Thursday, March 9, 2017

अगर सुनील दत्त न निभाते बिरजू का किरदार...

- वीर विनोद छाबड़ा
हिंदी फिल्म जगत में जितनी परदे पर जोड़ियां मशहूर हैं, उतनी ही परदे के पीछे भीं हैं। इनमें सबसे टॉप पर कदाचित सुनील दत्त-नरगिस की जोड़ी है। इनमें  मन-मुटाव की कभी खबरें नहीं उड़ी। बल्कि सदभाव की मिसाल बनी। धर्म अलग थे, लेकिन एक-दूसरे का बहुत श्रद्धा के साथ आदर किया। यकीनन यह प्रेम विवाह था। शुरुआत भी फ़िल्मी स्टाईल में हुई थी। हुआ यों था कि महबूब खान की 'मदर इंडिया' की शूटिंग चल रही थी। राधा (नरगिस) के बेटे की भूमिका में थे बिरजू सुनील दत्त। हालांकि सुनील दत्त रीयल लाईफ में नरगिस से चंद दिन ही छोटे थे। उन दिनों नरगिस दिग्गज नायिका थीं और सुनील दत्त महज दो-तीन साल पुराने। सीन कुछ यूं था कि खलिहान में आग लगी है और आग से घिरी राधा को बेटा बिरजू बचाता है। लेकिन हुआ यों कि नरगिस सचमुच ही आग में घिर गयीं। उनका बचना मुश्किल हो गया। लेकिन सुनील दत्त की दिलेरी ने उन्हें बचा लिया।
बस यहीं से सुनील दत्त उन्हें दिल दे बैठे। इधर नरगिस को बचाते हुए सुनील दत्त को कुछ चोटें भी आयीं थीं। उन्हें हफ्ता भर अस्पताल में भर्ती भी रहना पड़ा।  तब नरगिस ने सुनील दत्त की रात-दिन भरपूर सेवा की। और इस बीच ही नरगिस भी उन पर फ़िदा हो गयीं। पारिवारिक संबंध भी मजबूत हुए। कुछ दिन गुज़रे। एक दिन सुनील दत्त की बहन की तबियत अचानक ख़राब हो गई। तब नरगिस ने उनकी बहुत मदद की। सुनील दत्त को लगा कि नरगिस में एक ऐसी पत्नी के परफेक्ट गुण हैं जो परिवार के सदस्यों का ख्याल रख सकती हैं। बस उन्होंने नरगिस को प्रोपोज़ कर दिया - मैं आपसे शादी करना चाहता हूं।

नरगिस उस समय कुछ नहीं बोलीं। वो उन दिनों कुछ डिप्रेशन में भी थीं। उनकी कई फिल्मों के नायक राजकपूर से उनके संबंध ख़त्म हो चुके थे। क्योंकि वो शादी-शुदा थे और पांच बच्चों के पिता भी। दोनों ने महसूस किया कि इस रिश्ते का कोई भविष्य नहीं है। ऐसे में नरगिस को एक सहारे की सख्त ज़रूरत थी। और उन्होंने सुनील दत्त की बहन के मार्फ़त पैगाम भिजवा दिया कि यह रिश्ता उन्हें मंज़ूर है।
दोनों तुरंत शादी करना चाहते थे लेकिन महबूब खान विलेन बन गए - 'मदर इंडिया' अभी रिलीज़ नहीं हुई है। स्क्रीन पर मां-बेटा और रीयल लाईफ में पति-पत्नी, ऑडियंस कभी स्वीकार नहीं करेगी। फिल्म की शूटिंग के दौरान ऐसा सीन भी आया कि राधा बेटे बिरजू की पिटाई करती है और आखिर में गोली भी मार देती है। नरगिस को बहुत नाग़वार लगा। लेकिन महबूब खान ने उन्हें समझाया कि रीयल लाईफ़ को दिल-दिमाग से बाहर रखो।
आख़िरकार फिल्म २५ मार्च १९५७ को रिलीज़ हुई। मदर इंडिया सुपर-डुपर हिट हुई और मील का पत्थर बनी। ऑस्कर के लिए भी नॉमिनेट भी हुई। ११ मार्च १९५८ को सुनील उर्फ़ बलराज दत्त और फ़ातिमा राशिद उर्फ़ नरगिस परिणयसूत्र में बंध गए। इधर नरगिस को बेहतरीन परफॉरमेंस के लिए फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड मिला। आगे चल कर पद्मश्री भी। फिर 'रात और दिन' के लिए श्रेष्ठ नायिका का राष्ट्रीय अवार्ड मिला। 
'मदर इंडिया' से जुड़ा एक और दिलचस्प वाक्या भी है। नरगिस के बेटे बिरजू की भूमिका के लिए महबूब खान ने एक विदेशी कलाकार चुन रखा था। लेकिन बात बनी नहीं। तब महबूब ने दिलीप कुमार से बात की। लेकिन दिलीप-नरगिस ने कई फिल्मों में रोमांटिक भूमिकाएं की हुई थीं। उन दोनों को अटपटा लगा कि मां-बेटे के किरदार में ऑडियंस स्वीकार नहीं करेगी उन्हें। अंततः सुनील दत्त को चुना गया।

Tuesday, March 7, 2017

विधवा की हाय मत लो

- वीर विनोद छाबड़ा
डॉ राजेंद्र प्रसाद (०३ दिसंबर १८८४ से २८ फरवरी १९९३ तक) का जन्म बिहार के जिला सारन के एक छोटे से गांव जिरादेई में हुआ था।
वो भारत के प्रथम राष्ट्रपति (१९५० से १९६२) रहे। १९६२ में उन्हें भारत रत्न से नवाज़ा गया।
डॉ राजेंद्र प्रसाद ने उच्च श्रेणी में वक़ालत पास की। पहले कलकत्ता और फिर पटना हाई कोर्ट में वक़ालत करने लगे। ईमानदारी और निष्ठा में उनका कोई सानी नहीं था। सदैव सर्वहारा के पक्ष में खड़े दिखे। बड़ा नाम था उनका।
एक दिन एक व्यक्ति किसी परिचित के हवाले से राजेंद्र बाबू से मिलने आया। किसी विधवा महिला से ज़मीन का मामला था। बोला - मुंहमांगी फीस देने का लिए तैयार हूं। बस किसी तरह आप केस मेरे पक्ष में करा दें। मुझे मालूम है यह काम बड़ी आसानी से आप कर सकते हैं।
राजेंद्र बाबू ने कागज़ात देखे। उनके माथे पर बल पड़ गए। फिर उस व्यक्ति से मुख़ातिब हुए - यह कागज़ात बता तो रहे हैं कि इस ज़मीन के मालिक तुम हो। यह बात अदालत में साबित भी हो सकती है। लेकिन हक़ीक़त कुछ और है। असली मालकिन विधवा महिला है, तुम नहीं हो। यह कागज़ात नकली हैं। मेरा सिद्धांत और मेरा ज़मीर यह केस लेने का लिए इजाज़त नहीं देता। और मेरा मश्विरा है कि किसी विधवा की 'हाय' मत लो। पाप लगेगा। सुख-शांति नहीं मिलेगी।
राजेंद्र बाबू की बातें और सलाह सुन कर वो व्यक्ति इतना अधिक प्रभावित हुआ कि उसने वो सारे नकली कागज़ात उनके सामने ही फाड़ दिए।
राजेंद्र बाबू ने अनेक लोगों अपने विचारों से प्रभावित किया। बिना मुक़दमा के कई मामले सुलटा दिए। इस तरह समय, ऊर्जा और धन तीनों की बचत। भले उनका अपना आर्थिक नुकसान हुआ।

डॉ राजेंद्र प्रसाद के लिए महात्मा गांधी कहा करते थे - अमृत पीने वाले तो बहुत हैं मगर विष पीने वाला सिर्फ़ एक है। 
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Monday, March 6, 2017

भिखारी भी ऑनलाईन है

-वीर विनोद छाबड़ा
हमारे एक रिश्तेदार हैं। हर साल वो अपने जन्मदिन पर देवी-जागरण का आयोजन करते हैं और तत्पश्चात विशाल भंडारा। भंडारा दो किस्म का होता है। एक, भिखारियों के लिए और दूसरा, स्वजनों के लिए। दोपहर में भिखारी और शाम को स्वजन। भिखारियों की संख्या २५१ तक लिमिट है। और स्वजन पर कोई रोक-टोक नही। पांच सौ तक को वो स्वयं न्यौता दे आते हैं, मगर सात सौ से ज्यादा ही खा जाते हैं। दूर दूर तक के पड़ोसी और उनके बाहर से आये रिश्तेदार भी।
मगर अगले साल से उन्होनें भंडारा बंद करने का फैसला अभी से कर लिया है। वो इसकी वज़ह बताते हैं कि - यों तो भिखारी हर गली मोहल्ले अस्पताल और मंदिर के आसपास ढेर संख्या में मिलते हैं। लेकिन भिखारी की पहचान मुश्किल है। अब भिखारी मेकअप करके बैठता है। ऊपर चीथड़े और लेकिन अंदर जींस होती है। कुछ दिन पहले हमने एक ब्यूटी पार्लर से एक महिला को निकलते देखा। परफेक्ट भिखारिन का मेकअप। इच्छा हुई हम भी करा लें। लेकिन यह सोच कर रुक गए कि अभी पेंशन मिल रही है।

और फिर आजकल प्रतिस्पर्धा भी बहुत है। आठवां फेल से लेकर पीएचडी कर चुके भी इस लाईन में घूम रहे हैं। कई तो नकली भी हैं। मुफ़्त की रोटी तोड़ने में सबको मज़ा मिलता है। कुछ नकदी भी मिल जाती है। शाम को मल्टीप्लेक्स में फिल्म देखने की जुगाड़ हो जाती है। इन्हें संगठित करना और फिर ढोकर ले आना एक टेढ़ी खीर है। और इसके लिए भिखारियों के ठेकेदार का सहारा लेना पड़ता है। अंग्रेज़ी बोलने वाला पांच सौ से कम नहीं। इसकी मौजूदगी से यजमान का स्टेटस बढ़ता है। ये वीआईपी कहलाता है। यों प्रति भिखारी की दर तीन-चार सौ रूपए के आसपास होती है। सब लक्सरी बस से ढोकर लाये गए हैं। हज़ार रुपया उसका अलग से। ठेकदार की अपनी कमीशन अलग। ठेकेदार भिखारी से भी कमीशन मारता है। ठेकेदार भिखारियों की संख्या में भी हेरा-फेरी करता है। डेढ़ सौ लाएगा और बताएगा पूरे ढाई सौ। कई भिखारी तो ड्रेस बदल कर दोबारा खड़े हो जाते हैं। हो गयी संख्या पूरी। घोटाला ही घोटाला। अब यह तो संभव है नहीं कि भिखारी के नाखुन पर इलेक्शन वाली स्याही लगा दी जाए।
पिछली नवरात्री के दिन पत्नी की ख़ुशी के लिए हम मंदिर चले गये। बहुत भीड़ थी। हम बाहर ही खड़े रहे। देखा, एक सज्जन कार से उतरे। उनके हाथ में एक बैग था और उसमें ढेर सारे आलू-पूड़ी के पैकेट। वो वहां भिखारियों में बांटने के लिए लाये थे। मगर मार खाते-खाते बचे। 'पहले मैं, पहले मैं' के चक्कर में भिखारियों की भीड़ ने उन पर अटैक कर दिया। उनमें कुछ जेंटिलमैन भी शामिल थे। शुक्र है कि हम थोड़ा दूर थे अन्यथा मौके पर पहुंचे सिपाही लूट और हमले के जुर्म में हमें भी गिरफ़्तार कर ले गए होते। 

Sunday, March 5, 2017

जीने की एक स्टाईल यह भी

- वीर विनोद छाबड़ा
सुबह का वक़्त है। एक सीनियर सिटिज़न सुबह घर से बाहर निकलते हैं बल्कि बाहर ठेले जाते हैं। आगे बढ़ते हैं। उन्हें अपने जैसे आठ-दस और बुढ़ऊ मिलते हैं। कारवां बनता जाता है।
सब मिल कर पार्क में घुसते हैं। वहां एक कोना है। वहां उनके जैसे कई बुढ़ऊ पहले से ही मौजूद हैं। एक-दूसरे को देख कर आह्लादित होते हैं। गले मिलते हैं। चुटकुले सुनते-सुनाते हैं। ज़ोरदार ठहाके भी लगते हैं। बिलकुल असली ठहाके हैं, दिल से निकले हुए। कुछ गाने भी होते हैं और एक-आध भजन भी। एक-दूसरे से छेड़ा-छाडी भी होती है। पुरानी प्रेमिकाएं याद आती हैं। अब तो सब दादी-नानी बन चुकी हैं।
अचानक ख्याल आता हैं कि कल के मुक़ाबले आज एक बंदा कम है। चिंता होती है। बंदा निकल तो नहीं लिया? कल थोड़ा बीमार सा दिख रहा था। मिला तो कॉल।
तभी बंदा दूर से आता हुआ दिखता है। सबको चैन मिलता है। इत्ती गर्मी में शमशान घाट जाने से बच गए। अरे यार, तूने तो डरा ही दिया था। और यह क्या लाये हो?
जलेबी है। खाओ, गर्मा गरम है। इसी चक्कर में तो देर हो गई। और हां, वहां ऊपर अकेला जाकर क्या करूंगा? सब साथ-साथ चलेंगे। चिंता मत करो। ऊपर अभी हमारे रहने के लिए ज़मीन तक की ख़रीद नहीं हुई है। करप्शन वहां भी बहुत है। यहीं से तो सब गए हैं। चोर-चोर मौसेरे भाई। 
सब मिल कर एक बार फिर ज़ोरदार ठहाका लगाते हैं। तभी एक और सीनियर सिटीजन हांफते-कांपते आते हैं। हाथ-पांव दुःख रहे हैं। अस्थमा भी है। सबने हाथ-पैर दबाये। पीठ सहलाई। दस मिनट लग गए नार्मल होने में। तब तक जलेबी ख़त्म हो गई।
यार, तुम-लोग अच्छे हो। यही बैठ कर हंसी-ठट्ठा करते हो, खुश हो और तंदुरुस्त भी। अब कल से मेरी मॉर्निंग वॉक बंद। जिस्म को तकलीफ देने से क्या फायदा? खुश रहना ही सबसे बड़ा व्यायाम है।
सब मिल कर बाहर निकलते हैं। एक खूबसूरत महिला उनके सामने से बहुत तेज़ क़दमों से गुज़रती है। वो मॉर्निंग वॉक से लौट रही है। कुछ सीनियर सिटिज़न छड़ी बगल में दबा कर बहुत तेज़ क़दमों से उसके पीछे-पीछे चल देते हैं। हांफना-कांपना सब सेकेंडरी है। बाकी राह तकने लगते हैं। उनके घर की तरफ जाने वाली कोई दिखे तो वो भी पीछे-पीछे चलें। 
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Saturday, March 4, 2017

मुबारक़ के साथ गाते हुए रफ़ी अपनी आवाज़ नीची कर लेते थे

- वीर विनोद छाबड़ा
पचास और साठ का दशक, संगीत की दुनिया का गोल्डन ईरा और इसी दौर की मुबारक़ बेगम। मखमली आवाज़। पिता को प्रतिभा दिखी। बेटी बड़ी होके बड़ा नाम करेगी। किराना घराने के शास्त्रीय संगीत का प्रशिक्षण दिला दिया। वो आकाशवाणी में गाने लगीं। नाशाद (नौशाद नहीं) ने सुना तो दौड़ पड़े। 'आइये' (१९४९) फिल्म के लिए सोलो गवाया - मोहे आने लगी अंगड़ाई आज बलमा...इसी फिल्म के लिए लता के साथ भी गाया। लेकिन मायानगरी की माया निराली। लता को अगली फिल्म मिली 'महल' - आयेगा, आयेगा, आयेगा आने वाला...लता ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। मगर मुबारक़ पीछे छूट गईं। उनका खुद को प्रचारित और प्रसारित करने का नेटवर्क बहुत कमजोर था। सिर्फ़ गाने से मतलब, पैसे से नहीं। मौला की मर्ज़ी पर बसर करती रहीं। उनके गाने सी ग्रेड और बी ग्रेड की फिल्मों में मुजरों पर फिल्माया जाते रहे। 'देवदास' में उनका मुजरा गाना बहुत मशहूर हुआ - वो ना आएंगे पलट कर हम लाख बुलायें उन्हें...
कुछ और मकबूल गाने सुनिये - नींद उड़ जाए तेरी चैन से सोने वालों... हम हाले दिल सुनाएंगे... बे मुररवत बेवफा बेगन-ए-दिल आप हैं...
दिग्गज केदार शर्मा छोटे बजट की फिल्म 'हमारी याद आयेगी' बना रहे थे। लता से गवाना चाहते थे। लेकिन जेब ठनठन गोपाल। तब मुबारक़ ने पूरी की लता की कमी - कभी तन्हाइयो में हमारी याद आएगी...कई लोगों ने पूछा, यह लता ही हैं?
कमाल अमरोही की 'दायरा' में भजन के लिए लता उपलब्ध नहीं हो पा रहीं थीं। किसी ने मुबारक बेगम को खड़ा कर दिया। कमाल व्यस्त थे। सहायक से कहा देख लो। अगर मुनासिब हो तो रिकॉर्ड कर लो। मुबारक ने गाया - देवता तुम हो मेरा सहारा...कमाल ने सुना तो चौंक गए। लता के नहीं उपलब्ध होने का अफ़सोस जाता रहा। 

'हमराही' के एक गाने की रिकॉर्डिंग लता जी करने वालीं थीं। लेकिन वो फिर बाहर थीं। उनकी फ्लाईट मिस हो गयी। ऐसे में शंकर-जयकिशन को याद आई मखमली आवाज़ मुबारक़ बेगम की। वक़्त नहीं था। बिना रिहर्सल के रिकॉर्डिंग हुई - मुझको अपने गले लगा लो...। यह आवाज़ दिल की गहराइयों में उतर गईं। मगर मेहताना मिला महज़ १५० रूपए। लता जी होतीं तो हज़ार से कम न लेतीं। आश्वासन मिला कि आगे बहुत चांस मिलेगा। गाना भी सुपर हिट हुआ। लेकिन कोई नामी-गिरामी संगीतकार आगे नहीं आया। खबर तो यह थी कि जब लता जी लौटेंगी तो उनकी आवाज़ में गाना डब कर लिया जाएगा। लेकिन लता जी को फुरसत ही नहीं मिली। मजबूरन ज्यों के त्यों गाना रखना पड़ा।
रामानंद सागर की 'आरज़ू' के लिए लता-आशा पर एक डुएट की रिकॉर्डिंग होनी तय थी। लेकिन लता जी फिर गायब। शंकर-जयकिशन को फिर याद आई वो मखमली आवाज़ मुबारक़। फ़ौरन रिकॉर्डिंग हुई - जब इश्क कहीं हो जाता है...इस गाने को भी तुरंत शोहरत मिली। लेकिन परिणाम - फिर वही अंतहीन अंधेरी गली। मुबारक़ का मुकद्दर न बदला। वो हमेशा दूसरी पसंद बनी रहीं। उन्होंने ११५ फिल्मों में १६८ गाने गाये। इनमें ज्यादातर 'बी' और 'सी' श्रेणी की थीं। हर साल उनके एक-दो गाने हिट होते रहे, लेकिन फ़िल्में फ्लॉप होती रहीं। कुछ साल पहले एक इंटरव्यू में लता-आशा का बिना नाम लिए मुबारक़ ने शिक़ायत की थी - उन बहनों से सब डरते हैं। ऐसे में कौन पूछे मुझे?

Friday, March 3, 2017

हम में सुरखाब के पर नहीं लगे

- वीर विनोद छाबड़ा
कई लोगों को हमसे मिलने की इच्छा होती है। लेकिन हम थोड़ा कतराते हैं। इसलिए कि वास्तविक दुनिया में हमें देख कर उसका दिल न टूटे। अरे यह तो हाड़-मांस का साधारण आदमी है। 
हमें याद है कि टाइम्स ऑफ़ इंडिया के हिंदी साप्ताहिक 'धर्मयुग' में एक बंदे के लेख हम बहुत चाव से पढ़ते थे। कभी क्रिकेट पर तो कभी सिनेमा पर।एक एक अक्षर बहुत सारगर्भित हुआ करता था। एक दिन हमने उन्हें लखनऊ में देखा, उनको छुआ उनसे बातें की। उसने हमें अहसास कराया कि वो तो साधारण बंदा है, बिलकुल सबकी तरह, हाड़-मांस का बना हुआ। सोचता भी सबकी तरह है। हम भी उसकी तरह बन सकते हैं। आगे भी अपनी ज़िंदगी में हमने बहुत सूरमा, एक्टर, एक्ट्रेस, सूबेदार आदि देखे। सब के सब हाड़-मांस और माटी के पुतले निकले। किसी के सर पर कोई सुरखाब के पर नहीं दिखे। अब यह बात दूसरी है कि हम उनके जादुई व्यक्तित्व और उच्च कोटि के विचारों से निहाल हो कर लौटे।
मित्रों देखने में हम बहुत साधारण व्यक्ति हैं। हमारा तो कद भी बहुत बड़ा नहीं है। सूरत भी ऐसी नहीं है कि देख कर हंसी आये या डर लगे और आप छोटे छोटे बच्चों से कहें कि जल्दी से सो जा, नहीं तो छाबड़ा नाम के भूत को बुलाती हूं। हाड़-मांस के एक साधारण से पुतले हैं हम।
अब फोटो की बात तो दूसरी है। कुछ लोग कहते हैं, बहुत हैंडसम हैं आप। कई बरस पहले एक महिला ने हमसे कहा था - आप तो बिलकुल सिंपल व्यक्ति हैं। न कोई पर्सनालिटी और न कोई क्वालिटी। कार भी नहीं। यू ए टोटल डिस-अपॉइंटमेंट।
हमें याद आता है कि शादी-ब्याह के लिए लोग अपनी बेटी और बेटे की बढ़िया से बढ़िया तस्वीर निकलवाया करते थे। फोटोग्राफ़र को एक्स्ट्रा धन भी दिया करते हैं। यह चलन आज भी जारी है। आजकल फेस बुक पर भी यही हो रहा है। श्रेष्ठ अंदाज़ में श्रेष्ठतम तस्वीर।
किसी ज़माने में हमारी तस्वीरें बहुत अच्छी निकलती थी। तब हमारा सर बालों से ढका होता था। काला चश्मा लगा लेते थे गज़ब ढाते थे। गोरे गोरे मुखड़े काला काला चश्मा। लेकिन आज हालात बिलकुल उलटे हैं। सर पर बाल नहीं हैं। जो हैं वो कान के आजू-बाजू ही हैं। तस्वीर देख कर कोई मोहित हो जाये, इसके लिए हमें बहुत कवायद करनी पड़ती है। कई मित्र कहते भी हैं कि सिक्सटी-सिक्स प्लस पर यह सब शोभा नहीं देता।
बहरहाल, हम बता रहे थे कि हमें देख कर कोई हंसता भी नहीं है। अपने घर का लुक भी बस ठीक-ठाक है। हर पुरानी वस्तु से मोह है। इसीलिए फर्नीचर भी पुराना ही ठोंक-ठाक कर चला रहे हैं। क्राकरी भी पुरानी है। टूटे तो नई आये। जाने वो दिन कब आएगा। कपड़े-लत्ते भी बहुत पुराने। ज्यादातर तो दस साल से पुराने। कई तो सिल्वर जुबली मना रहे हैं। कभी-कभी तो शर्म आती है। इसीलिए दर्शनाभिलाषियों के दर्शन करने अक्सर हम स्वयं चल देते हैं।

Thursday, March 2, 2017

लाईलाज

-वीर विनोद छाबड़ा
यों तो महिलाओं से उनकी उम्र पूछना तहज़ीब के दायरे में नहीं है। लेकिन डॉक्टर की तो मज़बूरी है।
गंगा-जमनी तहज़ीब और इल्मो-ओ-अदब के मरकज़ लखनऊ में पढ़े उस नौजवान डॉक्टर ने चेकअप के लिए एक दिलकश भद्र महिला से उसकी उम्र नहीं पूछी। अंदाज़ से उम्र लिखी - ४५ साल।
लेकिन उस भद्र महिला ने खुलासा किया  - नहीं, मैं वास्तव में ७५ बरस की हूं।
वो डॉक्टर बहुत हैरान-परेशान हुआ। अब तक तो जितनी महिलाओं से वास्ता पड़ा, किसी ने भी सही उम्र नहीं बताई। और एक यह हैं कि ४५ की दिखती हैं और ७५ बता रही हैं। मेरा क्या बिगड़ता है?
बहरहाल, डॉक्टर ने उसका चेकअप किया।
भद्र महिला ने हर सवाल का सही सही जवाब दिया।
थोड़ी ही देर बाद वो भद्र महिला चीखती हुई डॉक्टर के केबिन से निकल कर बाहर भागी।
उसे यों बहदवास चीखते और भागते हुए देख कर उधर से गुज़रते तमाम लोग सकपका गए। सब रुक गए। एक सीनियर डॉक्टर ने उस महिला को रोका। माज़रा जानकर उन्हें भी गुस्सा आया।
उन्होंने फ़ौरन उस नौजवान डॉक्टर को अपने केबिन में तलब किया और उसे डांटते हुए कहा - लगता है तुम्हारा दिमाग ख़राब है। तुमने इन ७५ साल की मोहतरमा से यह क्यों कहा कि वो मां बनने वाली हैं? फ़ौरन इनसे माफ़ी मांगो।
नौजवान डॉक्टर ने सर झुका कर सफाई दी - सर, गुस्ताख़ी माफ़ हो। मैं इनसे माफ़ी तो मांग लूंगा। लेकिन पहले यह बताना ज़रूरी है कि मैंने इन्हें प्रेग्नेंट क्यों कहा।
सीनियर डॉक्टर ने जिज्ञासा प्रकट की - हां हां बिलकुल बताओ।
नौजवाब डॉक्टर ने बताया - सर, कभी-कभी मरीज़ का इलाज़ करने के लिए झूठ भी बोलना पड़ता है।