-वीर विनोद छाबड़ा

ये पचास के दशक का अंत था, जब मैंने होश संभाला था। घर में रेडियो नहीं था। स्कूल जाने के रास्ते में एक होटल था। वहां रेडियो था। सुबह-सुबह का वक़्त होता था। रेडियो पर पुरानी हिंदी फिल्मों के गाने चल रहे होते थे। गायकों में एक आवाज़़ बिलकुल अलग होती थी, जो अक्सर सुनायी देती थी। इस आवाज़ में बलां का दर्द होता होता था। कोई गहरी चोट खाया हुआ बंदा लगता था। मेरे पैर इस आवाज़ पर जाने क्यों तनिक ठिठकते थे। दरअसल उस वक़्त उस आवाज़ पर एक आदमी दीवानावार होकर हाय-हाय करता हुआ कभी अपने बाल नोचता होता था तो कभी कपड़े़ तार-तार करने पर उतारू दिखता होता था। कभी-कभी तो दीवार पर सिर भी पटकता था। होटल का मालिक इस दौरान उसे बामुश्किल कंट्रोल करने कोशिश में जुटा होता था। वो दर्द भरी आवाज़ से ये गाने निकलते होते थे- ग़म दिए मुस्तिकिल, कितना नाजु़क है दिल, ये ना जाना, हाय हाय ये ज़ालिम ज़माना... हम जी के क्या करंेेगे जब दिल ही टूट गया...चाह बरबाद करेगी हमें मालूम ना था... बाबुल मोरा नइहल छूटा जाए.. दुख के दिन अब बीतत नाहीं....। कुछ अरसे बाद, मैं बड़ा हुआ तो जाना कि वो कलेजा फाड़ कर दर्द भरी आवाज़ रेडियो सिलोन से आ रही होती थी और इस आवाज़ के मालिक का नाम कुंदन लाल सहगल था, जिन्हें परलोकवासी हुए मुद्दत हो चुकी थी। तभी मुझे इन गानों का अर्थ पता चला था और जाना था कि इस आवाज़ को सुन कर उस शख्स का कलेजा फट कर बाहर क्यों आ जाता था? तभी ये भी जाना था कि इंसान का जिस्म ज़रूर एक न एक दिन माटी होता है, मगर दिल की गहराईयों से ईमानदारी से उठी बाज़ आवाज़ें अमर रहती हैं।

ये पचास के दशक का अंत था, जब मैंने होश संभाला था। घर में रेडियो नहीं था। स्कूल जाने के रास्ते में एक होटल था। वहां रेडियो था। सुबह-सुबह का वक़्त होता था। रेडियो पर पुरानी हिंदी फिल्मों के गाने चल रहे होते थे। गायकों में एक आवाज़़ बिलकुल अलग होती थी, जो अक्सर सुनायी देती थी। इस आवाज़ में बलां का दर्द होता होता था। कोई गहरी चोट खाया हुआ बंदा लगता था। मेरे पैर इस आवाज़ पर जाने क्यों तनिक ठिठकते थे। दरअसल उस वक़्त उस आवाज़ पर एक आदमी दीवानावार होकर हाय-हाय करता हुआ कभी अपने बाल नोचता होता था तो कभी कपड़े़ तार-तार करने पर उतारू दिखता होता था। कभी-कभी तो दीवार पर सिर भी पटकता था। होटल का मालिक इस दौरान उसे बामुश्किल कंट्रोल करने कोशिश में जुटा होता था। वो दर्द भरी आवाज़ से ये गाने निकलते होते थे- ग़म दिए मुस्तिकिल, कितना नाजु़क है दिल, ये ना जाना, हाय हाय ये ज़ालिम ज़माना... हम जी के क्या करंेेगे जब दिल ही टूट गया...चाह बरबाद करेगी हमें मालूम ना था... बाबुल मोरा नइहल छूटा जाए.. दुख के दिन अब बीतत नाहीं....। कुछ अरसे बाद, मैं बड़ा हुआ तो जाना कि वो कलेजा फाड़ कर दर्द भरी आवाज़ रेडियो सिलोन से आ रही होती थी और इस आवाज़ के मालिक का नाम कुंदन लाल सहगल था, जिन्हें परलोकवासी हुए मुद्दत हो चुकी थी। तभी मुझे इन गानों का अर्थ पता चला था और जाना था कि इस आवाज़ को सुन कर उस शख्स का कलेजा फट कर बाहर क्यों आ जाता था? तभी ये भी जाना था कि इंसान का जिस्म ज़रूर एक न एक दिन माटी होता है, मगर दिल की गहराईयों से ईमानदारी से उठी बाज़ आवाज़ें अमर रहती हैं।









