Thursday, June 8, 2017

दुःख अकेले झेले लेकिन ख़ुशी बांटी

- वीर विनोद छाबड़ा
कुछ अपवादों को छोड़ दें तो सरकारी नौकरी में कोई किसी का सगा नहीं होता। सबको अपने प्रमोशन का ख्याल होता है। होना भी चाहिए। लेकिन दुःख होता है कि संकट के समय सब दूर चले जाते हैं। कोई डूब रहा होता है तो उसे बचाने की बजाए एक धक्का और दे दिया, जा जल्दी से पूरा ही डूब जा। कभी कभी कोई बेगाना ही काम आता है।
हमारे साथ तो कई बार ऐसा ही हुआ है अब तक। कई बार हमीं ने राजफाश किया। व्हिसल ब्लोअर का काम किया, लेकिन हमीं फंस गए। जवाब तलब हो गया।
लेकिन हम हमेशा इस बात के कायल रहे कि जीत अंततः सच्चाई की होती है। हमारे इसी विश्वास ने हमें जिताया।
एक केस में हम उच्चाधिकारियों को समय समय पर फाईल पर सबूत सही नोट लिख कर बताते रहे कि फलां का सेलेक्शन ग़लत है। इसके विरुद्ध दहेज़ उत्पीड़न का पुलिस केस है। चार दिन सलाखों के पीछे रहा है। नियमानुसार पहले इसका डीम्ड सस्पेंशन होना ज़रूरी है। लेकिन हमारी बात नहीं मानी गयी। हमारे उच्चाधिकारी हमारी बात को काटते रहे। नतीजा यह हुआ कि वो फलां प्रोमोट हो गया। शासन से शिकायत आई। हमारा जवाब-तलब हुआ। हमने पूरा-पूरा सहयोग किया। चेयरमैन तक को हमने पूरा केस बताया।
लेकिन वही हुआ जिसका हमें अंदेशा था। जांच समिति बन गयी। गलती करने वाले जिस अधिकारी को चार्जशीट मिलनी चाहिए थी उसे न मिल कर हमें मिली। हमारे कैडर में चार्जशीट मिलना ही असाधारण घटना थी। शायद हमारे खानदान में चार्जशीट वाले हम पहले थे। लेकिन हमें कोई आघात नहीं लगा। हमें विश्वास था कि हम पाक साफ़ हैं। बिना खरोंच बा-इज़्ज़त सीना चौड़ा करके बाहर आएंगे। हमारे पास सबूत थे। सच्चाई के रास्ते पर थे। ऑफिस से इंसाफ न मिला तो कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाएंगे।

Wednesday, June 7, 2017

मिक्सी जूसर से जूस!

-वीर विनोद छाबड़ा 
आजकल मार्केटिंग का ज़माना है। बढ़िया पैकिंग। किसी विदेशी कंपनी की मुहर। आर्डर दें या न दें, आपके द्वारे पर आ जायेंगे। ये मेक इन जापान और ये जर्मनी। बाज़ार में किसी बड़े शो रूम से खरींदेंगे तो दस हज़ार में मिलेगा। लेकिन हम तीन हज़ार में ही दे देंगे। ज़बरदस्त क्रेज़ है विदेशी आइटम के लिए।
हमें एक बरसों पुराना वाकया याद आया है।
मिक्सी बड़े घरों की शोभा थी। विदेशी आइटम था। बड़ी उपयोगी वस्तु थी। कुछ देशी कंपनियों ने इसे घर-घर पहुंचाने की ठानी। उषा कंपनी भी उनमें एक थी। उनके कुछ नुमाइंदे हमारे  ऑफिस में इसे प्रमोट करने और बेचने आये। महिला कर्मियों ने इसमें विशेष दिलचस्पी दिखायी।
हमारे ऑफिस में ठुल्ले यानी निठल्ले किस्म के पुरुष और महिला कर्मचारी समान अनुपात में बड़ी मात्र में उपलब्ध थे और आज भी हैं।
इन्हीं में से एक मोहतरमा ने मिक्सी जूसर-ग्राइंडर खरीदा। वो गर्व से फूली न समा रही थी।
हमने ऐसे ही पूछा - ठीक से सीख लिया है न ऑपरेट करना?
उन्होंने हमारे प्रश्न को अपनी संपूर्ण लियाक़त पर ही प्रश्नचिह्न समझ लिया - हां हां। बिलकुल। आप तो हमें निरा बुद्धू समझते हैं। ईश्वर ने सारी बुद्धि आपमें ही ठूंस दी है। 
उन्हें हम पर इतना गुस्सा आया कि चेहरा लाल कर लिया। आंखों से मोटे-मोटे आंसू टपकने लगे। इच्छा हुई कि वेस्ट पेपर बास्केट नीचे रख दें ताकि कीचड़ न होने पाए।
हमने एक बार नहीं बल्कि तीन बार सॉरी बोल कर बात ख़त्म कर दी। लेकिन इसके बावजूद हम बहुत देर तक उनकी बड़-बड़ सुनता रहा - खुद तो खरीदी नहीं। दूसरों से जल रहे हैं।
ये सुन-सुन कर बाकी लोगों को खूब मस्ती आ रही थी - आज फंसे हो, छाबड़ा जी। बहुत चुटकी लिया करते हो न। 
यार कहां बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया। खुद से ये कहते हुए हम बाहर निकल लिए।
मोहतरमा ने रोज़ की तरह उस दिन भी चार बजे प्लास्टिक की डिबिया वाला टिफ़िन और तमाम दूसरा सामान झोले में डाला। चपरासी से मिक्सी का पैकेट उठवाया और घर के लिए निकल लीं - चलें। पांच बजे टेम्पो नहीं मिलता। फिर मुन्नू के पापा भी तो दफ़्तर से जल्दी घर आते हैं। 
मोहतरमा दूसरे दिन ऑफिस आयीं। लेकिन कुछ उदास-उदास सी।
पंगा लेने की आदत से हम भी मजबूर थे। उस दिन तो लाख़ रोकने की कोशिश की, लेकिन रुक न सके। पूछ ही बैठे - क्या हुआ?
वो हाथ नचाते हुए बोली - होना क्या था? उषा कंपनी वाले बेवकूफ बना गए।
हम हैरान हुए - वो कैसे?

Tuesday, June 6, 2017

जै जै बजरंगबली, ऐसों-वैसों को भी लिफ्ट किया है

-वीर विनोद छाबड़ा
जेठ महीने का चौथा और आख़िरी बड़ा मंगल। क़रीब पांच-छह हज़ार भंडारे आयोजित होंगे। पूड़ी और आलू सब्जी और कहीं सूजी का हलवा और चावल के साथ कढ़ी। लखनऊ वालों और लखनऊ में आज पधारे मेहमानों के मौज। जम कर सेवन करें।
जुगाली करने वालों की भी मौज है। इसी बहाने दो-तीन दिन के नाश्ता-पानी का इंतज़ाम हो जाता है।
लेकिन आज का मंगल रहेगा इधर हाईस्कूल-इंटरमीडियेट और अन्य परीक्षाओं में उत्तीर्ण छात्र/छात्राओं के नाम। बजरंगबली के दर्शनार्थ भारी भीड़ उमड़ेगी। उन्हें धन्यवाद देने। और आगे के लिए सीट बुक करने के लिए भी। जिनके रिजल्ट नहीं निकले हैं, उन्हें बजरंगबली का ही सहारा है।
परीक्षा आदि के मामले में यों भी बजरंगबली छात्रों के टॉप फेवरिट रहे हैं। और इधर बजरंगबली भी अपने भक्तों का पूरा-पूरा ध्यान रखते हैं। स्कूल कॉलेजों की और जाते हुए कोई रास्ता ऐसा नहीं मिलेगा, जहां बजरंगबली विद्यमान न हों। परीक्षा कक्ष में जब पर्चा हाथ में आता है, तब आंख बंद कर सबसे पहले बजरंगबली का ही तो नाम लिया जाता है।
छात्रों का बजरंगबली से प्यार आज का नहीं है, बहुत पुराना है। हमें अपना चालीस-पैंतालिस साल पहले वाला ज़माना याद आता है। आड़े वक़्त बजरंगबली ने साथ दिया। पेपर में जब कोई टेड़ा-मेड़ा सवाल आया तो आंख बंद बजरंगबली को याद किया। पिछली रात पढ़े हुए पाठ को फोकस किया। ओह, याद आ गया। बोल बजरंगबली की जय। थैंक्स, बाल बाल बचा लिया आपने।
हनुमान सेतु वाले बजरंगबली हमेशा टॉप पर रहे हैं। एक तो इसलिए कि यूनिवर्सिटी के बहुत पास हैं। दूसरा छात्रों को आशीर्वाद देने की उनकी सर्विस राउंड दि क्लाक चलती है। पंडित जी प्रसाद झोली भर देने में पीछे नहीं रहते हैं। और प्रसाद चढाने वाले भी खुश। पंडित जी ने कभी मुट्ठी भर कर प्रसाद नहीं काटा। बस हनुमान जी सिर्फ दिखा दिया कि देखिये भक्त आपके लिए क्या और कितना लाये हैं। बाकी का न्याय आपको करना है।
कल और आज में फ़र्क यह है कि कल के बजरंगबली थोड़ा सख्त थे। बहुत हार्ड मार्किंग करते थे। बामुश्किल तीस-चालीस प्रतिशत को ही उत्तीर्ण किया। अब तो पच्चासी-नब्बे के आस-पास पास रिज़ल्ट आता है। अस्सी से सतानवे-अठानवे प्रतिशत प्राप्तांक वालों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। हैरानी तो तब होती है जब बजरंगी जी 'ऐसों-वैसों' को भी लिफ़्ट कर देते हैं। जबकि हमारे ज़माने में हमारे एक पड़ोसी बहुत मेहनत करने के बावजूद सातवें प्रयास में हाई स्कूल पास कर पाए थे। 

Sunday, June 4, 2017

काश, बजाज खरीदी होती!

-वीर विनोद छाबड़ा
कई साल पहले की बात है। हम एक बीमार सहकर्मी का हाल जानने अस्पताल जा रहे थे। अपने अधिकारी से दो घंटे का अवकाश मांगा।
उन्होंने सहर्ष आज्ञा दे दी।
हम निकलने को ही थे कि एक महिला सहकर्मी ने रोका। हम भी चलें।
हम थोड़ा अचकचाये, थोड़ा झिझके। कुछ पल सोच में गुज़र गए। ऐसी स्थिति पहली बार आई थी। हां कहूं या न। मन चंगा तो कठौती में गंगा। हमने हां कर दी। गेट पर मिलिए। स्टैंड से स्कूटर लेकर आता हूं।
हम गेट पर पहुंचे। उन्हें इंतज़ार करते पाया। हमने कहा बैठिये।
वो बिदक गयीं। यह कैसा स्कूटर है? इसमें तो एक ही सीट है।
हमने समझाया। यह नया स्कूटर है। काइनेटिक होंडा। इसमें एक ही सीट है। लंबी वाली। इस पर दो लोग आसानी से बैठ सकते हैं।
लेकिन बजाज में तो दो सीट होती हैं।
हां, ठीक कहती हैं आप। लेकिन मैं क्या कर सकता हूं। कंपनी वालों की गलती है यह। बाकी आप की मर्ज़ी।
वो कुछ क्षण चुप रहीं। शायद कुछ सोच रहीं थीं। अस्मंजय में थीं। जाऊं कि नहीं। 
मैंने उनकी मुश्किल आसान की। ठीक है तो मैं चलता हूं।
लेकिन भारत में जुगाड़ बहुत बड़ी नेमत है। उन्होंने हमें दो मिनट रुकने को कहा। वो वापिस ऑफिस में चली गयीं।
हम सिर्फ़ कयास लगाते रहे। शायद कुछ भूल गयीं हैं।
वो पांच मिनट बाद वापस लौटीं। उनके हाथ में एक फाईल बोर्ड था। पीछे स्कूटर पर धम्म से बैठ गयीं। बीच में फाईल बोर्ड रख लिया।
जाते हुए और फिर लौटते हुए तमाम आंखें हमें घूरती रहीं।
इस बीच हम खामोश रहे। हमारी निगाह सामने ट्रैफिक पर थी। थोड़ा तनाव भी था। एक्सीडेंट न हो जाये, रब्बा रब्बा।

Saturday, June 3, 2017

कुर्सी पर टंगा कोट

- वीर विनोद छाबड़ा
अस्सी के मध्य का ज़माना था। मस्ती भरा दौर था। कम आमदनी में भी जनता खुश थी, ज़रूरतें जो कम थीं।
हमारे बड़े बाबू इलाहाबाद के रहने वाले थे। उन्हें अपने घर और ज़मीन से बहुत लगाव था। यों बाबू के बैग में बहानों की कोई कमी तो रहती नहीं है। फिर हमारे बड़े बाबू के डीएनए में तो घाट-घाट के अलावा संगम की नदियों का पानी था। शनिवार की दोपहर को निकले तो मंगल की दोपहर बाद दिखते थे। बीच में छुट्टियां पड़ गयीं तो अगले हफ़्ते दीदार हुए। कुर्सी पर कोट ज़रूर टंगा रहता ताकि सनद रहे कि इधर-उधर टहल रहे हैं, अभी आते ही होंगे। गर्मियों में कोट की जगह झोला लटका दिखता था, जिसमें एक अदद फटी पतलून और मैली शर्ट रहती थी। हम जब नज़दीक गए तो बदबू आयी। अफसर के मुंहलगे थे। लिहाज़ा जब चाहा टूर मिल गया। एक दिन का काम चार दिन में निपटा कर लौटे। ऊपर से टीए-डीए। मौजां ही मौजां।
एक बार बड़े बाबू शनीचर की दोपहर निकले तो अगले शनीचर तक न लौटे। अपनी खोज-खबर तक न दी। हम लोग परेशान हुए। इस बीच नए अफसर आ गए। बहुत कड़क थे। ऊपर से सूट-बूट वाले। एमए, एलएलबी थे। कानून-कायदे से चलने वाले। शायद इसीलिए साल भर से ज्यादा एक जगह कभी टिक नहीं पाये। बीस साल की नौकरी में पच्चीस तबादले झेल चुके थे। जज साहब के उपनाम से मशहूर थे। उन्होंने कई बार बड़े बाबू को बुलवा भेजा। प्यून आया और हम लोगों ने कुर्सी की पीठ पर लटके कोट की ओर इशारा कर दिया।
अफसर को दाल में कुछ काला महसूस हुआ। खुद ही चले आये कमरे में। कुर्सी की पीठ पर टंगा कोट देखा। मुस्कुराए। शायद कैरियर में ऐसे कई कोट देख रखे थे और झोले भी। उन्होंने हमें पीछे आने का ईशारा इशारा किया। अगले क्षण हम उनके कमरे में हाज़िर। झूठ बोलना बेकार था और वो भी जज के नाम से मशहूर अफसर के सामने, जो पर्दे के पीछे मछली की गंध सूंघने में माहिर हो। हमने बिना उनके पूछे ही सब कुछ सच-सच उगल दिया।
सोमवार की दोपहर बाद बड़े बाबू लौटे। उन्हें माज़रा पता चला तो वो बिलकुल नहीं घबराये। परफेक्ट एक्टर थे। वो बाबू ही क्या जो एक्टिंग में माहिर न हो। अफसर के कमरे में घुसे और दंडवत लेट गए। बच्चे की बीमारी का बहाना बनाया। अफसर कितना ही कड़क क्यों न हो, होता तो इंसान ही है। बच्चे की बीमारी के नाम पर पिघल गए।

दिल्ली जाना मानो अमीनाबाद जाना

- वीर विनोद छाबड़ा
आज फ़ोन आया है, कज़िन सिस्टर का। बेटी की शादी है, अक्टूबर की फलां तारीख़ को। आने-जाने का रिज़र्वेशन आज ही करवा लो भैया। अभी तो क़रीब चार महीना बाकी है। लेकिन अब ज़माना बदल गया है। ट्रेन में बर्थ के लिए मारामारी है। कई कई दिन पहले रिजर्वेशन करना पड़ता है।
हमें वो ज़माना याद आता है। जब शादी की सूचना तो जल्दी दी जाती थी, लेकिन रिजर्वेशन पर ज़ोर कभी नहीं होता था। पंद्रह-बीस दिन पहले आ जाओ। और वापस जाओगे भी हमारी मर्ज़ी से। रिजर्वेशन का तो कोई मतलब ही नहीं होता था। जब चाहो, मुंह उठाओ और चल दो। भीड़-भाड़ वाले दिनों में भी ट्रेन में बैठने की जगह तो मिल ही जाती थी। न हुआ तो फर्श पर ही चद्दर बिछा कर पसर लिए।
यों ट्रेन से हमारा जन्म का रिश्ता है। जब हम पैदा हुए थे तो पिताजी रेलवे में थे। हम रहे भी रेलवे स्टेशन के सामने हैं और वो भी रेलवे कॉलोनी में। ऐसे में हफ़्ता पहले रिजर्वेशन की नौबत कभी नहीं आने पायी। रेलवे कॉलोनी में रहने से फ़ायदा ही क्या? हमेशा जिस दिन जाना हुआ, उसी दिन कराया और बर्थ पर लेट कर गए।
क्या दिन थे वो भी? पिताजी को फ़ैमिली पास मिला हुआ था। पास नहीं तो पीटीओ। जब जी चाहा चल दिए, दिल्ली या बनारस। मानों शॉपिंग करने डेढ़ किलो मीटर दूर अमीनाबाद जा रहे हैं।
हमारी कॉलोनी में ज्यादातर टीटीई या गार्ड रहते थे, मुरादाबाद और मुगलसराय डिवीज़न के। हमारे पिताजी क्लेम ऑफिस में थे। अक्सर टूर पर रहते थे। पास-पीटीओ हर समय उपलब्ध नहीं रहता था। जब स्कूल-कॉलेज में दो-तीन दिन की छुट्टी पड़ी तो पड़ोस के बत्रा चाचा का दरवाज़ा खटखटा दिया - चाचाजी, आज गाड़ी लेकर मुरादाबाद जा रहे हैं तो हमें भी लेते चलें।
बत्रा चाचा रहे हों या श्रीवास्तव चाचा, किसी ने कभी मना नहीं किया। मुरादाबाद तक तो कोई समस्या नहीं थी। आगे के लिए चाचा जी ने टिकट ले कर दूसरी ट्रेन में बैठा दिया। लेकिन अगर त्रिवेदी चाचा की ड्यूटी रही तो मज़ा ही आया समझो। वो यूनियन के नेता भी थे। मुरादाबाद के आगे दिल्ली तक भी फ्री की यात्रा का इंतज़ाम हो जाया करता था। उनके कॉउंटरपार्ट हमें दिल्ली स्टेशन के गेट के बाहर तक छोड़ा करते थे, रास्ते में चाय-नाश्ते का भी प्रबंध अलग से। हम उनसे अगले हफ्ते भर की ड्यूटी भी पूछ लिया करते थे ताकि जाना भी फ्री हो जाए।
दिल्ली में दादा जी का घर तो था ही। रहने-ठहरने और खाने-पीने की कोई दिक्कत नहीं रही। वहां दो दिन रहे। सदर, करोलबाग़ और कनॉटप्लेस घूमे। एकाध फ़िल्म देखी। और फिर वापसी। त्रिवेदी चाचा के कनेक्शन वाला कोई मिल गया तो ठीक, नहीं तो मुरादाबाद तक का टिकट और आगे के लिए अपनी कॉलोनी के कोई न कोई गार्ड या टीटीई चाचा मिल ही जाते थे। बाद में जब पिताजी को पता चलता तो बहुत गुस्सा होते थे।

Thursday, June 1, 2017

बांधने का हक़ इंसान को नहीं

-वीर विनोद छाबड़ा
एक बादशाह अपनी ईमानदारी और रहम दिल होने के लिए बहुत मशहूर हुआ करते थे।

उनके दरबार से कभी कोई खाली हाथ नहीं लौटा। उसने रोज़ाना सैकड़ों दीन-दुखियों की सेवा की और हुनरमंदों को नौकरी और ईनाम से नवाज़ा। अहंकार तो उसे छू तक नहीं पाया। यही नहीं उसने कभी दूसरों से सीखने में गुरेज़ भी नहीं किया, चाहे वो छोटा रहा हो या बड़ा।
यह वो दौर था जब इंसान दूसरे इंसान को खरीदता था। उससे मनमाना काम लेता था। न करने पर उसकी चमड़ी तक उधेड़ लेने में भी उसे संकोच नहीं होता था। खाने के लिए बस ज़िंदा रहने भर का ही दिया जाता था।
एक दिन बादशाह को भी महसूस हुआ कि अपने निजी कामों के निपटारे के लिए ग़ुलाम की ज़रूरत है।
बादशाह ने मंत्री से कह कर मंडी से अपने लिए एक हष्ट-पुष्ट ग़ुलाम खरीदवाया।
बादशाह के सामने ग़ुलाम हाज़िर हुआ।
बादशाह ने पूछा - तेरा नाम क्या है?
गुलाम ने कहा - ग़ुलाम का अपना कोई नाम नहीं होता। जो आप रख दे वही आयंदा से मेरा नाम नाम होगा?
बादशाह ने पूछा - तू खाता क्या है?
ग़ुलाम ने कहा - ग़ुलाम की अपनी कोई हैसियत नहीं होती कि अपने लिए कुछ खाने की फ़रमाईश करे। जो आप खाने को दें, वही ग़ुलाम को खाना पड़ेगा।
बादशाह ने पूछा - तू क्या कर सकता है?
ग़ुलाम ने कहा - जो आप हुक्म करें? हम करेंगे। चाहे उसमें ग़ुलाम की जान ही क्यों न चली जाए।