हमें वो गुज़रा ज़माना भली-भांति याद है जब अपने शहर में शिक्षकों की प्राथमिकताओं मे एक अच्छा जिम्मेदार नागरिक और बेहतर शैक्षिक माहौल देना था। कुछ अपवादों को छोड़कर तमाम स्कूल-कालेजों के शिक्षक प्राइवेट ट्यूशन नहीं करते थे। ज्यादातर समर्पण की भावना रखते थे। क्योंकि उन्हें मालूम था कि परिवार संस्कार डालता है तो शिक्षक छात्र को इंसान बनाता है। आमतौर पर शिक्षक गरीब थे, परंतु उन्हें समाज में अति सम्मान का दर्जा प्राप्त था। उनका फोकस कुशाग्र छात्रों पर नहीं कमजोर छात्रों के प्रति था। कभी एक्स्ट्रा क्लास लेकर तो कभी उनके माता-पिता को परामर्श देकर। हमने भी ऐसी अनेक एक्स्ट्रा क्लासें अटेंड की थीं। शिक्षकों के पढ़ाने और बिगड़ैल व बैल छात्रों को सुधारने के तरीके अलग-अलग थे। कुछ प्यार से और कुछ ‘समझावन लाल’ यानी छड़ी से भय बनाते थे। हालांकि इसका कोई लाभ नहीं होता था। बिगड़ैल व बैल कभी नहीं सुधरते थे। यों छड़ी वाले मास्टरों का ज़बरदस्त जलवा था। बिगड़ैल छात्र भी खौफ़ज़दा रहते थे। मगर क्या मजाल कि कोई पलट कर चूं भी करे या बदले की भावना पाले। दरअसल उन्हें मालूम था कि किस कसूर की सजा मिली है। मजे की बात तो ये थी कि उस जमाने के मां-बाप भी बच्चे का दाखिला ऐसे स्कूल में कराना पसंद करते थे, जहां प्रशासन व प्रिंसिपल सख्त हो और छड़ी मास्टरों की भरमार हो। बेंच पर खड़ा करना या मुर्गा बनाना तो आम था ।
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Monday, December 16, 2013
खूब याद हैं गुज़रे ज़माने के गुरुजन
हमें वो गुज़रा ज़माना भली-भांति याद है जब अपने शहर में शिक्षकों की प्राथमिकताओं मे एक अच्छा जिम्मेदार नागरिक और बेहतर शैक्षिक माहौल देना था। कुछ अपवादों को छोड़कर तमाम स्कूल-कालेजों के शिक्षक प्राइवेट ट्यूशन नहीं करते थे। ज्यादातर समर्पण की भावना रखते थे। क्योंकि उन्हें मालूम था कि परिवार संस्कार डालता है तो शिक्षक छात्र को इंसान बनाता है। आमतौर पर शिक्षक गरीब थे, परंतु उन्हें समाज में अति सम्मान का दर्जा प्राप्त था। उनका फोकस कुशाग्र छात्रों पर नहीं कमजोर छात्रों के प्रति था। कभी एक्स्ट्रा क्लास लेकर तो कभी उनके माता-पिता को परामर्श देकर। हमने भी ऐसी अनेक एक्स्ट्रा क्लासें अटेंड की थीं। शिक्षकों के पढ़ाने और बिगड़ैल व बैल छात्रों को सुधारने के तरीके अलग-अलग थे। कुछ प्यार से और कुछ ‘समझावन लाल’ यानी छड़ी से भय बनाते थे। हालांकि इसका कोई लाभ नहीं होता था। बिगड़ैल व बैल कभी नहीं सुधरते थे। यों छड़ी वाले मास्टरों का ज़बरदस्त जलवा था। बिगड़ैल छात्र भी खौफ़ज़दा रहते थे। मगर क्या मजाल कि कोई पलट कर चूं भी करे या बदले की भावना पाले। दरअसल उन्हें मालूम था कि किस कसूर की सजा मिली है। मजे की बात तो ये थी कि उस जमाने के मां-बाप भी बच्चे का दाखिला ऐसे स्कूल में कराना पसंद करते थे, जहां प्रशासन व प्रिंसिपल सख्त हो और छड़ी मास्टरों की भरमार हो। बेंच पर खड़ा करना या मुर्गा बनाना तो आम था ।
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