-वीर विनोद छाबड़ा
आज सुबह-सुबह
मेमसाब बोलीं - ये देखो मेरी बगिया में मिर्ची निकली। लाल-लाल।
हमने गौर से
देखा। न देखता तो आफ़त! यों भी सुखी पारिवारिक जीवन के लिए वो सब ज़रूर देखना चाहिए
जो
मेमसाब दिखाना चाहती हैं या जो वो देखना चाहती हैं। मैंने एक कदम आगे बढ़ कर कहा - हरी
मिर्च भी हैं ढेर सी। यही तो लाल हुई हैं।
उन्होंने मुझे
गुस्से से देखा। मानो कह रही हों जितना दिखाया उतना ही देखो। खैर, वो आज बहुत खुश हैं।
यों घर की बाग-बगिया
में दिलचस्पी रखने वाले तब-तब बाग-बाग होते हैं जब-जब उनकी बगिया में कोई फल-फूल खिलता
है। कितना ही ख़राब क्यूं हो मूड, बगिया की अच्छी खबर से खिल उठता है। ये उनकी मेहनत
का नतीजा जो होता है।
हमने किसान को
भी इसी तरह खुश होते देखा है। लेकिन निराश होते भी जब कोई उसे उजाड़ दे या बारिश न होने
से सूखा पड़ जाये या बाजार में उसका उचित मूल्य न मिले। मेमसाब भी किसान की तरह निराश
होती हैं।
बहरहाल, मेमसाब
की ख़ुशी में हम शामिल हैं। आज कुछ अच्छा खाने को मिलेगा। हर आइटम में मिर्च होगी लाल
भी और हरी भी। मिर्ची का आचार भी होगा। संभव है मीठे में भी मिर्ची हो। जो भी हो ज़ुबान
वाली मिर्च से हर सूरत में बेहतर ही होगी न!
मिर्ची से मुझे
एलर्जी है। मुंह में बेतरह जलन होती है। माथे से पसीना चूने लगता है। दो-चार छींकें
भी आती हैं। सब बर्दाश्त है। बस मेमसाब खुश रहें। मेम साब खुश तो घर में बहार है। बिना
हवा और वातानुकूलित यंत्र के भी ठंडी बयार है। हम अपनी तरफ से उन्हें हरचंद खुश रखने
की कवायद में जुटे रहते हैं। आखिर हमारा भी तो घर में बेहतर माहौल बनाये रखने में योगदान
होना चाहिए। ये फ़र्ज़ भी है।








