Saturday, December 19, 2015

चाचा जी!

-वीर विनोद छाबड़ा
बात १९६९ की है। हम बड़ी बहन की शादी के सिलसिले में दिल्ली में थे। बाड़ा हिन्दू राव एरिया में फिल्मिस्तान सिनेमा के पास चिमनी मिल गली में मेरे दादा जी का घर था। शादी वहीं से होनी थी।
शादी ठीक-ठाक निपट गई। सब अपनी-अपनी भूमिका में पास। बहन तारों की छांव तले सुसराल चली गयी। हम सब थके हारे लेटते ही सो गए।

सोये हुए अभी घंटा भर ही हुआ होगा कि बड़े चाचाजी ने जगाया। सुबह के क़रीब छह बज रहे थे। बोले - जल्दी चलो। पतीला वापस करना है। स्कूटर के पीछे पकड़ कर बैठ जाना। 
गर्मी के दिन थे। मैंने सिर्फ स्लीवलैस बनियाइन और पायजामा पहन रखा था। बनियाइन पीछे से थोड़ी फटी भी थी। मैं बोला- ठीक है। शर्ट तो पहन लूं।
चाचाजी स्वभाव से जल्दबाज़ किस्म के शख़्स थे। बोले - छोड़ो यार। सुबह-सुबह कौन देख रहा है। और फिर दस मिनट में लौट भी आएंगे।
शादी वाला घर था। सब अस्त-व्यस्त पड़ा था। शर्ट भी जाने कहां होगी? ढूंढ़नी पड़ेगी।
मैं राज़ी हो गया। स्कूटर की पिछली सीट पर उस बड़े से पतीले को कस कर पकड़ बैठ गया।
सड़क खाली देख चाचा ने ६०-७० की स्पीड पर स्कूटर दौड़ा दी। मैंने बड़ी मुश्किल से एक हाथ से स्कूटर की गद्दी और दूसरे हाथ से पतीला पकड़ रखा था।
शायद देव नगर का इलाका था वो। चाचा ने स्कूटर के साथ मुझे भी सड़क किनारे खड़ा किया और एक गली में पतीला लेकर घुस गए। फिर पलक झपकते ही वापस भी आ गए। चेहरे पर संतुष्टि कि यह काम भी निपटा। स्कूटर स्टार्ट की। इससे पहले कि मैं बैठ पाता, उन्होंने बड़ा तेज पिकअप लिया और फुर्र हो गए।
मैं पीछे खड़ा चीखता रहा  - चाचाजी रुकिए। रुकिए।
लेकिन जल्दबाज़ चाचाजी कहां रुकने वाले। चंद सेकंड में ही नज़रों से ओझल हो गए।
मित्रों आप समझ सकते हैं कि उस समय मेरी क्या दशा रही होगी। तन पर सिर्फ फटी बनियाइन और पायजामा। चेहरे पर उगी झाड़ जैसी दिखती दाढ़ी, जो उस ज़माने की नई पीढ़ी का शौक था। फूटी-कौड़ी नहीं पास। मोबाइल का युग नहीं था। सुबह का वक़्त होने के कारण दुकाने सब बंद थी। टेलीफोन भी नही कर सकता था। एक-आध ऑटो को हाथ दिया। मगर मेरी हालत देख वो रुके नहीं। शायद पागल समझ रहे होंगे।
अच्छी बात यह थी कि रास्ता मुझे मालूम था। पैदल ही चल पड़ा। कोई देख कर क्या बोलेगा, इसकी परवाह नहीं थी। परन्तु कुत्तों से ज़रूर डर लग रहा था जो मेरी ओर घूर-घूर कर देख रहे थे।
खैर, पसीने से तर-बतर डेढ़ घंटे में घर पहुंचा। देखा चाचाजी ज़बरदस्त क्लास चल रही थी। दादाजी, पिता जी और शादी में आये तमाम बड़े बुज़ुर्ग चाचाजी को घेर कर दनादन मुंहजुबानी 'फायर' कर रहे थे।

Friday, December 18, 2015

नेकी कर, दरिया में डाल।

- वीर विनोद छाबड़ा
मार्च २०१० की बात है। एक एक्सीडेंट हुआ। हमारा बायां कंधा उखड़ गया। डॉक्टर ने कंधा बैठा दिया और जिस्म के साथ पर स्क्रैप बैंडेज से बांध दिया।

दो दिन आराम किया। ऑफिस भी ज़रूरी था। सुबह एक दोस्त की कार की डिक्की में बैठ जाते। शाम को वो घर वापस पटक देते। हम ठहरे कामकाजी आदमी। शाम देर तक बैठना भी पड़ता था। ऑटो से आना-जाना शुरू कर दिया।बैग में झूलती हमारी बांह देख कर जनता का सहयोग भी खूब मिला। लड़कियां आगे रहीं - नहीं, अंकल आप बैठें। मैं दूसरा ऑटो पकड़ लूंगी।
एक दिन हमने गौर किया कि जिस ऑटो से हम वापस जा रहे हैं, पिछले दिन भी यही था। हमारा स्टॉपेज मुंशी पुलिया दो-तीन सौ मीटर पहले पड़ता है। फिर वहां से सड़क क्रॉस करके दो मिनट का रास्ता और यह रहा हमारा घर। 
ये सड़क क्रॉस करना अपने आप में बहुत दुरूह कार्य था। आएं-बाएं-शाएं तेज ट्रैफिक दौड़ता है। सड़क क्रॉस करने के लिए इंतज़ार कभी इतना लंबा हुआ होता था कि डर लगता था कि ऐसा न हो कि उम्र यूं ही गुज़र जाए। कई बार बीच डिवाईडर पर हम देर तक फंसे रहे।
उस दिन हम जैसे ही ऑटो से उतर कर सड़क क्रॉस करने को हुए कि एक बाइकर शाएं से हमें लगभग छूता हुआ निकल गया। हम सन्न रह गया। मौत जैसे बगल से गुज़री हो। एक क्षण भी इधर-उधर होता तो फेस बुक पर कभी न दिखता। 
ऑटोवाला अभी वहीं खड़ा था। वो हमारे पास आया। मेरे कंधे पर हाथ रखा। पूछा - अंकल ठीक तो हैं न?
हमारी आंखें दहशत से फटी हुई थीं। कंधे पर उसका आत्मीय स्पर्श और हाल पूछना, लगा ज़िंदगी वापस आ गयी है।
हमने कांपते हुए कहा- हां ठीक हूं। 
ऑटोवाले ने कहा - अंकल। बैठिये। उस पार छोड़ देता हूं। 
हमारे पास दूसरा विकल्प नहीं था। उसने मुंशी पुलिया से यू-टर्न लेकर मुझे उस पार उतार दिया। हमने उसे धन्यवाद दिया। इस सेवा के बदले क्या चाहिए ये पूछ कर हम मानवता और ऑटोवाले बंदे को शर्मिंदा नहीं करना चाहते थे। नाम पूछा तो मुस्कुराया - काले कहते हैं सब मुझे। जबसे बड़ा हुआ यही नाम सुनता आया हूं। लाइसेंस में भी यही लिखा है। 
हम मुस्कुराये। उसकी पीठ थपथपाई और ख़रामा-ख़रामा घर की ओर चल दिये। अगले दिन शाम ऑफिस से छूटा तो वो फिर मिला। उसे शायद हमारा ही इंतज़ार था। उसने फिर मुंशीपुलिया से यू-टर्न लेकर हमें सड़क पार करा दी।
ये सिलसिला दो महीने तक चलता रहा। हम जब भी ऑफिस से निकलता काले को इंतज़ार करता पाते थे। हमारे बैठने के बाद ही वो ऑटो में बाकी सवारियां भरता। इस बीच कई मित्रों ने ऑफर दी। लेकिन हम मना कर देता। काले की निस्वार्थ सेवा हमारी आदत बन चुकी थी। 

Thursday, December 17, 2015

कार से निकलें, मगर पार्किंग देखकर।

- वीर विनोद छाबड़ा
आजकल शादी के न्यौतों की बहार है। रोज़ कहीं न कहीं से बुलावा है, पूरे इसरार के साथ।
कभी-कभी एक दिन में दो से ज्यादा प्रीतिभोज होते हैं। ऐसे में वहां जाता हूं जो आंखें निकाल कर गए हैं - देखो, आना ज़रूर है। कोई बहाना नहीं चलेगा। इसीलिए तीन महीने पहले बोल दिया था कि कलैंडर में निशान लगा लो। और हां, अकेले नहीं आना, सबको साथ लाना है।आज ऐसी ही शादी में जा रहा हूं। बाकी जगह व्यवहार भिजवा दिया है। वहां नहीं गया तो उसे शिकायत भी नहीं होगी। व्यवहार तो आ ही गया है।

संयोग से जहां जा रहा हूं वो जगह पड़ोस में ही है। स्टोन थ्रो डिस्टेंस पर। कार की भी ज़रूरत नहीं। पेट्रोल, समय और ऊर्जा की बचत और साथ में ठंडक से भी बचाव।
लेकिन इन सबसे बड़ी जिस उलझन से बचा हूं, वो है पार्किंग। आजकल लोग न्यौता ज़रूर सप्रेम देते हैं, मगर पार्किंग आप जानें? अगर निषेध स्थान पर खड़ी करने पर चालान होगा, तो उसे आप झेलें। हमने तो आपको सपरिवार निमंत्रित करने का फ़र्ज़ अदा कर दिया है।
ठंडक के कारण कार से जाना भी ज़रूरी है। परिवार साथ में होने के कारण तो निहायत ही ज़रूरी है।
आज से पंद्रह-बीस साल पहले अपने लखनऊ शहर में कारें आज के मुकाबले पांच परसेंट भी नहीं थीं। जहां मर्ज़ी हो, मूंछों पर ताव देकर खड़ी कर लो। साहब लोग माने जाते थे कार वाले। मारुती ८०० स्टैंडर्ड को देखकर सिपाही भी सलूट ठोंकता था।
अब तो हालत यह है कि पार्किंग लिए बिलकुल भी जगह नहीं मिलती। स्कूटी वाले कोने की तलाश में इधर-उधर भटका करते हैं। ऐसे में महंगी कार वालों को सिपाही डंडे फटका-फटका कर दौड़ाया करते हैं। किलोमीटर दूर खड़ी कर दें तो प्रीतिभोज का मज़ा जाता रहता है। दिमाग में कार घूमती रहती है। चोर न उठा ले गये हों या पुलिस वाले 'टो' कर न ले गए हों। मैं तो मजबूरन कार में ही बैठा रहता हूं। दो-चार खाना खाकर निकलें तो अपनी कार लगाऊं। अब देर होती है तो हो जाये। मेरे एक मित्र सबसे पहले पहुंचते हैं। लेकिन आस-पास इतनी ज्यादा कारें खड़ी हो जाती हैं कि कार निकालनी मुश्किल। मजबूरन सबसे बाद में लौटते हैं।

Wednesday, December 16, 2015

भैया यह कार है ट्रक नहीं।

- वीर विनोद छाबड़ा
हम पिछले १६ साल से कार चला रहे हैं। एक बार बदल भी चुके हैं।
अपनी कार में बैठने वालों की यों तो हम कई आदतों से परेशान हैं। लेकिन उसमें सबसे ख़राब आदत है, दरवाज़ा जोर से बंद करना है। कार न हो गयी मानों ट्रक गया।

बताईये, हमने पांच-छह लाख खर्च करके सपनों की रानी कार ख़रीदी। बड़े नाज़ों से रोज़ के रोज़ उसे नहलाया-धुलाया, झाड़ा-पोंछा और महकाया। लेकिन अगला, एक तो मुफ़्त में लदा और फिर ऊपर से उसे ट्रक समझ लिया।
क़सम से जब-जब और जिस-जिस ने जोर से दरवाज़ा बंद किया हमें लगा जैसे किसी ने जोर से हमारे कोमल गाल पर तमाचा जड़ दिया। कलेजा खींच कर बाहर निकाल लिया हो। जब हमारा यह हाल है तो न जाने कार के दिल पर क्या बीतती होगी।
कार का दरवाज़ा जोर से बंद करने वालों की फ़ेहरिस्त में सबसे आगे हमारी मेमसाब रही हैं। उसके बाद दूसरों की मेमसाहबों का ज़िक्र होता है। एक बार तो शीशा ही टूट गया। अभी कुछ दिन पहले की ही तो बात है यह। पूरे ढाई हज़ार का चूना लगा। चूंकि विक्रेता जान-पहचान का था अन्यथा ज्यादा जेब ढीली होती।  ज्ञानी-ध्यानियों ने यों ज़ोर से दरवाज़ा बंद करने का मतलब यही निकाला है कि जनानी गुस्से  में है।
बेदर्दी से दरवाज़ा बंद करने वालों को हमने कई बार सख़्ती से टोका भी है, लेकिन अगला खीं खीं कर हंस दिया - यार, बड़ा मज़ाकिया है तू भी।
इसीलिए हमारी कोशिश रही है कि कार रोकते ही हम फुदक कर सबसे पहले बाहर निकलते हैं और फिर झटपट दूसरे के लिए कार का दरवाज़ा खोलते हैं। हमारी इस अदा पर लोग ख़ुद को गौरवांवित महसूस करते हैं। इस सिलसिले में हमें यह भी मालूम है कि कार का यों दरवाज़ा खोलने का मतलब यह होता है कि पत्नी नयी है या फिर कार।
बहरहाल, ये बड़ी पृष्ठभूमि हमने एक छोटी सी ख़बर सुनाने के लिए तैयार की है।
ख़बर यह है कि स्विट्ज़रलैंड में कार का दरवाज़ा ज़ोर से बंद करना ठीक नहीं माना जाता। वहां की सरकार ने भी इसे ग़ैरक़ानूनी घोषित कर रखा है।

Tuesday, December 15, 2015

मेरा नाम जोकर की ट्रेजेडी।

-वीर विनोद छाबड़ा
‘मेरा नाम जोकर’ राजकपूर का ड्रीम प्रोजेक्ट, बड़ा बजट, विशाल कैनवास। उस ज़माने की सबसे महंगी फिल्म। राजकपूर द्वारा ज़िंदगी में देखे तमाम सपने और कामयाबियों-नाकामियां के दस्तावेज़ इस फिल्म का हिस्से थे। ज़िंदगी भर की कमाई लगा दी इसे शाहकार बनाने में।

राजकपूर ‘मेरा नाम जोकर’को दुनिया का इतना बड़ा शो बनाने पर तुले थे कि आने वाले वक़्त में कोई बराबरी न कर सके। धरती पर यह आखिरी बड़ा शो हो। पूरे छह साल लग गए इस ड्रीम को पूरा करने में। राजसाब ने चैन की सांस ली।
मगर जब प्रिव्यू देखा तो कुछ बैचेन हो गए। बार-बार देखा। बात बनती नहीं दिखी। दोस्तों-हमदर्दा को दिखाया। सबने खूब सराहा। राजसाब को तसल्ली हुई। ख्याल आया कि दुनिया के करने से पहले किसी वर्ल्ड क्लास हस्ती से मोहर लगवाई जाये। कई नाम उनके ज़हन में आये। आख़िरकार एक जगह निगाह रुकी। इनकी स्टाईल और सोच के बेहद क़ायल थे राजसाब। मन ही मन उनसे प्रतिस्पर्धा की चाहत भी रखते थे। वो थे - सत्यजीत रे। क्लासिक फिल्में बनाने में माहिर और वर्ल्ड सिनेमा में आईकॉन।
राजसाब ने सत्यजीत रे को न्यौता भेजा। रे साहब बंबई तशरीफ़ लाये। रेड कारपेट वेल्कम हुआ। राजसाब के चेहरे की चमक बता रही थी कि रे साहब वर्ल्ड क्लास फिल्में सिर्फ आप ही नहीं हम बालीबुड वाले भी बना सकते हैं। हम किसी चौधरी से कम नहीं। 
सत्यजीत रे जानते थे कि राजकपूर इससे पहले ‘बूट पालिश’, ‘आवारा’, ‘जागते रहा’े और ‘जिस देश में गंगा बहती है’ जैसी क्लासिक फिल्में बना चुके हैं। वो उनके मुरीद थे।  मगर ‘मेरा नाम जोकर’ इन सबसे कई कदम वाला क्लासिक होने जा रहा था। रे साहब देख लें एक बार। राजसाहब को पूरा इत्मीनान था कि रे साहब इस पर मोहर लगा देंगे।
एक स्पेशल शो हुआ। रे साहब ने बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ फिल्म देखी। इस बीच राजसाहब की नज़रें बराबर रे साहब के चेहरे पर उतरते-चढ़ते भावों को पढ़ने की कोशिश में लगी रहीं।
फिल्म खत्म हुई। सबकी नज़रें रे साहब की ओर उठ गयीं। रे साहब बहुत गंभीर थे। बोले - राज आपकी फिल्म तीन पार्ट में है। पहला पार्ट बेहद अच्छा है, वर्ल्ड  क्लास। इसे पहले रिलीज़ कर दें। दूसरा पार्ट बढ़िया इंटरटेनमेंट है। तीन महीने बाद रिलीज़ करो। सुपर हिट होगा। और तीसरा पार्ट स्क्रैप कर दो। 

Monday, December 14, 2015

विभाग को उल्लूओं की ज़रूरत है।

-वीर विनोद छाबड़ा
लीला बाबू रिटायर हो रहे हैं। मातहत पुलकित हैं कि एक निठल्ले और तुगलकी अफसर से पिंड छूट रहा है। विदाई की इस सुखद बेला को यादगार बनाने के लिये वृहद राजसी प्रबंध किये हैं। एक-दूसरे की टांग-खिंचाई में वक़्त बरबाद करने में चतुर तमाम अधिकारी-कर्मचारी विभाग के इतिहास में पहली मर्तबा एकजुट हैं। बिना काम किये शान से अड़तीस साल काटने वाले इस अद्भुत पुरूष की अंतिम झलक हेतु सेल्फियां की होड़ है।

रस्म के मुताबिक तमाम वक्ताओं ने लीला बाबू को हरदिल अज़ीज़ बताया। उनकी शान में भांति-भांति के कसीदे पढ़े गये। एक ने उन्हें क़ायदे-कानून का सर्वकालीन ज्ञाता बताया। दूसरा एक क़दम आगे बढ़ कर इनसाईक्लोपीडिया बता गया। तीसरे की वो इंसानियत की जिंदा मिसाल लगे। चौथे की दृष्टि में फाईलों पर अंकित उनकी टिप्पणियों में प्रयुक्त शब्द आने वाली नस्लों के लिये नज़़ीर होंगे। पांचवे का गला भर आया - एक विकराल शून्य उत्पन्न हुआ है। इसे भरने के लिये स्वंय लीला बाबू को ही पुनर्जन्म लेना पड़ेगा।
ये फर्ज़ीनामा सुन कर सबका हंसी के मारे बुरा हाल है। कईयों के पेट दुखने लगे।
समारोह के अंत में आशीष वचन हेतु संबोधन में विभाग के मुखिया जी बड़े भावुक हो गए - हमें तो लीला बाबू के बारे में ऐसी-वैसी रिपोर्ट मिली थी। लेकिन आप लोगों का लीला बाबू के प्रति अपार स्नेह देखकर और उनके गुणों की गाथा सुनकर हम हतप्रद हूं साथ में गदगद भी। अतः उनकी अमूल्य सेवाओं का लाभ उठाने के दृष्टिगत सरकार उन्हें एक साल का सेवाविस्तार देने का फैसला करती है।
ऐसी घोषणाओं पर आमतौर पर अति प्रसन्न होकर गगनभेदी करतल ध्वनि होती है। परंत यहां हरेक को सांप सूंघ गया। चहुं ओर सन्नाटा खिंच गया। गहरी नीरवता व्याप्त हो गयी। कुछेक पछाड़ खाकर मूर्छित होते-होते बचे। बंदे के बगल में खड़े निर्बल हृदय कर्मठ बाबू तो लकवाग्रस्त हो जाते यदि उन्होंने ससमय जानबचाऊ गोली जीभ के नीचे न रख ली होती।
निकम्मे व चापलूस अफसर से छुट्टी पाने की खुशी में मनाया जा रहा जश्न मातम में तब्दील हो जाता यदि मौके की नज़ाकत को भांपकर समझदार आयोजक ने स्थिति न संभाली होती-  अब यह जश्न लीला जी की विदाई का नहीं है अपितु उनके सेवा विस्तार की खुशी में है। इसका सारा खर्चा लीला बाबू वहन करेंगे।

Sunday, December 13, 2015

कुंवारा जीवन सबसे मस्त जीवन था।

- वीर विनोद छाबड़ा
हम जब भी किसी अपने का कुंवारापन समाप्त होते सुनते या देखते हैं, हमें अपने कुंवारे जीवन के अच्छे और ख़राब दिन याद आते हैं। हम  बहुत पुलकित महसूस करते हैं। याद आता है कि कैसे अनेक लोग हमें ललचाई आंखोंं से देखा करते थे। हमने भी टैग लगा रखा था - बिलकुल मुफ़्त।
 
यों हम थे भी सस्ते मद्दे। साढ़े पांच सौ होम कैरिंग सैलरी। वैसे सत्तर के दशक में ठीक-ठाक रक़म थी। कई लोगों की सोच थी बिजली बोर्ड में नौकरी है। 'नीचे' की कमाई अच्छी होगी। परंतु हमने हमने क्लियर कर रखा था,  न ऐसा है और न ही होगा। हमारी टेबल के सामने पटरा लगा है। पूरी तरह से बंद है। बस एक ही फ़ायदा है कि हेडक्वार्टर पर भर्ती हुए हैं और ताउम्र यहीं रहना है। नो ट्रांसफर फ्रॉम लखनऊ। कई लोग बाक़ायदा जांच-पड़ताल भी कर गये। लड़के की कुछ 'कमाई' तो है नहीं। पगार के अलावा लेख-कहानी लिखने से कितनी कमाई होती है भला? एक और माईनस पॉइंट भी था कि आंखों पर मोटे लैंस वाला काले फ्रेम का चश्मा। एक साहब की आंखों में हमने पढ़ लिया - आगे चल कर अंधा हो जाएगा।
हमने भी आंखों आंखों में जवाब दिया - अच्छा ही तो है। कटोरा लेकर किसी मंदिर के गेट पर बैठ जाएंगे। ऑफिस जाते हुए एक घंटा भर सुबह और लौटते हुए दो घंटा शाम। भिखारी भी तो इंसान ही है। पार्ट टाईम जॉब।
बहरहाल वो दौर ऐसा था कि पसंद मां-बाप को करनी थी। हमें सिर्फ़ हां कहने की औपचारिकता पूरी करनी थी। एक बार ऐसा हुआ कि इससे पहले कि हम 'हां' बोलते लड़की ने ही हमें रिजेक्ट कर दिया। उसे हम जैसा बंदर नहीं, कोई भोंदू सूरत वाला पसंद था। लेकिन हम अवसाद में नहीं गए। लड़की की हमने तारीफ़ की। हां या न का हक़ उसका भी बनता है।
लेकिन यह दौर होता बड़ा प्यारा है, जब आप सबसे अधिक मांग वाले व्यक्ति होते हैं। तमाम कमियों के बावजूद सर आंखों पर बैठाने वालों की कमी नहीं होती। मगर दुनिया चिर कुंवारा नहीं रहने देती।