Friday, January 2, 2015

फ्री की पीता हूं!

-वीर विनोद छाबड़ा

१९९१ की गर्मियां थीं। एक रात अचानक पेट में दर्द उठा। गैस होगी। ये सोच कर ठंडा पानी पिया। मगर दर्द बढ़ता ही गया।

दर्द जब बर्दाश्त की हद से बाहर हो गया तो पत्नी को उठाया। अजवाइन, हींग, गरमपानी से सिकाई आदि तमाम घरेलू उपाय किये। मगर सब बेकार।

पिताजी ने डॉक्टर की सलाह दी। लेकिन रात दो बजे कौन डॉक्टर मिलेगा? हमारी कॉलोनी इंदिरा नगर को बसे यों तो बारह बरस हो चुके थे मगर स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल था। सिविल हॉस्पिटल, मेडिकल कॉलेज या बलरामपुर ये सरकारी अस्पताल थे। आठ दस किलोमीटर से कम तो कोई नहीं। प्राइवेट बहुत कम थे और उन पर ऐतबार भी नहीं था।

निम्न आय वर्गीय कॉलोनी थी। लिहाज़ा आसपास किसी के पास कार तक नहीं थी। ऑटो था नहीं। टेम्पो दूर मिलते थे। स्कूटर पर बैठने की स्थिति में नहीं था। अड़ोसी-पडोसी आ गए तो तरह-तरह के सुझाव भी आने लगे। एक साहब ने अपने तजुर्बे के आधार पर एलान किया - तुरंत ले जाओ इन्हें अस्पताल। वरना सुबह तक के मेहमान हैं।

पत्नी ने रोना-धोना शुरू कर दिया। तभी महसूस हुआ कि दर्द कम हो रहा है। सबको धन्यवाद दिया - कृपया अब जायें। अब मैं ठीक हूं। अब जाकर सोएं अपने घरों में। ज़रूरत हुई तो फिर याद करूंगा।

और अगले पंद्रह मिनट बाद पता ही नहीं चला कि कभी दर्द था। सब नार्मल। शुक्र है। खूब बढ़िया नींद आई। सुबह देर तक सोया भी। आराम से खाया-पिया।

डॉक्टर को दिखाया। उसने कहा - कुछ भी तो नहीं। गैस्टिक रही होगी। कुछ दवा दे दी।

हम भी खुश। दो दिन कुछ नहीं हुआ। डॉक्टर ठीक कहते थे कि गैस्टिक ही रही होगी।

लेकिन अगली ही रात फिर वही दर्द। बढ़ता ही गया। दो घंटा रहा और फिर चला गया। मानों कुछ हुआ ही नहीं था।

अगली रात फिर वही हुआ। फिर डॉक्टर को दिखाया। वो बोले - गैस्टिक ही है। दवा बदल दी है। थोड़ी तेज भी कर दी है। 

मगर सब बेकार। आधी रात शुरू होते ही दर्द शुरू हो जाता था।

कई जगह से राय आई - किसी भूतनी का साया है। झाड़ फूंक करा लो।

बड़ी-बूढ़ियों को लगा जादू-टोना है। उतरवाना चाहिए। टिल्लू की दादी एक्सपर्ट है। कइयों का उद्धार कर चुकी है।  

इधर डॉक्टर परेशान। उसने किसी बड़े डॉक्टर को रेफर किया। एक्सरे हुआ। सब सही। इसके बाद लखनऊ के दर्जन भर डॉक्टरों को दिखाया। कोई एसिडिटी बताता तो कोई हाइपर एसिडिटी। नई-नई दवा दे देता। कोई वही दवा ब्रांड बदल कर देता।

लेकिन सब फेल हो गया। दर्द बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की।

इस बीच महीना गुज़र गया। अब खाना भी अच्छा लगना बंद हो गया। 

डॉक्टर से अनुरोध किया - अल्ट्रा-साउंड करा लें। कुछ तो पता चलेगा। 

डॉक्टर ने कहा - ठीक है। लेकिन मेरा तीस साल का तजुर्बा कहता है। निकलेगा कुछ नहीं।

Wednesday, December 31, 2014

काले स्वेटर में २२ साल।

-वीर विनोद छाबड़ा

आज सुबह-सुबह एक मित्र आ धमके।

देखते ही आगबबूला हो गए। अब कितने दिन और पहनोगे? जब आता हूं यही काला स्वेटर पहने दोहरी-तिहरी रज़ाई में घुसे दिखते हो। दस-बारह साल से देख रहा हूं। कब तक पहनोगे? रिटायर करो।

मैं शून्य में निहारते हुए बताता हूं - दस बारह नहीं यार पूरे बाईस साल हो गए हैं।

मित्र थोड़ी देर तक बकर-झकर किये। चाय सुड़के और चलते बने। इस ताकीद के साथ कि अगली बार आऊं तो ये पहने न दिखना। 

उनके जाते ही मैंने कमरे में उनकी मौजूदगी से बने माहौल को फूं-फां किया। और अपने स्वेटर की ओर मुखातिब हुआ  - दोस्त, एक और पैदा हुआ तुम्हारा दुश्मन। लेकिन तुम घबराना नहीं। कोई कुछ भी कहे। बाइस साल का लंबा सफ़र साथ-साथ तय किया है हम दोनों ने। कोई मज़ाक नहीं। तुम्हें नहीं छोड़ सकता ऐ काले दोस्त। मेरे फेयर रंग के साथ काला रंग बहुत मैच करता है। गोरे रंग पे इतना न गुमान कर.…मुझे ये बात कई लोगों ने बताई। काले दिल वालों की काली नज़र से बचाया है तुमने। नज़र न लग जाये किसी की राहों में.…पांच बार स्कूटर से गिरा हूं। तीन बार तो तुम्हीं थे मेरे तन पर।

मेरी फरमाइश पर मेमसाब ने तुम्हें रिकॉर्ड समय में बनाया। तुम एक मात्र आइटम हो जो मेरी पसंद से बनाये गए और आज तक मेरी मर्ज़ी से मेरे घर में हो।

पहले दो साल तक मैं तुम्हें सिर्फ पार्टियों में पहनता रहा। लेकिन बाद में रेगुलर पहनने लगा। ऑफिस में और बाहर भी। कई साल तक ये सिलसिला चला। तुम्हें मेरे तन पर देख लोग आजिज़ आ गए। जलने लगे।

तुम मेरी पहचान भी बने। कोई बाहर से आता तो मातहत कहते - जाओ भैया देख लो किसी फ्लोर पर कहीं विचर रहे होंगे। जो फुल आस्तीन काला स्वेटर मिले, समझना साहब इसी में धरे हुए हैं।

जब एक से बढ़ कर एक नए स्वेटरों की आमद हो गयी तो पुराने पीछे चले गए। लेकिन पुराना होने की बावज़ूब मैंने इसे छोड़ा नहीं। घर में पहनने लगा।

Monday, December 29, 2014

राजेश खन्ना, एक मिथक का नाम!

-वीर विनोद छाबड़ा

आज के दिन जन्मे राजेश खन्ना को यूनाइटेड प्रोडूसर्स टैलेंट हंट ने खोजा था। उन्हें सबसे पहले नासिर हुसैन ने साइन किया था। लेकिन जीपी सिप्पी की रविंद्र दवे निर्देशित ‘राज़’ पहले फ्लोर पर गयी। मगर चेतन आनंद की ‘आख़िरी ख़त’ और नासिर हुसैन की ‘बहारों के सपने’ पहले रिलीज़ हो गयी। ये तीनों ही बाक्स आफ़िस पर फ्लाप रहीं। हां आलोचको ने ज़रूर दबे लफ्ज़ों में ऐलान किया कि राजेश में अच्छे कलाकार के गुण प्रचुर मात्रा में मौजूद हैं।


मैंने राजेश खन्ना की तमाम फ़िल्में देखी हैं। दरम्याना कद, साधारण रंग-रूप और नैन-नक्श। एक नज़र में कुछ भी नहीं। लेकिन इसके बावजूद सुपर स्टार। वो यकीनन एक मिथक थे। वरना ‘हाथी मेरे साथी’ जैसी बेहद साधारण सुपर-डुपर हिट न होती।

आज भी मैं उस दौर के ‘रहस्य’ को नहीं समझ पाया कि जनता किसमें क्या देख कर फर्श से अर्श पर बैठा देती है। तब तो आज जैसा मीडिया हाईप भी नहीं था, जिस पर राजेश को सुपर स्टार बनाने का इल्ज़ाम लगता।

हां राजेश की मृत्यु को ज़रूर मीडिया ने उसके ‘चौथे’के बाद भी अस्थि विसर्जन तक खूब भुनाया। मौजूदा पीढ़ी को बताया कि कभी राजेश खन्ना नामक मिथक रूपी सुपर स्टार होता था।

मुझे राजेश की हर फिल्म में उसका सुपर स्टार होने का अहम छाया दिखा जिसमें मैं उसमें सुपर स्टार के भार तले दबे कलाकार की तलाशता रहा। ये मुझे मिला। मगर चंद फिल्मों में। आख़िरी ख़त, खामोशी, आराधना, अमर प्रेम, दो रास्ते, आनंद, इत्तिफ़ाक़, सफ़र, बावर्ची, नमक हराम, दाग़, अविष्कार, प्रेम कहानी, आपकी कसम, अमरदीप, अमृत, अवतार, थोड़ी सी बेवफ़ाई, अगर तुम न होते, जोरू का गुलाम, आखिर क्यों, सौतन और पलकों की छांव में। परफारमेंस तलाशते निर्देशकों की पहली पसंद राजेश ही थे।


राजेश खन्ना पहले सुपर स्टार तो थे। उसके बाद अमिताभ सुपर स्टार हुए। लेकिन मैं राजेश को ज्यादा भाव दूंगा। राजेश के अलावा किसी और को हर तबके के, हर उम्र के दर्शक की बेपनाह मुहब्बत नहीं मिली। उनमें रेंज और वैरायटी भी ज्यादा थी। किरदार की खाल में बहुत ज्यादा घुसते थे।

मगर सब कुछ होते हुए भी राजेश ‘मुकम्मिल’ नहीं थे। उनके संपूर्ण कैरीयर और निज़ी जीवन में भारी उथल-पुथल चलती रही। इसने सुर्खियां बन कर उनके सुपर स्टारडम और आर्टिस्ट मन को ग्रहण लगा दिया।

Saturday, December 27, 2014

याद - रफ़ी का नौशाद को एक रुपया वापस करना!

-वीर विनोद छाबड़ा
बात उन दिनों की है जब फिल्म इंडस्ट्री में मोहम्मद रफ़ी एक स्ट्रगलर थे और नौशाद अली आला दर्जे की संगीतकार। 

रफ़ी के दिन मुफ़लिसी में कट रहे थे। रोज़ कमाओ और रोज़ रोटी खाओ। नौशाद साहब के संगीत निर्देशन में रिकॉर्ड होने वाले एक कोरस में रफ़ी को भी गाने का मौका मिला।


उस दिन रफ़ी की जेब में सिर्फ़ एक रुपया था। रिकॉडिंग स्टूडियो दूर था और रफ़ी ये मौका छोड़ना नहीं चाहते थे। स्ट्रगल के दिनों में मौका चूकने का मतलब होता था सफलता की ओर जाने के बजाये दो कदम पीछे और रात को भूखा सोना। लिहाज़ा रफ़ी रिकॉर्डिंग स्टूडियो पहुंचे। चूंकि नौशाद बड़े संगीतकार थे अतः  उम्मीद थी कि रिकॉर्डिंग से इतना मेहनताना मिलेगा कि दो दिन की रोटी का जुगाड़ हो जायेगा।

रफ़ी का एक रुपया स्टूडियो तक पहुँचने के किराये में ही खर्च हो गया। मगर किस्मत की मार। किन्हीं कारणों से रिकॉर्डिंग कैंसिल हो गयी। सब घरों को लौट गए। मगर रफ़ी बैठे रहे।

नौशाद साहब ने देखा कि एक बंदा स्टूडियो के बाहर सीढ़ियों पर उदास बैठा है। उसके चेहरे पर निराशा की गहरी लकीरें खिंची हैं। उन्होंने वज़ह पूछी।

रफ़ी ने थोड़ा झिझकते हुए बताया - मेरे पास सिर्फ एक रुपया था जो यहां आने में खर्च हो गया। सोचा था रिकॉर्डिंग के बाद पैसा मिल जायेगा। मगर रिकॉर्डिंग ही कैंसिल हो गयी। यही फ़िक्र है कि अब वापस कैसे जाऊं?

नौशाद साहब को तरस आ गया। उन्होंने जेब में हाथ डाला और एक रूपये का सिक्का निकाल कर रफ़ी की हथेली पर रख दिया।

कई साल गुज़र गए।

रफ़ी अब रफ़ी साहब हो चुके थे। बड़ा नाम था उनका। उन्हें बात करने तक की फुर्सत नहीं होती थी।

रफ़ी साहब एक दिन नौशाद साहब के घर पहुंचे। उनके हाथ में एक शीशे जड़ा एक फोटोफ्रेम था। और उस फ्रेम में एक रूपये का सिक्का चिपका हुआ था।

रफ़ी साहब ने नौशाद साहब को वो फ्रेम भेंट किया।

Wednesday, December 24, 2014

रफ़ी - अफ़सोस हम न होंगे…

रफ़ी - अफ़सोस हम न होंगे…

-वीर विनोद छाबड़ा 

दो राय नहीं हो सकती कि पुरुष गायकों में सबसे ज्यादा फैन क्लब सिर्फ और सिर्फ मोहम्मद रफ़ी के नाम हैं। उनका जन्म अमृतसर के पास एक गांव कोटला सुल्तानपुर में २४ दिसंबर १९२४ को हुआ था। आज वो होते तो ९० साल पूरे कर लेते।

रफ़ी की गायकी की बारीकियों के बारे में बात करना सूरज को दिया दिखाने के समान है। वो बेमिसाल थे। हर तरह के गाने गा सकते थे। चाहे क्लासिकल हो या वेस्टर्न। गंभीर हो या कॉमेडी।

अगर उन्हें मालूम होता था कि उनका गाना फलां कलाकार पर फिल्माया जाना है तो फिर कहने ही क्या। ऐसा लगता था मानो वो खुद कलाकार हों। धीर-गंभीर दिलीप कुमार हों या चुलबुले जानी वॉकर। या फिर रिबेल स्टार शम्मी कपूर। वो उनकी आवाज़ बन जाते। प्रदीप कुमार, राजेंद्र कुमार और देवानंद  की भी की भी स्थायी आवाज़ रफ़ी ही थे।

अभिनय की निचली पायदान माने जाने वाले बिस्वाजीत (पुकारता चला हूँ मैं.…)और जॉय मुखर्जी (आँचल में छुपा लेना कलियां…) सरीखे अभिनेताओं के बारे में कहा जाता था कि वो अगर फिल्म में खड़े हो पाते थे तो उन पर फिल्माए रफ़ी के गानों की वज़ह से।

रफ़ी जितने बेहतरीन गायक थे उतने ही बेहतरीन इंसान भी। किसी भी नए कलाकार को अपने आवाज़ देने में कोई संकोच नहीं था उनमें। कॉमेडियन को भी आवाज़ को आवाज़ देकर इज़्ज़त बख़्शने वाले रफ़ी साहब पहले थे। 

मुफलिसी के दौर से गुज़र रहे संगीतकार निसार बज़मी की 'खोज' के लिए रफ़ी ने एक रूपये में गाया। उन दिनों उन्हें बज़्मी साब को कोई घास नहीं डालता था। बाद में बज़्मी पाकिस्तान चले गए और बहुत बड़े संगीतकार बन गए।

लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को शुरुआती दौर में पैर ज़माने में उन्होंने बहुत मदद की। उनकी पहली फिल्म 'छैला बाबू' के लिए पहला गाना मुफ्त गाया। उन्हें नई फिल्मे भी दिलाईं। 'दोस्ती' में 'चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे…से लक्ष्मी-प्यारे कहां से कहां पहुंच गए। रफ़ी ने बेस्ट सिंगर का फिल्मफेयर पुरुस्कार भी पाया।   

राकेश रोशन की पहली फिल्म  'आपके दीवाने'  के लिए रफ़ी साहब ने सिर्फ एक रुपए मेहनताना लिया था। दुनिया जानती है आज राकेश रोशन किस बुलंदी पर हैं।

Tuesday, December 23, 2014

मिट्ठी वाणी बोलिए!

-वीर विनोद छाबड़ा
वो महिला कपडे की दुकान में घुसी।

दुकानदार गुरबचन सिंह जी ने स्वागत किया - आओ बहन जी। बैठो… उधर नहीं इधर बैठो… यहां ऐ.सी. की ठंडी-ठंडी सोणी हवा मिलेगी…हां हुक्म करो जी। क्या दिखाऊं। सूट, साडी, लहंगा… ओये छिंदे कुछ ठंडा-शण्डा लेकर आ भाई।

नहीं नहीं…मुझे कुछ ब्लाउज पीस चाहिए -  महिला ने तनिक झेंपते हुए कहा। 

कोई नहीं जी। ओ तुस्सी उधर साड़ी-ब्लाउज कार्नर चले जाओ… ओ छोटे बहन जी दी सेवा कर छेती - गुरबचन सिंह जी  बेहद विनम्रतापूर्वक बोले।

छोटे ने बहनजी को हाथ जोड़ नमस्ते की। आदरपूर्वक बैठाया। फिर एक नहीं दर्जनों पीस दिखाए। कार्नर में रखे सारे शेल्फ पलटवा दिए।

पूरे-पूरे पैंतालीस मिनट खा गयीं वो महिला। मगर उस महिला को कुछ भी पसंद नहीं आया। किसी का रंग उसके दिमाग में बैठे रंग से मेल नही खा रहा तो

किसी की क्वालिटी ख़राब। किसी की शेड फ़र्क। और किसी की दाम ज्यादा। एक पीस तो ऐसा था जिसे उनकी पड़ोसन कल ही खरीद कर लायी है। उसे तो कतई नहीं खरीदना है। 

छोटे का दिमाग ख़राब हो गया। अब घंटा भर लगेगा। सारे पीस तह कर सही जगह पर लगाने में।

लेकिन गुरबचन सिंह जी का दिमाग कतई गर्म नहीं हुआ। बर्फ की तरह ठंडा रहा। खड़े होकर महिला को विदा किया - आप आती रहा करें जी। आप ही की दुकान है। पैसों की फ़िकर तो कभी करना न जी। बीस-तीस हज़ार तक का समान तो जब चाहो ले लो जी। पैसा किधर नहीं जाता। आ जायेगा देर सवेर।

Saturday, December 20, 2014

इत्ता पिटोगे…

-वीर विनोद छाबड़ा

अभी कुछ दिन पहले की बात है।

मेरे भांजे की पोस्टिंग आगरा हो गई। उसने रोमिंग से बचने के लिए अपना मोबाइल नंबर बदल दिया। लेकिन ये न बताया कि पुराना ख़त्म हो गया है। मैंने दोनों ही नंबर 'सेव' में रखे। जब भी बात होती थी नए नंबर से।

एक दिन नया लग नहीं रहा था। पुराना मिला दिया। उधर से किसी स्त्री का कठोर स्वर सुनाई दिया - कौन है?

मेरा भांजा तो अकेला रहता है? ऐसा-वैसा भी नहीं है। फिर ये स्त्री कौन?और वो भी लट्ठमार स्वर। मुझे लगा कहीं गलत लग गया। मैंने कहा - जी माफ़ करियेगा। शायद गलत लग गया है।

उधर से पहले जैसी ही लट्ठमार आवाज़ आई - ठीक है। रख अब।

मैंने फ़ौरन काट दिया। और मन ही मन कहा - क्या ज़माना आ गया है। बात करने तक की तमीज नहीं।


ये सोच कर कि अब ठीक जगह नंबर लगेगा मैंने थोड़ी देर बाद फिर उसी नंबर पर कॉल किया।

लेकिन फिर वही कड़क आवाज़ -  कौन है?

मैं सकपका गया। वही कानों के परदे फाड़ने वाली कर्कश आवाज़। फिर वही गलती। मैं शर्मिंदा हो गया - माफ़ कीजियेगा। फिर गलत मिल गया।


ये कहते हुए मैंने कॉल बंद कर दी। अब मेरे समझ में आ गया कि भांजेराम का पुराना नंबर किसी और को अलॉट हो गया है।

चाहिए तो ये था कि मैं उस नंबर को फौरन डिलीट कर दूं। लेकिन गलती से ऐसा नहीं हो पाया। दो दिन बाद फिर भांजे से बात करने की ज़रूरत पड़ी। मैंने कॉल किया।

सहसा मुझे ख्याल आया कि ये तो उसी नंबर पर कॉल किया है। तुरंत काट दिया। तब तक दो बार 'ट्रिंग-ट्रिंग' हो चुकी थी। एक गहरी सांस लेते हुए शुक्र किया कि उधर से उठा नहीं था।
इस बार मैंने देर नहीं की। फौरन नंबर डिलीट किया।

फिर दूसरे नंबर से भांजे से बात की। उससे पुष्टि भी कर ली कि पुराना नंबर अब उसके पास नहीं है।

आदत के मुताबिक अगले दिन सुबह उठ कर सबसे पहला काम ये किया कि मैसेज और मिसकॉल चेक की। तीन मैसज थे और एक मिस कॉल। मिसकॉल बिना नाम की थीं।

आमतौर पर मुझे नंबर याद नहीं रहते। कोई नया मित्र होगा? ये सोच कर मैंने कॉल बैक किया। ट्रिंग ट्रिंग…मैं हैलो की प्रतीक्षा करने लगा।