-वीर विनोद छाबड़ा
आज १७ सितंबर को हरदिल अज़ीज़ शायर हसरत जयपुरी की पुण्यतिथि है। आज के दिन १९९९ को वो जन्नतनशीं हुए थे।
हसरत का असली नाम इक़बाल हुसैन था। १५ अप्रैल १९२२ को भारत की धरती पर वो जन्मे। शुरुआती तालीम अंग्रेजी में हुई। फिर उर्दू/पर्शियन की जानकारी हासिल की। शेरो-शायरी से ज़ुनून की हद लगाव देखकर उनके दादा फ़िदा हुसैन ने उनके इस फ़न को चमकाया और हवा दी।
जुनून और तकदीर ने हसरत को जयपुर से बंबई शिफ्ट होने पर मज़बूर किया। यहां ११ रूपए माहवार पे बस कंडक्टरी की। साथ ही मुशायरों में शिरकत करते रहे। उनकी मकबूलियत बढ़ती रही।
एक मुशायरे में जनाब पृथ्वीराज कपूर ने हसरत को सुना। बेहद मुतासिर हुए। बेटे राजकपूर से सिफारिश की। राज उन दिनों लव स्टोरी 'बरसात' बना रहे थे। शंकर जयकिशन को मौसिक़ी की ज़िम्मेदारी थी। हसरत की क़लम से पहला फ़िल्मी नगमा निकला - जिया बेक़रार है, छायी बहार है, आजा मेरे बालमा तेरा इंतज़ार है.…
उसके बाद हसरत ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। एक के बाद एक यादगार नगमे दिए। इनकी तादाद पांच सौ के करीब बताई जाती है।
कहते हैं हर शायर की कामयाबी के पीछे कोई न कोई मोहतरमा ज़रूर होती है। हसरत की गिनती भी इनमें थी। वो राधा नाम की एक लड़की से बेसाख्ता मुहब्बत करते थे। उनकी नज़र में मुहब्बत किसी भी किस्म की दीवार और सरहद को नहीं मानती, चाहे वो मज़हब ही क्यों न हो। हसरत उससे कभी इज़हार नही कर पाये। उसे देने के लिए एक खत लिखा जो उनकी जेब में ही रह गया। इसे उन्होंने 'संगम' में इस्तेमाल किया - ये मेरा प्रेम पत्र पढ़ के कि तुम नाराज़ न होना….
इसी तरह ये भी अपने इश्क़ को नज़र किया - तेरी प्यारी-प्यारी सूरत की किसी की नज़र न लगे…(ससुराल). पेरिस में एक हसीना को चमचमाते लिबास में देखा तो बर्दाश्त नहीं हुआ- बदन पे सितारे लपेटे हुए ओ जाने तमन्ना कहां जा रही हो.…(प्रिंस).





