Sunday, October 9, 2016

और मैं अट्ठारह साल पहले का गौरांगो ढूंढ रहा था

-वीर विनोद छाबड़ा
अस्सी और नब्बे का दशक।
लखनऊ के अख़बारों में प्रकाशित क्रिकेट के आंकड़े और नीचे संकलनकर्ता - गौरांग दास गुप्त। कभी-कभी ये आंकड़े मेरे लेख का भी हिस्सा बनते थे। लखनऊ के संदर्भ में उसकी तुलना उस दौर के क्रिकेट आंकड़ों के विश्वविख्यात विशेषज्ञ बीबी मामा से की जाती थी। कंप्यूटर रहित दौर में क्रिकेट के आंकड़ों का सटीक संकलन कोई मज़ाक नहीं था।

लेकिन मुझे याद आता था, साठ के दशक में मेरे साथ हाईस्कूल-इंटर में पढ़ने वाला गौरांग दास गुप्त।
क्या ये वही गौरांगो है? नहीं, वो तो विकलांग था! उसका भला क्रिकेट मैदान से क्या रिश्ता? आंकड़े जमा करना कोई खाला जी का घर तो है नहीं। फिर भी यार पता तो कर।
पता चला, हां वो विकलांग है। मैं अवाक रह जाता हूं। फिर तो ये मेरे साथ पढ़ने वाला गौरंगो है।
आगे पता चला कि वो एलआईसी में है। मैं अगले ही दिन पहुंच गया एलआईसी के हज़रतगंज स्थित बड़े ऑफिस। यह १९९३ की बात है।
जैसे ही मैंने गौरांग का नाम लिया एक आदमी बड़ी इज़्ज़त से एक आदमी तक ले गया। देखा, एक चौड़े बड़े चेहरे वाला मच्योर आदमी, रौबदार बड़ी-बड़ी मूंछे। साइड में बैसाखियां रखी हैं।
मैं सोचने लगा - यार ये वो मेरे साथ पढ़ने वाला गौरांगो नहीं है। वो तो दुबला-पतला। और ये कहां पहलवान और दादा किस्म का। निराशा हुई। लेकिन अब आ ही गया हूं। मिल लूं। क्रिकेट पर ही तो बात करनी है। कोई भी गौरांग हो?
उसने सर से पांव तक मुझे देखकर बैठने का इशारा किया। सिगरेट सुलगाई और लट्ठमार सवाल दागा -  ट्रांसफर चाहिए।
मैंने कहा - नहीं। मैं आपसे क्रिकेट पर डिस्कस करने आया हूं।
एकदम से उसके चेहरे का भाव बदल गया। ख़ुशी वाली मुस्कान। गदगद।
हम काफी देर तक क्रिकेट के विभिन्न पहलुओं पर बात करते रहे। दो बार चाय सुड़की और तीन सिगरेट फूंकी। घड़ी में चार बज रहा था। चलूं, दफ़्तर में बॉस बिगड़ता होगा।
ज्यों ही चलने को उठा तो उसने टोका - ओ जेंटलमैन, बातों में इतना खो गया कि नाम पूछना ही भूल गया।
मुझे भी हैरानी हुई- वाकई। मैं वीर.…
मेरी बात अभी पूरी हुई ही नहीं थी कि वो सीट से उचक पड़ा। अगर वो विकलांग न होता तो यकीनन दो फ़ीट तक उछल चुका होता। इस एक्शन से मुझे यकीन हो गया कि ये वही गौरांगो है।
वो चीख रहा था - अबे, तू छाबड़ा। कबसे तलाश रहा हूं? एक मुद्दत से तुम्हारे आर्टिकल पढ़ रहा हूं। अरे, जल्दी से समोसा लाओ यार। और चाय भी। नहीं कॉफी। आसपास के कई साथियों को बुलाया। इनसे मिलो। अट्ठारह साल बाद मिला है।
वो बहुत खुश था। और मैं दिल में बसे अट्ठारह साल पहले वाले गौरांगो की तुलना इस सामने बैठे एकदम उलट गौरांगो से कर रहा था।
शाम उसने मुझे चाय पर घर बुलाया। अपनी पत्नी और अड़ोसी-पडोसी से मिलाया। वो बहुत उत्तेजित व भावुक था। मुझसे कहीं ज्यादा।
उसके बाद मैं उससे हर दूसरे-तीसरे दिन मिलने लगा। कभी ऑफिस में और कभी घर जाकर। मैं छूटे हुए अट्ठारह साल का गैप जल्द जल्द से भरना चाहता था।
दो साल तक ये सिलसिला जारी रहा। मगर नियति में कुछ और लिखा था।
अक्टूबर की उस रात मैं मिल कर आया था। वो ठीक था। अगली सुबह खबर मिली - गौरांगो नो मोर। हार्टफेल।
भारी मन से विदा किया। इतनी जल्दी बिछुड़ना था तो न ही मिलते। अच्छा होता।
जब भी क्रिकेट के आंकड़े देखता हूं बड़ी शिद्दत से याद आती है। वो आज होता तो इस कंप्यूटर युग में जाने किस बुलंदी पर होता।
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Saturday, October 8, 2016

'उपकार में राजेश खन्ना होते तो?

- वीर विनोद छाबरा
साठ के दशक में पाकिस्तान के विरुद्ध १९६५ का युद्ध ख़त्म हो चुका था। माहौल देश-भक्ति से ओतप्रोत था। प्रधानमंत्री शास्त्री जी ने नारा दिया। जय जवान, जय किसान। भीषण अन्न संकट के दृष्टिगत उन्होंने देशवासियों से अपील की कि सप्ताह में एक दिन व्रत रखो। मनोज कुमार उनसे बहुत प्रभावित हुए। फिल्म बनानी शुरू की - उपकार। मेरे देश की धरती सोना-उगले, उगले हीरे-मोती...दूसरी तरफ कालाबाज़ारिये।
दो भाई थे इसमें । बड़ा वाला अच्छा, पक्का देश भक्त और दूजा ख़राब। शहर पढ़ने पड़ गया। लेकिन मुनाफाखोरी करने वालों और नशाखोरी की खराब सोहबत में पड़ गया। कसमें वादे प्यार वफ़ा सब बातें हैं बातों का क्या...
बड़ा भाई मनोज कुमार और दूजा...कौन? अपने दोस्त शशि कपूर के बारे में सोचा मनोज ने। फिर ख्याल आया, नहीं। शशि का कद बड़ा है, इमेज हीरो की है। विलेन की भूमिका ठीक नहीं होगी। बहुत नाइंसाफी होगी। उनसे कहना भी अच्छा नहीं होगा।

किसी नए को लेने का ख्याल आया। एक नया लड़का बहुत चक्कर लगाता है। क्या नाम है? हां, याद आया - राजेश खन्ना। देखने में अच्छा है और टैलेंटेड भी दिखता है। बुलाओ उसे। राजेश ने स्क्रिप्ट पढ़ी। अपना रोल सविस्तार सुना। बहुत बढ़िया है। नेगेटिव रोल है, लेकिन क्या फ़र्क पड़ता है। काम तो मिला। फिल्म भी सुपर हिट होगी। अपने तो भाग्य खुल गए। एग्रीमेंट साईन हुआ। तैयारियां पूरी हुईं।
लेकिन नियति का खेल अभी बाकी था। तभी अचानक राजेश को यूनाइटेड प्रोड्यूसर्स  एंड फ़िल्मफ़ेयर टैलेंट कांटेस्ट से बुलावा आ गया। 'उपकार' या कांटेस्ट? दोनों में से एक को चुनना था। यक्ष प्रश्न। राजेश ने बहुत सोचा और फिर मनोज कुमार से माफ़ी मांगी। मनोज ने राजेश की आंखों में झांका। एक सुंदर भविष्य दिखा। और अनुबंध नष्ट कर दिया। राजेश खन्ना आज़ाद हो गए।
अब छोटा भाई कौन? मनोज को प्रेम चोपड़ा याद आया। 'डॉ विद्या' और 'वो कौन थी' में उनके साथ वो काम कर चुका था। दो-तीन पंजाबी फिल्मों में वो हीरो भी था। लेकिन कोई पहचान नहीं बनी थी। नया एक्टर था और हैंडसम भी। स्थान बनाने के लिए हाथ-पैर मार रहा था। प्रेम ने स्क्रिप्ट पढी और रोल सुना। वही सोचा जो राजेश ने सोचा था। बड़ा बैनर है। आगे देखी जायेगी। और प्रेम चोपड़ा के लिए बिगड़े हुए छोटे भाई की भूमिका फाईनल हो गया। 

Friday, October 7, 2016

गुरूद्वारे में हमारी फीलिंग बदल जाती है

- वीर विनोद छाबड़ा
पूजा स्थलों पर हमारा जाना यदा-कदा ही होता है। उस दिन हम अपनी दिवंगत छोटी बहन के शांति पाठ के लिये स्थल तलाश कर रहे थे। कुछ परेशान भी थे। सब कह रहे थे कि स्थल सम्मानजनक होना चाहिए। अचानक ख्याल आया कि गुरुद्वारा उपयुक्त स्थल होगा। इंदिरा नगर के गुरूद्वारे को संपर्क किया। बात बन गयी।
Naka-Charbagh Gurudwara
यूं पहले भी हमारे परिवार में अनेक संस्कार गुरूद्वारे में हुए हैं। इसलिए नहीं कि थोड़े में गुज़ारा हो जाता है। बल्कि यहां की साफ़-सफाई और पारदर्शिता के हम कायल हैं। ऐसा हमने कहीं और नहीं देखा। आप जो भी श्रद्धा से देंगे, स्वीकार्य होगा और उसकी रसीद मिलेगी। मांगा कुछ नहीं जाता। उस दिन भी यही हुआ। हमें यहां के सारे बंदे कार सेवा करते हुए मिले। हम भी कारसेवा में शामिल हो गए। थोड़ी देर जोड़े (जूते) साफ कर लिए। मन को बहुत सकूं मिला। ठीक टाईम पर कार्यक्रम शुरू हुआ और ठीक टाईम पर ख़त्म हो गया। प्रबंधक महोदय का कहना था कि वक़्त की क़द्र करनी चाहिए। हमें बहुत अच्छी लगी बात। बहन की आत्मा को सकून मिलेगा। उसकी ज्यादातर सहेलियां भी सिख परिवारों से थीं। खुद भी गुरूद्वारे आया-जाया करती थी।  
यूं कारसेवा हमने बचपन में खूब की है, लखनऊ के चंदर नगर और चारबाग़ के बड़े गुरूद्वारे में। यहां हमारे बचपन से लेकर जवानी तक का ढेर हिस्सा गुज़रा है।
गुरुद्वारों की हमारी ज़िंदगी में अहम भूमिका है। परिवार के बहुत से संस्कार गुरुद्वारों में ही हुए हैं। याद पड़ता है कि बचपन में छुट्टियों में नानी के घर अंबाला जाना होता था। बहुत नज़दीक था गुरुद्वारा। नानी सुबह-शाम गुरूद्वारे मत्था टेकने जाती थी। मां बताया करती थी कि कहीं जाना हुआ करता था तो हम भाई-बहनों को गुरूद्वारे में भाई के पास छोड़ दिया करती थीं। हम वहीं खेलते-कूदते थे। भूख लगती थी तो लंगर छक लिया। कड़ाह प्रसाद ग्रहण किया और घड़े का ठंडा पानी पीकर सो गए। पता ही नहीं चलता था कि कब मां हमें घर ले गयी।
Yahiyaganj Gurudwara
उन दिनों हमारे लिए गुरूद्वारे का मतलब यही होता था- कड़ाह प्रसाद यानि देशी घी में बना हलवा। घर में भी हम लोग की डिमांड रहती थी कि गुरूद्वारे वाला हलवा। मगर गुरूद्वारे के कड़ाह प्रसाद का टेस्ट हमेशा अनूठा ही रहा। हमने छह साल विद्यांत कॉलेज में पढाई की है। घर और कॉलेज के बीच बांसमंडी चौराहे पर ही था बड़ा गुरुद्वारा। वापसी पर कड़ाह प्रसाद खाना कभी नहीं भूले। हमें ससुराल भी मिला तो उसकी दीवार पानदरीबा के चूहड़ सिंह गुरूद्वारे से सटी हुई थी। यानी हमारी मेमसाब आधी तो सिखणी है ही। उसकी बनारस वाली बड़ी भाभी भी सिख परिवार की है।

Thursday, October 6, 2016

थानेदार फूफा जी

- वीर विनोद छाबड़ा
पुलिस। बचपन से ही सुनते आये हैं - न इनकी दुश्मनी अच्छी और न दोस्ती। लेकिन हमें याद है कि हमारे खानदान में एक पुलिस वाले का खूब आना-जाना था।  यह दिल्ली में किसी इलाके के थानेदार हुआ करते थे। तुर्रेदार खाकी पगड़ी। और कलफ़ लगी खाकी वर्दी। सूर्ख रौबीला चेहरा। बड़ी बड़ी मूंछें, जिसके दोनों सिरे वो अक्सर मरोड़ा करते थे। आंखें भी उनकी लाल लाल होती थीं। कमर में भूरे रंग की चमड़े की बेल्ट। जिसमें कई गोलियां टंगी रहतीं थीं और साथ में भरा हुआ पिस्तौल। सिपाही से प्रमोटेड थानेदार थे। राजेंद्र नगर या देवनगर में इनका घर हुआ करते थे।
हमारे दादा जी सरहद पार से आये थे। सरकार ने उन्हें कुतब रोड पर एक बड़ा सा मकान अलॉट कर रखा था। इसकी डियोढ़ी और बहुत लंबी और चौड़ी थी। दोनों तरफ खटिया बिछी रहती थी। बड़ा परिवार था और आस-पास कई रिफ्यूजी खोलियां बना कर रहते थे। गर्मी के दिनों में ठंडी ठंडी हवा बहती थी। उनकी दोपहर वहीं कटा करती थी। वो थानेदार फूफा भी ड्यूटी करते-करते थक जाते तो वहीं सुस्ताने चले आया करते थे। कभी फुरसत में होते थे तो अपनी एक-आध वीर गाथाएं भी सुना जाते। बड़ी उत्सुकता से सुना जाता था उन्हें। बीच में कोई टोकता तो गुस्सा हो जाते थे। उनकी पोस्टिंग कहीं आस-पास हुआ ही करती थी।
हमने सुना था कि वो बड़े सख्त किस्म के थानेदार थे। चोर-डकैतों का उनको देखते ही पेशाब छूट जाता था।
साठ के दशक में एक मुकद्दमे के सिलसिले में लखनऊ आये। हमारे ही घर पर ठहरे। हमारे आस-पास के कई लोग कौतूहलवश उन्हें देखने हमारे घर आये। उन्हें देख हम इतना डरे कि स्टोर में जाकर छिप गए। लेकिन उन्होंने हमे ढूंढ निकाला। हमें गोद में उठा लिया। हम रोने लगे थे। लेकिन जब उन्होंने प्यार से हमें चूमा और और टॉफी दी तो हम शांत हो गए।

Wednesday, October 5, 2016

मिस्ट्री गर्ल साधना

- वीर विनोद छाबड़ा
साठ के दशक की सबसे पांच खूबसूरत और टैलेंटेड नायिकाओं का जब ज़िक्र होता है तो साधना का नाम ज़रूर लिया जाता है। सिनेमा से आई वो पहली फैशन आइकॉन थी। माथे पर फैले तराशे हुए बाल, 'साधना कट' के नाम से मशहूर हुए। उनकी यह स्टाईल मशहूर हॉलीवुड एक्ट्रेस ऑड्रे हेपबर्न की याद दिलाती थी। यह उसके प्रेमी आरके नैय्यर की देन थी। 'मेरे महबूब' में साधना की फ़ैमिली कंज़र्वेटिव मुस्लिम थी। ऐसे में भला फैशन से क्या मतलब? लेकिन डायरेक्टर एचएस रवैल ने तमाम एक्सपर्ट विरोध के बावज़ूद उसकी हेयर स्टाईल को जारी रखा। साधना की बुर्के से झांकती नशीली आंखों ने कहर ढा दिया। वाह, सिर्फ़ आंखें ही काफ़ी हैं खूबसूरती का ज़रूरी इफ़ेक्ट डालने के लिए। इसी फ़िल्म में उनका चूड़ीदार पायजामा-कुरता भी घर-घर में चर्चा पा गया। महिलाएं दर्जियों को साधना की फ़िल्में देखने की सलाह देती थीं।   
साधना का जन्म ०२ सितंबर १९४१ को कराची में हुआ था। साधना उनका नाम इसलिए पड़ा क्योंकि साधना बोस उनके पिता की फ़ेवरिट सिंगर थीं। होश संभालते ही उन पर फिल्मों का भूत सवार हुआ। उनके एक्टर कज़िन हरि शिवदासनी मदद की। मुड़ मुड़ के न देख मुड़ के....नादिरा और राज कपूर पर फ़िल्माये 'श्री ४२०' के इस गाने में उनकी बतौर एक्स्ट्रा कुछ झलकियां दिखी। किस्मत देखिये कि बरसों बाद 'दूल्हा-दुल्हन' में वो राजकपूर की नायिका थीं।

कुछ समय बाद साधना को सिंधी फिल्म 'अबाना' में नायिका शीला रमानी की छोटी बहन का रोल मिला। उन्होंने शीला से ऑटोग्राफ मांगे। शीला ने आशीर्वाद दिया था - देखना, एक दिन मैं तुमसे ऑटोग्राफ लेने आऊंगी। एचएस रवैल ने साधना की आंखों में नशीलापन देखा तो राजखोसला को उन आंखों में रहस्यमई किरदार दिखा। एल्फ्रेड हिचकॉक की 'वर्टिगो' के आधार पर भूतिया 'वो कौन थी' में फैशन आइकॉन साधना अब मिस्ट्री गर्ल हो गयी। नैना बरसे रिम-झिम...जो हमने दास्तां सुनाई आप क्यों रोये... इसकी सफलता से उत्साहित होकर राज खोसला ने मेरा साया और फिर अनीता बना डाली। 'मेरा साया' का झुमका गिरा रे...आज भी बहुत मशहूर है।
साधना के ग्लैमर को असल में भुनाया बीआर चोपड़ा ने 'वक़्त' में....कौन आया कि निगाहों में चमक जाग उठी...और फिर 'आरज़ू' में सागर ने। फूलों की रानी बहारों की मलिका... 'गीता मेरा नाम' साधना की आख़िरी फिल्म थी। इस दोहरी भूमिका वाली फिल्म को खुद साधना ने डाइरेक्ट भी किया था।
साधना को मां-बहन के अनेक साईड रोल ऑफर हुए। लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया। मैं चाहती हूं कि अपने चाहने वालों के दिलों में जवान और सुंदर बनी रहूं। फिल्मों से रिटायरमेंट के बाद पब्लिक लाईफ़ से गायब ही हो गयीं। २०१४ में एक कैंसर चैरिटी शो में वो अपने रिश्तेदार रणवीर कपूर के साथ रैंप पर दिखीं। अपनी चिर-परिचित साधना-कट के साथ। रणवीर कपूर के ताऊ रंधीर कपूर के साथ उनकी भतीजी बबिता की शादी हुई थी। लेकिन बबिता के साथ उनकी कभी निभ नहीं पाई। आमने-सामने होने पर भी कभी हाय-हेल्लो नहीं हुई।

साधना अपनी पहली फिल्म 'लव इन शिमला' के डायरेक्टर आरके नैय्यर से शादी करना चाहती थी। लेकिन उनकी मां को यह रिश्ता मंज़ूर नहीं था। क्योंकि नैय्यर सिंधी नहीं थे। १९६६ में राजकपूर के हस्तक्षेप से वे विवाह वेदी तक पहुंचे। उनके विवाहोत्तर जीवन में बहुत उथल-पुथल रही। नैय्यर का कैरियर अच्छा नहीं चला। साधना को फिल्मों में वापस आना पड़ा। तभी साधना को थायराइड की भयानक समस्या हो गयी। ईलाज के लिए उन्हें बोस्टन जाना पड़ा। लौट कर साधना ने 'इंतकाम' की। ज़बरदस्त कामयाबी मिली। इसे नैय्यर ने डायरेक्ट किया था। फिर संजय के साथ 'एक फूल दो माली' और राजेश खन्ना के साथ पुरानी कॉमेडी 'पगड़ी' के रिमेक 'दिल दौलत और दुनिया' भी सफल हुई। इस बीच साधना को 'मिस कैरिज' हुआ। वो दोबारा मां नहीं बन पायी। एक लंबी बीमारी के बाद १९९६ में नैय्यर ने उनका साथ छोड़ दिया। नैय्यर की दिली इच्छा थी कि वो साधना से पहले विदा हों। 

Tuesday, October 4, 2016

डर अब इनसे ज्यादा लगता है

- वीर विनोद छाबड़ा
कई साल पहले की बात है। हम स्टूडेंट हुआ करते थे। नाईट शो देख कर लौट रहे थे। साईकिल लहराते हुए गुनगुना रहे थे - जीवन के सफर में राही मिलते हैं बिछड़ जाने को...

सड़क पर स्ट्रीट लाईट के नाम पर कहीं कहीं बिजली के खंबों पर चालीस वाट के लट्टू जल रहे थे। एक जगह पर अंधेरा था। अचानक हम धड़ाम से गिरे। कुछ पल तक समझ ही नहीं आया कि ये क्या हुआ। तभी एक और झटका लगा। किसी ने हमें उठा कर फेंक दिया। हम चीख उठे। असंख्य तारे एक साथ दिखे थे। कुछ पलों तक तो होशो-हवास भी गुम रहे। जब जाग्रत हुए तो पता चला कि हम गौ माताओं के झुंड पर गिरे थे जो बीच सड़क बैठा जुगाली कर रहीं थीं। हमें यह याद नहीं है कि वो गौ माता थी या सांड, जिसने हमें सींगों पर उठा दूर फ़ेंक था।
ऐसे में कोई राहगीर भी उधर नहीं फटका। जैसे-तैसे खुद ही उठे। थोड़ा उछल-कूद कर भी देखा। अंग-प्रत्यंग सब सही सलामत थे। तभी मद्धिम सी रोशनी दिखी। कोई रिक्शावाला था। छोटी सी लालटेन लगी हुई थी। कहीं दीप कहीं दिल...। उन दिनों रिक्शेवालों के लिए लालटेन ज़रूरी होती थी। उसी की मद्धिम रोशनी में हमें अपनी साईकिल दिखी। गौ माताओं के झुंड के बीच में पड़ी थी। हमने उन स्कूटर वाले भाई साहब की मदद से गौ माताओं को उठाया। साईकिल उठाई। मडगार्ड पिचक कर टायर से चिपक गया था।

खरड़ खरड़ करते हुए घर पहुंचे तो पता चला कि कई जगह से खाल छिल गयी थी और नयी पैंट भी फट गयी थी। सुबह उठे तो बदन बुरी तरह से दुःख रहा था। मां हमें रेलवे के आऊटडोर हॉस्पिटल ले गयी। टिटनस का इंजेक्शन लगा और मरहम-पट्टी हुई। तीन दिन तक सुबह दोपहर शाम गोलियां और शीशी में लाल कड़वा पानी-पानी सा शरबत। 

Monday, October 3, 2016

जनसेवा गयी तेल लेने!

-वीर विनोद छाबड़ा
सुधार व विकास के वादों पर भक्तराज पुनःनिर्वाचित हुए हैं। जनता को पूरी आशा है कि इस बार ज़रूर उखड़ी सड़क बनेगी। चोक सीवर खुलेंगे। जल भराव से निजात मिलेगी। बूढ़े हो चले बदहाल बगीचों  के दिन बहुरेंगे। शुद्ध पानी पीयेंगे। प्रॉपर्टी डीलिंग और अवैध कब्जों के धंधे को समर्पित भक्तराज को ऊपरवाले पर पूरा भरोसा है। ईश्वर सब ठीक करेंगे। उन्होंने अपनी जीत को अधर्म पर जीत के पर्व में मनाने की घोषणा की। इस निमित्त उन्होंने बदहाल पार्क की घास-फूस कटवा कर वहीं फूंकवा दी। आसपास के तमाम घरों में धुआं घुस गया। लोग बेतरह खांसे। वृद्धजनों का तो दम घुटने लगा। दो अस्थमा पीड़ित मरणासन्न स्थिति में अस्पताल पहुंचाए गए।
भक्तराज बोले - आप ही की गल्ती है। खिड़कियां बंद रखनी चाहिए। फिर धर्म-कर्म का मामला है। थोड़ा-बहुत कष्ट तो सहना पड़ता है। इसे भोले का प्रसाद समझिये।
धर्म-कर्म जैसी मिसाईल के सामने भला कौन बोले। मोहल्ला सुधार समिति के अध्यक्ष जी ने भी हां में हां मिलाई। शिकायतकर्ता ढेर हो गए। 

संध्या में झमझमा भजन-कीर्तन हुआ। भक्तराज फिल्मी धुनों पर बने भजनों पर मस्त हो गए। भोंडे तरीके से झूम-झूम नाचे। बजरंगबली के मेकअप में एक भक्त भी खूब नाचा। सौ-पचास के नोट लुटाये गए। मालूम नहीं कि धर्मग्रंथों में हनुमान जी के नृत्य का ज़िक्र है कि नहीं। हो सकता है कि हो। लेकिन इतने भौंडे तरीके से तो नहीं नाचे होंगे। इस कौतुक पर जनता धन्य हुई। जम कर नकद चढ़ावा आया। ईश्वर के नाम पर कम और भक्तराज के नाम पर ज्यादा जयकारे लगे। फिर सबने जमकर स्वादिष्ट भंडारा डकारा।
डकार इस सच का प्रतीक है कि निरीह जनता ने मान लिया है - सड़क इस बार भी नहीं बनी तो कोई बात नहीं। बल्कि नई सीवर लाईन अगर डाली गयी तो मुसीबत ही आएगी। अतिक्रमण कर बनाये हुए सबके गैराज, किचेन गार्डन, दुकानें, चबूतरे टूटेंगे। 
पार्क का विकास होगा तो फूल-पत्ती लगेगी। कोई फूल तोड़ेगा, कोई पौधे रौंदेगा। ख़ामख़्वाह का झगड़ा-फ़साद। झूला लगा तो पहले झूलने की मारा-मारी। फिर कोई झूले से गिरेगा। किसी का सिर फूटा और किसी का माथा। पुलिस में रिपोर्ट और फिर कोर्ट-कचेहरी। लड़ते रहिये उम्र भर? शादी और कनछेदन की पार्टियां कहां होगीं? बच्चे क्रिकेट कहां खेलेंगे? बच्चे धोनी और विराट जैसे होनहार नहीं बनेंगे।
नल में शुद्ध पानी नहीं है, तो क्या हुआ? एक्वागार्ड तो घर घर है ही! 
भैया जैसा है, चलने दो। सब रामभरोसे छोड़ दो। इतना बड़ा कथा-कीर्तन और भंडारा हुआ है। गगनभेदी जयकारे लगे हैं। ऊपर कुछ तो आवाज़ पहुंची ही होगी। कुछ तो कृपा बरसेगी। भाव-विभोर जनता-जनार्दन एकमत में बोली - सड़क, पार्क, पानी, सीवर को मारो गोली।