- वीर विनोद छाबड़ा
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| Gandhi |
कोई पैंतीस बरस पहले १९८२ में इंग्लैंड से आये जाने-माने एक्टर
और फ़िल्म मेकर रिचर्ड एटनबरो ने एक फ़िल्म बनाई थी - गांधी। भारत सरकार का पैसा लगा
था उसमें। हमने एक बार नहीं दो तीन मरतबा देखी वो फ़िल्म।
दो राय नहीं कि गांधी बहुत अच्छी फ़िल्म थी और दस्तावेज़ी कहलाने
के काफ़ी करीब रही। लेकिन हम एटनबरो की गांधी को एक अंग्रेज़ की नज़र से बनाई फिल्म मान
कर देखते रहे। उनका गांधी को देखने का अपना नज़रिया था। और अच्छी बात यह थी कि उनका
नज़रिया पॉज़िटिव था।
लेकिन जब हम यह देख रहे तो हमें रह-रह कर बहुत गुस्सा भी आ रहा
था। एक अंग्रेज़ को ही क्यों फ़िक्र हुए गांधी बनाने की? यह पहल हमने
क्यों नहीं की? क्या हमारे पास संसाधन नहीं थे या सोच की कमी? क्या इसलिये
कि हमें डकैतों पर और क्राईम पर फ़िल्में बनाने से फुरसत ही नहीं मिलती? हालांकि बाद
में हमने गांधी पर फ़िल्में बनायीं। गांधी - माई फादर, महात्मा, हे राम, द मेकिंग ऑफ़
महात्मा, नाइन आवर्स तो राम, मैंने गांधी
को नहीं मारा आदि। लेकिन एटेनबरो के 'गांधी' पहले थे और अभी
तक टॉप पर हैं।
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| Saeed Jaffary as Sardar Patel in Gandhi |
गुणवत्ता और तथ्यात्मक पहलूओं के दृष्टिगत 'गांधी' अच्छी थी। ऐतिहासिक
तथ्यों को टुकड़ों-टुकड़ों बांटने के बावजूद कसी हुई पटकथा।
इसके लगभग सारे आर्टिस्ट लगभग अनजान थे। ज़हन में किसी की कोई
इमेज नहीं थी। जैसे बेन किंग्सले (गांधी), रोहिणी हट्टंगड़ी
(कस्तूरबा) अमरीश पुरी (खान), वीरेंद्र राज़दान (मौलाना आज़ाद) रोशन सेठ (नेहरू)
आदि। सभी बेहतरीन और मंझे हुए आर्टिस्ट। तभी तो अपने किरदारों में भी रचे-घुले दिखे।








