Wednesday, November 5, 2014

परदे में रहने दो!

परदे में रहने दो!
-वीर विनोद छाबड़ा
मुद्दत पहले की बात है। सन १९७१ - ७२ की। लखनऊ यूनिवर्सिटी में पोलिटिकल साइंस में पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहा था।
स्टूडेंट लाइफ मीन्स फक्कड़ जीवन। साइकिल से आना-जाना। और उसके अलावा ज्यादा से ज्यादा चवन्नी जेब में। बाकी दोस्तों-यारों का प्यार। अहसान मेरे दिल पे तुम्हारा है दोस्तों, ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तों।
कभी-कभी सब पूल करके भी चाय-शाय कर लेते थे। जब कभी छटे-छमाही जेब थोड़ी गर्म हुई तो रिक्शा।
एक बार ऐसा ही हुआ। जेब में दो रुपए थे। बस में बैठे। हनुमान सेतु उतर लिए। वहां से वाकिंग डिस्टेंस पर यूनिवर्सिटी। लेकिन बीस पैसे दिए रिक्शेवाले को-गेट नंबर एक छोड़ देना भैया।
दो चार लड़कियां तो देख ही लेंगी। इम्प्रेशन जमेगा। मज़ा आ जायेगा। कार स्कूटर तो थी नहीं और न ही औकात थी। बस यही रिक्शा ही था रुआब गांठने के लिए।
यही सिलसिला वापसी पर भी अपनाया।
यूनिवर्सिटी से चले, हज़रतगंज के लिए। वहां से हनुमान मंदिर से चारबाग़ के लिए बस।
वो दौर लंबे बाल का फैशन का था। घने बाल वाले को देख कर लगता था मानो किसी ने टोकरा सर पर उलट रख दिया है। आज की पीढ़ी उस युग को देख कर ज़रूर यही सोचती होगी - यार, उस युग की पीढ़ी के लोगों के कान नहीं होते होंगे।
अलावा इसके प्रिंटेड फूलदार फ्रॉकनुमा डिज़ाइन की बुशशर्ट और बेल्ल बॉटम पैंट जो अक्सर शरारे और पायजामे के क्रॉस का अहसास कराती थी। 
बहरहाल, गर्मी के दिन। तपती धूप। तेज हवा। रिक्शावाले ने हुड चढ़ा दिया। हवा के गर्मागर्म थपेड़ों से पीछे का परदा लगातार उड़ रहा था।
स्टेडियम के पास पहुंचे। सन्नाटा पसरा पड़ा था। इतनी तेज़ धूप में निकले कौन? यों भी उस दौर में स्टेडियम के आस-पास बिज़नेस एक्टिविटी न के बराबर थी।
तभी अहसास हुआ कि कुछ लौंडे साइकिल से पीछा कर रहे हैं। और साथ में फ़िक़रेबाज़ी भी  - वाह गुरू, माल है माल। पीछे से तो बढ़िया दिख रहा है। चलो सामने से देखते हैं। ये कह कर लौंडों ने साइकिल तेज़ कर दी।
मैंने भी सोचा आने दो सालों को सामने। देखते ही फट जाएगी।

Sunday, November 2, 2014

एक थी लक्ष्मी छाया!

-वीर विनोद छाबड़ा

१९७१ में राज खोसला की 'मेरा गांव मेरा देश' को सुपर हिट बनाने में जिन फैक्टर्स ने काम किया था उसमें निम्मांकित तीन गाने भी शामिल थे -


१) मार दिया जाए या छोड़ दिया जाए..... 
२) हाय शरमाऊं किस-किस को बताऊं अपनी प्रेम कहानियां…और
३) आया, आया अटरिया पे कोई चोर.....

इस सच को निर्देशक राज खोसला ने स्वीकार भी किया था।

ये दोनों गाने नायिका आशा पारेख पर नहीं फिल्माए गए थे बल्कि एक कम जानी -पहचानी अभिनेत्री लक्ष्मी छाया पर फिल्माए गए थे। बच्चा-बच्चा जान गया था उसे।  राज खोसला ने ऐसा क्यों किया था? इस राज को आज तक कोई नहीं जान पाया। उनका मक़सद तो आशा पारेख की पतंग आसमान पर चढ़ाना था। यों कभी कभी ऐसा होता है कि बाज़ छोटे अदाकार भी अपनी अदाकारी से किरदार में जान डाल देते हैं कि फिल्म हिट होने सा सबब बन जाते हैं। और अहम अदाकार ठगे से रह जाते हैं। इससे पहले लक्ष्मी छाया नायिका की सहेली के छोटे-मोटे रोल किया करती थी। मज़े की बात ये थी ये नायिका ज्यादातर आशा पारेख ही रहती थी।

उन दिनों राज खोसला ने तय कर रखा था कि आशा पारेख को ग्लैमर की दुनिया से निकाल कर मीनाकुमारी सरीखी गंभीर अभिनेत्री बना देंगे। इसकी शुरआत वो 'दो बदन' से कर चुके थे।

'मेरा गांव…' सुपर हिट होने के बावजूद आशा पारेख को कुछ भी हासिल नहीं हुआ। लेकिन ट्रेजेडी ये रही कि 'मार दिया जाए की छोड़ दिया जाए गर्ल' से घर-घर की पहचान बनी लक्ष्मी छाया भी तीर मार कर कोई कद्दू नहीं फोड़ पायी। 

लक्ष्मी को 'रास्ते का पत्थर' में ज़रूर अच्छी फुटेज मिली। इसमें अमिताभ बच्चन नायक थे और नवोदिता नीता ख्याणी नायिका। नशे में हर वक़्त चूर लड़की के किरदार में लक्ष्मी ने जान डाल दी। लेकिन बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड नाकामी ने लक्ष्मी के अरमानों पर भी पानी फेर दिया। लक्ष्मी छाया की पहचान वही रही। वो नायिका की अच्छी सहेली से आगे नहीं बढ़ पायी। 

Saturday, November 1, 2014

डेनिस कॉम्पटन - बल्ले से रन बनाने के साथ पिटाई भी।

-वीर विनोद छाबड़ा

बेहतरीन तकनीक से खेलने वाले दुनिया के बेहतरीन बल्लेबाज़ों का जब ज़िक्र होता है तो डेनिस कॉम्पटन को ज़रूर याद किया जाता है। दायें हाथ के इस इंग्लिश बल्लेबाज़ ने ५०.०७ की औसत से ७८ टेस्टों में ५८०७ रन बनाये थे। काउंटी में भी उन्होंने ढेरों रन बनाये। उनके बल्ले का कमाल  देखने दूर-दूर से लोग आते थे।
रिटायर होने के बाद भी कॉम्पटन ने बल्ला कभी नहीं छोड़ा। जब कभी मौका मिला, दो चार हाथ ज़रूर दिखाए। लेकिन उन्होंने ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि बल्ले का इस्तेमाल मैदान से बाहर भी करना पड़ सकता है।


ये बात १९८५ की है। हुआ ये था कि एक बार कॉम्पटन एक पार्टी से  देर रात लौट रहे थे।

एक सुनसान जगह पर कॉम्पटन की कार को कुछ लुटेरों ने घेर लिया। लुटरों ने उनकी जामातलाशी ली। कुछ भी नहीं मिला।

लुटेरों को घोर निराशा हुई। इतनी बेशकीमती कार में चलेंगे, सलीकेदार सूट पहनेंगे और औकात ज़ीरो।

लुटेरों को यकीन नहीं हुआ कि ये अमीर दिखता शख्स मुफ़लिस है। ज़रूर दाल में कुछ काला है। कार में कुछ न कुछ बेशकीमती होगा। उन्होंने कॉम्पटन की कनपटी पर पिस्तौल की नली लगा दी - कार में जहां पैसा छुपा रखा है, निकाल दो। वरना जान से हाथ धो बैठोगे।

एकबारगी कॉम्पटन के हाथ-पांव फूल गए। लेकिन अगले पल वो सब कुछ समझ गए। लुटेरे का हाथ कांप रहा था। इसका अहसास सर पर रखी पिस्तौल की नली करा रही थी। ये लुटेरे अभी अधकच्चे हैं। इन्होंने कभी चींटी भी नहीं मारी होगी। आखिर खौफ़नाक गेंदबाजों के मन को पढ़ने में माहिर जो थे वो। 

कॉम्पटन ने कहा - हां बेइंतिहा दौलत है कार में। मैं देने के लिए तैयार भी हूं। मगर एक शर्त है कि सब एक किनारे खड़े हो जाएं। सबको बराबर हिस्सा मिलेगा।

लुटेरे उनकी बातों में आ गए। तब ६७ वर्षीय कॉम्पटन ने कार से अपना बल्ला निकाला और ज़ोर-ज़ोर से घुमाते हुए बोले - ये है मेरी दौलत। इसने आज तक सैकड़ों गेंदों का कचूमर निकाला है और हज़ारों रन उगले हैं। लेकिन आज इसकी आज़माईश तुम लोगों पर होगी।

लुटेरे ये सुनते ही डर गए कि ये कोई पुराना खुर्राट बल्लेबाज़ है। इसकी मार बड़ी महंगी पड़ेगी। निकल लो पतली गली से। सारे लुटेरे पल भर में नौ-दो-ग्यारह हो गए।

जिन लोगों की क्रिकेट में दिलचस्पी नहीं है उन्हें कॉम्पटन का दूसरा परिचय दे दूं। यकीनन उन्हें पसंद करेंगे।

Thursday, October 30, 2014

खड़ूस आदमी!

-वीर विनोद छाबड़ा

हरेक की ज़िंदगी में अच्छे के अलावा खराब और खड़ूस किस्म के दोस्त आते हैं। ,मगर ये नियमित नहीं होते। बीच बीच में हैरान-परेशान करने चले आते हैं।

हमारे भी एक खड़ूस दोस्त हैं। चमड़ी जाए, पर दमड़ी नहीं किस्म के। हमेशा इसकी सिद्धांत पर यकीन किया। दूसरों का खाया, उड़ाया और पीया।

जब अपना नंबर आया तो ठनठन गोपाल बन गए - यार घर में बड़े खर्चे हैं, नाना प्रकार की बिमारियों से ग्रस्त बूढ़े मां-बाप। तिस पर दो लड़कियां। एजुकेशन लोन ले रखा है। बैंक से हाउसिंग लोन ले कर मकान बनवाया है। पैसा बचता ही नही है।

ऑफिस आने - जाने के लिए घंटों उनकी निगाहें लिफ्ट देने वाले को तलाशती रहीं। जब थक-हार जाते तो बस, ऑटो-टेम्पो में थक्के खाते हमेशा दो घंटे देर से गंतव्य पर पहुंचते।

कई बार राय दी गयी - एक अदद स्कूटी या साइकिल लेलो।

मगर वही रोना - पैसा कहाँ है? उधार दे-दो। किश्तों में अदा कर दूंगा।

अरे भाई, जब किश्तों में अदा कर सकते हो तो बैंक से लोन ले लो। मगर बड़े सयाने हैं। वहां से नहीं लेंगे। मूल के साथ सूद भी चुकाना पड़ता है।

तीन चार-साल पहले ऑफ़िसर पद पर प्रमोशन हुआ। अफ़सरी हनक के लिए एक अदद सेकंड हैंड कार खरीदी। बोले- दफ्तर आने-जाने के लिए बसों, ऑटो-टेम्पो में धक्के खाते-खाते परेशान हो गया हूं। अब प्रमोशन भी तो हो गया है। अच्छा नही लगेगा कि क्लास -टू ऑफ़िसर ऑटो से उतर रहा है। फिर ऑफ़िसर को टाइम पर ऑफिस भी तो पहुंचना होता है।

हमने कहा- स्कूटर ली होती। कार से भी पहले पहुंच जाते। सड़क पर ट्रैफिक बहुत ज्यादा होता है। 

बोले - इतनी अच्छी पोस्ट है। अच्छा नही लगता कि स्कूटर पर चलूं।

उनके साथ एक दिक्कत और भी है। ड्राइविंग नहीं आती। स्कूटर तक तो कभी चलाया नहीं। कार क्या चलाएंगे? ऐसा नहीं कि बढ़ती उम्र में ड्राइविंग सीखना उनके बस की बात नहीं। बात ये है कि मुफ़्त में कौन सिखाये। दोस्तों ने भी हाथ खड़े कर दिए। इतनी फुरसत कहाँ किसी के पास। थक हार कर ड्राइवर रख लिया।

उनके एक भुक्तभोगी मित्र बोले - पैसा इफ़रात में है। मगर दिल छोटा है। बीवी का जन्मदिन पर दोस्तों से केक के लिए पैसा उधार लेता है। किसी बढ़िया होटल में खाना खाता है। आज तक उधार लिया पैसा कई तकादों बाद वापस किया। और वो भी आधा-अधूरा कई टुकड़ों में चवन्नी-अठन्नी करके। कंजूस ही नहीं मक्खीचूस भी है। थोड़े दिन में औकात पर आ जायेगा। अरे कार है। पानी से तो चलेगी नहीं! पेट्रोल से चलेगी और पेट्रोल मिलता है पैसे से। फिर ड्राइवर की तनख़्वाह। जिसकी अपने पैसों से एक कप चाय पीने से फटती हो वो साला…

आखिर वही हुआ। उनकी मीन-मेख निकालने की आदत से परेशान होकर ड्राइवर नौकरी छोड़ गया। पुराना सिलसिला फिर शुरू हो गया। बसों-ऑटो में धक्के खाना या दूसरों से लिफ्ट मांगना। परिवार के साथ जब कहीं जाना होता था तो किसी न किसी दोस्त की सेवाएं ले लेते।

Wednesday, October 29, 2014

ओ चाल भाई चाल!

ओ चाल भाई चाल!

-वीर विनोद छाबड़ा

कल आदरणीय श्री दिनेशराय द्विवेदी जी का कान में जनेऊ पहन मल-मूत्र त्याग करने संबंधी एक मज़ेदार संस्मरण पढ़ा। मुझे भी ऐसी ही एक घटना याद आ गयी। 

१९५७-५८ की घटना है ये। चाचाजी की ससुराल दिल्ली के किंग्सवे कैंप (गुरु तेग बहादुर नगर) में थी। मेरा ददिहाल कुतब रोड पर था।

एक दिन मैं चाचाजी के साथ उनकी ससुराल गया। सात-आठ साल की उम्र रही होगी मेरी। रात ज्यादा हो गयी। सो वहीं रुकना पड़ा।

उन दिनों शौचालय पंचायती थे, जिन्हें शायद बम-पुलिस भी बोला जाता था। सुबह-सुबह चाचाजी पकड़ कर ले गए। एक लाइन से दस शौचालय थे। हर शौचालय के बाहर दस-पंद्रह लोगों की लाइन थी। सबके हाथ में पानी से भरा टीन का डिब्बा।

जब भी कोई शौचालय के भीतर जाता तो हर आधे मिनट के बाद बाहर खड़ा अगला बंदा दरवाज़ा पीट-पीट कर चिल्लाता - ओ, चाल भाई, चाल।

ऐसा वो तब तक हर आधे मिनट बाद दोहराता, जब तक कि भीतर गया आदमी बाहर नहीं आ जाता।  इसके बाद 'चाल भाई चाल' कहने वाला बंदा भीतर जाता और 'चाल भाई चाल' की ड्यूटी बाहर खड़ा वो बंदा संभाल लेता जिसका नंबर लगा होता था।

सबसे बड़ी दिक्कत तो आखरी बंदे की होती। तब उसे किसी से गुजारिश करनी होती थी कि बाहर खड़े होकर हर आधे मिनट पर 'चाल भाई चाल' करता रहे।  मुझे याद है ये देख कर मुझे तो 'उतरी' ही नहीं। बस दूर खड़े होकर तमाशा देख खुश होता रहा, जब तक कि चाचाजी बाहर नहीं आ गए।

लखनऊ लौट कर कई मित्रों को मैंने ये घटना सुनाई। हम खूब हंसे। कई दिन तक तो इस घटना को याद करके मैं अकेले ही हंसता रहा।

फिर कई बरस गुज़र गए। मैं उस घटना को भूल गया। ज़माना कहीं से कही पहुंच गया। बम-पुलिस ख़त्म हो गए। चाचाजी में मॉडल टाउन में कोठी खड़ी कर ली।


उस घटना के करीब पंद्रह साल बाद चाचाजी हमारे घर आये। सुबह वो टॉयलेट गए। करीब दस मिनट बाद निकले। थोड़े परेशान दिखे। करीब आधे घंटे बाद वो फिर टॉयलेट गए। दस मिनट बाद निकले। इस बार भी परेशान दिखे। मैंने पूछा- चाचाजी पेट तो ठीक है न ?

बोले - सब ठीक है। बस कभी-कभी होता है। दो-दफ़े जाना पड़ता है।

लेकिन जब थोड़ी देर बाद जब उन्होंने फिर टॉयलेट का रुख किया तो मुझसे नहीं रहा गया - चाचाजी ज़रूर कोई बात है। आप छुपा रहे हैं। आप वापस आइये। फिर डॉक्टर के पास चलते हैं।