पोलीथीन को पर्यावरण तथा ज़िंदगी के लिये ज़हर मान चुके हमारे एक अज़ीज़
मित्र उस दिन अख़बार में ये ख़बर पढ़ कर बेहद खुश थे कि लखनऊ शहर की एक बड़ी मार्किट
के व्यापारियों ने तय किया है कि वे आइंदा पोलीथीन बैग्स का इस्तेमाल नहीं करेंगे।
इलावा इसके एक समाजसेवी संस्था ने भूतनाथ मार्किट को पोलीथीन-मुक्त करने की मुहिम के
अंतर्गत मुफ़्त झोले व लिफा़फे़ बांटे। इत्तिफ़ाक़ से मित्र उस वक़्त वहीं मौजूद थे। इससे
पहले इतना खुश तब हुए थे जब कुछ साल पहले सरकार ने पोलीथीन बैग्स पर पाबंदी का ऐलान
किया था।
उनको वो ज़माना याद आया जब पोलीथीन बैग्स का किसी ने नाम तक नहीं सुना
था। हर सामान काग़ज़ से बने लिफ़ाफ़ों में पैक हो कर मिलता था। चूंकि भारी और ज्यादा सामान
का बोझ काग़ज़ी लिफ़ाफे़ बर्दाश्त नहीं कर पाने के कारण जल्दी फट जाते थे इसलिये इन लिफ़ाफ़ों
को एक बड़े कपड़े के थैले में रख दिया जाता था। सब्ज़ी-तरकारी आदि की खरीद के वक़्त पहले
आलू-प्याज़ जैसी सख़्त जान वाले आईटम थैले में सबसे पहले रखे जाता थे और बाद में मुलायम
आईटम का नंबर आता था। सबसे ऊपर लाल-लाल टमाटर और हरी धनिया को जगह मिलती थी।






