Wednesday, March 29, 2017

हिट गीत-संगीत का पर्याय थे जॉय मुख़र्जी

- वीर विनोद छाबड़ा
Joy Mukherjee
कुछ सितारों को हम उनकी अदाकारी के लिए नहीं, चेहरों के लिए याद करते हैं और वो भी तब जब उन पर फिल्माया कोई गाना सुनाई देता है। जॉय मुख़र्जी ऐसे सितारों की सूची में टॉप पर है। वो सुप्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक शशधर मुख़र्जी के बेटे थे। अशोक कुमार, किशोर और अनूप कुमार उनके मामा थे। यानी फ़िल्म जॉय के खून में थी। मगर वो निर्माण में रूचि रखते थे। पैसों की कमी से जूझ रहे शशधर उन दिनों कम बजट की 'लव इन शिमला' की रूप-रेखा तैयार कर चुके थे। नायिका के लिए साधना और बाकी तमाम आर्टिस्ट साईन हो चुके थे। बस हीरो बाकी था। लेखक आग़ा जानी कश्मीरी संग माथापच्ची चल रही थी कि उधर से जॉय गुज़रे। ऊंचा कद और हैंडसम चेहरा। आग़ा ने कहा - हीरो तो आपके घर में ही है।
और इस तरह जॉय हीरो बन गए हीरो। १९३८ की हिट हॉलीवुड फिल्म 'जेन स्टेप्स आउट' पर आधरित 'लव इन शिमला' (१९६०) खूब चली थी। इस म्यूज़िकल फिल्म में कुल ११ गाने थे और सब हिट। दिल थाम चले हम आज किधर...गाल गुलाबी किसके हैं...दर पे आये हैं तेरे... आज भी यदा-कदा सुनाई देते हैं। जॉय-साधना की जोड़ी एक बार फिर 'एक मुसाफिर एक हसीना' में रिपीट हुई। यह भी गानों के कारण चली। बड़ा शुक्रिया बड़ी मेहरबानी...आप यूं हमसे मिलते रहे...मैं प्यार का राही हूं...आज भी खूब सुनाई देते हैं और जॉय के मुस्कुराते चेहरे और चमकती आंखों की याद दिलाते हैं। जॉय का एक्टिंग सफ़र महज़ २५ साल का रहा। इस दौरान उन्होंने ३३ फ़िल्में कीं जिनमें १९ फ़िल्में हिट हुईं और इनमें भी वो १८ में सोलो हीरो रहे।
Joy with Sadhana
उनकी फिल्मों का गीत-संगीत इतना हिट होता था कि उन्हें भारत का एल्विस प्रेसली कहा जाता था। कंधे पर टंगे गिटार वाली उनकी तस्वीर उन दिनों उनकी पहचान थी। आशा पारेख के साथ उनकी तीन म्यूज़िकल हिट आयीं - फिर वही दिल लाया हूं, ज़िद्दी और लव इन टोकियो। बंदापरवर थाम लो ज़िगर...आंखों से जो उतरी है दिल में...लाखों हैं निगाह में...आजा रे आ ज़रा आ...
मज़े की बात है कि १९६७ में जब जॉय का जब बतौर हीरो टा-टा कर रहे थे तो उसी समय राजेश खन्ना का आशा पारेख के साथ कैरियर उदय हो रहा था। जॉय ने उन्हें बधाई दी थी - दोस्त, कभी परेशानी में हो हमें याद करना। कुछ साल बाद, १९७७ में राजेश खन्ना की नैया भंवर में थी। तब जॉय मुख़र्जी ने उन्हें सस्पेंस थ्रिलर 'छैला बाबू' देकर डूबने से बचा लिया। यह एक सरप्राईज़ सुपर हिट थी। राजेश की नैया फिर चल पड़ी थी। तब राजेश ने जॉय से वादा किया था कि वो इस अहसान का बदला ज़रूर चुकाएंगे। १९८५ में 'इंसाफ मैं करूंगा' में राजेश ने विलेन के लिए जॉय का नाम सुझाया था। यह फिल्म हिट हुई और साथ में जॉय का किरदार भी। संयोग से जॉय की एक्टिंग के सफर यहीं ख़त्म हो गया। और इसके साथ ही फिल्म इतिहास में उनकी गिनती उन एक्टर्स में दर्ज हो गयी जिनकी पहली और आखिरी फिल्म हिट थीं।

Tuesday, March 28, 2017

तलाक़ का ग्राउंड

- वीर विनोद छाबड़ा
यों भी जब किसी महिला की कोर्ट में पेशी होनी हो तो भीड़ लग जाती है। और फिर उस दिन तो महिला भी खूबसूरत थी और मुद्दा था तलाक़। झलक पाने के लिए कई उम्रदराज़ विधुर और तलाकशुदा उम्मीदवार भी मंडराने लगे। केस कई महीनों से चल रहा था। महिला की शिक़ायत थी कि वक़ील साहब फ़ैसला ही नहीं होने देना चाहते। जज साहब ने सीधे महिला से जिरह करने का फैसला किया।
दिलचस्प मंज़र।
जज साहब ने चश्मे के पीछे से महिला को भरपूर नज़रों से निहारा - हां, तो मोहतरमा, यह बताएं कि तलाक़ की ग्राउंड क्या है?
महिला ने फुर्ती से जवाब दिया - जनाब, दो एकड़ में फैला एक आलिशान बंगला और...
जज साहब ने मुस्कुराते हुए बात काटी - आप समझीं नहीं। ग्राउंड से मेरी मुराद यह है कि ज़मीन क्या है?
महिला - वही तो मैं अर्ज़ कर रही थी कि आपने टोक दिया। हां, तो मैं बता रही थी कि दो एकड़ ज़मीन पर आलिशान बंगला और साथ में आम और अमरूद का बगीचा भी है।
जज साहब समझ गए किसी बेवकूफ़ पाला पड़ा है। आधा दिमाग रोज़ घरवाली खाली करती ही है। आज बाकी दिमाग यहां पहले ही केस में हो जाना है। उन्होंने महिला को समझाने की कोशिश की - देखिये, मैं जो पूछ रहा हूं, उसे ध्यान से सुनिए और समझने की कोशिश करें। ज़मीन से मेरी मुराद है कि आधार क्या है? यानि नींव क्या है?
महिला ने सर हिलाया - अच्छा, अच्छा। अब मैं समझी। आधार, मतलब नींव। नींव तो बहुत गहरी है, पक्की कंक्रीट की बनी है। चिंता की कोई ज़रूरत नहीं। इस पर चार-पांच मंज़िल तो आराम से खड़ी हो सकती हैं।
जज साहब बुरी तरह झल्ला गए - मोहतरमा, मैं जो मैं आपसे पूछ रहा हूं उसका सीधा-सीधा जवाब दीजिये... हां, तो बताईये, आप तलाक़ क्यों लेना चाहती हैं?

Monday, March 27, 2017

चश्मा ही ज़िंदगी है

-वीर विनोद छाबड़ा
बात जब चश्मे की उठती है तो हम पिछली सदी के साठ की शुरूआत में पहुंच जाते हैं। चश्मा तब बहुधा सठियाये लोग ही लगाते थे। लेकिन हमने तो रिकॉर्ड ही तोड़ दिया। ग्यारह साल की उम्र में ही हमने साठ वालों की बराबरी कर ली। हमने आईना देखा। एक धीर-गंभीर और बुद्धिजीवी आकृति के दर्शन हुए। ज़रूर बड़ा होके बड़ा नाम करेगा। लेकिन ज़माना तो कुछ और ही सोच रहा था। हाय, हाय! इत्ती सी उम्र और चश्मा लग गया। साठ तक पहुंचते तो अंधा हो जाएगा। सलाहें मिलने लगीं। हरी सब्जियां खिला इसे। और रोज़ाना करेले-लौकी का जूस भी। मां हमें डॉक्टर बनाने का सपना देखती थी। एक दूर के मामा ने रूलिंग दे दी कि जिस्म में इतनी महीन महीन नाड़ियां होती हैं। इसे तो दिखाई ही नहीं देगीं। ऑपरेशन गलत कर देगा यह तो। कईयों की जान चली जायेगी। बाबू बना इसे। बेचारी मां ने दिल के अरमां आसूओं में बहा दिए।  
बहरहाल, जैसे ही हमने चश्मा लगाया, एक नई दुनिया दिखी। एक अरसे से ब्लैक बोर्ड पर धुंधली दिखती इबारत साफ-साफ दिखने लगी।
बड़े होकर अपने इस अनुभव पर हमने एक कहानी भी लिखी थी। एक ज़हीन बच्चे को इसलिए कम नंबर मिले क्योंकि उसे ब्लैक बोर्ड पर साफ़-साफ़ दिखाना बंद हो गया। बच्चे ने डर के कारण मां-बाप को बताया नहीं। लेकिन शिक्षक ने यह बारीकी पकड़ ली। उसके मां-बाप को से बात की। वे विलाप करने लगे। हाय! बेटा इतनी छोटी सी उम्र में चश्मुद्दीन कहलायेगा। लेकिन शिक्षक ने उन्हें मना लिया। बच्चे को चश्मा लगा। और वो फिर से फर्स्ट आने लगा।

लेकिन कहानी का असलियत से क्या लेना-देना? हमें याद है जब हमने कम उम्र में चश्मा लगाया था तो माता-पिता को कोई उलझन नहीं हुई। हां समाज और स्कूल में ज़रूर हाहाकार मच गया। अक्सर कमेंट्स सुनने को मिलते - अरे ओ, चश्मुद्दीन। सबसे ख़राब तब लगा जब एक शिक्षक ने हमें चश्मुद्दीन कहा। एक दिन शिक्षक ने एक गलती पर हमें कंटाप रसीद दिया। चश्मा टूट गया। लेकिन मैथ वाले शिक्षक पहले चश्मा उतरवाते थे और फिर पिटाई। दरअसल वो खुद भी चश्माधारी थे।
हम क्रिकेट और कबड्डी खेलने के बहुत शौक़ीन हुआ करता था। लिहाज़ा, आये दिन चश्मे टूटा करते थे। खूब पड़ा करती थी। कितनी बार चश्मा बनेगा तेरा। घर में टकसाल तो खुली नहीं है। नतीजा, एक दिन क्रिकेट-कबड्डी खेलने पर प्रतिबंध लग गया।
समय गुज़रता गया। जैसे-तैसे हम यूनिवर्सिटी पहुंच गए। तब तक हमारे चश्मे का शीशा बहुत मोटा हो चुका था और फ्रेम चौड़ा, जिसमें से हमारी सुनहरी आंखें बहुत मोटी-मोटी दिखती थीं। चश्मा उतार लें तो हमें लड़की और लड़के में फर्क नज़र नहीं आता था, जब तक कि आवाज़ न सुनें। उन्हीं दिनों एक लड़की से हमारी अच्छी मित्रता हो गयी। एक दिन हमने सुना कि उस लड़की से उसकी सहेली पूछ रही थी - क्यों री, आज तेरा चश्मुद्दीन नहीं दिखा। यूनिवर्सिटी छूटी और वो लड़की भी कहीं गुम हो गयी। माईनस तेरह डिग्री के लैंस वाला तो कुछ साल बाद अंधा हो सकता है।

Sunday, March 26, 2017

डैमेज कंट्रोल

- वीर विनोद छाबड़ा
दूर एक समृद्ध देश है। उसका राजा बहुत प्रतापी है। आदर्श पुरुष भी है। उसकी पत्नी अप्सरा समान है और  दो प्यारे बच्चे हंस समान। राजा शुचिता की मिसाल हैं। उनके नाम की पूजा भी होती है।

राजा के कुछ विरोधी भी हैं। उसके विरुद्ध रोज़ नए खुलासे करते हैं। लेकिन पब्लिक ठहरी अंधभक्त। आरोप मुंह के बल खड्ड में गिरते हैं।
एक दिन बहुत बड़ा धमाका हुआ। एक स्त्री ने दावा किया कि वो राजा की पत्नी है। कहती है यकीन न हो तो डीएनए करा लो।
राज्य के कानून के अनुसार अगर पहली पत्नी ज़िंदा है तो दूसरी शादी नहीं हो सकती और अगर हुई है तो अवैध है।
इस बार मामला गंभीर है। एक नहीं दर्जन भर सबूत हैं।
देश की जनता ऐसे मामलों के प्रति बहुत ही संवेदनशील है। उनकी नज़र में स्त्री देवी समान है। उसके प्रति अन्याय बर्दास्त नहीं करती। देश के कोने कोने से प्रजा सड़कों पर उतर आई। सफ़ाई दो सफ़ाई दो, वरना कुर्सी छोड़ दो।
इधर राजा की छवि खंडित होने की कगार पर आ गई। राजा को तो काटो खून नहीं। यह हिडंबा कहां से आ गयी? राजा को याद है कि बहुत मोटी रक़म की एवज़ में यह तो लंदन में जाकर बस गई थी।
गुप्तचरों ने रिपोर्ट दी कि धनलोलुपता के कारण वापस आई है।
राजा को चैन मिला। पैसे की ख़ातिर वापस आई है तो पैसे लेकर चली भी जायेगी। और सचमुच वो मान भी गई।
परंतु सवाल उठा कि पब्लिक के बीच उठी शंका का निवारण कैसे हो। विरोधियों का मुंह बंद कैसे होगा? सबूतों का क्या होगा?
राजा ने अपने चाणक्य को याद किया। वो डैमेज कंट्रोल और मीडिया मैनेज करने में जुट गए।
सुरसा एक पतिव्रता स्त्री है। हिडंबा बहन को बचपन में सपना आया था कि उसका पति मुल्क का राजा होगा, मगर शर्त यह होगी कि पति से दूर रहना होगा।
सुरसा की शादी हुई। लेकिन विवाह की पहली ही रात सुरसा को सपने की याद आई। उसने पति को यह बात बतायी। पति के लाख समझाने के बावजूद उसने पति को त्याजने का कठिन प्रण लिया। अपने तन की परछाईं भी पति पर नहीं पड़ने देगी। घर-संसार छोड़ दिया। सन्यासिनी बन कर तब से वो पूरे संसार में नगरी नगरी द्वारे द्वारे भटक रही है ताकि पति राजा बन जाए।
अब सुरसा बहन का सपना पूरा हो चुका है। वो बस अपने राजा बने पति की झलक देखने आई थी। काम पूरा हुआ और वो अंतर्ध्यान हो गई। देश का मीडिया सुबह-शाम यही अलाप रहा है। धर्मभीरू प्रजा ने सुरसा माता की जय की और प्रण किया कि सुरसा माता के मंदिर बनाये जायें।
विपक्ष की आवाज़ इन गगनभेदी जयकारों के बीच जैसे नक्कारखाने में तूती साबित हुई। वे तिलमिला कर रह गए।
---
25-03-2017 mob 7505663626
D-2290 Indira Nagar
Lucknow - 226016

Saturday, March 25, 2017

शक्ति सामंत ने बदल दिया था 'आराधना' का सेकंड हाफ

- वीर विनोद छाबड़ा 
सिर्फ परदे पर ही नहीं असल में भी वो होता है जिसकी हसीन से हसीन सपने में भी कल्पना नहीं की गयी होती। 'आराधना' फिल्म के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था। शम्मी कपूर के साथ शक्ति सामंत 'जाने-अंजाने' बना रहे थे। फिल्म आधी से ज्यादा शूट हो चुकी थी कि बेसमय शम्मी की पत्नी गीताबाली चल बसीं। शम्मी की ज़िंदगी में अंधेरा छा गया। शक्ति जिगरी दोस्त थे शम्मी के। उन्होंने वादा किया शम्मी से कि मैं तेरे साथ हूं। तू मना ले ग़म, जितना चाहे। 'जाने अंजाने' की शूट के लिए जब दिल करे, तब आना।
शक्ति ने कह तो दिया। लेकिन बाद में सोचा कि ऐसा कब तक चलेगा? वितरकों का, फाइनेंसरों का, खुद का और बाज़ार का ढेर पैसा लगा हुआ है। कैसे चुकता होगा? हफ्ता गुज़रा और फिर महीना। शक्ति दा परेशां हो उठे। सोचा एक सस्ती सी क्विकी बना डालूं। कुछ पैसा आ जाएगा। कुछ उधार चुकता होगा। सचिन भौमिक ने कहानी दी, महिला प्रधान। जवानी से बुढ़ापे तक का सफ़र। और इस तरह अस्तित्व में आयी - आराधना। बात की अपर्णा सेन से। लेकिन वो तैयार नहीं हुईं कि इस भरी जवानी में कोई हीरो उसे मां कहे।
अगला दरवाज़ा शर्मीला टैगोर का था। वो 'सावन की घटा' उनके साथ कर चुकी थीं। शर्मीला भी हिचकिचाई। लेकिन शक्ति दा ने मना ही लिया। लाईफ टाईम रोल है। दो-दो हीरो हैं। रोमांस है, ट्रेजेडी है, करुणा है, ममता है, विछोह है, मर्डर, जेल यात्रा, रिहाई और फिर नाटकीय मिलन। परदे पर भी तालियां और हाल में ऑडियंस की। फर्स्ट हाफ में तो ग्लैमर ही ग्लैमर है। शर्मीला ने पूछा हीरो कौन है? शक्ति दा ने राजेश खन्ना का नाम बताया। नया है। पिछली तीन फ़िल्में फ्लॉप हो चुकी हैं, लेकिन टैलेंटेड है। सेकंड हाफ के लिए भी हीरो जल्दी मिल जाएगा।
Rajesh Khanna & Shakti Samant
'आराधना' का पेपर वर्क पूरा हुआ। शक्ति दा जानते थे कि वो कोई महान फिल्म नहीं बनाने जा रहे हैं। तीन-चार महीने में ऐसा होता ही कहां है? शूटिंग शुरू होने को ही थी कि शक्ति दा को उनके मित्र निर्माता सुरिंदर कपूर ने 'एक श्रीमान एक श्रीमती' की अंतिम दो रीलें दिखाते हुए राय मांगी। शक्ति दा के तो होश उड़ गए। इसका और 'आराधना' का क्लाइमैक्स तो सेम टू सेम है और दोनों के एक ही लेखक - सचिन भौमिक। उन्होंने शक्ति दा को समझाने की बहुत कोशिश की -  क्लाइमैक्स दिखता ज़रूर एक है, लेकिन वास्तव में है नहीं।
शक्ति दा बहदवास हो गए। आराधना कैंसिल। तभी लेखक मधुसूदन कालेलकर और गुलशन नंदा आ गए। गुलशन की कहानी पर ही शक्ति दा ने 'सावन की घटा' बनाई थी। शक्ति दा ने पूछा, कोई कहानी है? मुझे फ़ौरन फिल्म शुरू करनी है। नंदा ने कहा, हां है - कटी पतंग। लेकिन आप इतने परेशां और उतावले क्यों हैं? तब शक्ति दा ने अपनी व्यथा बताई। नंदा और कालेलकर ने कहा, पहले 'आराधना' की कहानी सुनाओ। उन दोनों ने आपस में बात की और शक्ति दा से कहा कि कटी पतंग बाद में, पहले आराधना।

Friday, March 24, 2017

परमानेंट तौबा कर ली है नॉन-वेज से

- वीर विनोद छाबड़ा
कभी हम मीट बड़े शौक से खाते थे। कहीं पार्टी-शॉर्टी में जाते थे तो नॉन-वेज सूँघा करते थे। कभी कभी किसी दोस्त की पत्नी मायके गयी होती थी तो उसके घर हम दोस्त मिल कर नॉन-वेज बना कर दावत उड़ाते थे। लेकिन ऐसा भी नहीं मीट खाने के लिए मरे जा रहे हों। अक्सर होता था कि महीनों गुज़र जाते और नॉन-वेज के दर्शन नहीं हुआ करते थे।

लेकिन एक बार एकाएक वितृष्णा हो गयी। तब हम सातवें या आठवें में पढ़ा करते थे। हुआ यह कि हम मीट लेने गए। भाई ने कहा - बकरा कट रहा है। थोड़ा इंतज़ार कर लो।
संयोग से हमारी नज़र पड़ गयी, जहां बकरा कट रहा था। देखा न गया। बिना लिए ही लौट आये। थैला भी वहीं छूट गया। इसके लिए मां ने खूब डांटा। तब कई साल तक नहीं खाया। लेकिन बचपन की याद जैसे ही धूमिल पड़ी, हमने फिर शुरू कर दिया। लेकिन कटते बकरे या मुर्गे को देखने की हिम्मत तब भी नहीं जुटा पाए। 
सत्तर का दशक था। हज़रतगंज में एक चाइनीज़ रेस्तरां में नॉनवेज मिक्स्ड चाऊमीन उड़ा रहे थे। तभी एक मित्र पधारे। हमारी प्लेट पर नज़र डाली - ओह हो, तो चाउमिन के साथ पोर्क भी उड़ाया जा रहा है।
हमने कहा - नहीं, नहीं यह मिक्स्ड है।
उसने हमारी प्लेट में से एक टुकड़ा उठाया - अबे लल्लू, ये चीनी रेस्तरां वाले मिक्स के नाम पर सब डाल देते हैं।
हम उसी वक़्त प्लेट छोड़ उठ खड़े हुए। दोबारा वहां नहीं गए। बल्कि किसी भी चीनी रेस्तरां में नहीं झांका। 
एक बार एक मित्र की शादी में गए, लखीमपुर-खीरी। वहां नॉन वेज के अलावा कुछ था ही नहीं। कबाब, चिकन, मटन, बिरयानी आदि की नाना प्रकार की किस्में। हम कई दोस्त थे। सबके सब मांसभक्षी। हमारे मेज़बान मित्र ने हमें ताक़ीद कर दी - पीयो, खूब पीयो। खाओ, खूब खाओ, पेट भर कर। लेकिन कबाब न छूना। हम समझ गए। हमारा मन खट्टा हो गया। मुर्गा-मट्टन भी खाने खाने को मन नहीं हुआ। वेज के नाम पर रायता और शाही टुकड़ा। उसी से पेट भर लिया।
वो दिन है और आज का दिन, तैंतीस साल गुज़र चुके हैं। हमने कबाब की तरफ़ देखा तक नहीं। वेज कबाब तक को देख कर शक़ होता है। 

Thursday, March 23, 2017

परमानेंट टेढ़े-मेढ़े होने का डर

- वीर विनोद छाबड़ा 
बरसों पहले की बात है। 

एक मित्र बड़े गदगद दिखे। यों हमें ख़ुशगवार चेहरे अच्छे भी लगते हैं। हमने जानना चाहा -  मित्र, माज़रा क्या है? 
वो बोले - आज मैं खुद पर फ़ख्र महसूस कर रहा हूं। मैंने...योगी बाबा का हफ्ते भर का कोर्स ज्वाइन कर लिया है। पूरे बीस हज़ार जमा करके आ रहा हूं अभी-अभी। उन्होंने वादा किया है कि जो भी यह कोर्स करेगा एक हफ़्ते में दुनिया भर का प्रेम, संतोष, ऐश्वर्य और समृद्धि का मालिक हो जायेगा। हफ्ते भर बाद फ़र्क देखिएगा मुझमें। 
हमने कहा - विजई भवः।  
हफ़्ता गुज़र गया। मित्र नहीं दिखे। एक हफ़्ता और गुज़र गया। मित्र नहीं दिखे। फ़ोन-मोबाईल सब बंद मिले। हमें फ़िक्र हुई। सूत्रों के हवाले से खबर मिली कि भाई की तबियत नासाज़ है। खुद को कमरे में बंद कर लिया है। किसी से मिलते ही नहीं हैं। 
हम फ़ौरन उनके दौलतखाने पहुंचे। बड़ी मशक्क़त करनी पड़ी। तब जाकर उनकी मेमसाब ने दरवाज़ा खोला। हमने देखा कि मित्र की कमर टेढ़ी हो गई है और हाथ - पैर ट्विस्ट हुए पड़े हैं। बदन दर्द का हाल ज़ुबां से बाहर नहीं निकल पा रहा था। जिस्म के गोशे-गोशे से उठता दर्द उनकी शक्ल पर इस कदर हावी था कि उन्हें बताने की ज़रूरत ही नहीं थी। न जाने कौन सा आसन लगवा दिया गया उन्हें? 
लेकिन हमें हैरत हुई कि यह सब हुआ कैसे? हमारी चिंता का जवाब उनकी मेमसाब ने दिया -  मना किया था कि ढोंगी योगियों के चक्कर में मत पड़ा करो। क्या अच्छा और क्या बुरा, सभी को मालूम है। जाने क्या दिखा इनको उस ...योगी में। प्रेतगुरू हैं सबके सब। इन्हें ऐसे-ऐसे आसन बता दिए कि जान ही निकल गयी। मजबूर होकर फिज़ियोथैरेपिस्ट की शरण में जाना पड़ा। 
बहरहाल, महीना भर लग गया उन्हें दुरुस्त होने में। उन्होंने कान पकड़े कि आयंदा से वो किसी बाबा या योगी या महाराज के चक्कर में नहीं पड़ेंगे। 
पांच-छह बरस और गुज़र गए। 

Wednesday, March 22, 2017

बहन की भूमिका निभा कर ऊब गयी थीं नंदा

- वीर विनोद छाबड़ा
हिंदी फिल्मों की खूबसूरत नायिकाओं के इतिहास का जब ज़िक्र होता है तो नंदा की गिनती टॉप पांच में होती है। उनकी ज़िंदगी बहुत ट्रैजिक रही। पिता मास्टर विनायक मराठी फिल्मों के एक्टर थे। लेकिन महज़ ४१ साल की उम्र में वो परलोकवासी हो गए। तब वो महज आठ साल की थी। बेबी नंदा के नाम से काम करना शुरू किया। नंदा सहित छह भाई-बहन के परिवार की गाड़ी चल पड़ी। उनका भाई जयप्रकाश कर्नाटकी बाद में मराठी फिल्मों का हीरो बना। उसकी शादी मशहूर नर्तकी और अभिनेत्री जयश्री टी(तलपदे) के साथ हुई। 
मामा व्ही.शांताराम की 'तूफ़ान और दीया' से नंदा वयस्क बनी। यह अनाथ भाई-बहन की कथा थी। इससे नंदा को बहन की पहचान मिली। कई फिल्मों में भाभी, छोटी बहन और कभी बेटी, तो कभी बड़ी बहन बनी। देवानंद की 'कालापानी' में भी वो बहन थी। ऊब गयी थी वो बहन और बेटी के किरदारों से। उसे अपने लंबे कैरियर में मेरा कसूर क्या है, बेदाग, आदि ऐसी कई फ़िल्में भी करनी पड़ी, जिसमें रोते-धोते खुद को पतिव्रता साबित करना पड़ा।
नंदा जितनी खूबसूरत थी उतनी ही अच्छी एक्ट्रेस भी थी। उसके इस टैलेंट को देवानंद ने पहचाना। उनकी डबल रोल वाली 'हम दोनों' में वो साधना के साथ नायिका थी। 'तीन देवियां' में वो देव की पसंदीदा देवी थी। यहां से वो स्टार बन गयी। १९६० से १९७० तक वो पहले नूतन और फिर वहीदा के बाद दूसरी सबसे अधिक मेहनताना लेने वाली नायिका रही।
Nanda 
हालांकि ब्लैक एंड व्हाईट 'तीन देवियां' में नंदा का ग्लैमर दर्शक देख चुके थे लेकिन असली ग्लैमर के दर्शन हुए रंगीन 'जब जब फूल खिले' में। अपनी इस पहली रंगीन फिल्म में उनकी खूबसूरती और कशिश का जादू सर चढ़ कर ऐसा बोला कि सेना का एक उच्च अधिकारी दिल दे बैठा। उसने शादी का प्रस्ताव भेजा। लेकिन नंदा ने इस कारण से मना कर दिया कि अभी-अभी तो 'बहन' के खोल से बाहर आकर 'ग्लैमर गर्ल' की दुनिया में कदम रखा है।
यह शशि कपूर के साथ नंदा की पहली हिट फिल्म थी। इससे पूर्व मेहंदी लगे मेरे हाथ और चारदीवारी अच्छी होने के बावज़ूद फ्लॉप हो चुकी थीं। दोनों की केमेस्ट्री भी बेहतरीन थी। आगे नींद हमारी ख्वाब तुम्हारे, रूठा न करो और राजा साहब भी हिट हुईं। शशि के बड़े भाई राजकपूर की 'आशिक' में भी वो नायिका थी। राज उन्हें छोटी बहन मानते थे। बरसों बाद उनकी 'प्रेमरोग' में शम्मी कपूर के साथ वो दिखीं। हालांकि पत्नी वो कुलभूषण खरबंदा की थीं। उल्लेखनीय है कि इससे पहले नंदा ने शम्मी कपूर के साथ इसलिये फ़िल्में मना कर दी थीं कि उनकी उछल-फांद से उन्हें चोटिल होने का डर था।
नंदा को अगली पसंद थी उम्र में छोटे राजेश खन्ना। 'दि ट्रेन' में नंदा का नाम राजेंद्र कुमार ने सुझाया था। पहली फिल्म 'तूफ़ान और दीया' में राजेंद्र कुमार ही उनके नायक थे और फिर 'धूल का फूल' और गीत-रहित 'कानून' में भी उनकी केमेस्ट्री खूब जमी। इत्तेफ़ाक़ से गीत-रहित अगली फिल्म 'इत्तेफ़ाक़' में नंदा ही थी और हीरो राजेश खन्ना। दोनों ही फ़िल्मफ़ेयर के लिए नामांकित हुए थे। 'जोरू का गुलाम' उनकी तीसरी हिट फिल्म थी। नंदा के कैरियर की यह अंतिम फिल्मों में से थी। और हैरानी हुई कि वो बेहतरीन कॉमेडी भी कर लेती थीं।

Tuesday, March 21, 2017

पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए

-वीर विनोद छाबड़ा
Drinking is not good for health
कोई ४५ बरस पहले की बात है। हम अपने के मित्र के घर गए। देखा, वो खरगोश को बीयर पिलाने को कोशिश कर रहे थे।
हमने पूछा - ऐसा क्यों कर रह हो?
वो बोले - यार, ये बिल्ली से डरता है। बीयर पिला कर इसे मुकाबले के लिए तैयार कर रहा हूं।
वो दिन है और आज का।
हमने दुनिया में अनेक लुंज-पुंज सूटेड-बूटेड शख्सियतों को देखा है। महफ़िलों में बेआवाज़ आते हैं और एक कोने में कुर्सी खींच कर बैठ जाते हैं। रॉक पर एक पैग डलवाया। भुने मुर्गे की टांग मुंह में दबाई। और फिर दो घूंट हलक से नीचे उतरते हैं। अचानक जैसे आग लग गई हो। वो लुंज पुंज शख्सियतें जी उठती हैं। उनके पैरों में थिरकन आ जाती है। मुंह में बोलने वाली जुबान लग जाती है। और आखिर में होता यह है कि अक्सर ऐसे ही लोग महफ़िल लूट कर ले जाते हैं।
हम एक ऐसे साथी अधिकारी को जानते हैं जो बॉस के बुलाने पर अकेले जाने में घबराते थे। उनकी कोशिश रहती कि कोई साथ चले। फिर किसी ने 'घुट्टी' पीनी सीखा दी। दो पैग लगाये। मुंह में दो जोड़ा ३२ नंबर तंबाकू किमाम जर्दा सहित किनारे ठूंसा। पांच मिनट जुगाली की। फिर पिच से थूका। अलमारी के पीछे वाली पहले से रंगीन दीवार और भी रंगीन हो गयी। बॉस से अकेले ही लंबी-लंबी वार्ताएं करने लगे। यहां तक कि गलत बात पर भिड़ने भी लगे। उन्हें कई बार वार्निंग भी मिली। लेकिन बाज़ न आये। 
दरअसल ये नामुराद चीज़ ही ऐसी है कि असहज को मिनटों में सहज बना देती है।
इसके सहारे बड़ों-बड़ों को खुश करने वाले भी बहुत देखे हैं हमने। बिगड़े कामों को संवरते भी देखा है।
किसी को महल बनाते देखा है और किसी के महल गिरते हुए भी देखे हैं।
चिराग जलते ही शेर बने हुओं को सुबह को भीगी बिल्ली बने हुए भी देखा है।
दोस्ती बनते भी और टूटते भी देखी है। प्यार से गले मिलते और इसकी आड़ में छुरा घोंपते भी देखा है।
दो घूंट अंदर धकेल कर रात-रात भर भोंपू पर फ़िल्मी तर्ज पर इबादत करने वालों को भी देखा है।
ऊपर से मज़बूत दिखते मगर अंदर ही अंदर खोखले होकर मरते हुए भी देखा है।
हमने ऐसे भी देखे हैं जिन्हें कामयाबी का ऐसा नशा चढ़ा कि जश्न मना डाला। और कई टन बहा दी।

Monday, March 20, 2017

चाय बिना ज़िंदगी अधूरी

-वीर विनोद छाबड़ा
पंजाब के किसी आदमी को दावत पर बुलायें। एक से बढ़ कर एक बढ़िया परोसें। लेकिन अगर सरसों का साग, मक्के की रोटी और लस्सी नहीं है तो दावत बेकार है।  लेकिन हमारे लिए बिना चाय बढ़िया से बढ़िया पार्टी या प्रोग्राम निरर्थक है। उस दिन मित्र का ड्रामा देखते हुए सरदर्द शुरू हो गया। थिएटर की कैंटीन में चाय नहीं थी। हम ड्रामा बीच में ही छोड़ कर चले आये।
एक ज़माना था जब चाय से पहले सिगरेट और बाद में फिर एक सिगरेट। दिन में चार-पांच बार तो यह सिलसिला चलता ही था। अब सिगरेट तो छूट गयी, लेकिन चाय को अलविदा नहीं कहा। दिल ने कहा - जीने के लिए कुछ तो रखो यार। 
बचपन में मां सिर्फ सुबह और शाम आधा कप चाय देती थी। कहती थी गैस बनेगी, रंग काला पड़ जायेगा। चाय की लत तो हमें हाईस्कूल की परीक्षा से हुई। चाय देर रात तक पढ़ने के लिए जगाये रखती थी। पॉजिटिव एनर्जी भी मिलती थी। यूनिवर्सिटी पहुंचे तो आदत बन गयी। दिन में छह-सात चाय तो हो ही जाती थी।
छुट्टी के रोज़ बहुत बोरियत होती थी। चार दोस्त जमा हुए। चलो गुरमीत के घर एयरपोर्ट कॉलोनी। और कुछ गपशप भी हो जाएगी। साइकिल उठाई और चल दिए दस किलोमीटर दूर। उनकी माताश्री मसाले वाली चाय बनाती थीं। वाह मज़ा आ जाता था। हम लोग कहते थे - एक कप और मिलेगी? वो पूरे दिल से पिलाती भी थीं। कहती थीं - दो बार नहीं दस बार पियो। हम लोग शहर से इत्ती दूर बैठे हैं कि कोई आता ही नहीं यहां तो। तुम लोग आये हो तो ख़ुशी मिलती है।

यूनिवर्सिटी के दिनों में डिनर के बाद हम पांच मित्र कंबाइंड स्टडी के लिए एक मित्र के घर जमा होते थे। रात डेढ़-दो बज जाता था। विसर्जन से पूर्व अब्दुल्लाह टी स्टाल जाकर चाय ज़रूर सुड़कते थे। यह स्टाल हम जैसे निशाचरों के लिए ही रात भर चलता था। यों हम रेलवे स्टेशन के ठीक सामने कई साल तक रहे। चौबीस घंटे यहां चाय मिलती थी। नींद नहीं आई तो उठ कर चल दिए चाय सुड़कने। 
नौकरी के लिए परीक्षा देने हम सिर्फ एक चाय पीकर गए थे। परीक्षा शुरू होने में आधा घंटा शेष था। हमने एक ढाबे में कड़क चाय पी ली। पहली और सेकंड शिफ्ट में दो घंटे का गैप हुआ। उसी ढाबे पर बैठे-बैठे समोसे के साथ दो चाय पी लीं। दो दिन तक यह सिलसिला चला। पांच महीने के बाद चिठ्ठी आई कि उत्तीर्ण हो गए। इसका संपूर्ण श्रेय हम कड़क चाय को ही देते हैं। 
दफ़्तर में भी हमने विधिवत चाय पी भी और खूब पिलाई भी। 'ओवर ए कप ऑफ़ टी' हमने प्रशासन के हित में कई समस्याओं का निदान किया। हम भी खुश और कर्मचारी भी। 

Sunday, March 19, 2017

प्लेटफॉर्म टिकट प्लीज!

-वीर विनोद छाबड़ा
याद आते हैं वो दिन। लगभग २२ साल तक रहे लखनऊ के उत्तर रेलवे स्टेशन के सामने मल्टी स्टोरी बिल्डिंग में। इसमें उत्तर रेलवे के ही कर्मचारी रहते थे।
आइस-पाइस खेलते खेलते हम अक्सर स्टेशन पहुंच जाया करते थे। थोड़ी देर बाद खेलना भूल कर ए.एच.व्हीलर के बुकस्टाल पर खड़े हो जाते। राजा भैया, पराग, बालक, मनमोहन, चंदामामा आदि ढेर पत्रिकाएं उलटते-पलटते थे।
बरसों तक गहरा नाता रहा व्हीलर से और रेलवे प्लेटफॉर्म से। न कभी प्लेटफॉर्म खरीदा और न किसी ने मांगा। दरअसल सबको मालूम था कि हम रेल कर्मचारियों के बच्चे हैं और प्लेटफॉर्म हमारा प्लेग्राउंड है और कई तो मॉर्निंग वॉक भी करते थे। चार-पांच टीसी तो मल्टी स्टोरी में ही रहते थे।
बगल में था उत्तर-पूर्व रेलवे का लखनऊ जंकशन स्टेशन। यहां तैनात रेलवे का स्टाफ हमें नहीं था। लेकिन फिर भी घूमते-घामते चले ही जाते थे। यहां के टिकट चेकर थोड़े सख्त होते थे। कई बार धरे गए। बहुत मिन्नतें करके छूटे। एक बार तो बात इतनी बढ़ी थी कि हम नाबालिग बच्चों को बचाने के लिए नॉर्दन रेलवे के किसी बड़े अफसर का दखल दिलवाया गया। हम बच्चों ने कान पकडे कि यहां कभी नही जायेंगे टहलने। लेकिन बच्चे उस ज़माने के भी होशियार थे। जल्द ही हम लोगों ने वहां से बच निकलने छेद तलाश ही लिए थे।
जब बड़े हुए और नौकरी लगी तो बिना प्लेटफॉर्म टिकट के टहलना बंद कर दिया। रिस्क लेने से कोई फायदा नहीं। बदनामी होगी और अपनी नौकरी पर भी बन आ सकती है। यों हमारे एक मित्र भी थे अनिल द्विवेदी। पक्की यारी थी। पार्सल ऑफिस में थे। हम पहले चेक कर लेते कि वो ड्यूटी पर है। तभी बिना प्लेटफॉर्म टिकट एक नंबर से घुसते थे और पार्सल ऑफिस के रास्ते से बाहर निकलते थे। निकलते हुए अनिल की चाय पीना नहीं भूलते थे।
हम अपने मित्र प्रमोद जोशी के साथ भी रेलवे प्लेटफॉर्म पर कई बार टहले, लेकिन प्लेटफॉर्म टिकट लेकर। उस दौर में टिकट बहुत कम पैसे का था। दस पैसे के दौर से अब तक का दौर तो याद है।

Saturday, March 18, 2017

आज़ादी बाद पहली नव-यथार्थवादी फिल्म थी 'दो बीघा ज़मीन'

- वीर विनोद छाबड़ा
आज़ादी के बाद जो फिल्म राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रस्तुतिकरण के कारण चर्चा का विषय बनी थी वो 'दो बीघा ज़मीन' थी। कहते हैं बिमल रॉय को यह फिल्म बनाने के प्रेरणा वित्तोरियो की 'बाईसाइकिल थीफ' से मिली थी। बिमल दा चाहते थे कि फिल्म का शीर्षक कुछ ऐसा हो कि पूरी फिल्म का ख़ाका एकबारगी जहन में समा जाए। इसके लिए उनकी नज़र गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर की कविता के शीर्षक 'दुई बीघा ज़मीन' पर पड़ी। यह वो दौर था जब देश का चिंतन समाजवादी था। किसान को ज़मींदार से और शहर को पूंजीपति, बनिया और साहुकार से मुक्ति दिलानी थी। फिल्म इसी यथार्थ को उजागर करती है।
गांव के किसान शंभू (बलराज साहनी) का परिवार है- पत्नी (निरुपारॉय), बेटा कन्हैया (रतन)  और बीमार पिता गंगू (नाना पलसीकर)। एक क्रूर ज़मींदार हरनाम (मुराद) भी है। हरनाम मोटी कमाई के लिए गांव में फैक्ट्री लगाना चाहता है। ज़मीन के लिए उसकी निगाह शंभू की दो बीघा ज़मीन पर है। लेकिन शंभू मना कर देता है। तब हरनाम ने दांव चला। शंभू को पैंसठ रूपए के एक पुराने कर्ज़ में फंसा दिया। कर्ज़ चुकाओ या ज़मीन बेचो। दुर्भिक्ष के उस दौर में शंभू ने पत्नी के ज़ेवर बेचे और ज़रूरी रकम हरनाम के सामने रख दी। लेकिन घाघ ज़मींदार बताता है कि ब्याज सहित कुल रकम दो सौ चौंसठ रूपए है। कोर्ट से भी शंभू को राहत नहीं मिलती। तीन महीने में कर्ज चुकाओ या ज़मीन बेचो। शंभू बेटे कन्हैया के साथ पैसा कमाने कलकत्ता पहुंचता है। लेकिन यहां आकर शंभू को एक के बाद एक कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। लेकिन कुछ भले लोंगों के मदद से कन्हैया बूट-पालिश का काम शुरू करता है और शंभू हाथ रिक्शा चलाने का। इधर गांव में पारो को शंभू और कन्हैया की कोई सूचना ने होने से परेशान है। वो शहर जाती है। यहां उसको एक गुंडा बहकाने की कोशिश करता है। वो किसी तरह उसके चुंगल से छूट कर भागती है और एक कार से टकरा जाती है। शोर मचता है। पारो को जिस रिक्शे से अस्पताल ले जाया जाता है, वो शंभू का है। अस्पताल में पारो के ईलाज में शंभू की सारी पूंजी ख़त्म हो जाती है। इधर कन्हैया चोरी करता पकड़ा जाता है। इस बीच तीन महीने गुज़र चुके हैं। शंभू और पारो गांव जाते हैं। उनकी ज़मीन पर हरनाम फैक्ट्री का निर्माण शुरू कर चुका है। शंभू एक मुठ्ठी माटी लेना चाहता है लेकिन सुरक्षा कर्मी उसे ऐसा नहीं करने देता। निराश शंभू और पारो वहां से चल देते हैं। 

रिलीज़ होते ही फिल्म को ज़बरदस्त आलोचना का सामना करना पड़ा। नव-यथार्थवाद के नाम पर कूड़ा बना डाला। पूंजीवादी व्यवस्था इसे हज़म नहीं कर पाती है। समाजवाद अभी शैशवावस्था में है। लेकिन जब फिल्म को कांस और फिर कार्लोव वरी में आयोजित इंटरनेशनल मेलों में अवार्ड मिलते हैं तो सबकी आंखें खुलती हैं। इधर देश में पहली बार नेशनल अवार्ड घोषित होते हैं। उसमें 'दो बीघा ज़मीन' बेस्ट फिल्म का अवार्ड पाती है। इसी समय फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड भी स्थापित होते हैं। बेस्ट फिल्म 'दो बीघा ज़मीन' चुनी गयी और बेस्ट डायरेक्टर बिमल रॉय बने। बरसों बाद २००५ में इंडियाटाइम्स मूवीज़ ने २५ सर्वकालीन श्रेष्ठ फिल्मों के सूची जारी की तो उसमें भी 'दो बीघा ज़मीन' शामिल की गई।