Friday, August 21, 2015

बारिश के साइड इफ़ेक्ट।

-वीर विनोद छाबड़ा
आज बहुत बारिश हुई। अभी थोड़ी देर पहले ही थोड़ी कम हुई है। बरसात से डर नहीं लगता। डरता हूं उसके साइड और आफ्टर इफेक्ट्स से। जैसे आज हुआ।
बरसात शुरू हुई कि बत्ती चली गई। सब-स्टेशन और लेसा कंट्रोल, कहां नहीं फ़ोन किया। या तो स्विच ऑफ या फिर एंगेज। सोचा, लग भी गया तो इतनी बारिश में सुनेगा कौन सुनेगा? यही कहेगा बारिश रुके तो देखें।
इन्वर्टर तो है। बत्ती आने में तो तीन घंटा लग सकता है। हो सकता है सारी रात न आये। तब तक इन्वर्टर ने जवाब दे दिया तो। इसी चिंता के कारण नींद नहीं आ रही। इंतज़ार के अलावा कोई चारा नही।

बाहर बारिश शायद रुक गयी है। टॉर्च लेकर बाहर निकलता हूं। वाकई बारिश रुक गई है। मुझे ख़ुशी हुई। बारिश रुकने से ज्यादा इस बात पर कि अब थोड़ी देर में बत्ती आ जाएगी।
और वाकई बत्ती आ गयी। लेकिन नींद फिर भी नहीं आ रही है। बाहर सड़क पर पानी भरा है। सिगरेट की खाली डब्बियां, चप्पलें, गोबर जाने क्या-क्या तैर रहा होगा। हर बार ऐसा ही होता है। पिछले साल तो घर के अंदर तक घुस आया था बारिश का पानी। तार पर लटकी मेरी बनियाइन हवा से उड़ कर नीचे गिर गई थी। और मेरी नई चप्पल का जोड़ा। पानी दोनों को ही बहा ले गया। 
सोचता हूं उन लोगों का क्या हाल होगा जिनकी ज़िंदगी मेरे घर से थोड़ी दूर स्थित हाई-वे के चौड़े डिवाईडर पर बीतती है। दिन भर के थके-हारे मज़दूर और रिक्शेवाले ईटों के टेम्पोररी चूल्हे पर भोजन बनाते हैं। ईंधन मिल जाता है। इधर-उधर बिखरी पेड़ों की सूख कर गिरी डालियां, टहनियां और पत्तियां, बेकार टायर, सूखी घास-फूस और दुकानदारों द्वारा फेंके गत्ते के खाली डिब्बे। आज इनका क्या हुआ होगा? भोजन कैसे बना होगा? क्या भूखे सोये होंगे?
रात के दो बज चुके हैं। देखूं जाकर। लेकिन निकलूं तो कैसे? बाहर तो पानी ही पानी है। सड़क पर कहीं कहीं छोटे मोटे गड्ढे भी हैं। किसी में पैर पड़ गया या फिसल गया तो? खुद पर हंसी आ गयी।
आज की बारिश तो सर्वत्र लखनऊ में हुई होगी। चप्पा-चप्पा डूबा होगा। गोमती भी चढ़ी होगी। लखनऊ शहर को गोमती से कोई खतरा नहीं है। ऊंचे-ऊंचे सुरक्षा बांधों के रहते क्या मजाल कि शहर में बाढ़ का पानी घुस सके। खतरा तो अपनों से है। नालियों-नालों और उफनाते सीवरों से है। पता नहीं कौन से इंजीनियर हैं ये जिन्होंने जगह-जगह ये चोक लगने और बैक-फ्लो का 'उल्टा सिस्टम' तैयार किया है। पुराने लोग बताते हैं अंग्रेज़ों के ज़माने के लखनऊ में ड्रेनेज सिस्टम बहुत बढ़िया था।
अमां होगा। अब ज़रा सी समस्या के लिए अंग्रेज़ तो वापस नहीं बुलाये जा सकते। 
यों कबाड़ा करने में हम लोग भी कम नहीं। कारें खड़ी करने के लिए नालियां पाट दी हैं। घर का कूड़ा बड़े नाले में डाल दिया जाता है। नाला साल में कभी एक-आध दफ़े साफ़ होता है। कागज़ पर तो हर हफ़्ते साफ़ होता होगा।

Thursday, August 20, 2015

आल इंडिया पत्नी पीड़ित संघ! ना, बाबा ना।

-वीर विनोद छाबड़ा
हमें अभी थोड़ी देर पहले एक भक्त ने फ़ोन किया - गुरू जी, बढ़िया ऑफर है? जनरल सेक्रेटरी या प्रेजिडेंट जो चाहें ले लें। च्वाईस आपकी। अच्छा संगठन है। लेकिन पोस्ट ऑनरेरी है।
हमने पूछा - संगठन का नाम।

भक्त ने पुलकित होते हुए बताया - ऑल इंडिया पत्नी पीड़ित संघ।
जैसे मन-चाही मुराद मिल गयी हो। लपक कर 'हां' करने ही जा रहे थे कि अचानक हमें खटका हुआ। कुछ साल पहले भी ऐसा ही एक संघ बना था। एक आल इंडिया लेवल के हास्य कवि उसके अध्यक्ष थे। बड़ा ख़राब हश्र हुआ उनका। पत्नी ने उनका खाना-पीना बंद कर दिया। दहेज़ उत्पीड़न का मुक़दमा भी चला दिया। कोर्ट में बड़ी मुश्किल से मामला सुलटा।
याद आते ही हमारे पसीने छूट गए। अपने भय को दबाते हुए दबाते हुए हमने कहा - सोच कर बताऊंगा। 
अब हम कैसे बतायें कि पत्नी लाख हिटलर हो, लेकिन खाना तो अच्छा बनाती है। पेंशन में भी घर पहले की तरह चलाती है और बचत भी करती है। हाट बाजार सब उसी के ज़िम्मे है। उसके अकाउंट में भी मुझसे ज्यादा पैसे हैं। डबल एमए है। अभी-अभी दो एडिशनल कमरे बनवाये हैं। उसकी आर्किटेक्ट, डिज़ाइनर, ठेकेदार आदि वही है। हम तो पालथी मार कर फेस बुक की आभासी दुनिया में अपना ज्ञान बघारते रहे।

Wednesday, August 19, 2015

और ओम प्रकाश ने मधु के घर पालथी मार दी।

-वीर विनोद छाबड़ा 
एक थे कॉमेडियन ओम प्रकाश। ग़ज़ब की टाईमिंग। बिंदास और नेचुरल एक्टिंग। बहुत कम हुए हैं ऐसे आर्टिस्ट जिनकी मौजूदगी से सेट को ज़िंदगी मिलती। हलचल रहती। कहकहे गूंजते थे। उन्होंने ३०७ फिल्मों में काम किया।
उनकी अदाकारी और उनकी ज़िंदगी से जुड़े तमाम किस्से किसी और दिन। आज सिर्फ़ यह बताना है कि ओम प्रकाश का सरनेम बक्शी था और उन्होंने साथ फ़िल्में फ़िल्में प्रोड्यूस की थीं - कन्हैया (नूतन-राजकपूर), संजोग (प्रदीप कुमार-अनीता गुहा) और जहांआरा (भारत भूषण-माला सिन्हा)।

चाचा ज़िंदाबाद (किशोर कुमार-अनीता गुहा) और गेट वे ऑफ़ इंडिया (मधुबाला-भारत भूषण-प्रदीप कुमार) ओम प्रकाश ने न सिर्फ़ प्रोड्यूस की बल्कि लिखी और डायरेक्ट भी कीं। 'गेट वे ऑफ़ इंडिया' एक रात की कहानी है। नायिका घर से भागी हुई है। पर्स में लाखों के ज़ेवरात हैं। तमाम शातिर लुटेरे और सफ़ेदपोश लूटने के लिये तैयार हैं। जैसे-तैसे वो इनसे जान बचाती हुई सही जगह पहुंचती है।
जिस वक़्त कहानी का आईडिया ओम प्रकाश में दिमाग में आया, उसी वक़्त उन्होंने तय कर लिया कि हीरोईन मधुबाला ही होगी। अब मधुबाला को साईन करना कोई आसान काम तो था नहीं। मधुबाला की ज़िंदगी में सबसे बड़े विलेन उनके अब्बा अताउल्लाह खान से मिलिए। उन्हें तफ़सील बताईये। वही फीस तय करंगे और बाकी की शर्तें भी उन्हीं की होंगी। मधु सेट पर सुबह दस बजे से शाम पांच बजे तक उपलब्ध रहेगी।
लेकिन ओम प्रकाश को तो उनकी ज़रूरत रात के वक़्त रहेगी। अताउल्लाह ने नामुमकिन बोल दिया। ओम प्रकाश ने बहुत चिरौरी की। समझाया कि फ़िल्म के  सारे किरदार हीरोईन के इर्द गिर्द घूमते हैं। मधु के कैरियर की शानदार फ़िल्म साबित होगी। मधु की किसी किस्म की तकलीफ़ नहीं होगी। आराम फ़रमाने के लिए ताज होटल में सबसे उम्दा सुईट बुक करा देने का वादा किया।
लेकिन अताउल्ला टस से मस नहीं हुए।
ओम प्रकाश समझ गए कि सीधी उंगली से घी नहीं निकलेगा। उन्होंने मधु से मिलने की ख्वाईश ज़ाहिर की।
सटाक जवाब मिला कि मधु किसी सूरत में नहीं मिल सकती। आप जल्दी से चाय-नाश्ता करें और दफ़ा हो जायें।
लेकिन ओम प्रकाश परले दरजे के ज़िद्दी। ठान कर आये थे कि मिल कर ही जाऊंगा। चाहे सारी रात इंतज़ार करना पड़े। अगर उनकी नापसंद होगी तो फ़िल्म ही नहीं बनेगी। और ओम प्रकाश पालथी मार पसड़ गए।
अभी पांच मिनट भी नहीं गुज़रे होंगे कि मधु कमरे में दाख़िल हुई।
अताउल्लाह को सांप सूंघ गया।

Tuesday, August 18, 2015

और पड़ोसन की डिंपी फर्स्ट आ गयी।

-वीर विनोद छाबड़ा
कई साल पहले की बात है। बिटिया की हाई स्कूल की परीक्षा दे रही थी। 
बच्चों को टेंशन। और मां-बाप को उनसे भी ज्यादा। मानों उन्हीं की परीक्षा है। पत्नी जी ने नोटिस जारी किया नो गेस्ट, नो टीवी, नो गाना-बजाना। नो जोर से बात करना और नो हंसना।
कर्फ्यू जैसा माहौल। शूट एंड साईट आर्डर। प्रशासन पूरा का पूरा हाथ में।
पत्नी जी ने पूरा-पूरा ख्याल रखा कि कोई ऐसा पाठ न छूट जाये जो बिटिया ने पढ़ा न हो। अपनी स्टाईल याद आई। जोर-जोर से पढ़ो। दस-दस बार पढ़ो। छत पर टहल-टहल कर पढ़ो। पड़ोसी के आराम में खलल पड़े तो पड़ने दो। अपने दिमाग में तो कुछ न कुछ घुसेगा। कई बार ऐसा भी हुआ कि पहले उन्होंने खुद पढ़ा और पीछे-पीछे बिटियाने रिपीट किया। बीच-बीच में ज़रूरत पड़ी तो भावार्थ सहित अर्थ भी बताती चलती थीं, उदाहरण सहित।
ख़ैर परीक्षाएं समाप्त हुई। फल घोषित हुआ। बिटिया द्वितीय श्रेणी में पास हुई। डबल ख़ुशी इस बात की कि पापा का रिकॉर्ड टूटा। पापा हाई स्कूल में पहली मरतबे फेल हो और बेटी पास। इस तथ्य को सगर्व बताते हुए मोहल्ले भर में में मिठाई बंटी।
 
देर शाम गए पड़ोसन भी मिठाई का डिब्बा ले आई। भाभी जी विशेषतौर पर ये आपके लिए है। मेरी बेटी डिंपी भी पास हो गयी है। फर्स्ट डिवीज़न। हमें तो उम्मीद ही नहीं थी। और ये सब आप ही वज़ह से है।
पत्नी हैरान। मेरी वज़ह से क्यों? भगवान की कृपा से क्यों नहीं? जैसे मैंने अपनी बेटी को सिर्फ पढ़ाया। लेकिन आशीर्वाद तो भगवान जी का था न !
पड़ोसन बोली। भाभी, वो तो ठीक है। भगवान तो हैं ही सबके रखवाले और रास्ता दिखाने वाले। लेकिन सच कहती हूं। यदि आप न होती तो मेरी डिंपी कभी फर्स्ट डिवीज़न तो दूर की बात, कभी पास भी न हो पाती।
पत्नी की हैरानी परेशानी बढ़ती ही गई। क्या कह रही है डिंपी की मम्मी ?
पड़ोसन ने रहस्य से परदा उठाया। दरअसल, जब आप छत पर अपनी बेटी को ज़ोर-ज़ोर से पढ़ाते हुए याद करा रही होती थीं तो ठीक उसी समय मेरी डिंपी भी छत पर पहुंच जाती थी। वहां आपकी आवाज़ साफ़ साफ़ सुनाई देती। डिंपी चुपचाप ध्यान से आपको सुनती रही। और इस तरह उसने भी रट लिया। मेरी भी मेहनत बच गयी। और फिर आप तो जानती ही हैं कि मैं कम पढ़ी-लिखी हूं। इसके पापा को तो दुकान से ही फुरसत नहीं मिलती।

Monday, August 17, 2015

एक थे दीक्षितजी।

-वीर विनोद छाबड़ा 
हमारे एक सीनियर हुआ करते थे- सदाशिव दीक्षित जी।
अपनी तरह के अनोखे जीव। ग्रामीण पृष्ठभूमि से बहुत गहरे जुड़े हुए। कुदरत ने रंग भी गहरा सांवला दिया था और लहज़ा, आचार, व्यवहार भी बिलकुल खांटी क़िस्म का। बिंदास बात-चीत। कुश्ती के बेहद शौक़ीन और जानकर। कई बार लंगोट कस दंगल में भी कूदे। कुर्सी पर पालथी लगा कर बैठते थे। ऑफ़िसर होने के बाद भी उन्होंने अपना ये अंदाज़ नहीं छोड़ा।

विचारों से भी परंपरावादी और पुरातनपंथी और रहन-सहन में भी। यह काम मंगल को और यह बुध को - बुध करे सुध। मगर थे बहुत पढ़े-लिखे। अंग्रेजी में एमए थे। फाइलों में हिंदी में लिखे नोट्स पढ़ने में दिक्कत होती मगर अंग्रेज़ी  फटाफट पढ़ लेते। और लिखते तो गज़ब थे। ईमानदार और साफ़दिल। जो अंदर, वही बाहर।
दीक्षित जी दफ़्तर के काम से टूर पर जाने से एलर्जी थी। एक दिन इलाहाबाद जाना पड़ा। हाई कोर्ट में चल रहे सरकारी मुकदमे के सिलसिले में। हलफ़नामे पर दस्तख़त होने थे उनके।
वो जनरल डिब्बे में यात्रा करते थे। स्लीपर कोच में उन्हें उलझन होती। कहते थे - अमां उसमें सब सो जाते हैं। हम ठहरे बातूनी आदमी। ट्रेन में यों भी नींद कहां आती है।
लेकिन इस बार मामला अलग था। वो राजपत्रित पद पर प्रमोट हो चुके थे। नज़दीकी दोस्तों ने समझाया - दीक्षितजी, अब आप अधिकारी हैं। कोई छोटे-मोटे बाबू नहीं कि जहां और जब तबियत हुई, बैठ गए। पद की गरिमा का भी ध्यान रखना ज़रूरी है। फर्स्ट क्लास में जाने के लिए आप अधिकृत भी हैं। फिर मुक़द्दमे से संबंधित सीक्रेट फाइल भी ले जा रहे हैं। इसकी हिफाज़त भी ज़रूरी है। फर्स्ट में जाने का बनता है।
बामुश्किल दीक्षितजी माने। चल दिए सफ़र पर। चिरपरिचित देशी पोषाक। वही साधारण कुरता-पायजामा। एक हाथ में लोहे का छोटा संदूक। और दूसरे में घिसी-फटी पतलून की क़तर-ब्योंत से बना थैला। फर्स्ट क्लास का टिकट लिया। उन दिनों लखनऊ से इलाहाबाद का टिकट बड़ी आसानी  उपलब्ध था।
लेकिन वो जैसे ही हम फर्स्ट क्लास में घुसे टीटीई ने गंवार समझ दबोच लिया - अबे, कहां घुसे जा रहा है? यह फर्स्ट क्लास है, फर्स्ट।  
दीक्षित जी लाख समझाए - भैया, हम बाक़ायदा फर्स्ट क्लास का टिकट लिए हैं। बिजली बोर्ड में राजपत्रित अधिकारी हैं। हमारे पहनावे और सूरत पर मत जाओ। सरकारी मुक़द्दमे की पैरवी करने इलाहाबाद जा रहे हूं। न यकीन हो तो लो देख लो फाईल।
मगर टीटीई माना ही नहीं। टिकट देख कर भी नहीं। लेकिन जब दीक्षित जी ने फर्स्ट क्लास अंग्रेजी में उसे डांटा तो उसकी सिटी-पिट्टी गुम हो गयी।
दीक्षित जी ने ज़िंदगी में पहली मरतबे फर्स्ट क्लास देखा। बहुत भला लगा। दिन का सफ़र। लेकिन कूपे में साथ सफ़र कर रहे सूट-बूट वाले मुसाफिर असहज और परेशान दिखे। दीक्षित जी ने तनहा महसूस किया। एक-दूसरे से कोई बात-चीत नहीं। एक अंग्रेज़ी का अख़बार पढ़ने में मसरूफ़ और दूसरा जेम्स हेडली चेज़ के नावेल में घुसा था। बाकी बैठे-बैठे ऊंघ रहे थे।  
दीक्षित जी अगले स्टेशन पर डिब्बे से बाहर निकले। और जनरल में आकर बैठ गये। टिकट चेक करने वाला आया। उसकी आंखें फ़ैल गयीं - फर्स्ट का टिकट और जनरल में यात्रा? मूर्ख हो क्या?

Sunday, August 16, 2015

अगर आईना न होता!

- वीर विनोद छाबड़ा 
किसी भी समय कहीं भी जाना हो, मुझे तैयार होने में कुल जमा पांच-सात मिनट लगते हैं। वो भी सिर्फ़ इसलिए की चेंज होता है। कभी-कभी तो वो भी नहीं। जूता पहना और चल दिए। रात का टाईम कौन देखता है? और फिर कोई मेरी शादी तो है नहीं और न सिल्वर जुबली है। जिसकी है वो सजे-धजे। पॉर्लर में जाए। मेरा पैसा कोई फालतू तो है नहीं। 
मुझे लगता है ज्यादा वक़्त आईना देख कर कंघी करने में जाया होता है। मैं वही नहीं करता। सर पर गिने-चुने तो बाल हैं। क्रीम-पाउडर कतई पसंद नहीं। पैंतीस साल पहले एक बार लगा कर पार्टी में गया था।
एक साहब ने पूछ लिया था - आटे की बोरी से निकल कर आ रहे हो क्या? वाश रूम में जाकर आईने में देखा था तो डर गया था। मानों सफ़ेद प्रेत खड़ा हो। तब से बस चुल्लू भर पानी लिया और मुंह पर छिड़क दिया। लेकिन ऐसा भी कभी-कभी। रुमाल ही काफ़ी है। शेव करते हुए और टाई बांधते हुए आईने में चेहरा देखना एक मजबूरी है। अन्यथा एक मुद्दत हो गयी है कायदे से आईना देखे।
लेकिन जवानी के दिनों के लिए मैं यह दावा नहीं करता। बार-बार ज़ुल्फ़ें संवारना और कंघी करना। कई एंगल से खुद को निहारना तो खूब चलता रहा। लेकिन क़सम अपनी कभी जेब में आईना नहीं रखा। जबकि कई लड़के उस ज़माने में छोटा सा आईना हिप पॉकेट में रखते थे।
और लड़कियां! पूछो मत। इवनिंग शो देखना हो तो मैटनी बोलो। तब जाकर जैसे-तैसे टाईम पर निकल पाएंगी।
अपने ज़माने में ढेर सारा मेकअप का सामान मय आईने के उनके पर्स में धरा देखा। और आज भी कोई कमी नहीं आई है। हां, आईटम सब ब्रांडेड हैं। इसमें आईना तो निहायत ज़रूरी है।
कई बार मैं खुद से मुख़ातिब होता हूं - यह आईना न होता तो दुनिया क्या कर रही होती? हो सकता है थोबड़ा देखने के लिए सरकार या किसी निजी संस्था ने जगह-जगह एटीएम की भांति छोटे-छोटे तालाब बनवाये होते। पांच रूपए में दस मिनट तक खुद को निहारें। क्रीम-पाऊडर थोपें। कहीं-कहीं रिचार्ज कार्ड सिस्टम भी होता। या फिर मंथली किराये पर अनलिमिटेड का प्राविधान होता।
ख़ैर यह तो एक टाईम पास यूटोपिया है।

Saturday, August 15, 2015

इस्मत चुग़ताई - खुद बदनामियों झेल कर औरत को उसका हक़ दिलाया।

-वीर विनोद छाबड़ा
लखनऊ में तारीख़ १४ अगस्त २०१५ में इस्मत चुग़ताई के जन्म शताब्दी समारोह के सिलसिले में इप्टा, लखनऊ ने 'महत्व इस्मत चुग़ताई' कार्यक्रम आयोजित किया। अध्यक्षता जेएनयू के पूर्व प्रोफ़ेसर और उर्दू इल्म-ओ-अदब में बहैसियत समालोचक दख़ल रखने वाले शारिब रुदौलवी ने की। अलावा उनके मंच पर आबिद सुहैल, रतन सिंह, सबीहा अनवर, वीरेंद्र यादव और शबनम रिज़वी की मौज़ूदगी थी।

इप्टा के राष्ट्रीय सचिव राकेश ने संचालन करते हुए इस्मत चुग़ताई की ज़िंदगी पर रौशनी डालते हुए बताया इस्मत आपा के अफ़साने 'लिहाफ़' ने अदबी दुनिया में ज़बरदस्त हलचल पैदा की। ये अफ़साना औरत की आज़ादी की बात तो करता ही है, पूरे समाज का रचनात्मक आत्मलोचन भी करता है.…उन पर उनके भाई अज़ीम बेग चुग़ताई का और उनके लेखन का ख़ासा असर था। इस्मत ने अज़ीम बेग को पार करके उर्दू अदब में खुद को स्थापित किया। ख़ुद अज़ीम बेग को भी इसका डर था। इस्मत कहती थीं कि क़लम मेरे हाथ में जब आ जाती है तो मैं लिखती ही जाती हूं.…वो १९४७ में मुल्क़ की तक़सीम से पैदा हुए फ़सादात से गुज़री। तक़सीम मुल्क़ की ही नहीं हुई बल्कि अवाम के दिलों की भी हुई.…वो कृष्ण चंदर, राजिंदर सिंह बेदी और सआदत अली मंटो की कड़ी  हैं। प्रोग्रेसिव लेखन की अगुवा रहीं। उनका लेखन ऑटोबायोग्राफ़िकल रहा है। उनके अफ़साने बताते हैं वो किसी से भी बात कर लेती हैं। चाहे वो धोबी हो या मोची या सफ़ाई वाला या कामवाली बाई या अस्तबल का साइंस…एक बार मंटो से किसी ने पूछा था कि अगर मंटो की शादी इस्मत से हो गयी होती तो? मंटो ने जवाब दिया था कि निक़ाहनामे पर दस्तख़त करते-करते उनमें इतनी लानत-मलानत होती कि यह वहीं टूट जाती।
करामात हुसैन डिग्री कॉलेज की पूर्व प्रिसिपल और उर्दू की वरिष्ठ लेखिका सबीहा अनवर ने इस्मत आपा के साथ वक़्त वक़्त पर बिताये दिनों को भावुक अंदाज़ से याद किया। इस्मत आपा की राय बेहद बेबाक होती थी। वो दिखावटी बात नहीं करती थीं। प्रैक्टिकल, मुंहफट और आज़ाद ख़्याल। उन्हें दुनिया में होने वाली हर घटना की जानकारी लेने की फ़िक्र रहती। उस पर अपना नज़रिया ज़ाहिर करती…वो जब कभी लखनऊ आतीं तो मेरे घर ज़रूर आती, क़याम भी फ़रमाती। जब भी मिलीं बड़े ख़लूस से मिलीं। उन्हें मिलने, देखने और सुनने वालों का सिलसिला सुबह से शाम चला करता। भीड़ लगी रहती। वो बेबाक बोलने से बाज़ न आतीं। उनकी शैली व्यंग्यात्मक होती।
एक बार बोलीं कि मेरी मां को उसके दसवें बच्चे ने बिलकुल तंग नहीं किया क्योंकि वो पैदा होते ही मर गया....कोई न कोई कंट्रोवर्सी वाला बयान दे देतीं और फंस जाती। अख़बारनवीसों को इसी का इंतज़ार रहता। एक दिन कह बैठीं कि मरने के बाद दफ़न करने के बजाये मुझे जलाया जाए.…जब मैंने उनसे कहा कि आप थोड़ा सोचा-समझ कर बयान दिया करें तो उन्होंने कहा, मैं तुम्हारे जैसी समझदार नहीं हूं। जो दिल में है वही कहूंगी। मैं सच कहने से डरती नहीं…बहुत ज़िद्दी थीं वो। बोलने पर आतीं तो बेलगाम हो जातीं। यादों का कभी ख़त्म न होने वाला ख़जाना था उनकी झोली में। अपने मरहूम शौहर शाहिद लतीफ़ और भाई अज़ीम बेग का बहुत ज़िक्र करतीं थीं। लेकिन दुःख साझे नहीं करतीं थीं.…'जुनून' की शूटिंग में मिलीं। मैंने पूछा कहां एक्टिंग में फंस गयीं। तो बोलीं क्या जाता है मेरा? फ़ाईव स्टार होटल और शानदार खाना है। मौज मस्ती है.…चटपटे खाने की बहुत शौक़ीन थीं। खाते वक़्त खूब बातें करतीं। एक बार मुझसे बोलीं बड़ी मक्कार हो तुम। हस्बैंड को रवाना करके खूब बढ़िया-बढ़िया खाना खाती हो और गप्पें मारती हो.…छोटी-छोटी बातों का बहुत ध्यान रखतीं। पूरा सूटकेस पलट देतीं। समझौते नहीं कर सकतीं थीं.…मैंने ऊपरी तौर पर उन्हें ज़िंदगी से भरपूर देखा। लेकिन अंदर से मायूस और तनहा पाया। उन्होंने अपनी बेटियों का ज़िक्र बहुत कम किया। हां, नाती को कभी-कभी याद ज़रूर कर लेतीं। किसी को उनकी फ़िक़्र नहीं होती थी कि वो कहां हैं, कैसी हैं और कब लौटेंगी …उन दिनों वो हमारे घर पर रुकीं थीं। उनके लिए बंबई से फ़ोन आया। फलां फ्लाईट से फ़ौरन रवाना कर दें। मैं और मेरे पति अनवर उन्हें एयरपोर्ट छोड़ने गए। वहीं बंबई जा रहे एक दोस्त मिल गए। हमने इस्मत आपा को उनके सिपुर्द कर दिया, इस ताक़ीद के साथ कि रास्ते भर उनका हर क़िस्म का ख्याल रखें और एयरपोर्ट से घर के लिए टैक्सी भी कर दें। दोस्त ने लौट कर बताया कि वो बलां की ज़िद्दी निकलीं। बंबई एयरपोर्ट पर उन्हें लेने कोई नहीं आया। टैक्सी करके सीधा बांद्रा चली गयीं अपने एक दोस्त के घर।
प्रसिद्ध लेखिका शबनम रिज़वी ने इस्मत आपा के अफ़सानों और नावेलों के किरदारों पर बड़े विस्तार से रौशनी डाली। वो खुद अव्वल दरजे की ज़िद्दी थीं। उनके किरदारों में अजीबो-ग़रीब ज़िद्द और इंकार साफ़ दिखता है। मुहब्बत करने वाला नफ़रत का इज़हार करता है। खेल-खेल में बात शुरू होती है। फिर नफ़रत में तब्दील हो जाते हैं। हमला करते हैं। मगर आख़िर आते-आते भावुक हो जाते हैं.…उनके किरदार वक़्त के साथ बदलते भी रहते हैं.… महिलाओं के लिए बहुत लिखा। 
हिंदी साहित्य के सुप्रसिद्ध समालोचक वीरेंद्र यादव ने रशीद जहां, अतिया हुसैन और कुर्तनलैन हैदर की पंक्ति में इस्मत चुग़ताई को रखते हुए बहुत बड़ी लेखिका बताया। यह सब लखनऊ के आधुनिक आईटी कॉलेज की पढ़ी हुईं थीं। उन्होंने अपने समाज की चिंता के साथ महिलाओं की आज़ादी की बात की है। उनकी प्रसिद्ध कृति 'लिहाफ़' में शोषण के परिप्रेक्ष्य की सिर्फ़ बात नहीं है। उनमें फ़िक्र है कि हालात क्या हैं, रिश्ते क्या हैं और ऐसे रिश्ते क्यों हैं और उनके किरदारों के शौक क्या हैं?…उन्होंने सेक्सुल्टी की बात की।
उस भाषा में बात की जो उनके समाज के मिडिल क्लास में बोली जाती है। और उन विषयों पर लिखा जिन पर कभी किसी की निग़ाह नहीं गयी थी.…वो मूल्यों के साथ जुडी रहीं। कभी किसी तहरीक़ के साथ जुड़ कर नहीं लिखा। थोपी हुई बातें नहीं मानीं। जो मन में आया, लिखा…उनके अफ़सानों में १९४७ के पार्टीशन से उपजे सांप्रदायिक दंगों का दर्द है। दिलों में दरारें पड़ने का दर्द है। ऐसे संगीन माहौल में एक लेखक का फ़र्ज़ बनता है कि वो हस्तक्षेप करे। और इस्मत आप ने पूरे समर्पण के साथ बखूबी किया…वो पाखंड की धज्जियां उड़ाती हैं। 'कच्चे धागे' कहानी में उनकी यह फ़िक्र और उनकी विचारधारा दिखती है कि वो किसके साथ खड़ी हैं। बापू की जयंती के रोज़ आत्माएं शुद्द हो रही हैं। गंदी और घिनौनी। मगर लालबाग़ और परेल के इलाकों में एक भी तकली नाचती नज़र नहीं आती है। पच्चीस हज़ार श्रमिक कामगार मैदान में जमा हैं। छटनी की धार से ज़ख्मी मज़दूर, फीसों से कुचले विद्यार्थी, महंगाई के कारक और शिक्षक उम्मीद भरी नज़रों से आज़ाद मुल्क के रहनुमाओं को ताक रहे हैं। इंसान इंसान से नहीं हैवान से लड़ेगा। कामगार मैदान के चारों ओर पुलिस का पहरा है। मगर नाज़ायज़ शराब पर नहीं है, काले बाज़ार और चोर उच्चकों पर नहीं है। मैं इनके साथ हूं। भले मैं इस तूफ़ान में कतरा हूं और हर कतरा एक तूफ़ान है.…आज बहुमतवादी आतंक है। मूल्यों का क्षरण हो रहा है। ऐसे में इस्मत आपा की और उनके समर्पित लेखन की सख़्त ज़रूरत है।
मशहूर सीनियर उर्दू अफ़सानानिगार रतन सिंह ने इस्मत आपा को याद करते हुए बताया कि वो बेहद संजीदा औरत थीं। एक वाक़या याद है। एक जलसे में उनको सुनने और देखने वालों से हाल भरा हुआ था। मैं जगह न मिलने की वज़ह से पीछे एक कोने में खड़ा था। इस्मत आपा ने देखा।
ज़ोर से बोलीं। पीछे क्यों खड़े हो? आगे आओ। इसके पीछे उनका मक़सद था, नई पीढ़ी के अदीबों आगे आओ। सीनियर अदीब जूनियर के लिए रास्ता साफ़ करो। एक जनरेशन दूसरी जेनरेशन को तैयार करती थी। हमें उनके काम को आगे बढ़ाना चाहिये…आज मुल्क़ में कोई ऐसा रिसाला नहीं है जिसमें पूरे मुल्क़ के अदब को देखा जा सके। कहानी के मामले में हमारा हिंदुस्तान बहुत आगे है।
मशहूर सीनियर उर्दू अफ़सानानिगार और सहाफ़ी आबिद सुहैल ने बताया कि इस्मत आपा सिर्फ़ हिंदुस्तान में ही नहीं बल्कि सारी दुनिया में मशहूर थीं.… पहली मरतबे उन्हें १९६२ में देखा था। लखनऊ के बर्लिंग्टन होटल में एक जलसा हुआ। बेशुमार नौजवान अदीब जमा हुए इस्मत आपा को देखने और सुनने। उन्होंने अपील की। घर से बाहर निकलो।
लोगों से मिलो, उन्हें देखो और लिखो…इस्मत आपा शादी के कुछ दिनों बाद तक अपने शौहर शाहिद लतीफ़ के नाम से लिखती रहीं। बाद में अपने नाम से लिखा…औरत जब चुटकी लेती है तो मर्द कसमसा कर रहा जाता है। इस्मत आपा इसमें माहिर थीं.…एक जलसे में जाने से पहले शाहिद ने उनसे कहा, मेरी कहानी के मुतल्लिक कुछ नहीं कहेंगी। मुंह बिलकुल बंद रखना। लेकिन वो अपना वादा नहीं निभा सकीं। कहानी की बखिया उधेड़ कर रख दी। वापसी पर शाहिद ड्राइव कर रहे थे और इस्मत उनका चेहरा देख रहीं थीं कि शाहिद कुछ बोलेंगे। लेकिन बिलकुल ख़ामोश रहे.....एक वाकया रामलाल के घर पर हुआ। हम सब वहां पहुंचे। रामलाल वो तमाम खतूत संभालने और खंगालने में लगे थे जिन्हें तमाम अदीबों ने उन्हें लिखे थे। इस्मत बोलीं यह सब बेकार मेहनत क्यों कर रहे हो। तुम्हारे जाने के बाद सब ख़त्म हो जायेगा। कोई इन्हें संभाल नहीं रखेगा… इस्मत के अफ़सानों में डायलॉग बहुत कम हैं। कहानी बनाई नहीं जाती, बल्कि चलती रहती है।
कार्यक्रम के अध्यक्ष और ,जेएनयू के पूर्व प्रोफ़ेसर और उर्दू समालोचक शारिब रुदौलवी की निग़ाह में इस्मत चुग़ताई की कहानियां के ख़ास तरह की थीं। तरक़्क़ीपसंद अफ़साने लिखे। फ़िक्री कहानियां लिखीं, जिनकी बुनियाद मसायल हैं। मसायल में इंसान के काम की अहमियत है.…उर्दू में भंगी समाज पर सिर्फ़ दो अफ़साने लिखे गए हैं। एक कृष्ण चंदर ने लिखा - कालू भंगी। और दूसरा लिखा इस्मत ने - दो हाथ।
यह इस्मत की ही हिम्मत थी कि उन्होंने उस किरदार की समाज में अहमियत बताई…उनके अफ़सानों को पढ़ कर लोग हैरान होते थे जब उन्हें यह पता चलता था कि ये खातून ने लिखे हैं। उस दौर में यह बहुत बड़ी बात थी.…अफ़साना तो कोई भी लिख सकता है। सवाल यह है कि मसला क्या है? इस्मत ऐसे मसायल लेकर चलती हैं जिनमें औरत की जद्दोजहद पूरी शिद्दत के साथ पेश की जाती है। उसे समाज में हक़ दिलाती हैं। इस्मत ने बदनामियों को झेल कर औरत को उसका मुक़ाम दिलाया। आज़ादी दिलाई… अफ़साने आते रहेंगे और अफ़सानानिगार भी। लेकिन इस्मत का आना मुश्किल है।