Monday, August 31, 2015

रात बिलासपुर से चली ट्रेन सुबह बिलासपुर में खड़ी मिली।

-वीर विनोद छाबड़ा
मार्च १९७४. मैं लखनऊ से बिलासपुर गया था मामा से मिलने। लखनऊ से इलाहाबाद, वहां से कटनी और फिर बिलासपुर। तीन बार ट्रेन बदलनी पड़ी। कोई दिक्कत नहीं हुई। ठीक-ठाक पहुँच गया। कुछ दिन रहने के बाद वहां से उसी रूट से वापसी हुई।
बिलासपुर से ट्रेन छूटने का समय रात दस बजे। सुबह-सुबह कटनी पहुंचना। फिर वहां से लखनऊ वाया इलाहबाद।
बिलासपुर स्टेशन पर मामा आये छोड़ने। पता चला ट्रेन आधा घंटा लेट छूटेगी। मैंने मामा से कहा, आप जाओ। रात ज्यादा हो रही है।
मामा चले गए। थ्री टीयर में ऊपर का बर्थ। मैंने चद्दर बिछाई और लेट गया। दिन भर का थका था। जाने कब आंख लग गयी।
नींद खुली तो रात को बिदा करने वाला धुंधला सा सवेरा था। ट्रेन किसी स्टेशन पर खड़ी थी। चाय की तलब लगी। बर्थ से नीचे उतरा। ट्रेन से उतर कर प्लेटफॉर्म पर आया। लगा ये कोई जानी-पहचानी जगह है। दिमाग पर जोर डाला। कुछ याद नहीं आ रहा था। कोई पूर्व जन्म का नाता तो नहीं! फिल्मों में ऐसे सीन कई बार देखे थे।
उत्सुकतावश मैंने एक सहयात्री  से पूछा - कौन सा स्टेशन है?
उसने मुझे हैरानी से देखा और रहस्यमयी अंदाज़ में बोला - आप को पता नहीं? आप जहां कल रात थे, अभी भी वहीं हैं।
मुझे तो काटो खून नहीं - क्या कह रहे हैं आप ?
वो तनिक तल्खी से बोला - बिलासपुर में ही हैं। ट्रेन चली ही नहीं जनाब। यह रेलवे वाले भी.…  
माज़रा पूछा तो पता चला कि गॉर्ड लोगों ने किसी मुद्दे पर फ़्लैश स्ट्राइक कर दी है। उन दिनों ऐसा ही होता था। रेलवे में क्या पूरे भारत में अराजक माहौल था। किसी न किसी बहाने पूरा महक़मा स्ट्राइक पर चला जाता था। ये भी पता नहीं था कि यह स्ट्राइक कब ख़त्म होगी।
तय किया कि वापस मामा के घर पास जाऊं। टिकट वापसी का कोई झंझट है नहीं। पिताजी का रेलवे पास है। हां, इसकी एक्सपायरी उसी दिन रात बारह बजे तक की ही थी। दो-चार दिन में जब माहौल कुछ शांत हो जाये तभी निकलूं। बस किराया जेब से खर्च करना पड़ेगा। 
तभी हलचल हुई। पता चला कि स्ट्राइक ख़त्म हो चुकी है। बस ट्रेन किसी भी क्षण रवाना होने को है। राहत की सांस ली। बस दिल में यही ऊहापोह थी कि आगे कटनी से इलाहाबाद का कनेक्शन और फिर वहां से लखनऊ का कनेक्शन मिल पायेगा? अपनी परेशानी सहयात्री से बताई।
वो बोला - मुझे भी इलाहाबाद जाना है। कटनी से इलाहाबाद को कई ट्रेन हैं। कोई न कोई तो मिलेगी।
खैर शाम चार बजे कटनी पहुंचा। भागते हुए इलाहाबाद की ट्रेन पकड़ी। यह वही ट्रेन थी जो मुझे दिन में बारह बजे मिलनी थी। लेट चल रही थी। रात एक बजे इलाहाबाद पहुंचा।
उस दिन भाग्य अच्छा था। हर आशंका निर्मूल साबित हो रही थी। इलाहाबाद से जिस ट्रेन को रात दस बजे छूटना था वो भी काफी लेट थी। बस छूटने ही वाली थी। ट्रेन में बैठते ही ख्याल आया कि मेरा रेलवे पास
तो कुछ घंटे पहले एक्सपायर हो चुका है। टिकट लेना याद ही नहीं रहा। इधर ट्रेन ने प्लेटफॉर्म भी छोड़ दिया। एक बैचेनी दिलो-दिमाग पर छा गई।
भगवान से मनाता रहा कोई टीटीई चेकिंग करने न आ धमके। काश! उस वक़्त अगर मैं टीटीई की जगह सिर्फ भगवान को याद करता होता तो ज्यादा अच्छा होता। टीटीई महोदय चेक करने आ धमके। मैं पसीना-पसीना था। क्या बोलूंगा मैं? और क्या करेगा टीटीई? खैर, टीटीई आया -टिकट।
 
मैंने गुलाबी रंग का पास निकाला। देखते ही वो बोला - फैमिली पास है। किसका है?
मैंने कहा - पिताजी का। नॉर्थर्न रेलवे में क्लेम इंस्पेक्टर हैं।
टीटीई ने पास खोल कर देखा भी नहीं। वापस कर दिया। जान में जान आई।
उस यात्रा में ट्रेनों की लेट-लतीफी से फायदा ही फायदा हुआ।
अक्सर होता है जिस बात को लेकर हम बहुत आशंकित होते हैं वो कभी घटती ही नहीं। धरी की धरी रह जाती हैं। ऐसे में जो राहत मिलती है वो किसी भी विजय से कम नहीं होती।

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