत पर। ले लें?
मेमसाब - नहीं बिलकुल नहीं। रोज़ का धंधा है तुम लोगों का। सोने भी नहीं देते ठीक से। बाबूजी ने मना किया है कि अबकी बार गेंद आये तो मत देना।
आधा घंटा बीता न था कि दरवाज़े पर फिर खट...खट...खट… 
मेमसाब बड़बड़ाती हैं - अब कौन आ मरा?…कौन है?
बाहर खड़ा आदमी कहता है -  जी केबल वाला।
मेमसाब - ये लो दो ढाई सौ। भैया क्या बात है?आजकल केबल बहुत जा रहा है? बाबूजी बहुत डांट रहे थे कि बंद करके डीटीएच लगवा लो।
ट्रिंग ट्रिंग ट्रिंग...इस बार मोबाईल की आवाज़ है।
मेमसाब - हेलो…अरे सुमन कैसी हो?...क्या बताऊं?....तुम्हारे बाबूजी को टाइम कहां?…मैं तो हर वक़्त तैयार हूं....

Monday, February 27, 2017

ढिबरीवाला नकली भूत

- वीर विनोद छाबड़ा
उस दिन सारा शहर ठिठुर रहा था। ज्यादातर लोग घरों के अंदर रज़ाई में दुबक कर बैठे थे। लेकिन हम कई मित्र शमशान घाट पर थे। अश्रुपूर्ण नेत्रों से अपने एक प्रिय मित्र की अंतिम विदाई को आये थे। सूर्य देवता के सुबह से ही दर्शन नहीं हुए थे। चिरागों के जलने से अहसास हुआ कि सूर्यास्त होने को है। कई चिताएं एक साथ जल रही हैं। आज सुबह से ही मृतकों के आने का सिलसिला जारी है। जब सर्दी या गर्मी ज्यादा होती है तो आमद बढ़ जाती है। कई को अंतिम संस्कार के लिए प्लेटफार्म नहीं मिलता है। संयोग से हमारे मित्र को मिल गया। इसलिए कि दिन ढल चुका था। हिंदू धर्म के अनुयायी सूर्यास्त के बाद नहीं आते। लेकिन हमारे मित्र के परिवारीजन ये सब नहीं मानते थे।
मुखाग्नि के पश्चात ज्यादातर लोग खिसक लिए। लेकिन हम और हमारे मित्र निर्णय लेते हैं कि तब तक रुके रहेंगे जब तक कि चिता पूरी तरह आग न पकड़ ले। अंधेरा पूरी तरह छा चुका था और कोहरा भी घना हो चुका था। हम दोनों वहीं पास में ही एक बिना शट्टर वाली दुकान की सीढ़ी पर बैठ गए। उन दिनों नगर निगम की ओर से कुछ नए प्लेटफार्म बनाये जाने के अतिरिक्त इस स्थान को नया रंग-रूप और समस्त नागरिक सुविधाएं देने की कवायद चल रही थी ताकि ये स्थान थोड़ा रमणीक लगे। ये अर्द्धनिर्मित दुकान भी इसी कवायद का हिस्सा थी।

तभी हमने गौर किया कि हमारे पीछे किसी ने ढिबरी जलाई है। हमने मुड़ कर पीछे देखा। हां वाकई वहां कोई था। बदन में झुरझुर्री सी उठी। पूछा - कौन हो भाई। वो बोला यहीं साइट पर काम करता हूं। रात यहीं सो जाता हूं। ठेकेदार ने कहा है। सामान की रखवाली भी होती रहेगी।
कौतुहलवश हमने पूछा - ये नए प्लेटफॉर्म कब तक तैयार हो जायेंगे?
उसने पलट कर पूछा - आपको कब लेटना है?
हमें उसका जवाब कुछ अजीब सा लगा। कोई बेवकूफ है। हमने कोई जवाब नहीं दिया। सामने देखने लगे। तभी टार्च लिए एक सज्जन आये। वो मृतक के रिश्तेदार थे। बोले, देर हो रही है। आप जाओ। हम भी चल रहे हैं। हम उठे। अचानक हमारी निगाह पीछे की और गयी। ढिबरी नहीं जल रही थी। हमें कुछ संदेह हुआ। उन सज्जन के हाथ से  टार्च लेकर हमने देखा। हम सन्न रहे गए। वहां तो कुछ भी नहीं था। उस भयंकर सर्दी में भी हमारा पसीना छूट गया और घने कोहरे के बावज़ूद हम तूफ़ान मेल की रफ़्तार से हम बाहर निकले।

Sunday, February 26, 2017

वक़्त से पहले और किस्मत से ज्यादा नहीं

-वीर विनोद छाबड़ा
एक राजा हुआ करता था। बड़ा दयालू। जो कोई उसके द्वारे आया, कभी खाली हाथ नहीं लौटा।
एक दिन राजा ने एक बहुत गरीब आदमी को कद्दू दान में देते हुए निर्देश दिया - घर जाकर कद्दू काट कर खाना ज़रूर। देखना, तुम्हारे सब दुःख दूर हो जाएंगे।
लेकिन उस भिखारी को संतुष्टि नहीं मिली। वो बहुत रोया। राजा को भरपूर गलियां दी - भला कद्दू से भी किसी का भला हुआ। कितने दिन चलेगा कद्दू? मुश्किल से चार या पांच दिन। मैंने तो हीरे और जवाहरात की ख्वाहिश की थी। लेकिन मिला क्या, कद्दू! इस राजा के महल को आग लगे। 
तभी उसके दिल में एक ख्याल आया कि इस कद्दू को बेच दूं तो कम से कम पांच रूपये मिल सकते हैं। यह इरादा बना कर वो बाजार गया।
कद्दुओं की कदर करने वाले एक अमीर दुकानदार ने देखा कि इस कद्दू की डिज़ाइन दूसरे कद्दूओं से भिन्न है। ज़रूर कोई खास बात है इसमें। उसने उस भिखारी से पूछा - ए नाशुक्रे से दिखने वाले ईश्वर के बनाये आदमी। तू रोते हुए कद्दू क्यों बेच रहा है?
भिखारी ने बताया - मैं बहुत गरीब हूं। राजा के पास गया था अपनी गरीबी दूर करने के लिए कुछ मदद मांगने। मगर राजा का इंसाफ तो देखो। कद्दू पकड़ा दिया। अब इसे बेचना चाहता हूं, ताकि इसे मिले पैसों से कुछ ज़रूरी चीज़ें खरीद सकूं।
दुकानदार ने कहा - राजा को ऐसा नहीं करना चाहिए था। ऐसा करो कि तुम यह कद्दू मुझे दे दो। मैं तुम्हें इसके तुम्हें बदले बीस रूपए दूंगा।
उस ज़माने में बीस रूपये आज के बीस हज़ार के बराबर हुआ करती थी। भिखारी झट से तैयार हो। उसने सोचा यह दुकानदार ज़रूर कोई मूर्ख आदमी है। उसने यह भी नहीं पूछा कि इसमें क्या खासियत है। और बीस रूपये दे रहा है।

Saturday, February 25, 2017

सुनील दत्त ने चाहा था मधुबाला का नाम पहले आये...

-वीर विनोद छाबड़ा 
मधुबाला की आख़िरी फिल्म थी 'ज्वाला'। इसका निर्माण पचास के दशक के आख़िरी दौर में शुरू हुआ। आशा पारेख इसमें मधुबाला की सहेली हैं। लेकिन इसका निर्माण मधुबाला की बीमारी के कारण बहुत मंथर गति से चला। निश्चित ही यह डिब्बे में बंद रहती, अगर १९६९ में मधु परलोक न सिधारी होतीं।
मधु को श्रद्धांजलि स्वरुप समझिए या उसकी मौत को भुनाने के लिए, 'ज्वाला' डिब्बे से बाहर आई। मधु की डुप्लीकेट के साथ बाकी फ़िल्म पूरी हुई। डबिंग भी कई नायिकाओं के सहारे हुई।
ज्वाला के हीरो सुनील दत्त थे। सोहराब मोदी और प्राण की भी अहम भूमिकाएं थीं। सुनील दत्त ने इससे पहले मधुबाला के साथ शक्ति सामंत की 'इंसान जाग उठा' में काम किया था। सुनील-मधु पर फिल्माए दो गाने बहुत मशहूर हुए थे - चांद सा मुखड़ा क्यों शरमाया...न ये चंदा रूस का है न ये जापान का...इस फिल्म की शूटिंग हैदराबाद से १०० किलोमीटर दूर कृष्णा नदी के ऊपर नागार्जुन सागर बांध के निर्माण के समय हुई थी। मधुबाला शायद पहली बार आउटडोर शूट पर थीं। उन्होंने सुनील दत्त को बताया - मुझे अपने मुल्क के मज़दूरों के साथ कंधा से कंधा मिला कर काम करना बहुत अच्छा लगा। मैंने अपने भारत को बनते देखा।

बहरहाल, 'ज्वाला' रिलीज़ होने को थी। सुनील दत्त के संज्ञान में आया कि प्रचार सामग्री में उनका नाम मधुबाला से पहले छपा है। यह ठीक है कि उस समय सुनील दत्त की पोज़ीशन बहुत अच्छी थी और दिवंगत मधुबाला को लोग लगभग भूल सा गए थे। और यह भी एक सच था कि मधु की भूमिका का ज्यादातर हिस्सा डुप्लीकेट के सहारे पूरा हुआ था। लेकिन इन सबके बावजूद इस सच को झुठलाना मुश्किल था कि मधुबाला सुनील दत्त से सीनियर थीं। 'इंसान जाग उठा' में भी मधुबाला का नाम पहले था और दत्त साहब का बाद में। सुनील दत्त को यह बात अच्छी तरह याद थी। अतः उन्हें 'ज्वाला' में अपना नाम पहले देख बहुत तकलीफ़ हुई। अगर मधु ज़िंदा होती तो यकीनन उसे भी नागवार लगा होता।
यों भी सुनील दत्त एक भद्र पुरुष के रूप जाने जाते थे। समाज में उनका काफ़ी रुतबा था। एक अच्छे फ़िल्मकार भी थे। दत्त परिवार के मधु के बहुत अच्छे रिश्ते भी थे। जब मधुबाला की मृत्यु हुई थी तो सुनील दत्त किसी काम से दिल्ली गए हुए थे। जैसे ही उन्हें मधु के गुजरने की खबर हुई तो सारे काम छोड़ वो तुरंत बंबई लौटे और फिर एयरपोर्ट से सीधे मधु का घर पहुंचे थे।

Friday, February 24, 2017

साधु का मुखौटा बनाम राजा का मुखौटा

-वीर विनोद छाबड़ा
एक राजा अपने राज्य के भ्रमण पर निकला।
रास्ते में उसे एक वृक्ष की छांव तले विश्राम करता एक साधु दिखा। राजा ने रथ से उतर कर उसे दंडवत प्रणाम किया।
मंत्री ने राजा को ऐसा करते देखा तो अच्छा नहीं लगा - श्रीमानजी, आप राजा हैं। साधु को आपके पास आकर प्रणाम करना चाहिए न कि आपको। आपने ऐसा क्यों किया?
राजा बोले - मंत्री जी, इसका उत्तर मैं कुछ दिन बाद दूंगा।
कुछ दिन बाद राजा ने मंत्री को बुलाया - मंत्री जी ये ढेर सुंदर-सुंदर मुखौटे हैं, आधे मेरे चेहरे के और आधे साधु के। इन्हें राज्य में बेच दीजिये। मेरी इच्छा यह जानने की है कि प्रजा की पसंद का रुझान क्या है?
मंत्री जी आश्चर्य चकित हुए। लेकिन उन्हें तो राजा की आज्ञा का पालन करना ज़रूरी था। मंत्री जी वेश-भूषा बदल कर राज्य में जगह-जगह जाने के लिए निकल पड़े। दो दिन बाद वो लौट कर आये। उसने बताया - राजन, साधु के मुखौटे मिनट भर में बिक गया। लेकिन क्षमा करें राजन, आपके मुखौटे लाख कोशिश के बावजूद किसी ने भी नहीं खरीदे।
राजा ने कहा - मंत्री जी एक बार फिर जायें। यदि कोई न खरीदे तो इन मुखौटों को मुफ़्त में दे दें।

Thursday, February 23, 2017

शान और कुलीनता का प्रतीक था मेफेयर सिनेमा

- वीर विनोद छाबड़ा
ये है मेफेयर सिनेमा। इसने आधुनिक लखनऊ को उसके शैशव काल से बहुत करीब से देखा है, उसका हिस्सा रहा है। शहर का पहला सेंट्रली-ऐयरकंडीशन थियेटर। पिछले कई साल से बंद। मुझे वो दौर याद है जब माना जाता था कि यहां सिर्फ शहर का अभिजात्य और कुलीन वर्ग ही फिल्म देखता है। साधारण आदमी इसकी सीढ़ी पर पैर रखने तक से डरता था। अंग्रेज़ी की ही फिल्में रिलीज़ होती थी। इसके अलावा ओडियन था जहां अंग्रेज़ी फिल्में नियमित रिलीज़ होती थी।
मैं विजुलाईज़ करता हूं। १९६० का कोई महीना। मैं नौ-दस साल का हूं। पिताजी की उंगली पकड़ कर मैं ‘बेनहर’ की रथ दौड़ देखने आया हूं। ठंडा-ठंडा और एक अजीब सी महक, जिसे पहली बार अनुभव किया। याद है ठंडी-ठंडी हवा के कारण मैं सो गया। पिताजी मुझे बार-बार जगाते हैं। अंग्रेजी समझ नहीं आती। वो मुझे समझाते रहे। फिल्म खत्म होने के बाद क्वालिटी रेस्टोरेंट में पिताजी ने मुझे काफी के साथ पेस्ट्री खिलाई। मुझे हैरत हुई। मैंने सुना था यहां सिर्फ़ लाटसाहब आते हैं। पिताजी मेरी बात पर हंस देते हैं। फिर हम इसके ऊपर जाते हैं। यहां ब्रिटिश कांउसिलिंग लायब्रेरी है। यह भी एयरकंडीशन। पिता जी इसके सदस्य हैं। दो किताबें लेते है। छह साल बाद मैने पिताजी के कार्ड पर सिनेमा और क्रिकेट की अनेक किताबें पढ़ी। यहां के पिन ड्राप साईलेंस में घंटों इंग्लैंड से प्रकाशित अखबारों में क्रिकेट मैच का स्कोर देखे।

वक़्त गुज़रता है। मैं दसवें में पहुंच गया हूं। काफी ‘समझ’ आ गयी है। अब मैं कालेज बंक कर दोस्तों के संग सिनेमा देखने लगा हूं। मेफेयर में ‘दोस्ती’ आयी। हंगामा हो गया। मेरी याद में पहली हिंदी फिल्म। १९६४ की बात है यह। इसके बाद 'सांझ और सवेरा' देखी। बाद में मेरे मित्र अजय निगम ने बताया था कि मेफेयर में पहली हिंदी फिल्म 'घर बसा के देखो' रिलीज़ हुई थी। ।
मेफेयर लंबे समय तक अंग्रेजी फिल्मों की रिलीज़ की पहली पसंद रही। याद है मुझे पिता जी ने ‘गोल्डफिंगर’ की कहानी सुनायी। पैसे दिये। बोले जा, देख आ। मैंने बांड की फिल्म पहली बार देखी थी। अंग्रेजी न जानने वालों को फिल्म की कहानी मालूम हो तो  समझने में कतई दिक्कत नहीं होती।
मैं बड़ा हुआ। दाड़ी आ रही है। बड़ा खुश हूं कि मेफेयर में एडल्ट अंग्रेज़ी फ़िल्में देखने का लाइसेंस मिल गया। ईवनिंग शो देखने का मज़ा ही कुछ दूसरा था। यूनिवर्सटी, आईटी, लामार्ट, लोरेटो, कालविन के अंग्रेजी में गिटपित करते लड़के-लड़कियों के बीच हम हिंदी मीडियम के लड़के चुपचाप उन्हें हसरत भरी निगाहों से देखते हैं। सोचता हूं कि काश मैं भी पैदा हुआ होता अमीरों के घर। मज़ा आ जाता।
कुछ वक़्त और गुजरा। मुंह में सिगरेट आ गयी है। मेफेयर थियेटर और क्वालिटी के बीच एक कारीडोर है। ऐसा कारीडोर दूसरी तरफ भी है। यह भी बड़ा कूल-कूल है। दीवारों पर एलिजाबेथ टेलर, रिचर्ड बर्टन, सोफिया लारंस, रैक्स हैरीसन, क्लिंट ईस्टवुड, डीन मार्टिन, क्रिस्टोफर ली आदि की शीशे के फ्रेम में बड़ी-बड़ी रंगीन तस्वीरें टंगी हैं। मैंने हिंदी सिनेमा के आईकान किसी सिनेमाहाल में टंगे नहीं देखे।

मुझे याद है कि इन कारीडोरों में हम होंटों के किनारे सिगरेट फंसा लेते थे और फिर होंट चबा-चबा कर अंगे्रज़ी के कुछ रटे-रटाये वाक्य बोलते थे। इससे तलुफ़्फ़ुज़ में थोड़ी अंग्रेज़ियत आ जाती थी।
यहां बेशुमार फिल्में देखीं। अंग्रेज़ी भी और हिंदी भी। यहां रिलीज़ हुई ज्यादातर फिल्में सुपर हिट रहीं। बाबी, दुल्हन जो पिया मन भाये, अखियों के झरोखों से, पाकीज़ा, खामोशी आदि। क्रेज़ी ब्वाय सीरीज़ की तमाम फिल्में मैंने यहीं देखी। इसके अलावा दि पोसाईडियन एडवेंचर, वेयर दि ब्याज आर, दि बैड दि गुड एंड दि अगली, वाट ए वे टू गो, टावरिंग इनफरनो, ऐयरपोर्ट, दोज़ मैग्नीफिसेंट फ्लाईंग मशीसं, इट्स ए मैड मैड वल्र्ड आदि। इरमा ला डूज़ और उसका की हू-बहु हिंदी नक्ल शम्मीकपूर की ‘मनोरंजन’ भी यहीं देखी थी। मजे की बात यह है कि नक्ल पहले आई और मूल प्रति बाद में।
हमने कई बार कामयाबी को सेलीब्रेट करने के लिये मेफेयर को चुना। इसके बगल में एक सरदार जी का कूल कॉर्नर होता था। मेफेयर में सिनेमा देखने के बाद इस कॉर्नर पर २५ पैसे वाली कूल बोतल पीकर तो सोने में सुहागा हो जाता था।