Wednesday, February 15, 2017

देवानंद ने गुस्से में छोड़ दी थी 'तीसरी मंज़िल'

- वीर विनोद छाबड़ा 
परदे के सामने की कहानी जितनी मज़ेदार होती है, परदे के पीछे कहीं ज्यादा लुत्फ़ मिलता है। ऐसा ही किस्सा है नासिर हुसैन और देवानंद और फिर शम्मी कपूर और नासिर हुसैन की दोस्ती का। यह बात पचास के दशक की है। तब फिल्मिस्तान कंपनी के लिए नासिर हुसैन फ़िल्में लिखा करते थे। शम्मी कपूर और देवानंद एक्टर थे। नासिर और देवानंद के बीच नज़दीकियां ज्यादा थीं। इसका लाभ यह हुआ कि नासिर ने 'मुनीम जी' और फिर 'पेइंग गेस्ट' में देव के किरदार को बड़े दिल से लिखा। 'पेइंग गेस्ट' में तो नासिर हुसैन सहायक निर्देशक भी थे। एक के बाद एक दोनों ही फ़िल्में बड़ी हिट साबित हुईं। दोस्ती का रंग चोखा हो गया।
फिल्मिस्तान की अगली फिल्म थी - तुमसा नहीं देखा। ख़ासियत यह थी कि इस फिल्म से नासिर हुसैन पहली बार निर्देशन के क्षेत्र में कदम रखने जा रहे थे। फिल्म पहली हो और साथ में दोस्त हीरो, तो सोने पे सुहागा। लेकिन बदी में लिखे को कोई नहीं टाल सका है। दो हिट फ़िल्में देने के परिप्रेक्ष्य में देवानंद ज्यादा भाव मांग रहे थे। लेकिन प्रबंधक तैयार नहीं थे। इससे बेहतर किसी सस्ते हीरो को लिया जाए। किसी ने शम्मी कपूर का नाम सुझाया।
Nasir Hussain
उन दिनों शम्मी लगातार १७ फ्लॉप फ़िल्में करके रिकॉर्ड बना चुके थे और उन्हें बड़ी शिद्दत से एक हिट फिल्म की तलाश थी। पहले भी फिल्मिस्तान के लिए शम्मी 'हम सब चोर हैं' कर चुके थे। लेकिन नासिर को शम्मी पसंद नहीं आये। लेकिन उनकी भी अपनी मजबूरी थी। पहली फिल्म मिली थी। अपनी शर्तें लगाने का तो कोई सवाल ही नहीं था। मगर जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ी, नासिर और शम्मी की दोस्ती ने रंग दिखाने शुरू किये। दो महीने में 'तुमसा नहीं देखा' बन गयी और ज़बरदस्त हिट भी हुई। शम्मी के लिये तो बहुत बड़ी बात थी। कैरियर की पहली बड़ी हिट।
नासिर-शम्मी की अगली फिल्म थी - दिल देके देखो। इस बीच फिल्मिस्तान से शशधर मुख़र्जी ने अलग होकर फिल्मालय कंपनी शुरू कर दी और 'दिल देके देखो' ही उनकी पहली फिल्म होने जा रही थी। नासिर और शम्मी पर प्रेशर था यह साबित करने का कि 'तुमसा नहीं देखा' की सफलता कोई तुक्का नहीं थी। दोनों ने बहुत मेहनत की। और 'दिल देके देखो' भी हिट हो गयी। दोस्ती और भी प्रगाढ़ हो गयी।

Tuesday, February 14, 2017

गुरू के गुरू

-वीर विनोद छाबड़ा
सुकरात के बारे में तो सबने सुना है।
गुरुओं के गुरू - अफ़लातून। ऐसी कोई समस्या नहीं जिसका हल इनके पास नहीं था। सबको संतुष्ट करके ही वापस करते। जानते-बुझते हुए भी ज़हर का प्याला पी गए थे।
एक दिन एक शिष्य ने पूछा - गुरू जी आपका भी कोई गुरू होगा।
सुकरात ने कहा - हां, मेरा भी गुरू है। दुनिया भर के मूर्ख  मेरे गुरू हैं।
शिष्य को आश्चर्य हुआ - यह कैसा मज़ाक कर रहे हैं आप गुरूवर? सच बतायें न।
सुकरात को ऐसे मज़ाक करने की आदत भी थी।
सुकरात ने कहा - कोई मज़ाक नहीं है यह। मैं इसे अभी सिद्ध भी कर देता हूं। जैसे जब कोई किसी को मूर्ख कहता है तो सबसे पहले मैं उस कारण विशेष की तलाश करता हूं जिस कारण से उसे मूर्ख कहा गया। उस कारण को तलाश करने के बाद मैं उस कारण को खुद में तलाश करता हूं कि ऐसा तो कहीं कि यह मूर्खतास्पद कारण मुझ में मौजूद हो। हो सकता है भविष्य में इस मूर्खतास्पद कारण से लोग मुझे भी मूर्ख कहें।
अगर वो कारण मुझमें विद्यमान है तो सर्वप्रथम मैं उस मूर्खतास्पद कारण को अपने अंदर से निकाल बाहर करूंगा। तब निश्चित हो जाएगा कि मैं मूर्ख नहीं कहलाऊंगा। इस प्रकार मैंने एक मूर्ख से शिक्षा प्राप्त की। वो मूर्ख मेरा गुरू ही हुआ न। मैंने अब तक जो शिक्षा प्राप्त की है इन मूर्खां से ही प्राप्त की। इस प्रकार सब मूर्ख मेरे गुरू हैं।

Monday, February 13, 2017

बेटा, बहु और नॉमिनी

- वीर विनोद छाबड़ा
हमारे मित्र ने इकलौते बेटे को बड़े लाड़-दुलार से पाला-पोसा। अच्छी शिक्षा दी। उसे अपने दम पर बढ़िया नौकरी मिली। दुनिया की सबसे अच्छी लड़की तलाश कर उसकी शादी की। लाखों का दहेज़ मिला। बहु क्या आई मानों लक्ष्मी आई। एक पुरानी पड़ी ज़मीन का सौदा हो गया। कौड़ियों के भाव खरीदी पूरे दो करोड़ का मुनाफ़ा दे गयी।
लेकिन इधर पिछले कुछ दिनों से मित्र परेशान हैं। बेटा पराया हो गया। वह वो दिन भूल गया जब उसे छींक भी आई तो हम रात-रात भर जागे उसके लिए। उसकी लंबी उम्र के लिए हर साल कितनी बार उसकी मां व्रत रखे। कोई तीर्थ-दरगाह नहीं छोड़ी। उसके गले में और बाहों में तावीज़ बांधे ताकि दुश्मनों की उसे भूल कर भी नज़र न लगे। एक करोड़ का एकमुश्त बीमा कराया उसका। नॉमिनी में उसने मेरा नाम भरा था। लेकिन मेरा नाम हटा कर बहु का नाम लिखवा दिया। यह सब बहु की चाल है। डायन कहीं की। अभी छह महीना भी नहीं हुआ शादी को। यही नहीं ऑफिस के रिकॉर्ड में भी पत्नी को नॉमिनी घोषित कर दिया है। जैसे हम मर गए हैं। 

हमने समझाया - अरे भाई, इसमें हर्ज़ ही क्या? हमारे पिता ने तो हमारी शादी के दूसरे ही दिन हमें बीमा कंपनी भेजा था। नॉमिनी से अपना नाम हटवा कर पत्नी का नाम डलवा लो। जीपीएफ और पेंशन के लिए भी पत्नी को नॉमिनी बनवा दिया। हमें खुला छोड़ दिया। जा जी ले अब अपनी ज़िंदगी जी। तुझ पर तेरी पत्नी का अधिकार पहले। सात फेरे लिए हैं तूने दुनिया के सामने। और जानते हो, हमारी पत्नी ने क्या किया। ससुराल को ही मायका समझा। मैं तो भूल चली बाबुल का देश कि पिया का घर प्यारा लगे। सास-ससुर की अंतिम सांस तक सेवा की। उन्होंने खूब आशीर्वाद दिया। पत्नी ने खुश होकर कहा, असली दौलत तो यही है। मैं तो धन्य हो गयी....
मित्र पर कोई असर नहीं हुआ - तू किताबों की दुनिया में रहता है। इल्मी-फ़िल्मी बातें करता है। आभासी दुनिया में रायता फ़ैलाता है। इसलिए किस्से-कहानियां बना लेता है। मैं दुनियाबी आदमी हूं। धरती का रहने वाला हूं, धरती की बात करता हूं। असली बात यह है कि बेटे को मुझ पर यक़ीन नहीं रहा। उसे लगता है कि अगर उसे कुछ हो गया तो हम उसकी पत्नी का ख्याल नहीं रखेंगे।

Sunday, February 12, 2017

झाड़ू के साथ एक सेल्फ़ी हो जाए

- वीर विनोद छाबड़ा
झाड़ू...झाड़ू...झाड़ू ले लो। द्वार पर झाड़ू बेचने वाले की आवाज़ है। हमारी पहली प्राथमिकता यही रहती है कि इसी से झाड़ू खरीद लें। लेकिन बेचने वाले के दावे के बावजूद इनमें क्वालिटी नहीं होती है। मजबूरन हमें झाड़ू के लिए बाज़ार जाना पड़ता है। लेकिन कुछ मित्रों लोगों के यह लिए दृश्य बहुत मनोहारी होता है - अच्छा तो अब ये दिन आ गये हैं। अच्छा काम मिला है रिटायरमेंट के बाद। आइये झाड़ू के साथ एक फोटो हो जाए।
हमें मालूम है कि मित्र इसे मंडली में सर्कुलेट करेगा। कोई फेसबुक पर भी चेंप देगा। हम जैसे-तैसे बच निकलते हैं। एक बार हम झाड़ू लेकर लौट रहे थे। कैमरा लिए एक साहब मिल गये। सर, आप बहुत अच्छे लग रहे हैं। स्वच्छता अभियान के लिए बिलकुल परफेक्ट मॉडल। मैं सुबह से ही ऐसे बंदे की तलाश में हूं। इसे कंधे पर रख लें। और एक फोटो हो जाए। अख़बार में छपेगा। आपका बहुत नाम होगा। और शायद आपको और मुझे ईनाम भी मिले। आप चाहें तो ड्राइंग रूम में भी इस फोटो को अपने पुरखों की फोटो के साथ टांग लेना।
यह सुन कर हम टाईम मशीन में बैठ गये हों जैसे। आज से साठ-सत्तर साल आगे निकल गये। हमारी अगली से अगली पीढ़ी को बहुत गर्व हो रहा है। यह जिनका एक पैर शेर के सर पर है और कंधे पर बंदूक है, हमारे परदादा के परदादा हैं...और यह जिनके कंधे पर झाड़ू है, यह हमारे परदादा हैं।
हमारे जैसे बहुत भुक्तभोगी हैं। एक मित्र मिले - कहां चल दिए? हमने कहा - कल्लू किरयाना स्टोर तक जा रहे हैं। थोड़ी शॉपिंग करने।

Friday, February 10, 2017

कथा श्री छुन्नू महाराज की

-वीर विनोद छाबड़ा
ये उस दौर की कथा है जब पचास का नोट आज के पांच सौ के बराबर था।
छुन्नू बाबू मुहं में चांदी का चम्मच रख पैदा हुए थे। इतनी दौलत थी कि सात पुश्तें दोनों हाथ से लुटाएं तब भी कम न हो। खूब उड़ाया-खाया। पढाई-लिखाई में जीरो-जीरो। लेकिन नो फ़िक्र।
दौलत आदमी विलासता की और धकेलती है। छुन्नू के साथ भी यही हुआ। शराब और सिगरेट। हर वक़्त टुन्न और धुआं-धुआं। वो थोड़ा भोंदू किस्म के भी थे। इसलिए जल्दी ही ख़राब संगत ने उन्हें दबोच लिया। ये संगत उन्हें अय्याशी के रास्ते पर ले गई। पूर्ण बरबादी के लक्षण दिखने लगे। लगा सात पुश्तों के लिए जमा दौलत इसी जन्म में खर्च कर देंगे।

हम दोस्तों ने इस बिंदु पर आकर छुन्नू का साथ छोड़ दिया। कुछ ने अपने घर में उनकी आमद पर रोक भी लगा दी।
माता-पिता ने बहुतेरी कोशिश की कि छुन्नू का किसी तरह घर बस जाये। शायद इसी बहाने उनकी विलासिता और अय्याश लाइफ स्टाइल पर ब्रेक लग जाए और वो सही राह पर आ जाएं।
लेकिन छुन्नू का तो समाज ने मानो बहिष्कार कर रखा हो। दरअसल उनका जीवन वृत्त इस कदर सार्वजनिक था सात लोक भी उनकी खबर रखते थे। माता-पिता छुन्नू के विवाह का अरमान दिल में लिए एक के बाद एक चल बसे। और हम दोस्तों पर ज़िम्मेदारी डाल गए ये कह कर कि छुन्नू के साथ बचपन गुज़ारा है, सो उसे सुधारने का फ़र्ज़ भी बनता है।
हम दोस्तों ने बीड़ा उठाया। इधर छन्नू भी पहले पिता और फिर फ़ौरन बाद माता की मृत्यु से व्यथित हो गए। माता-पिता की मृत्यु के लिए खुद को दोषी मानने लगे। दिन-रात शराब पीते और रोते रहते। वो उन कंधो को शिद्द्त से तलाशने लगे जिन पर वो सर रख कर गम गलत कर सकें। उनके ख़राब संगी-साथी भाग खड़े हुए। ऐसे ग़मगीन माहौल में हम साथ छोड़ चुके दोस्तों को अपने इर्द-गिर्द पाकर छुन्नू निहाल हो गए। हम धीरे-धीरे उन्हें सही राह पर ले आये।
छुन्नू ने शराब और शबाब दोनों से तौबा कर ली। दोस्तों ने बंद दरवाज़े खोल दिए। भाभियां भी भैया-भैया करके आदर-सत्कार करने लगीं। लेकिन समाज में एक बार बिगड़ी छवि को उजला करना बहुत मुश्किल होता है। यही छुन्नू के साथ हुआ। बामुश्किल दूसरे शहर जाकर उनका रिश्ता बना। शादी भी दूसरे शहर जाकर करनी पड़ी।  
छुन्नू को ऐन सुहागरात के रोज़ खूब समझाया कि अब उनकी बाकी ज़िंदगी उनके हाथ में है। कोई गड़बड़-शड़बड़ और उलटी-सीधी बात नहीं करनी। गुज़रे पल दफ़न हो चुके हैं। उन्हें बाहर मत आने देना। नहीं तो बना-बनाया खेल बिगड़ जायेगा।

Thursday, February 9, 2017

हमारे दद्दा

- वीर विनोद छाबड़ा 
आज हमें न जाने क्यों दद्दा याद आ रहे हैं। लखनऊ की चारबाग़ मल्टीस्टोरी में हम तिमंजिले पर रहते थे और वो नीचे दुमंजिले पर, अपने पैरेंट्स के साथ। उनके पिताजी रेलवे में गार्ड थे। घर में सबसे बड़ी संतान थे। इसीलिए उन्हें सब दद्दा कहते थे। बल्कि उनका नाम ही दद्दा पड़ गया था। आस-पड़ोस छोटा हो या बड़ा उन्हें दद्दा के नाम से ही जानता था। उनके माता पिता भी उन्हें दद्दा पुकारने लगे। यूनिवर्सल दद्दा। असली नाम ही सब भूल गए।
हमें तो तब उनका असली नाम तब पता चला जब वो उन्होंने डॉक्टरी की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। उनके दरवाज़े पर नाम पट्टिका लगी - डॉ. रमेश कुमार श्रीवास्तव। लेकिन हम उन्हें तब भी दद्दा ही कहते रहे। उन्हें बुरा भी नहीं लगता था।
उनके डॉक्टर बनने से हम लोगों को बड़ी सुविधा हुई। जब ज़रा सी छींक आई, न दिन देखा और न रात, किवाड़ खटखटा दिया। दद्दा ने बुखार नापा और टिकिया पकड़ा दी - एक-एक सुबह, दोपहर और शाम। तीन दिन तक। हम खुशी खुशी घर चले आए। पानी के साथ गड़क गए। थोड़ी खट्टी-मीठी लगी। बाद में एक दिन पता चला कि वो हमें 'गोली' दिया करते थे। चूरन की टिकिया पकड़ाते थे। छींक आना भी कोई बीमारी है। वो बताते थे कि कई बीमारियों घरेलू इलाज से ठीक हो जाती हैं। हमारे खरगोश की जब डेथ हुई तो हमें यकीन ही नहीं हुआ। हम दद्दा को बुला लाए थे। उन्होंने ही सर्टिफाई किया अब 'गोशी' दुनिया में नहीं रहा।

Wednesday, February 8, 2017

मीना के बदले हेमा को मिल गया फ़िल्मफ़ेयर

- वीर विनोद छाबड़ा
दो राय नहीं हो सकती कि मीना कुमारी हिंदी सिनेमा की बहुत बड़ी स्टार थीं। ट्रेजेडी क्वीन कहलातीं थीं वो। कल तक वो तो हर एक्ट्रेस के लिए आइकॉन भी हुआ करती थीं। सिर्फ परदे पर ही उन्होंने दुःख नहीं सहे, उनकी निजी ज़िंदगी में भी बहुत उथल-उथल रही। वस्तुतः वो चैन से मर भी न सकीं। जब जब उन्होंने ख़ुशी चाही, कांटों का हार मिला। उन्होंने जब जब औलाद चाही, उन्हें एबॉर्शन के लिए फोर्स किया गया। सुना तो यह भी गया कि एक बार ज़बरदस्ती गर्भ गिराया गया।
दुखी होकर मीनाजी ने पति कमाल अमरोही का घर छोड़ दिया। हास्य अभिनेता महमूद उनकी बहन के पति थे। कुछ दिन वो उनके घर रहीं। फिर उनका घर भी छोड़ दिया। वो गहरे अवसाद में डूब गयीं। तन्हा तन्हा ज़िंदगी में  बोतल उनकी साथी बन गई। नतीजतन उन्हें लीवर कैंसर हो गया। वो तिल तिल कर मरीं। वो चाहती थीं कि ज़िंदा रहूं, लेकिन बोतल उनका साथ छोड़ने के लिए तैयार नहीं थी। और तब तक मौत भी उनके इतने करीब आ चुकी थी कि उसका लौटना नामुमकिन था। आखिरकार ३१ मार्च १९७२ को उन्होंने नश्वर शरीर त्याग दिया।

मीना जी को मरने से पहले यह तसल्ली रही कि 'पाकीज़ा' पूरी कर ली थी। उन्होंने पति कमाल अमरोही को दिया वचन निभाया दिया था कि अलग होने के बावज़ूद 'पाकीज़ा' ज़रूर पूरी करूंगी। पैसा भी दूंगी। बारह साल लग गए थे, फिल्म पूरी होने में। मीना कुमारी ने सिर्फ पूरी दौलत लुटाई बल्कि ज़िंदगी का बेहतरीन परफॉरमेंस भी दिया। ०४ फरवरी १९७२ को फिल्म रिलीज़ हुई। मीना जी किसी तरह चल कर प्रीमियर पर भी गयीं। फिल्म को शुरू के कुछ दिनों में अच्छा रिस्पांस नहीं मिला। यह खबर शायद मीना जी तक भी पहुंची थी। वो ज्यादा उदास हो गयीं।
लेकिन मीना जी की मौत ने फ़िल्म को आसमान पर उठा दिया। अचानक जनसाधारण के दिल में मीना जी के लिए प्यार उमड़ पड़ा। सिनेमा हाल हाऊसफुल चलने लगे। भीड़ की भीड़ मीना जी को अपनी श्रद्धांजलि देने के लिए हर उस सिनेमा हाल की और बढ़ चली जहां 'पाकीज़ा' चल रही थी। इसका गीत-संगीत भी जन जन की ज़ुबान पर चढ़ गया... इन्हीं लोगों ने लीना दुपट्टा मोरा...चलो दिलदार चलो...मुझे कोई मिल गया था... मौसम है आशिकाना...ठाड़े रहियो ओ बांके यार...