Sunday, April 13, 2014

घात में बैठे आटो वाले!

-वीर विनोद छाबड़ा

किसी भी लखनऊ वाले से पूछ लीजिये। सबसे ज्यादा परेशान आटो वालों से होता मिलेगा। बस का तो कोई निश्चित टाईम  है नहीं। भरोसा नहीं कि आयेगी भी। लिहाज़ा आम आदमी उसके होने या न होने को कोई त्वज़ो नहीं देता। रिक्शा हालांकि सर्वसुलभ है। परंतु महंगी और स्लो होने के कारण लोग नज़दीकी दूरी के लिये भी आटो के इस्तेमाल को ही प्राथमिकता देते हैं। लंबी दूरी के लिये तो आटो ही
एकमात्र सहारा है। सुबह-शाम आफिस टाईम पर इन आटो वालों की पौ-बारह होती है। कई स्कूलों का भी लगभग यही टाईम है। हर आदमी को गंतव्य तक पहुंचने की जल्दी रहती है। यों आटो की तादाद अच्छी-खासी है। मगर ये आटो वाले डिमांड बढ़ाने के लिये जरूरत से कम आटो सड़क पर उतारते हैं। ऐसे में डिमांड&सप्लाई का बैलेंस बिगड़ता है। आप आटो के पीछे भागते हो। ये नज़ारा देख आटो वाला खुद को मुख्तार समझता है। आपको मुंशी पुलिया से आठ किलो मीटर दूर जवाहर भवन जाना है, मगर आटो वाला 12 किलोमीटर दूर चारबाग की सवारी बैठाता है। आपकी गरज़ हो तो चारबाग का किराया देकर बीच रास्ते जवाहर भवन उतर जाओ। यही हाल पूरे लखनऊ का है। मुए किराया भी अनाप-शनाप लेते हैं। तय भाड़ा आठ रुपये हैं, मगर आटो चालक दस से कम पर राजी नहीं होता। सवारी झिक-झिक करती है तो दूसरे यात्री चिल्लाते हैं- अरे जाने भी दो न... दो ही रुपये की तो बात है... जल्दी करिये... हमें भी आफ़िस की देर हो रही है... आपके चक्कर में मेरा क्रास लग जायेगा... आधी सीएल चली जायेगी...।

बंदे को हैरानी होती है कि ऐसे मारा-मारी के माहौल में भी कुछ आटो वाले स्टैंड से तनिक हट कर आराम फ़रमाते होते हैं। कोई-कोई खाली आटो तो सामने से मुंह चिढ़ाते हुए सरपट निकल जाता है।
आराम करते हुओं से आप अति विनम्रता से निवेदन करते हो- ‘भैया फलां जगह चलोगे?’ ज्यादातर तो आपको त्वज़ो ही नहीं देंगे। अगर किसी ने मुड़ कर जवाब दे भी दिया तो तय बात है कि उसमें जग प्रसिद्ध लखनऊ की गंगा-जमुनी तहज़ीब के कुछ अंश बाकी हैं या फिर आपने सुबह&सुबह किसी भलेमानुस के दीदार किए हैं। 

इनकी हरकतों से दुखी बंदे ने सिक्सटी प्लस होने के बावजूद रिसर्च करने की ठानी। क्या इन निठल्ले चालकों के आटो में खराबी है?  इनका हाज़मा खराब है या पेचिश की शिकायत हैं? बीवी की डांट खायी है? या उससे कोई झंझट हुआ है? इनके पेट पहले से इतने भरे हैं कि इन्हें अब और पैसे की ज़रूरत नहीं है? इसी तरह के कई सवाल ज़हन में पैदा होते हैं।

Monday, April 7, 2014

वीनू मांकड़ - एक हैरतअंगेज़ हरफ़नमौला !

-वीर विनोद छाबड़ा

अच्छा-भला खिलाड़ी जब घरेलू क्रिकेट में धड़ाधड़ रन बना रहा हो। क्रिकेट के तमाम विद्वान समीक्षक उसकी प्रशंसा करते न अघाते हों। मगर ऐन चयन के वक़्त सारी उम्मीदों का सत्यानाश करते हुए राष्ट्रीय टीम में उसका नाम न हो! बड़ा अजीबो-गरीब और तकलीफ़देह लगता है न ये सब देख-सुन कर। पर भारतीय क्रिकेट में ऐसी घटना को होना कोई अजूबा नहीं है। बेहद हैरान-परेशान होने वाली बात है यह कि आज से तकरीबन 53 साल पहले एक ऐसे खिलाड़ी को नहीं चुना गया था, जिसने न सिर्फ़ पिछला टेस्ट जिताया था बल्कि साथ ही अंतर्राष्ट्रीय टेस्ट क्रिकेट में पहली-पहली जीत का मीठा-मीठा स्वाद भी चखाया था।

इस खिलाड़ी का नाम था मूलवंतराय हिम्मतलाल मांकड़ उर्फ़ वीनू मांकड़। इस महान हरफ़नमौला को भारत का कीथ मिलर कहा जाता है। वीनू ने 1951-52 की श्रंखला के आखिरी टेस्ट (मद्रास का चेपक मैदान) में भारत को इंग्लैंड पर अपनी स्पिन गेंदबाज़ी की बदौलत शानदार जीत दिलायी थी। उनका
प्रदर्शन था पहली पारी में 8 विकेट पर 55 रन और दूसरी पारी में 53 रन देकर 4 विकेट। मगर हैरत की बात यह थी कि अंग्रेज़ों के विरुद्ध इस हैरतअंगेज़ प्रदर्शन के बावजूद वीनू मांकड़ का नाम कुछ महीनों बाद इंग्लैंड के सफ़र के लिये कूच करने वाली भारतीय टीम में शामिल नहीं था। क्यों नहीं था? इस क्यों का जवाब इतना भौंडा था कि जिसने भी सुना उसने दीवार पर माथा पटक दिया।

Tuesday, April 1, 2014

राम भरोसे चलता सिस्टम!

&वीर विनोद छाबड़ा

हमारे शहर लखनऊ के इंदिरा नगर के एक क्षेत्र से सुधार व विकास के ढेर सारे वादों पर पुनः निर्वाचित परम ईश भक्त सभासद से जनता को पूरी आशा थी कि इस बार ज़रूर गलियों की मुद्दत से उखड़ी सड़क बनेगी। बरसों से चोक सीवर खुलेंगे। आये दिन के जल भराव से निजात मिलेगी। खुशहाली के इंतज़ार में बूढे़ हो चले बदहाल पार्का के दिन बहुरेंगे और गंदा बदबूदार पानी उगल रहे नल से अविरल शुद्ध पानी प्रवाहित होगा।


आगे की कथा से पूर्व जरूरी है कि यह ख़बर पढ़ लें। भारत के एक माह के भ्रमण के बाद एक विदेशी ने ट्वीट किया- ’’घनघोर नास्तिक होने के नाते मैं ईश्वर के अस्तित्व पर कभी यकीन नहीं करता था। परंतु भारत में सारे सिस्टमों को राम भरोसे चलते देख कर मुझे भगवान के ‘होनs  का पक्का यकीन हो गया है।’ हमारे सभासद महोदय भी राम भरोसे सिस्टम के घनघोर अनुयायी हैं। इसीलिये उन्होंने उस बदहाल व उजाड़ पार्क की घास-फूस सरकारी तंत्र के माध्यम से कटवायी।  आस-पास की जनता की तमाम
आपत्तियों- अपीलों को दरकिनार करके उसे वहीं फूंकवाया। नतीजा ये हुआ कि आस-पास के इलाके में धूंए का भीषण प्रदूषण फैल गया। तमाम घरों में धूंआ घुस गया। इसके बुरे असर से कई लोग बुरी तरह खांसने लगे। वृद्धजनों का दम घुटते-घुटते बचा। अस्थमा पीड़ित दो जनों को अस्पताल की शरण लेनी पड़ी। जब सभासद महोदय से शिकायत की गयी तो बोले-’‘आप लोगों की गल्ती है। घर की खिड़कियां बंद कर लेनी चाहिए थीं।’’ हमारे मोहल्ले के स्वंयभू अध्यक्ष जी ने भी उनकी हां में हां मिलायी। फिर उन्होंने धर्म-कर्म का हवाला दिया- ’’मैं तो आप ही लोगों के भले के लिये एक धार्मिक आयोजन इस पार्क में कराने जा रहा हूं। अब भगवान के नाम का अपूर्व धन लूटने के लिये थोड़ा-बहुत कष्ट तो सहना ही पड़ेगा।’’ धर्म-कर्म जैसे बेमिसाल मिसाईल के सामने बड़े बड़े ढेर हो जाते हैं। ऐसे में बेचारे मोहल्ले के वो  चार-पांच शिकायतकर्ता मुंह लटकाने के सिवा और कर भी क्या सकते थे।