Tuesday, September 23, 2014

न हिन्दू, न मुस्लिम - जज़्बा सिर्फ़ जान बचाने का!

वीर विनोद छाबड़ा

उस दिन सुबह जब मुरादाबाद की सुमन सोकर उठी तो उसे नहीं मालूम था कि ये उसकी ज़िंदगी का आख़िरी दिन साबित होगा।

मुरादाबाद शहर के एक एरिया की पिछले चार बरस से निर्माणाधीन सीवर लाइन के मेनहोल की पिट खुली रह गई है। इस कार्य को संपन्न करने वाली कंपनी की लापरवाही का नमूना था ये।


न जाने क्या हुआ कि सुमन बरास्ता खुले मेनहोल सीवर में गिर जाती है।

वो जान बचाने की गुहार लगाती है- बचाओ बचाओ।  

कई लोग भाग कर आगे आते हैं। 

मगर इस भीड़ में जांबाज़ सिर्फ दो ही निकलते हैं। नोमान और दानिश।

वो बरास्ता मेनहोल सीवर में कूद जाते हैं।

उन्हें नहीं मालूम वो एक बहुत खतरनाक काम अंजाम देने जा रहे हैं। इसमें जान भी जा सकती है। 

और वही हुआ जिसका डर था।

Monday, September 22, 2014

प्यार दीवाना होता है.…

- वीर विनोद छाबड़ा

सत्तर के दशक का शुरुआती दौर.…

मस्त ज़िंदगी। कोई दुःख नहीं, गम भी नहीं। हर शोक और फिक्र को धुंए में उडाते चले जाने वाले मोड का युग।
एक बार परेशां मित्र बड़ी आस लिए मिले। दिल खोल दिया।

अरे, ये तो प्रेमरोगी है। मामला एकतरफ़ा प्यार का है। दिल पसीज उठा। प्रेमरोगी को आश्वासन दिया। इस मामले में अंजाम पर रोना नहीं होगा। न दूर खड़े होकर गुब्बार देखना होगा। बहारों फूल बरसाओ में कन्वर्ट होगा।

प्रेमरोगी आश्वस्त हुआ। हम होंगे कामयाब एक दिन!

हम जुट गए। खून-ए-जिगर से लबरेज़ एक खत महबूब का महबूबा को। न पावती का नाम और न प्रेषक का। ताकि पकड़ाई पर मुकरने की गुंजाईश बनी रहे। चांद-तारे तोड़ कर महबूबा के नाम किये। खुदाई तक छोड़ने की क़सम। महबूब की शक्ल में क़ायनात दिखती है। जाने क्या-क्या लिखा।

गुलाबी रंग के एनवलप में इज़हार-ए-मोहब्बत खत को रखा। प्रेमरोगी को पकड़ाया - जा बेटा। पकड़ा दे महबूबा को। फिर देख कमाल। खिंची चली आएगी। एकतरफा प्रेम को दोतरफा होने से कोई नहीं रोक पायेगा, कोई तांत्रिक भी नहीं।   

अगले रोज़ चंदन-मंडन लगा और कायदे से इस्त्री किया शर्ट-पतलून पहन प्रेमरोगी कथित प्रेमिका के पीछे चल दिया। पीछे-पीछे हम भी।

प्रेमिका के साथ उसकी सहेली भी है। परंतु प्रेमरोगी प्रेमिका के करीब पहुंच कर इतना घबराये कि ख़त प्रेमिका को देने की बजाय उसकी सहेली को पकड़ा बैठे। और भाग खड़े हुए। साथ में हम भी।

Sunday, September 21, 2014

पुलिस की ख़बरें।

-वीर विनोद छाबड़ा

पागल कौन है? वर्दीधारी या वो जिसके बदन पे एक लुंगी के सिवा कुछ नहीं।

लखनऊ के हिंदुस्तान में १५ सितम्बर २०१४ को छपी इस तस्वीर में शहर की मित्र पुलिस अपनी कार्यगुज़ारी की दास्तां खुद ही पेश कर रही है।

भुक्तभोगी के बदन पे सिर्फ एक लुंगी है। उसकी काया बता रही है उसके पास इसके अलावा पहनने को कुछ दूसरा है ही नहीं। इसकी आंतें भी भूख से बिलबिला रही हैं। ये पहले से चोट खाया हुआ है। ज़माने ने इसे बेतरह दिल पे भी चोट दी है और जिस्म पे भी। रही सही कसर वर्दी की हनक ने पूरी कर दी है जो उसे पागल समझ रही है।


विचार करने का मुद्दा है ये इसमें पागल है कौन? वर्दीधारी या वो जिसके बदन पे एक लुंगी के सिवा कुछ नहीं। ज़िंदगी भर की कमाई भी यही है।

माना वो भी पागल है और वर्दीधारी भी। यकीनन इन दोनों को जीने का हक़ है। लिहाज़ा बेहतर है कि दोनों को पागलखाने में भर्ती किया जाए।

लुंगी वाले को भूख प्यास के कारण पागल होने के कारण और पुलिसवाले को वर्दी के अहंकार के कारण।
पेट में अन्न का दाना लगातार पेट में जायेगा और तन ढकने को पूरा कपड़ा मिलेगा तो उम्मीद है कि लुंगी वाला जल्दी निरोग होगा।

लेकिन वर्दी का अहंकार तो वर्दी उतरने के बाद भी जल्दी दूर नहीं होता। बरसों बाद भी नहीं। ये अहंकार नाम का फैक्टर है ही ऐसा। सिवाय बर्बादी के कुछ नहीं देता। 

माननीय मुख्यमंत्री जी कृपया ध्यान दें। निसंदेह आपने उत्तर प्रदेश की पुलिस की ऐसी दरिंदगी से लबरेज़ तस्वीर की कल्पना सपने में भी नहीं देखी होगी।

Friday, September 19, 2014

अभी फुरसत नहीं ऊपर जाने की !

-वीर विनोद छाबड़ा

बाज़ लोगों को बीमारी है। किसी बीमार को देखने जाते हैं तो बीमार का हाल पूछते-पूछते अपना हाल बताने लगते हैं।अपने किसी फलां के फलाने के जीजा जी की सास का किस्सा ले कर बैठ जायेंगे और उसे मार कर दम लेते हैं। बस चलता है तो वहीं बैठे-बैठे क्रिया कर्म और चौथा-तेरवीं और बरसी भी कर देते हैं।

अंदाज़ा लगाया जा सकता है मरीज़ का क्या हाल होता रहा होगा।

ख़ुदा किसी को बीमार न करे। बीमार करे तो इतना नहीं कि अस्पताल में भर्ती होना पड़े। और ऐसे सज्जन मिजाज़पुर्सी के लिए तशरीफ़ न लाएं।

एक बार हमें दुश्मनों की नज़र लग गयी। अब हम ठहरे हम। कोई सर्दी जुकाम जैसी छोटी-मोटी  बीमारी तो लगेगी नहीं। दिलो जां की तकलीफ़ के साथ भर्ती होना पड़ा।

हमने कभी कसर नहीं रख छोड़ी थी। चाहे दूर का रहा हो या नज़दीक का। चाहे दोस्त के पिता हों या उनकी सास। बस ख़बर मिली नहीं कि तबियत नासाज़ है, न दिन देखा न रात, पहुंच गए मिजाज़पुर्सी को। तन मन धन से सेवाएं हाज़िर कर दीं। कई बोतल खून तक उनकी नसों में पहुंचा दिया।

अब ऐसी खिदमात का सिला तो मिलना लाज़िमी ही था न। लाख चाहा खबर न हो किसी को। नाहक परेशान होंगे लोग। मगर मेमसाब की ढिंढोरा पीटो नीति ने हमें फेल कर दिया। लाइन लग गयी।

Wednesday, September 17, 2014

हसरत जयपुरी --- मोहब्बत के पुजारी को सलाम !

-वीर विनोद छाबड़ा
आज १७ सितंबर को हरदिल अज़ीज़ शायर हसरत जयपुरी की पुण्यतिथि है। आज के दिन १९९९ को वो जन्नतनशीं हुए थे।

हसरत का असली नाम इक़बाल हुसैन था। १५ अप्रैल १९२२ को भारत की धरती पर वो जन्मे। शुरुआती तालीम अंग्रेजी में हुई। फिर उर्दू/पर्शियन की जानकारी हासिल की। शेरो-शायरी से ज़ुनून की हद लगाव देखकर उनके दादा फ़िदा हुसैन ने उनके इस फ़न को चमकाया और हवा दी।


जुनून और तकदीर ने हसरत को जयपुर से बंबई शिफ्ट होने पर मज़बूर किया। यहां ११ रूपए माहवार पे बस कंडक्टरी की। साथ ही मुशायरों में शिरकत करते रहे। उनकी मकबूलियत बढ़ती रही।

एक मुशायरे में जनाब पृथ्वीराज कपूर ने हसरत को सुना। बेहद मुतासिर हुए। बेटे राजकपूर से सिफारिश की। राज उन दिनों लव स्टोरी 'बरसात' बना रहे थे। शंकर जयकिशन को मौसिक़ी की ज़िम्मेदारी थी। हसरत की क़लम से पहला फ़िल्मी नगमा निकला - जिया बेक़रार है, छायी बहार है, आजा मेरे बालमा तेरा इंतज़ार है.…

उसके बाद हसरत ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। एक के बाद एक यादगार नगमे दिए। इनकी तादाद पांच सौ के करीब बताई जाती है।

कहते हैं हर शायर की कामयाबी के पीछे कोई न कोई मोहतरमा ज़रूर होती है। हसरत की गिनती भी इनमें थी।  वो राधा नाम की एक लड़की से बेसाख्ता मुहब्बत करते थे। उनकी नज़र में मुहब्बत किसी भी किस्म की दीवार और सरहद को नहीं मानती, चाहे वो मज़हब ही क्यों न हो। हसरत उससे कभी इज़हार नही कर पाये। उसे देने के लिए एक खत लिखा जो उनकी जेब में ही रह गया। इसे उन्होंने 'संगम' में इस्तेमाल किया - ये मेरा प्रेम पत्र पढ़ के कि  तुम नाराज़ न होना….

इसी तरह ये भी अपने इश्क़ को नज़र किया - तेरी प्यारी-प्यारी सूरत की किसी की नज़र न लगे…(ससुराल). पेरिस में एक हसीना को चमचमाते लिबास में देखा तो बर्दाश्त नहीं हुआ- बदन पे सितारे लपेटे हुए ओ जाने तमन्ना कहां जा रही हो.…(प्रिंस).