Sunday, February 7, 2016

फेस बुक - दिल की बात कहने का प्लेटफॉर्म।

- वीर विनोद छाबड़ा 
साठ का अंत और सत्तर की शुरुआत का दौर था वो। लखनऊ से एक साहित्यिक पत्रिका प्रकाशित होती थी - कात्यायनी। कहानी प्रधान पत्रिका थी।
साहित्यिक गलियारों में बहुत चर्चित थी यह पत्रिका। संपादक थे पंडित अश्विनी कुमार द्विवेदी। मेरा सौभाग्य था कि उसमें मेरी कुछ कहानियां प्रकाशित हुईं। पत्रिका के अंतिम दो-तीन वर्ष मैंने इसमें काम भी किया। बिलकुल मुफ़्त में। युनिवर्सटी से छूट कर सीधे वहीं जाना होता था। मेरे साथ बंधु कुशावर्ती भी होते थे उसमें।
हीवेट रोड स्थित गुप्ता प्रिंटिंग प्रेस के मालिक साहित्य प्रेमी थे। न सिर्फ मुफ्त में मुद्रित करते थे बल्कि ऑफ़िस के लिए दो बड़े कमरे भी उन्होंने प्रदान कर रखे थे। लेकिन कागज़ और ब्लॉक के लिए धन पत्रिका की बिक्री से होने वाली थोड़ी सी आमदनी से चलता था। साहित्य में फ़क़ीरी तब भी होती थी। अक्सर वहां अड्डा ज़माने वाले साहित्यकारों को जेब सहर्ष खाली करनी पड़ती थी। कई बार हमें भी अपना जेब ख़र्च न्यौछावर करना पड़ा।
'कात्यायनी' की विशेषता यह थी कि इसमें उन सब रचनाओं को प्रमुखता दी जाती थी, जिनके साथ किसी बड़ी पत्रिका की 'खेद सहित वापस' की पर्ची लगी हो। उस दौर के तमाम युवा कहानीकारों की रचनायें इसमें प्रकाशित हुई। न छपने योग्य कहानियों को भी द्विवेदी जी कतर-ब्यौंत कर छपने योग्य बना दिया। कई लेखक द्विवेदी जी को धन्यवाद देने आये कि आपने हमें लिखना सिखा दिया। आये दिन गोष्ठियां भी आयोजित होतीं।

Saturday, February 6, 2016

तस्वीर बन कर दीवार पर टंगा होता!

- वीर विनोद छाबड़ा
सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए बहुत ख़राब है। इस बात को हर सिगरेट पीने वाला जानता है।
मैं भी जानता था। लेकिन फिर भी पीता रहा। अभी कौन सी जल्दी है। जब वक्त आएगा छोड़ दूंगा।

मैं चालीस क्रॉस कर चुका था। सोचा अब छोड़ दूं। बहुत हो चुका। लेकिन इसके बावजूद यही होता रहा कि आज नहीं कल छोड़ दूंगा। कल हुआ तो एक दिन और सही। अगला दिन आया तो आज बुध है। अगले संडे को बाज़ार क्लोज़ और सिगरेट भी।
बस यही करते-करते सालों गुज़र गए। जिस दिन छोड़ी उस दिन मैं ५३ का था। कोई तक़लीफ़ नहीं थी। बस परिस्थिति ऐसी बनी कि मैं खुद पर क़ामयाब हो गया। तैंतीस साल तक सिगरेट पी मैंने। 
अगस्त २०१२ में मुझे ज़बरदस्त खांसी शुरू हुई। हफ्तों ठहर गयी। कई डॉक्टर बदले। ठीक ही नहीं हुई। आख़िर चेस्ट स्पेशलिस्ट की दहलीज़ पर लैंड हुआ। भांति भांति के टेस्ट, सस्ते और महंगे भी।
मैंने कहा - अच्छा कर दो हमें। हफ़्तों से ठीक से सो नहीं पा रहा हूं। किसी के घर जाने में भी शर्म आती है। खांसी कैसे छुपाऊं? हरेक कोई नए डॉक्टर का नाम बताता है। आप अंतिम हैं। अब और हिम्मत नहीं।
डॉक्टर ने टेस्ट रिपोर्ट देखते हुए मेरे कंधे पर हाथ रखा और पूछा - सिगरेट?
मैंने कहा - एक्स स्मोकर। कोई नौ साल हुए छोड़े हुए।
डॉक्टर ने कहा - अच्छा हुआ, नहीं तो आज तस्वीर बनकर दीवार पर टंगे होते। आपको हाई लेवल की एलर्जी है - अस्थमा। ठीक हो जायेंगे, बशर्ते  दवा ईमानदारी से लें।

Friday, February 5, 2016

'गर्म हवा' मतलब मैसूर श्रीनिवास सथ्यू।

- वीर विनोद छाबड़ा
यों निर्माता-निर्देशक एमएस सथ्यू सिनेमा और थिएटर में एक बड़ा नाम है। लेकिन १९४७ की तक़सीम पर बनी सफल फ़िल्म 'गर्म हवा' के बिना वो अधूरे हैं।
कल ०४ फरवरी को सथ्यू साहब लखनऊ पधारे। आल इंडिया कैफ़ी आज़मी एकेडमी और इप्टा ने उनसे संवाद का साझा प्रोग्राम बना डाला। गर्म हवा ने समानांतर भारतीय सिनेमा को हवा दी ही, भारतीय मुसलमानों को भी यह पहचान दी है कि उनके सरोकार आम भारतीय वाले ही हैं। आज जब माहौल में सहिष्णुता को लेकर काफ़ी गर्मी है और सिनेमा सिर्फ़ मार्केटिंग कर रहा है तो ऐसे में 'गर्म हवा' को रि-विजिट करना बहुत ज़रूरी है।

कन्नड़ भाषी ८५ वर्षीय एमएस सथ्यू ने बताया - मैं 'कहां कहां से गुज़र गया' की स्क्रिप्ट लेकर फिल्म फाइनेंस कारपोरेशन से लोन लेने गया। मगर चेयरमैन बीके करंजिया ने कहा कि हीरो निगेटिव है। राजेंद्र सिंह बेदी, इस्मत चुगताई आदि दोस्तों से बात हुई। नतीजा 'गर्म हवा' की स्क्रिप्ट बनी और करंजिया साहब ने पसंद कर ली।


चेतन की नीचा नगर, बिमल राय की दो बीघा ज़मीन और अब्बास की धरती के लाल की तरह 'गर्म हवा' भी इप्टा के आर्टिस्टों के साथ बनायी। लेकिन सेंसर ने रोक ली। कहा, बैन लगना चाहिए। तब मैंने प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी से हस्तक्षेप का अनुरोध किया। उन्होंने तार भेजा - आकर दिखाओ फिल्म। बामुश्किल लैब से प्रिंट निकलवाया। उनकी कैबिनेट ने फिल्म देखी और उसके बाद में पक्ष-विपक्ष ने। सबने पसंद किया। मुफ्त में सैकड़ों ने फ़िल्म देख ली। इधर फ्रांस के कांस फिल्म फेस्टिवल में एंट्री के लिए नॉमिनेट हुई और फिर जब ऑस्कर के लिए एंट्री मिली तो 'गर्म हवा' की हवा गर्म हो हुई। तब तक ग्यारह महीने गुज़र चुके थे। बंबई के रीगल थिएटर में प्रीमियर के ठीक पहले शिव सेना के बाल ठाकरे ने रोक लगा दी। एक सेंसर के बाद एक और सेंसर। उन्हें फ़िल्म दिखाई गयी तो बोले - मुसलमान को भारत में ही रहना चाहिए।

MS Sathyu & Virendra Yadav
प्रसिद्ध समालोचक वीरेंद्र यादव ने हस्तक्षेप किया - मैंने राजनीति से परे हट कर विभाजन की बलि चढ़ गए मानवीय मूल्यों के दृष्टिगत इस फ़िल्म को कई बार देखा। आज माहौल में असहिष्णुता को लेकर जिस तरह की गर्मागर्मी में है उसमें 'गर्म हवा -२' बनाने की निहायत ज़रूरत महसूस हो रही है।

सथ्यू साहब ने समर्थन किया। लेकिन अच्छी फिल्म संयोग से बनती है। हिट का कोई फार्मूला नहीं है। ईमानदारी ज़रूर हो। बहुत केयरफुल रहना पड़ता है अब। एंटी पाकिस्तान फिल्म एंटी मुस्लिम हो जाती है। सबसे बड़ी समस्या तो फाइनांस है।

MS Sathyu & Deepak Kabeer
एक अन्य प्रश्न के उत्तर में सथ्यू साहब ने बताया - पाकिस्तान में भी खूब देखी गयी यह फिल्म।
सुप्रसिद्ध लेखक भगवान स्वरुप कटियार ने जब प्रश्न किया कि वर्तमान दौर के बारे में सथ्यू क्या सोचते हैं तो उन्होंने कहा - लोग सोचते हैं मैं पागल हूं। सिर्फ पॉलिटिक्स जानता हूं। लेकिन ऐसा नहीं है। त्रासदी क्या होती है यह दिल्ली आकर जाना। वहां मैसूर में पार्टीशन का इफ़ेक्ट नहीं था। ज़रूरी नहीं कि हम त्रासदी से गुज़रे हों। संवेदना होनी चाहिए। जुनून और समर्पण होना चाहिए। थिएटर के आर्टिस्टों में यह ज्यादा होता है। आर्टिस्ट हिंदू-मुसलमान नहीं है, सिर्फ आर्टिस्ट है। यही वज़ह थी कि सिर्फ ४२ दिन में बन गई गर्म हवा।
Rakesh Vijay KK Vats

एमएस सथ्यू साहब को युवाओं से बहुत उम्मीदें हैं - इंसान बनना कुछ चाहता है और  बन कुछ जाता है। इंजीनियरों के परिवार से था मैं। लेकिन मन नहीं लगता था। तीन साल कथकली डांस सीखा। कहीं-कहीं परफॉर्म भी किया। उदय शंकर की 'कल्पना' पहली बैले फ़िल्म थी। उसमें काम किया। लेकिन बात बनी नहीं। बीएससी की पढाई छोड़ कर मैसूर से बंबई आ गया। छह महीने इधर-उधर भटकता रहा। हबीब तनवीर और केए अब्बास मिले। थिएटर में फ्यूचर दिख गया। हिंदी-उर्दू खराब थी इसलिए पर्दे के पीछे रहा। बहुत काम किया। एक दिन डायरेक्टर चेतन आनंद ने मुझे स्पॉट किया। अपना असिस्टेंट बना कर ले गए। पहली ही बार में वो फिल्म के हीरो थे और मैं उन्हें यानि डायरेक्टर को डायरेक्ट कर रहा था। कब क्या जाये मालूम नहीं। पैशन यानि जोश बहुत ही ज़रूरी है।
VV Chhabra & MS Sathyu

कई बार प्रश्नों का उत्तर देते हुए सथ्यू साहब बीच-बीच में नॉस्टॅल्जिक हुए - शुरू-शुरू में उर्दू नही जानता था। उर्दू के दोस्तों और पत्नी शमा ज़ैदी की सोहबत में रह कर उर्दू सीखी। इंदिरा जी के पुत्रों राजीव और संजय को पढ़ाने जाना होता था। वहीं पर पूर्व रक्षा मंत्री कृष्णा मेनन आया करते थे। कोई सिक्योरिटी नहीं होती थी। चाय खूब पिया करते थे। फिर वहां से कनॉट प्लेस तक पैदल जाते और पीछे पीछे उनका बहुत धीमी गति से ड्राईवर। गर्म हवा को कई ईनाम मिले। राष्ट्रीय एकीकरण के लिए बेस्ट फ़िल्म फिल्म का नेशनल अवार्ड बड़ा था। तीन फिल्मफेयर भी मिले। एक दिन ऑफर आया पद्मश्री देने का साथ में यह आश्वासन मांगा गया कि मना नहीं करना। अब तो नीचे से सिफारिश होती है।

सथ्यू साहब ने बताया - दो साल पहले गूगल के लिए सांप्रदायिक एकता पर एक एड फिल्म की थी जिसमें उन्होंने पाकिस्तान में बसे एक मुस्लिम का किरदार अदा किया था जो इंडिया वाले हिंदू का गहरा दोस्त है और मरने से पहले उससे मिलना चाहता है। मोदी जी के लिय एड फिल्म का ऑफर मिला। मना कर दिया था। वो मेरी पसंद नहीं थे।
MS Sathyu & Sushila Puri

फ़िल्म  इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव राकेश ने सथ्यू जी को उस साझी संस्कृति का बड़ा प्रतीक बताया जिन्होंने उसे ठीक से पढ़ा और आगे बढ़ाया। पद और पुरुस्कार उनके सामने बौने हैं। कम बोलकर एनर्जी जमा करते हैं और जब इसमें विस्फोट होता है तो कोई गर्म हवा बनती है, बकरी जैसा नाटक सामने आता है। कई भाषाओँ में एक साथ काम करते हैं।

Thursday, February 4, 2016

उस दिन फ़ारिग़ होने को तरस गए।

- वीर विनोद छाबड़ा
हमें याद आ रहा है वो ४३ साल पहले गुज़रा वो दिन जब हम एक दोस्त की शादी अटेंड करने शहर से कोई पचास-साठ मील दूर एक छोटे से कस्बे में गए थे।

क़स्बा क्या था गांव ही समझिये। जहां ठहराये थे उसके आगे-पीछे खेत ही खेत थे। दूर दूर तक फैले खेत। हम ठहरे शहरी आदमी और वो भी लखनउवा। तबीयत भी कुछ अंग्रेज़ किस्म की। बस रात सोने के लिए आरामदायक बिस्तर और सुबह फ़ारिग़ होने का बढ़िया बंदोबस्त। लेकिन वहां ये सब नहीं था।
सर्दी के दिन थे। रात तो लालटेन की धीमी रोशनी में जैसे-तैसे कट गयी। लेकिन सुबह हालत ख़राब।
गुज़री रात बहुत भरपेट स्वादिष्ट भोजन किया था और अल सुबह गुड़ की चाय पी। वाकई आनंद आ गया था। लेकिन उसके बाद फ़ारिग होना निहायत ज़रूरी था। मेज़बान ने टीन के डिब्बों की कतार दिखा दी। मुंह तक भरा था पानी। अपनी ज़रूरत के हिसाब से चाहे एक डिब्बा उठाओ या दो और निकल लो दूर खेतों में। यहां फ़ारिग होने का यही तरीक़ा था। सरल और सस्ता।
हमें तो काटो खून नहीं। ऐसी स्थिति हम अकेले ही नहीं झेल रहे थे। हमारे जैसे कई थे। मरता क्या न करता। टीन का एक डिब्बा उठा लिया। एक समझदार ने अख़बार का एक एक सफ़ा भी पकड़ा दिया। यह अख़बार उसने गुज़रे दिन सफ़र के दौरान ख़रीदा था।
बहरहाल, हम लोग चल दिए। राह दिखाने को आगे-आगे एक लोकल बंदा। नम ज़मीन पर बिखरी ओस और चारों और धुंध ही धुंध। तीन-चार फिट से आगे दिखना मुश्किल हो रहा था। लोकल बंदा साथ न होता तो जाने कहां निकल गए होते। पतली मेढ़ों पर डांस जैसा संतुलन बनाते हुए एक जगह पहुंचे।
लोकल ने कहा - यह ठीक-ठाक जगह है। यहां कोई आता-जाता नहीं। फैल जाईये।
डिब्बे में पानी आधा रह गया था। टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों के कारण उलीच गया था। इधर प्रेशर बढ़ता ही जा रहा था। जैसे ही हम बैठने को हुए कि आकाशवाणी हुई। यह लोकल बंदे की आवाज़ थी। भैया, नीचे ठूंठ देख कर। यहां कभी अरहर का खेत था।  हमने गौर किया कि वाकई नीचे ठूंठ थी। वक्त रहते आकाशवाणी न हुई होती तो जाने क्या होता? इसकी कल्पना करते हम आज भी कांप उठते हैं।

Wednesday, February 3, 2016

भगवान मिठाई के भूखे नहीं हैं।

- वीर विनोद छाबड़ा 
कल शाम मंदिर जाना हुआ। यों तो हम निराकार ब्रह्म को मानने वाले हैं। लेकिन फिर भी परिवार की ख़ुशी के लिए जाते हैं।

हमने देखा कि एक १०-११ साल के लड़के ने लिफ़ाफ़े से थोड़ी सी बूंदी निकाल कर दूसरे लिफ़ाफ़े में भरी। उस लिफ़ाफ़े को लपेट कर जेब में रख लिया। और फिर मंदिर में हनुमान जी की मूर्ती के सामने खड़ा हो गया। पुजारी जी ने उसके हाथ से लिफ़ाफ़ा लिया। भोग लगाने का स्वांग किया। आधी से ज्यादा बूंदी उन्होंने निकाल कर एक बाल्टी में डाली। बाकी वापस कर दी। मंगल होने के कारण भीड़ बहुत थी। पंडित जी को कतई फ़ुरसत नहीं थी। लड़के ने स्वयं टीका लगाया। और चरणामृत भी खुद लिया।
उसे देख हमें अपना बचपन याद आया। मंगल के दिन पांच आने मिलते थे, प्रसाद चढ़ाने के लिए। ढाई आने की बूंदी और ढाई आने के चीनी के बताशे।
पहले बूंदी लेते थे और फिर उसके ऊपर बताशे। भीड़ बहुत होती थी। पुजारी जी लिफ़ाफ़े में हाथ डालते और मुट्ठी भर बताशे निकाल लेते थे। बूंदी तक हाथ पहुँच ही नहीं पाया। पूरी की पूरी बच गयी। दो-तीन बार ऐसा किया।
लेकिन शायद पुजारी जी समझ गए। नीचे से लिफ़ाफ़ा मुलायम जो होता था। उन्होंने अगली बार लिफ़ाफ़ा ही पलट दिया और फिर आधी मुट्ठी बताशे लिफ़ाफ़े में डाल दिए। जा तेरा कल्याण हो बच्चा।

Tuesday, February 2, 2016

सीताराम यचुरी - वामपंथ को मज़बूत करना ज़रूरी।

रिपोर्ट - वीर विनोद छाबड़ा
सीपीएम के जनरल सेक्रेटरी सीताराम येचुरी को रूबरू देखने और सुनने की मुद्दत पुरानी मेरी चाह पूरी हुई। कल शाम दिवंगत कामरेड शंकर दयाल तिवारी के ९५ वें जन्मदिवस के अवसर पर वो लखनऊ पधारे थे।
Prof.RameshDixit&SeetaramYachuri

सभा में वो लगभग चार घंटे तक रहे। उन तक पहुंचना भी बहुत सहज था। कोई सेक्युरिटी नहीं। मुस्कुराता हुआ चेहरा। वाकपटु। हिंदी स्ट्रांग नहीं है
, लेकिन फिर भी बिंदास बोलते हैं। मुद्दे के दृष्टिगत बीच-बीच में चुटकुले भी छोड़े और हिंदी फ़िल्मी गानों की हेडलाइंस भी सुनाते चले। बात सहमति की नहीं, अपितु उनके विचारों को जानने की रही जो पूरी प्रतिबद्धता और लयबद्धता से प्रवाहित हुए।

जेएनयू में इंटरनेशनल रिलेशन की स्टडी कर रहीं उनकी सहपाठी वंदना मिश्रा जी ने बताया कि सीताराम तीन बार जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष रहे। और हर बार हराया राजाराम को। सिर्फ़ राम नहीं, सीताराम ग्राह्य था। नारे लगते थे - बड़ी लड़ाई ऊंचा काम, सीताराम सीताराम। अल्पायु में इकोनॉमिक्स के पुरोधा बन गए। नेपाल में राजशाही ख़त्म हुई तो तमाम साम्यवादी गुटों को एक करके सरकार बनाने में अहम भूमिका येचुरी जी ने ही अदा की।


येचुरी जी ने फ़रमाया मुल्क में २००८ से पूंजीवाद कई बार लड़खड़ाया है। सोशल व्यू के बिना कोई वाद नहीं चल सकता, साम्यवाद भी नहीं। मार्टिन लूथर किंग ने कहा था कि सपने वही देखते हैं जो सोते हैं। लेकिन अपने देश में नौबत आ रही है - कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन। यूपीए की सरकार को हमने बाहर से समर्थन दिया। कई दबाव बनाये। मज़दूरों-किसानो के हित वाले कई बिल पास कराये। आज चमकता भारत और तरसता भारत हैं। विदेशी पूंजी है। डब्ल्यूटीओ के दबाव में है। शासक वर्ग सबऑर्डिनेट के रूप में काम कर रहा है।

प्रांतीय पार्टियां सुबह हमारे साथ हैं तो शाम दूसरे के साथ। सबके अपने मिशन हैं। लेकिन सांप्रदायिकता के विरुद्ध लड़ने के लिए सबका साथ चाहिए। बिना वामपंथ आंदोलन को मजबूत किये सांप्रदायिकता से नहीं लड़ सकते। मोदी सरकार सांप्रदायिकता को पैट्रोनाइज़्ड करती है। संवाद अर्थात क्लैश ऑफ़ आइडियाज की स्थिति ख़त्म करने की कोशिश ज़ारी है। इंटॉलरेंस बढ़ रहा है। दाभोलकर, पंसारे और कलबुर्गी की हत्या इसी का परिणाम हैं। हमने पीएम से कार्यवाही करने का आश्वासन माँगा। लेकिन पीएम नाराज़ हो जाते हैं। विपक्ष की संख्या पर कटाक्ष करते हैं- सिटी बस। लेकिन जब वो दिल्ली हारे तो हमने भी कहा - ऑटो।


फिर हमने कहा - काला धन छोड़ो, पीएम वापस लाओ। कांग्रेस से असहमति रही, लेकिन विरोध नहीं। हम मानते हैं कि राजनैतिक आज़ादी के साथ आर्थिक आज़ादी देनी होगी। वर्ग संघर्ष दो टांग पर खड़ा है - आर्थिक और सोशल शोषण। धर्म निरपेक्ष का गणतंत्र खतरे में रहेगा जब तक हिंदू राष्ट्रवाद और उसका जुड़वा भाई मुस्लिम राष्ट्रवाद रहेगा। गांधी जी की हत्या इसी के चलते हुई। इंटॉलरेंट फासिस्ट राष्ट्रवाद का रूप सामने आ रहा है। इस खतरे से बचना ज़रूरी है।

मज़दूर और किसान की एकता कमजोर करने की तैयारी हो रही है। इसके लिए सांप्रदायिकता को तोड़ना ज़रूरी है। हम लैंड बिल पर पार्लियामेंट में सोनिया जी के साथ रहे। आरबीआई के चीफ़ ने हाल ही में कहा है - ९३ फ़ीसदी मज़दूर असंगठित हैं। कभी कानपुर के मज़दूर आंदोलन को लेनिन नोटिस करते थे। लेकिन आज वो मज़दूर नहीं है। आऊटसोर्सिंग हो रही है। छात्रसंघ नहीं हैं। राजनैतिक शिक्षा नहीं हो रही है। चैन्नई में अम्बेडकर ग्रुप डिस्कशन स्टडी सेंटर बैन कर दिया गया। यानि डिबेटिंग सोसाइटी ग़ैरक़ानूनी हो गयी। मज़दूर के साथ-साथ छात्र तक पहुंचना मुश्किल हो रहा है।


आज देश में दो-तिहाई नौजवान है। निवेश नहीं आ रहा। कॉरपोरेट कह रहा है कि जब तक पिछले तीन साल से बने रखे माल की खपत नहीं हो जाती तब तक नया निवेश नहीं हो सकता। इसके लिए घर में ही बाज़ार तैयार करने की ज़रूरत है। बाहर गए नौजवान भी लौटेंगे। साधनों की कमी नहीं है। ५% के हाथ में ८५% संपत्ति है। बजट में एक छोटा सा पैरा होता है कि पांच लाख करोड़ टैक्स माफ़ कर दिया गया। जबकि गरीबों के लिए सब्सिडी फ़िज़ूलखर्ची मानी जाती है।

Monday, February 1, 2016

और ले जाओ बुके, छंट गए न!

-वीर विनोद छाबड़ा 
रामजी कपड़े के बड़े थोक व्यापारी हैं। अथाह धन-दौलत और साधनो के मालिक। भरा-पूरा संयुक्त परिवार। आये दिन किसी का जन्म-दिन और कभी किसी का मुंडन या छटी।
ज़बरदस्त जश्न। सौभाग्य से बंदे की झोपड़ी रामजी के महल के पड़ोस में है। लिहाज़ा आये दिन दावतें खाने को मिलती हैं।
रामजी फूल-पत्ती के नए फैशन के बहुत विरुद्ध हैं। उनका बस चले तो फूल की दुकानें ही बंद करा दें। जन्मदिन हो या सगाई-शादी की दावत, कई लोग बुके लिए चले आ रहे हैं। वो भनभनाते हैं कि इनको सर पर मारूं क्या? नक़द दिए होते तो कुछ काम भी आते। चार सौ रूपये प्रति प्लेट दस आदमी का पूरा परिवार हड़प गया। लेकिन रामजी भी कोई कम नहीं। अगली पार्टी में फूलवाले कई भरे-पूरे परिवार नहीं दिखे। सबको छांट दिया। 
मगर बंदे को गर्व है कि उसने कभी नकदी वारी तो कभी रंग-बिरंगी चमकीली पन्नी में लिपटा बड़ा सा गिफ्ट।
उस दिन ख़ास पार्टी थी। रामजी पिचहतर के हो गए। बंदा टूर कट-शार्ट कर ऐन मौके पर वापस पहुंचा। साप्ताहिक बंदी के कारण मार्किट बंद। सो फूलों का बढ़िया सा बुके लिया और चल पड़ा सपरिवार।   
रामजी ऊंचे मंच पर बादशाहों वाली शानदार कुर्सी पर विराजमान थे। बगल में बैठी पत्नी नकदी वाले लिफ़ाफ़े एक बड़े बैग में भर रही थी। गुलदस्ते मंच के पीछे फेंके जा रहे थे। बंदे के गुलदस्ते का भी यही हश्र हुआ। फूल की जगह नक़दी होती तो कुछ और बात होती। लेकिन बंदे को यकीन था कि चचा को दो-चार दिन बाद बढ़िया गिफ्ट देकर मस्त कर देगा।
लेकिन दुर्भाग्यवश ये हो न सका। कभी यहां जाना पड़ा तो कभी वहां।
रामजी परिवार से हरदम चिढ़ी रहने वाली वीरांगना मेमसाब ने भी कह दिया - छोड़ो भी। बुढ़ऊ के पास बहुत कुछ है। तुम्हारे ढाई-तीन सौ रूपए के फोटोफ्रेम का क्या महत्व उनके लिए? फिर कौन याद रखता है कि फूल-पत्ती कौन लाया था और गोभी का फूल कौन? अभी न जाने कितने जन्मदिन और मुंडन होने हैं। यों भी लिफाफे का वज़न देखकर रिटर्न गिफ्ट देते हैं। हमारा तो नंबर कभी आया नहीं और न आयेगा। तुम्हें तो वो प्रजा समझते हैं। कुर्सी यहां से वहां रखो।
बंदा मेमसाब के उवाच से सहमत नहीं है। रामजी बड़े आदमी हैं। उनके सानिध्य में रहना उपलब्धि है। पिचहतर पार के बावजूद हट्टे-कट्टे हैं, बिलकुल लाल-सुर्ख़। उनका महल हमारा लैंडमार्क है। दुःख-सुख में काम भी वही आयेंगे। कल ज़रूर जाएंगे उनको गिफ्ट देने।