Monday, May 25, 2015

काश! दिलीप सॉरी कह देते तो मधु उनकी हो जाती।

-वीर विनोद छाबड़ा  
दिलीप कुमार इश्क के मामले में हमेशा बदक़िस्मत रहे हैं। कामिनी कौशल से उनका लंबा इश्क़ चला। लेकिन कामिनी शादी शुदा थी। उसका पति बीएस सूद बंदूक लेकर सेट के आस पास घूमता रहता। फिर दिलीप किसी शादी-शुदा का घर तोड़ने की तोहमत अपने ऊपर लेना नही चाहते थे।
दिलीप के दिल को अगला पड़ाव मधुबाला की दहलीज़ पर मिला। दोनों साथ-साथ तराना, संगदिल और अमर कर चुके थे। ‘नया दौर’(१९५७) फ्लोर पर थी। मधु भी जल्दी ही दिलीप के दिल के दरवाजे़ पर दस्तक देने लगी। दोनों बेसाख्ता मोहब्बत में डूब गये। परंतु मधु के निठल्ले पिता अताउल्लाह खान इस रिश्ते के सख़्त खि़लाफ़ थे। उन्हें डर था कि अगर कमाऊ चिड़िया हाथ से उड़ गयी तो दर्जन भर लोगों का परिवार कौन चलायेगा? इसी मुद्दे पर मधु इमोशनल हो जाती और दिलीप कुमार से दूर जाने की कोशिश करती। लेकिन बेमुरुव्वत मोहब्बत दूर होने न देती। मधु की हालत न जीने की थी और न मरने की। ऐसा ही कुछ दिलीप के साथ भी था। मगर  मधु के पिता फूटी आंख नहीं सुहाते थे।

बी.आर.चोपड़ा से ‘नया दौर’ की शूटिंग के अनुबंध को लेकर अताउल्लाह खान का झगड़ा हुआ। मामला अदालत तक जा पहंचा। दिलीप ने बी.आर.चोपड़ा के पक्ष में गवाही दी। बताते हैं कि भरी अदालत ने दिलीप ने ऐलान किया कि वो मधुबाला से बेसाख़्ता मोहब्बत करते हैं। असर यह हुआ कि मधुबाला ‘नया दौर’ से बाहर हो गयी और साथ ही दिलीप की ज़िंदगी से भी। बाद में केस भी चोपड़ा के पक्ष में गया। लेकिन दिलीप के कहने पर बी.आर.चोपड़ा ने मधु को जिल्लत से बचाने के लिए केस वापस ले लिया।
मधु ने किसी से कहा -आपकी चाहत यहां थी। मोहब्बत यहां थी। फिर आपने ऐसा क्यों किया? चोपड़ा साहब का साथ दे दिया।
मगर दिलीप और मधु एक दूसरे के दिल से नहीं गये। निजी जिंदगी का असर प्रोफेशनल रिश्तों पर नहीं आये। इसके बहाने दोनों ‘मुगल-ए-आज़म’ करते रहे। मोहब्बत की झूठी कहानी पे रोये...इस गाने में मधुबाला ने मानों दिल का हाल कह डाला। एक और सीन था जिसमें दिलीप कुमार एक पंख मधुबाला के चेहरे से छुआ कर मोहब्बत का इज़हार करते हैं। यह तस्वीर विश्व प्रसिद्ध लव सीन में शुमार की गयी।
मधु के दिल में एक उम्मीद की किरण हमेशा रही। मधु ने दिलीप कुमार को पैगाम भिजवाया - साहेब मैं आपसे शादी करना चाहती हूं। बस एक बार आप अब्बू को सॉरी कह दें। अब्बू आपको गले लगा लेगें। सारे गिले-शिकवे जाते रहेंगे। घर के गोशे-गोशे में शहनाई गूंज उठेगी। आप सेहरा बांध कर आयेंगे। मैं तो कबसे 'कबूल' कहने को बेताब हूं।

Sunday, May 24, 2015

चार बेवकूफों का इंतज़ाम!

-वीर विनोद छाबड़ा
आइये आपको अकबर-बीरबल का एक किस्सा सुनाऊं। मौज़ू भी है। सुबह-सुबह ताज़ा दिमाग है। पढ़ कर प्रसन्न होंगे। सारा दिन तर रहेंगे।
बादशाह अकबर का दरबार लगा है। नौ रत्नों सहित तमाम दरबारी हाज़िर है। हंसी-ठिठोली का माहौल है। बादशाह अकबर ने आदतन एक ऐसी बात कर दी कि माहौल में चिंता व्याप्त हो गई।

उन्होंने फरमाइश की - बीरबल चार ऐसे बेवकूफ मेरे सामने पेश करो जो अपनी मूर्ख हरकतों की वज़ह से मशहूर हों।
बीरबल ने कभी न तो की नहीं। इस बार भी उनके माथे पर कोई फ़िक्र और परेशानी की कोई सलवट नहीं आई।
बोले - जो हुक्म बादशाह सलामत। मगर एक दिन का वक़्त चाहिये।
बादशाह अकबर तैयार हो गए - मंज़ूर है।
बीरबल भेष बदल निकल पड़े शहर की गलियों की ख़ाक छानने। यों तो एक नहीं सैकड़ों दिखे। लेकिन वो चाहते थे कोई विचित्र किस्म का बेवकूफ़, नालायक और गधा, जिसे देख बादशाह अकबर वाह-वाह कर उठें।
तभी बीरबल को एक आदमी दिखा जो एक रेहड़ी पर मिठाई के डिब्बे, गहने और कई जोड़े नए-नए कपड़े लाद कर ले जा रहा है।
बीरबल ने पूछा - किसकी शादी में जा रहे भाई?
वो आदमी बोला - मेरी बीवी ने दूसरी शादी की है। उसको बधाई और उपहार स्वरूप यह सामान देने जा रहा हूं। चाहो तो तुम भी चलो।
बीरबल ने कहा - ज़रूर। लेकिन इसके बाद तुम्हें मेरे साथ बादशाह के सामने पेश होना होगा। वो तुम्हें ईनाम-इकराम देंगे।
वो आदमी तैयार हो गया।
थोड़ी देर बाद बीरबल को एक और अजीब नज़ारा दिखा।
एक आदमी घोड़े पर सवार है और अपने सर पर घास-फूस का ढेर भी रखे है।
बीरबल ने पूछा - ओ भले आदमी, यह क्या है? तुम घोड़े पर सवार और तुम्हारे सर पर घास-फूस का बोझ।
उस आदमी ने कहा - मेरा घोडा बीमार है। उसे सुबह से बुखार है। इसलिए मैंने घासफूस का गट्ठर अपने सर पर लाद रखा है ताकि उसे ज्यादा बोझ न उठाना पड़े।
इस तरह बीरबल को अपना मनपसंद दूसरा बेवकूफ़ मिल गया। उन्होंने उसे ईनाम-इकराम का लालच देकर साथ ले लिया।
अगले दिन बीरबल ने बादशाह के दरबार में उन दोनों बेवकूफ़ों को हाज़िर करते हुए उनकी मूर्खताओं का ब्यौरा पेश किया।
बादशाह खुश हुए। लेकिन सिर्फ दो ही बेवकूफ़ देख कर चिंतित होते हुए सवाल किया  - बीरबल यह तो दो हैं। बाकी दो कहां?

Friday, May 22, 2015

बाकी जो बचा महंगाई मार गयी.…

-वीर विनोद छाबड़ा
प्रोड्यूडर-डायरेक्टर-एक्टर मनोज कुमार की 'रोटी कपड़ा और मकान' (१९७४) में एक हिट गाना था - …बाकी कुछ बचा तो महंगाई मार गयी।
इसकी बड़ी मज़ेदार कहानी है। मनोज के कहने पर गीतकार वर्मा मलिक ने महंगाई पर एक गाना लिखा। गाना क्या कव्वाली बन गयी। उसे पहले तो पढ़ कर सब हंसे। कंटेंट पर भी और इस पर भी क्या यह फिल्माने योग्य गाना है? वर्मा मलिक ने मनोज को कन्विंस किया कि इसमें हिट होने की पर्याप्त गुंजाईश है।
रेकॉर्डिंग शुरू हुई। लता जी का मारे हंसी बुरा हाल। कहां से शुरू और बीच में कहां बहक जाता है गाना। दूसरे गायक मुकेश, चंचल और जानी बाबी कव्वाल भी कतई सीरियस नहीं थे। संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को भी इसमें कुछ दम नहीं दिखा।
जैसे-तैसे गाना रिकॉर्ड हुआ। फिल्मांकन के समय भी आर्टिस्ट मौशमी चैटर्जी और प्रेमनाथ का भी हंस-हंस कर बुरा हाल। यह कैसा गाना है यार? कैसा रिस्पॉन्स मिलेगा पब्लिक का? लेकिन जैसे ही सब स्टूडियो से बाहर निकले तो सुना क्या?
यूनिट के जूनियर आर्टिस्ट से लेकर स्पॉट बॉय तक हर छोटा आदमी गुनगुनाते हुए मिला - बाक़ी जो बचा था महंगाई मार गयी।

और फ़िल्म रिलीज़ होने से पहले ही सुपर-हिट हो गया यह गाना। तिस पर ऐसा माहौल कि महंगाई और अराजकता से परेशान जन-जनार्दन की आवाज़ बन गया यह गाना। हर गली-कूचे में छा गया। भारत सरकार भी परेशान हो उठी। कुछ अरसे तक प्रतिबंधित भी रहा। इसकी लंबाई भी नहीं अखरी किसी को। पेश है गाना -
उसने कहा तू कौन है, मैंने कहा उल्फ़त तेरी
उसने कहा तकता है क्या, मैंने कहा सूरत तेरी
उसने कहा चाहता है क्या, मैंने कहा चाहत तेरी
मैंने कहा समझा नहीं, उसने कहा किस्मत तेरी
एक, हमें आंख की लड़ाई मार गयी
दूसरी, यह यार की जुदाई मार गयी
तीसरी, हमेशा की तन्हाई मार गयी
चौथी यह खुदा की खुदाई मार गयी
बाक़ी कुछ  बचा तो महंगाई मार गई.…
तबियत ठीक थी और दिल भी बेकरार न था
यह तब की बात है जब किसी से प्यार न था
जब से प्रीत सपनों में समाई मार गयी
मन के मीठे दर्द की गहराई मार गयी
नैनों से ये नैनों की सगाई मार गयी
सोच सोच में जो सोच आई मार गई
बाक़ी कुछ  बचा तो महंगाई मार गई.…
कैसे वक़्त में आके दिल को दिल की लगी बीमारी
महंगाई के दौर में हो गई महंगी यार की यारी
दिल की लगी दिल को जब लगाईं मार गयी
दिल ने जो की प्यार की दुहाई मार गयी
दिल की बात दुनिया को बताई मार गयी
और दिल की बात दिल में जो छुपाई मार गयी
बाक़ी कुछ  बचा तो महंगाई मार गई.…
पहले मुट्ठी विच पैसे लेकर थैला भर शक्कर लाते थे
अब थैले पैसे जाते हैं, मुट्ठी में शक्कर आती है
हाय हाय महंगाई, हाय दुहाई, हाय हाय दुहाई
तू कहां से आई, तुझे मौत क्यूं न आई
शक्कर में आटे मिलाई मार गई
पाउडर वाले दूध की मलाई मार गयी
राशन वाली लेण की लंबाई मार गयी
जनता जो चीखी, चिल्लाई मार गयी
बाक़ी कुछ  बचा तो महंगाई मार गई.…
गरीब को बच्चे की पढाई मार गयी
बेटी की शादी और सगाई मार गयी
किसी की तो रोटी की कमाई मार गयी
कपडे की किसी को सिलाई मार गयी
किसी को मकान की बनवाई मार गयी
बाक़ी कुछ  बचा तो महंगाई मार गई.…
जीवन दे बस तीन निशान रोटी कपडा और मकान
ढूंढ ढूंढ के हर इंसान खो बैठा अपनी जान
जो सच बोला तो सच्चाई मार गयी

और बाक़ी कुछ  बचा तो महंगाई मार गई.…
-----
vir vinod chhabra
23-05-2015 mob 7505663626

Thursday, May 21, 2015

फटी जर्सी बनाम नई जर्सी!

-वीर विनोद छाबड़ा
हमारे शहर में एक चलता-फिरता बाज़ार है। बहुत ही पुराना। कभी यह इसे हाट कहलाता था। मंगल को आलमबाग में तो बुध को महानगर गोलमार्किट से बादशाहनगर तक। गुरुवार को नजीराबाद में। यहां सुई से लेकर सोफ़ा सेट तक मिल जाएगा। एक से बढ़ एक धांसू और क्वालिटी प्रोडक्ट। हर ब्रांडेड आइटम का डुप्लीकेट। ओरिजिनल से भी मजबूत। बेहद सस्ते मद्दे दामों पर। रईस लोग भी अच्छी संख्या में आते हैं। सबसे ज्यादा तादाद अल्प आय और निम्न-मध्य वर्गीय समाज की होती है। महिलाएं तो हर वर्ग और धर्म की मिलेंगी।
हमारी मेमसाब भी कभी कभी बुध बाज़ार का चक्कर लगा लेती है। एक बार वो  बड़े प्यार से जर्सी खरीद लायी। यों हमारी गिनती उन सब्र वालों में होती है जो कुछ कच्चा पक्का मिल जाए खा लेते हैं और सस्ता मद्दा पहन भी लेते हैं। लेकिन वो जर्सी वाकई बहुत अच्छी थी।
यों हम इस धारणा के हैं कि घर में सुख- शांति रखनी है तो मेमसाब के बनाये भोजन की भूरि भूरि प्रशंसा करो और बाजार से उनके द्वारा और उनकी पसंद का लाया वस्त्र ही हमेशा धारण करो। यह हमारी खानदानी परंपरा रही है।
एक दिन हमारा स्कूटर दूसरे स्कूटर से भिड़ गया। हम बाल-बाल बचे। मगर वो जर्सी फट गयी। बड़ा दुःख हुआ।
मेमसाब से कहा कि इसकी मरम्मत कर दो। कई बार कहा। परंतु उन्हें टाइम नहीं मिला। यों स्त्रियां घर में इतना व्यस्त रहती हैं कि कुछ न कुछ ज़रूरी काम भूल जाती हैं।
कई दिन गुज़र गए। कहते-कहते मुंह थक गया। जर्सी नहीं मरम्मत हो पायी।
एक दिन हमने मेमसाब से कहा - वो… जो मेरे साथ दफ़्तर में काम करती है न। उसे तो तुम जानती ही हो। उसे वो जर्सी बहुत अच्छी लगती है। कह रही थी कि वो जर्सी उसे दे दूं। ऐसा पैबंद लगाएगी कि लोग समझेंगे कि डिज़ाइन है। मैं सोचता हूं उसे दे ही दूं। दिन भर दफ्तर में निठल्ली इधर से उधर टूलती रहती है। इसी बहाने कुछ काम ही कर लेगी।
मेमसाब ने हमें घूरा और बोली- ठीक है। कल दोपहर में तलाश करूंगी। जाने कहां रखी है।

Wednesday, May 20, 2015

अंत्येष्टि - खाली हाथ आया, खाली हाथ गया!

-वीर विनोद छाबड़ा
कुछ दिन हुए मुझे अपने एक मित्र की माता श्री की अंत्येष्टि में जाना पड़ा।
मित्र महोदय ने बताया कि वो ८९ वर्ष की थीं। कुछ अरसे से अस्वस्थ थीं। बढ़ती उम्र के बावजूद ठीक थीं मगर कूल्हे की हड्डी के टूट जाने से दुखी थीं। उस पर बुढ़ापा। हम दो भाई हैं। सात-आठ साल पहले पिताजी के गुज़र जाने के बाद वो अकेली हो गयीं थीं। सो कभी अहमदाबाद में छोटे भाई के पास तो कभी मेरे साथ लखनऊ में।
अभी अहमदाबाद में थीं। ज़िद की, लखनऊ ले चलो। पोते की सगाई देखनी है। मां की हर इच्छा पूरी करने में हम सदा तत्पर रहे। कभी मां भी खुद भूखी रह कर भी हमरी हर इच्छा पूरी करती थी।
जैसे-तैसे आ गयीं लखनऊ। १५ को पहुंची। १६ को सगाई की रस्म और रौनक देखी। और १७ की सुबह बैकुंठ के लिए रवाना हो गयीं। सगाई की रस्म निभाने आये सारे रिश्तेदार अभी लखनऊ में ही मौजद थे। मुक्ति पाने का अच्छा अवसर चुना उन्होंने।
मित्र महोदय संतुष्ट थे कि मां सारी ज़िम्मेदारियां पूरी करके गयीं हैं। हमें ज़िंदगी नाम की नेमत दे गयी। मां को कभी शिकायत का मौका नहीं दिया। खूब सेवा की।
ये बताते हुए उनकी आंखें सजल थीं। और चेहरे पर संतुष्टि भी।
अंतिम बिदाई देने मित्र के तमाम रिश्तेदार और इष्टमित्र शामिल थे।
ज्यादातर ज्ञान-ध्यान की बातें कर रहे थे। जाने कहां से परम ज्ञान आ गया। बुद्ध हो गए।  
मोह-माया भरम है, मिथ्या है। आत्मा का परमात्मा में मिलन ही इंसान का अंतिम निष्कर्ष है।
कमा कर छुपा ले जितना भी, सब यहीं रह जाना है। खाली हाथ आया है, खाली हाथ जाना है।
पाप का घड़ा इसी जन्म में फूटता है। देख लो तमाम जाने-माने कुबेर और धर्मात्मा सलाखों के पीछे हैं। कोई मारा-मारा छुपता हुआ घूम रहा है। पहुंच वाले छुट्टा घूम रहे हैं। जाने क्यों कोर्ट-कचेहरी की रहमत उन्हीं पर ही बरसती है  
इस पर प्रतिवाद भी है। ये सब मुकद्दर की बात है। टाइम ख़राब आया, धर लिए गए। मंत्री-संत्री भी बुरे वक़्त में सरक लिए। अभी तो हज़ारों हैं ऐसे। उन्हें कब और कौन धरेगा?
कोई राजनीती पर बहस रहा था। असंतुष्ट पिछवाड़े की टूटी नाली से लेकर गड्डे युक्त सडकों के लिए परेशान हैं। मुख्यमंत्री को लिखी अनगिनित चिट्ठियों का हवाला देते हुए सरकार को कोस रहा हैं।
कोई प्रधानमंत्री की शान में कसीदे पढ़ रहा था तो किसी को ये बात हज़म नहीं हो पा रही थी।
एक साहब सचिवालय में कार्यरत बाबू से चिंता व्यक्त कर रहे थे कि शासन डीए के आदेश क्यों नहीं जारी कर रहा?
उस दिन संडे था। लोग ज्यादा ही फ़ुरसत में थे। लिहाज़ा विश्राम हाल में पसरे पिकनिक मूड में हंसी-मज़ाक भी कर रहे थे।
इस मध्य छह-सात कर्मठ लोगों ने टाल से लकड़ी चिता स्थल तक पहुंचाई।
मुखाग्नि देने का समय आ गया। कुछ लोग करीब आ गए।

Tuesday, May 19, 2015

बिन चाय सब सून!

-वीर विनोद छाबड़ा
अभी अभी एक बढ़िया प्रोग्राम भारी मन से अधूरा छोड़ से लौटा हूं।
फेस बुक के कई वो मित्र वहां मिले जिन्हे देखने की बड़ी तमन्ना थी। ढेर बातें नहीं हो पायीं। वज़ह वहां चाय का इंतेज़ाम नहीं था। बिना चाय सर दुखता है। मन बेचैन होता है। उठ कर बाहर गया। आस-पास देखा। एक ढाबा दिखा। लेकिन उसके सामने कूड़ाघर था। लाखों की संख्या में रोग की वाहक मक्खियां बहुत भिनभिना रही थी। ६४ प्लस को दृष्टि में रखते हुए रिस्क लेना ठीक नहीं है। सच बताऊँ आदतन जेब में पर्स रखना भी भूल गया था। कही आजू-बाजू जाकर भी नहीं पी सकता था।
हां, तो मैं चाय पर बात कर रहा था। चाय से पहले सिगरेट और बाद में फिर एक सिगरेट। एक ज़माना था, दिन में चार-पांच बार तो यह सिलसिला चलता ही था। अब सिगरेट तो छूट गयी, लेकिन चाय को अलविदा नहीं कहा। दिल ने कहा, जीने के लिए कुछ तो रखो यार। 
चाय की इंतेहा की शुरुआत हाईस्कूल की परीक्षा से हुई। देर रात तक पढ़ना। बीच-बीच में चाय पॉजिटिव एनर्जी प्रदान करती रहती।
यूनिवर्सिटी पहुंचे तो आदत बन गयी। दिन में छह-सात चाय तो हो ही जाती थी।
कभी चाय की तलब हमें दस किलोमीटर दूर अमौसी एयरपोर्ट तक ले जाती थी। छुट्टी के रोज़ बहुत बोरियत होती थी। चार दोस्त जमा हुए। चलो वीरेंदर के घर अमौसी। और कुछ गपशप भी हो जाएगी। साइकिल उठाई और चल दिए। ये माताश्री लोग चाय बढ़िया बनाती हैं। एक बार नहीं दो तीन बार पिलाती हैं, पूरे दिल से। वीरेन्द्र की माताश्री कहती थीं - हम लोग शहर से इत्ती दूर बैठे हैं। कोई आता ही नहीं यहाँ तो। तुम लोग आये हो तो अच्छा लगता है।
यूनिवर्सिटी के दिनों में डिनर के बाद विजय वीर सहाय के मॉडल हाउस स्थित घर हम कुछ मित्र कंबाइंड स्टडी के लिए बैठते। रात काफ़ी हो जाती। एक बार तो सहायजी पिला देते थे। अगली चाय के लिए करीब आधा किलोमीटर अमीनाबाद के अब्दुल्लाह टी स्टाल तक जाना पड़ता। यह स्टाल हम जैसे निशाचरों के लिए ही रात भर चलता था।
यों मैं लखनऊ रेलवे स्टेशन के ठीक सामने एक रिहाइशी मल्टी स्टोरी में २२ साल रहा। यह एरिया २४x७ चलता था। चाय तो मिल ही जाती थी।
यूनिवर्सिटी के बाद भटकना नहीं पड़ा। बल्कि पढाई के दौरान ही नौकरी मिल गई। मित्र मज़ाक में कहते थे -डायरेक्ट प्लेसमेंट मिल गया। वास्तव में बेमन से एक एग्जाम में बैठे। घर से सिर्फ चाय ही पीकर चले थे। एग्जाम शुरू होने में भी टाइम था। एक ढाबे में चाय पी ली। पहली और सेकंड शिफ्ट में दो घंटे का गैप हुआ। उसी ढाबे पर बैठे-बैठे समोसे के साथ दो चाय पी लीं। दो दिन तक यह सिलसिला चला। पांच महीने के बाद कॉल लेटर भी आ गया। इसका संपूर्ण श्रेय हम चाय को ही देते हैं।
दफ़्तर में भी हमने खूब चाय पी। एसिडिटी कभी नहीं हुई। क्योंकि पानी भरपूर पीते रहे। चाय पी भी और पिलाई भी। ओवर ए कप ऑफ़ टी कई समस्याओं का निदान तलाश किया।

Sunday, May 17, 2015

टुथपेस्ट से टुथब्रश तक!

-वीर विनोद छाबड़ा
हम भारतीय हैं। हर जान की कीमत जानते हैं। खून-पसीने की कमाई है। लड़ कर लेंगे पाई-पाई।
जब तक पाई-पाई नहीं वसूल लेते, ओ मुसाफ़िर जायेगा कहां?
टूथपेस्ट की ज़िंदगानी को ही लो। जोर जबर कर पूरी की पूरी निचोड़ते हैं। अब और ताकत नहीं। फिर हथोड़ी से कूचते हैं। प्लास से गला दबाते हैं। निकल साली जाएगी कहां? और फिर कैंची से काट उसका पोस्टमार्टम करते हैं। पेट से लेकर गला तक फाड़ डालते हैं। वहशी की तरह चाट मारते हैं। जब तक खाली सतह न दिखे।
 
पड़ोसी के पास फ़ुरसत नहीं है। हमेशा ताक में रहते हैं। उसने फेंकी नहीं कि हम उठा लाये। चार-पांच दिन निकल जाते हैं।
ऐसा ही हश्र टूथ ब्रश का है। बेचारा रिटायर होने के बाद भी चाकरी करता है। जनता जनार्दन की कोशिश रहती है कि खरीदना न पड़े। किसी स्कीम में मुफ़्त मिल जाए। कोलगेट की डबल डेकर स्कीम में मुफ़्त मिलता ही है।
अब इसे कितना घिसना है यह मैन टू मैन डिपेंड करता है। तीन से चार महीना या साल भर तक। चबाने वाले तो पंद्रह ही दिन में ऐसी-तैसी करते हैं।
सयाने लोग दन्त सेवा के बाद बाल काले करने के दस्ते में  इस्तेमाल करते हैं। यहां काफ़ी वक़्त गुज़रता है।
बेचारा ब्रश खासी घिसाई के बाद चैन की सांस लेता है - चलो फ़ुरसत। अब दफ़न का वक़्त हो चला।
अरे कहां चला साथिया? अभी तो तुझे मशीन साफ़ करने की सेवा करनी है।
कुछ महीने वक़्त गुजारने के बाद- बाबू जी अब चलूं।
अरे रुक न। जल्दी क्या है? आ तेरी मुंडी तोडूं।
हां, सिरमुंडे अब तू अच्छा लगता है। पंजाब में तेरा नाम 'नाला पावड़ी'। सलवार-पायजामे में नाला डालने में मदद सिर्फ़ तू ही कर सकता है। और तब तक करेगा जब तक कि पड़ोसी की नज़र नहीं पड़ेगी - मेरा वाला जाने कहां खो गया। ज़रा अपना वाला दीजिये। भरे हृदय से बिदाई। मालूम है अब तू नहीं आएगा। पिछले साल भर में तुझसे पहले इसी तरह चार तो जा चुके हैं।
कई भाई दांत घिसने के बाद इसे सीधे मशीन में या सोफे के कोने या इसी तरह के अन्य कोने साफ़ करने पर लग जाते हैं।