Thursday, May 18, 2017

अब कहां जायें हम?

- वीर विनोद छाबड़ा
हम लखनऊ के चारबाग़ रेलवे स्टेशन के सामने रेलवे की तिमंज़ली मल्टी स्टोरी बिल्डिंग में २१ साल रहे। पचास कदम पर पूर्वोत्तर रेलवे का लखनऊ जंक्शन। दो सौ मीटर की दूरी पर चारबाग़ राजकीय बस अड्डा। सामने मेन रोड थी। आलमबाग से हज़रतगंज जाने वाला सारा ट्रैफिक वहीं से गुज़रता था। बस अड्डे से गोरखपुर-बनारस की दिशा की ओर जाने वाला ट्रैफिक भी वहीं से होकर जाता था। सड़क पर कोई गड्ढ़ा बन गया या टूट गयी तो समझ लीजिये कोढ़ में खाज। ट्रैफ़िक के शोर प्लस गड्ढ़े में के ऊपर से गुज़रने का शोर।
हम तिमंज़ले पर रहते थे, कोने वाले मकान में। कुल तीन खिड़कियां थीं। बंद करने पर भी सड़क पर गुज़रते वाहनों का शोर। सुनने के आदी हो गए थे। लेकिन जब पढ़ने बैठे तो पागल हो गए।
फिर स्टेशन के सामने रहने का अलग से ख़ामियाज़ा भी। किसी न किस वज़ह से कोई न कोई मेहमान बना ही रहता। मसलन चार घंटे ट्रेन लेट हो गई। अब घर जाकर क्या करेंगे? किसी को सुबह सवेरे ट्रेन पकड़नी है तो वो रात को आ गया। कहां जायें हम?

मां छत पर भेज देती थी। वहां शोर फैला हुआ मिलता। ऊपर खुला आसमान। पढ़ने में दिल लग जाता था। गर्मियों में खम्मन पीर का उर्स। तीन-तीन दिन तक रात भर जगह-जगह कव्वालियां। लेकिन हम छत पर टेबल लैंप की रोशनी में जैसे-तैसे फोकस करते रहे और गिरते-पड़ते पास भी हो गए। हमारी कॉलोनी के कई लड़के तो इस शोर में भी पढ़ते हुए फर्स्ट आये। कोई डॉक्टर बन गया तो कोई इंजीनियर। हम फिस्सडी थे, इसलिए बाबू बनना नसीब में रहा। गो, वो बात दूसरी है कि हम बिजली बोर्ड से डिप्टी जीएम की पोस्ट से रिटायर हुए।
अस्सी के दशक की शुरूआत में हम चारबाग़ छोड़ कर इंदिरा नगर के डी ब्लॉक में शिफ्ट हुए तो अहसास हुआ कि हम जंगल में आ गए हैं। सिर्फ़ दर्जन भर मकानों में रहते थे लोग। बगल से गुज़रती कुकरैल फारेस्ट रोड। रात में कुत्ता भी टहलता हुआ दिखा तो लगा कि भेड़िया है। कस कर दरवाज़े बंद कर लेते थे।
न सड़क का शोर और न इंजिन की कूक और न ट्रेन की खड़खड़। वहां रूरल फीडर से बत्ती आती थी। जाती तो कई कई घंटो तक न लौटती। कई बार दो दिन बाद आई। सन्नाटा हमें दिन में भी डराता रहा। महीनों तक नींद नहीं आई। बार-बार किसी न किसी बहाने चारबाग़ भागते थे। संयोग से पत्नी का मायका भी उधर पानदरीबा में था। कई बार हमने स्टेशन के जेनरल वेटिंग रूम में भी शरण ली।

Wednesday, May 17, 2017

वो यम नहीं बरेठा था

-वीर विनोद छाबड़ा 
मेरे साथ छोटी-मोटी दुर्घटनायें और टूट-फूट लगी रहती हैं। दो साल इन्हीं दिनों की बात है।
आसमान पर घने बादल थे। मैं घर लौट रहा था। इंद्र देवता से मना रहा था, दस मिनट रुक जाओ। तब तक मैं घर पहुंच जाऊंगा। फिर जी भर कर बरसना। लेकिन उन्होंने मेरी इल्तज़ा पर ध्यान नहीं दिया। बरस ही पड़े। तब मैं घर से करीब तीन किलोमीटर दूर था।
मैंने स्कूटी रोकी। वहां एक कपड़े इस्त्री करने वाले बरेठे का डेरा था। धूप-पानी से बचने के लिए ऊपर मोटे पॉलीथीन की चद्दर वाली छत। पुरानी होने के कारण उसमें चार-पांच जगह छेद थे। पानी टपक रहा था। फिर भी बारिश से बचने के लिए उसमें कई लोग घुसे हुए थे। मेरे लिए उसमें कतई जगह नहीं थी।
मैंने आस-पास अन्य आश्रय के लिए नज़र दौड़ाई। सड़क पार कुछ दुकानें और उन पर शेड। सुरक्षित स्थान। कुछ लोग खड़े भी वहां थे। मैंने पीछे मुड़ कर देखा। खाली सड़क थी।
मैंने स्कूटी मोड़ी ही थी कि जाने कहां से बलां की रफ़्तार से एक बाईक आई और उसने मेरी स्कूटी को बीच में ठोंक दिया। मैं उछला कर गिरा। चारों चित्त। मेरी आंखों के सामने अंधेरा छा गया। कुछ पल के लिए लगा मैं परलोक में हूं। किसी ने सहारा दे बैठाया और फिर हाथ खींच कर मुझे खड़ा कर दिया। तब तक मैं उसे दूसरे लोक का ही वासी यम समझता रहा। वो बोला, शुक्र है कि आप बच गए।
तभी मैंने ध्यान दिया कि अरे यह यम नहीं। कोई मनुष्य है देवता के रूप में। याद आया, वो बरेठा था। कई और लोग भी जमा हो गए। मूसलाधार बारिश जारी थी। किसी ने मेरी स्कूटी किनारे खड़ी कर दी। दूर मीटर दूर जा गिरा हेलमेट और घड़ी उठाई।
एक्सीडेंट के शॉक मैं बाहर नहीं था। बांह पकड़ कर बरेठा अपनी झोंपड़ी में ले आया। शुक्र है जिस्म की सारी हड्डियां सलामत थीं। हां, खाल ज़रूर चार-पांच जगह से छिल और फट गयी थी। सर में पीछे दर्द हो रहा था। हाथ लगाया तो पाया की मोटा सा रोड़ बन गया है। स्कूटी को देखा। मुझसे ज्यादा चोट लगी है। बरेठे ने एक बीमार सी टूटी कुर्सी पर बैठा दिया। बारिश से भीगा होने के कारण कंपकंपी छूट रही थी। जाने कौन कहीं से चाय ले आया। चाय तो वैसे भी मेरी जान है। मैंने उसे फूंक मार कर फटा-फट सुड़ुक लिया। मैंने खुद को बेहतर महसूस किया। दो-एक ने घर छोड़ने का ऑफर दिया।
लेकिन मैंने उनका अनुरोध क्षमा मांगते हुए अस्वीकार कर दिया। अपने मित्र सत्य प्रकाश को मोबाईल किया। वो मेरी स्कूटी का डॉक्टर है, मुझसे करीब बीस साल छोटा।

Tuesday, May 16, 2017

आत्मा नहीं है ऑनलाइन में

-वीर विनोद छाबड़ा
हमने वो ज़माना देखा है जब हर जगह लंबी कतार थी। राशन की दुकान, मिट्टी का तेल, बैंक, पोस्ट ऑफिस, बिजली, पानी, सीवर, हाउस टैक्स, रेल-बस का टिकट और सिनेमा का टिकट, हर जगह मारा-मारी थी। गरीबों की कतार अलग और सिफाऱिशियों की अलग। दबंग लोग तो जहां खड़े हुए वहीं से कतार शुरू हुई। 
अब सिस्टम थोड़ा आसान हो गया है। हर तरह के पैसे का लेन-देन ऑनलाइन है। साइबर कैफ़े जाना ज़रूरी नहीं है। मोबाईल भी किसी से कम नहीं। दो सेकंड में हज़ारों मील दूर अपने प्रिय को पैसा भेज दो। जनता बड़ी खुश है। समय और ऊर्जा की बचत नहीं बल्कि महाबचत। सारा काम घर बैठे-बैठे। लिहाज़ा भाड़े की भी बचत।
लेकिन जहां फ्री सामान मिलता है, वहां अब भी कतार लगती है। सरकारी अस्पतालों में दवा लेने की कतार। मुफ़्त में पूड़ी-कचौड़ी पाने के लिए कतार। वो बात अलग है कि कुछ लोगों की प्रवृति कतार तोड़ू रही है, उन्हें तो झेलना ही होगा।
लेकिन हमारे जैसे रिटायर और निठल्ले लोग भी प्रचुर मात्रा में हैं जो कतार में लगना पसंद करते हैं। वहां तरह-तरह की बातें होती हैं। देश की, समाज की और परिवार की। कोई बेटे से दुखी है तो कोई पत्नी से और कोई पत्नी अपने निठल्ले पति से। सास-बहु और ननद-भौजाई के बीच तनातनी के मामले भी हमने वहीं डिस्कस होते और निपटाये जाते देखे हैं। रिश्ते भी हमने वहां देखे। जब उसी पंक्ति में महिलायें भी लगी हों तो मर्दों के कंठ से वीरगाथाएं स्वतः बाहर आने लगती हैं। इंसान की फितरत के दर्शन होते हैं। कई के लिए तो समझो यह टैक्स फ्री एंटरटेनमेंट का प्रबंध हो गया।
हम सोचते हैं यदि ऑनलाइन सिस्टम अगर कंपलसरी हो गया तो समस्याओं को सुलझाने का जो मज़ा रूबरू है, वो ऑनलाइन में कहां? चाय-वाय तो ऑनलाइन आने से रही। हमें तो लोकल काल से बेहतर आमने-सामने बैठ कर बात करना अच्छा लगता है। हम तो कहते हैं कि भले ही महीने में एक बार दस पल के लिए ही सही, लेकिन मिलो तो दिल से। हम तो तकरींबन रोज़ किसी न किसी मित्र के घर झांकने चले जाते हैं। यह बताने के लिए कि हम ज़िंदा हैं और यह देखने को कि वो ज़िंदा है। हम सुने हैं कि भीख भी ऑनलाइन होने जा रही है। भिखारी को घर बैठे एक तय राशि मिल जायेगी।
अब ये डिजिटलीकरण हो रहा है। अच्छी बात है। पारदर्शिता और प्रक्रिया में तीव्रता तथा सरलीकरण हो जाएगा। और वो भी फूलप्रूफ। मगर डर भी लगता है कि मानव का यंत्रीकरण न हो जाए। हमने तो हाड़-मांस का मेहनत करता इंसान देख लिया। अब आने वाली पीढ़ी का क्या होगा? शायद वो यह कहेगी - सुना है कोई इंसान ऐसा भी था, जो खुद सोचता था और चलने-फिरने के साथ दौड़ता भी था।
हमारे मित्र मिश्रा जी ऑनलाइन शॉपिंग के नंबर वन हिमायती हैं। दाल-चावल तक ऑनलाईन मंगाते हैं। कहते हैं, बाज़ार से बहुत सस्ता पड़ता है। क़्वालिटी भी ए-क्लास। बड़े गर्व से दूसरों को भी प्रेरित करते हैं।

मेफेयर के गलियारों में सिगरेट का अलग ही मज़ा था

-वीर विनोद छाबड़ा 
सिगरेट पीने की भी कई कलाएं होती हैं। देश, काल और माहौल के अनुसार स्टाइल बदलती है।
अब हाफ रेट के सिनेमाहाल में तो चाहे मुट्ठी में सिगरेट दबा कर पियें या छल्ले निकालें। न कोई रोके और न कोई इमेज बने। वहां तो पिक्चर चलते सिगरेट पियो। इधर हीरो ने सुलगाई, उधर कल्लन मियां को तलब हो आयी।
लेकिन मेफेयर में सिगरेट पीने का अंदाज़ बिलकुल निराला होता था। मेफेयर यानी अपने शहर लखनऊ के साठ और सत्तर के दशक का अंग्रेजी फिल्मों का प्रीमियर सिनेमाहाल। उस दौर में  लखनऊ का एकमात्र पूर्णतया केंद्रित वातानुकूलित छविगृह।
यहां अंग्रेज़ी में  गिटपिटाने वाले अभिजात्य वर्ग और कुलीन वर्ग के बंदे बहुतायत में पाये जाते थे। तकरीबन हर तीसरे-चौथे मुंह के होटों के किनारे दबी हाई क्वालिटी सिगरेट। वहां कल्लन और रामटहल नहीं दिखते थे।
कुल मिला कर वहां का माहौल टोटल अंग्रेज़ी और अंग्रेज़परस्त था। यह उसके माहौल का असर था कि सिर्फ सिगरेट पीने की तमीज़ ही नहीं बदलती थी बल्कि बोलचाल और हाव भाव में भी अंग्रेज़ियत किसी जिन्न की भांति चिपक जाती थी। हिंदी के तमाम धुरंधर प्रेमियों और विद्वानों को वहां मैंने सूट-बूट में और होटों में सिगरेट दबा कर अंग्रेजी में बतियाते देखा है।

Monday, May 15, 2017

ऊपर वाला बहुत समझदार है

- वीर विनोद छाबड़ा
उस दिन शाम की ही बात है। हमें ख़्याल आया कि हमारे जूते घिस चुके हैं। हम भूतनाथ मार्किट के लिए निकले।
मेमसाब ने भी पांच सौ का नोट पकड़ा दिया। कुछ अचार और ढोकला ले आना।
हमने कहा कि पैसे हैं, लेता आऊंगा।
मेमसाब ने जोर दिया, रख लो नहीं तो बाद में कहोगे कि पर्स में पैसे कम हो गए। और हमने पांच सौ रूपये शर्ट की जेब में रख लिए।
बाज़ार पहुंचते ही हम सीधे एक जूते की दूकान में घुस गए। बढ़िया सा जूता दिखाइये। सात-आठ सौ के भीतर, बहुउद्देशीय। मॉर्निंग वॉक भी हो जाए और बाज़ार भी घूम सकूं। और पार्टी-शार्टी में भी चल जाए।
सेल्समैन ने हमें सिर से पांव तक देखा। उसकी निगाहें हमारे घिसे और मैले-कुचैले जूतों पर टिक गयीं।
हमने बताया कि करीब चार साल से पहन रहे हैं इस जूते को। तब साढ़े चार सौ का लिया था बहुत आरामदायक रहा है। झाड़-पोंछ कर हम पार्टियों में भी चले जाते हैं इसे पहने-पहने। रात का टाईम, कौन नीचे देखता है। सब चेहरा देखते हैं। ड्रेस जूता-चप्पल तो दूल्हा-दुल्हन की देखी जाती है।
सेल्समैन ने हमारी बात बहुत गौर से सुनी। जूता पेश किया। बहुत बढ़िया है। ग्लाइडर्स गोल्फ़ ब्लैक। चार सौ अस्सी रूपए का।
हमने कहा, नहीं कोई बढ़िया ब्रांड का दिखाओ।
वो लौट कर आया। दो-तीन ब्रांड ले आया। यह छह सौ का और यह साढ़े सात सौ का। और यह हज़ार का। हमने गौर किया कि हज़ार पर सेल्समेन ने बहुत ज़ोर दिया। शायद वो हमारी औकात को चैलेंज कर रहा हो। 
हमें न उसका अंदाज़ पसंद आया और न ही जूता। कुछ और दिखाओ।
लेकिन उसने जोर कहा - मेरी मानिये। यह चार सौ अस्सी वाला ग्लाइडर्स गोल्फ़ ब्लैक बढ़िया है, कम्फ़र्टेबल। आपकी हर ज़रूरत पूरी करेगा। दो साल निकल जाएंगे आराम से। तब तक नए डिज़ाईन आ जायेंगे।
उसने बहुत विश्वास से यह बात कही। हमें लगा कि यह ठीक कह रहा है। इस बार सेल्समेन के कहने से जूता पहना जाए। हमने कहा - ठीक पैक कर दो।

Sunday, May 14, 2017

पोख

-वीर विनोद छाबड़ा
हमारे एक मित्र हैं राजन प्रसाद। राजन का परिवार पेशावर से संबंधित है और मेरा परिवार पेशावर से करीब दो सौ किलोमीटर के आस-पास स्थित मियांवाली से है। बोली भी तकरीबन एक सी है- यानी सरायकी। 
इस नज़रिये से हम अपने पुरखों के साथ उस संस्कृति की भी याद कर लेते हैं, जो अब कहीं गुम हो गयी है या किसी कोने में पड़ी आख़िरी सांस से पहले की हिचकियां ले रही है।
सरहद पार के पंजाब में ऐसी ही एक परंपरा थी - पोख या पोखा। विभाजन के वक़्त वहां से आये रिफ्यूजी आये तो इसे भी साथ लेते आये । 
हां, पोख है क्या? इसे मिसाल देकर बताता हूं। 
उन दिनों लखनऊ के आलमबाग इलाके के चंदर नगर में रिहाईश थी। मां आचार डालने से पहले कलई किये हुए बड़े से पीतल के थाल में सारा सामान मिक्स करने के लिए जमा करके बैठी है। तभी मैं उसके सामने आ कर बैठ जाता हूं।
मां हुश करके भगाती है - जा बाहर, तेरा दोस्त विंदी तुझे बुला रहा है। गुल्ली-डंडा वेड़े में रखा है। गुलेल वी है। वेख किसी दा शीशा न तोड़ीं।
मैं नहीं जाता था। उल्टा पाल्थी मार कर बैठ गया। क्योंकि में जानता हूं मां झूठ बोल रही है। दरअसल, वो मुझे वहां से भगाना चाहती है। लेकिन मैं वहीँ बैठा रहना चाहता हूं। मुझे आचार डालने का प्रोसेस देखना है। मां फिर भगाती है। मैं अड़ा ही रहता हूं।
मां मुझे इकन्नी देती है - जा कुछ खा ले। पर चूरन नईं खाईं। डंडी वाली आइसक्रीम ले लईं।
लेकिन मुझे दुनिया की कोई ताक़त नहीं डिगा सकी। मैं पसड़ गया।
मां उठी और मेरी बांह पकड़ कर मुझे स्टोर में बंद कर दिया। बोली - तेरा पोखा भैड़ा (ख़राब) हे।
तब मां ने मेरी छोटी बहन को सामने बैठाया और अचार बनाने की प्रक्रिया विधिवत पूर्ण की।
अचार ही नहीं। बाकी कामों में भी यही होता था। वो चाहे सिलाई मशीन पर काम शुरू करना हो या दस्ते में इमाम के साथ मिर्ची कूटना हो। लड़कों को सामने बैठा काम शुरू नहीं करना। ये काम बिगाड़ू होते हैं।
लड़कियों को शुभ माना जाता था। अपनी नहीं है तो पड़ोसन की बेटी को बुला लिया। वो नहीं मिली तो पड़ोस वाली मासीजी  भी चलती थी। बशर्ते वो झगड़ालू नहीं हो। गुणकारी हो तो बहुत ही अच्छी बात।
बताता चलूं कि उन दिनों पड़ोसनों को आंटियां का नहीं मासियां का दरजा हासिल था।
मां कहती थी - जा विमला मासी नू बुला ला। आखीं सलवार कमीज़ सिलणी शुरू करणी हे। पोखा डे जाए।
भंगन (मैला साफ़ करने वाली) भी शुभ मानी जाती थी। बदले में पैसा-दो पैसा नेक देनी ज़रूर बनती थी।

Saturday, May 13, 2017

घिस्सू आदमी

-वीर विनोद छाबड़ा
वो जब भी दिखते हैं तो लगता है अपने आप से बात कर रहे हैं। चेहरा भी सड़ा-सड़ा सा बनाये रखते हैं। कभी कभी तो लगता है बीवी से पिटे हों जैसे। दूसरों से बहुत कम बात करते हैं। दुआ-सलाम का जवाब भी नहीं देते। लेकिन जब बोलते हैं तो समझिए बन गए चिपक गए जोंक की तरह।

इसीलिए लोग उनसे कन्नी काटते हैं। सचिवालय में बाबू थे। डिप्युटी सेक्रेटरी पद से रिटायर हुए। हमें तो महीनों पता चला। हम यही देखते रहे कि रोज़ की तरह थैला उठाया। साईकिल के हैंडल में लपेटा और चल दिए। और शाम को बाकी बाबूओं की साथ लौट आये। सुना है दिन भर ऑफिस में इधर से उधर टूलते रहते थे। कोई लिफ्ट भी नहीं देता था। 
लोग बताते हैं कि बड़े कानूनची किस्म के बाबू थे। बाल में से खाल निकालने वालों में। फाईलों का ढेर लगा रहता था उनके आसपास। इसीलिए अर्जेंट फाईल उन्हें कभी नहीं पकड़ाई गयी। शासन को जिसमें न करनी होती थी, वही फाइलें पकड़ा दी जातीं थीं।
एक दिन हमें चिपक गए - यह स्कूटी कितने की खरीदी?
हमने कहा - खरीदे हुए छह साल हो गए। तब पैंतीस हज़ार के आस-पास थी। सुना है अब पचास की है।
उन्होंने हमारी स्कूटी का घूम-घूम कर क़ायदे से निरीक्षण किया - एवरेज कितना देती है?
हमने कहा - यही कोई ४० के करीब?
उन्हें हैरानी हुई - बस! अच्छा बिकेगी कितने में?
हमने अंदाज़ा लगाया - यही ढाई-तीन हज़ार में।
उन्हें फिर आश्चर्य हुआ - बस! अगर नई खरीद कर बेची जाये तो कितने की बिकेगी।
हम मन ही मन बड़बड़ाये कि किस घोंचू क़िस्म के आदमी से पाला पड़ा है। हम झुंझला गए - बेचने के लिए कोई नयी स्कूटी क्यों खरीदेगा?
उन्होंने आकाश की और ताका - मान लो। हमें सूट न करे तो क्या करेंगे? बेचेंगे ही न?
हमने कहा - तो पुरानी खरीद लीजिये न। मज़ा न आये तो बेच देना।
उनका मनहूस चेहरा एकाएक खिल उठा - वही तो मैं कहना चाह रहा हूं। आप अपनी स्कूटी हमें बेच दो। नहीं भायी तो हम आगे बेच देंगे।
मान न मान मैं तेरा मेहमान। हमने कहा - लेकिन हमें अपनी स्कूटी बेचनी ही नहीं है। बढ़िया चल रही है। चार-पांच साल बाद सोचूंगा, इसे बेचने के बारे में।
वो थोड़ा झेंपे - मैं भी अभी की बात कब कह रहा हूं? चार-पांच साल बाद ही सही।
वो तनिक रुके। उसके बाद फिर जारी हो गए - यह भी हो सकता है कि इस बीच आपका एक्सीडेंट हो जाए और आप.…तब तक तो इसकी कीमत और भी कम हो चुकी होगी। बस वायदा करो कि स्कूटी हमीं को बेचोगे। 
हमारे पास पिंड छुड़ाने का एक ही तरीका था कि वायदा कर लिया जाए। और हमने कर लिया। इस करारनामे को हुए चार साल गुज़र गए।
हमारी स्कूटी बढ़िया चलती रही। इस बीच हमारा एक बार एक्सीडेंट भी हुआ। वो बड़ी उम्मीदों से हमें देखने आये। लेकिन उन्हें बड़ी निराशा हुई, जब पता चला कि हमारे जिस्म की सारी हड्डियां सलामत हैं। पुष्टि करने हेतु उन्होंने हमारे हाथ-पैर भी हिलाये।
इसके बाद वो जब-तब हमें हसरत भरी निगाहों से देखते रहे। और हम कन्नी काट कर निकल जाते रहे। जब कभी हम पकड़ में आये तो एक ही सवाल पूछा - नयी स्कूटी कब खरीद रहे हो?
हम बजट नहीं होने का बहाना बना कर खिसक रहे। सिर्फ हमीं नहीं हैं, हमारे जैसे बहुत से लोग हैं। सबसे कोई न कोई वायदा ले रखा है। किसी से फ्रिज का, किसी से एयर कंडीशनर और वाशिंग मशीन का। पुरानी साईकिल तक पर उनकी नज़र है।

लेकिन हमने तय कर लिया था कि जब भी हम नई स्कूटी खरीदेंगे तो पुरानी उन्हें नहीं बेचेंगे। और यही हमने किया भी। क्योंकि यह आदमी माल लपक कर ले लेता है, मगर पैसे देने के मामले में बहुत घिस्सू है। हम ऐसे कई लोगों को जानते हैं जिन्होंने उम्मीद ही छोड़ दी है। एक-दो हज़ार रुपये के लिए क्या लड़ना-झगड़ना और अपनी एनर्जी वेस्ट करना।
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13-05-2017 mob 7505663626
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Lucknow - 226016