Sunday, November 15, 2015

कभी सोलह आने सही होता था।

-वीर विनोद छाबड़ा
कभी एक रूपए में १०० पैसे होते थे। लेकिन आज की पीढ़ी नहीं जानती। जानती भी होगी तो उसने कभी देखे नहीं होंगे।

हमने तो वो ज़माना देखा है जब एक रुपए में ६४ पैसे और सोलह आने हुए करते थे। दो पैसे की दुअन्नी, चार पैसे की इकन्नी, इसी तरह दुअन्नी और अठन्नी भी। १९५७ से सब उल्टा-पुल्टा हो गया। अंग्रेज़ों के ज़माने के जॉर्ज पंचम और क्वीन विक्टोरिया वाले सिक्के और नोट गए।
नया रुपया आ गया और उसमें १०० नए पैसे। कुछ साल बाद 'नया' शब्द हटा दिया गया। तब तक पुरानी करेंसी काफ़ी हद तक चलन से गायब हो चुकी थी।  लेकिन छेद वाला पैसा अरसे तक हमने ताबीज़ के साथ बंधा हुआ देखा। शायद यह तांबे का होता था।
पाई भी होती थी। लेकिन हमने देखी कभी नहीं। सुनते बहुत थे कि 'पाई' भी होती थी। लेकिन कभी नहीं देखी।
तब सच्ची बात पर टिप्पणी की जाती थी - सोलह आने सही। आज चलन है - वन हंड्रेड परसेंट करेक्ट।
अब तो एक रूपए से कम मूल्य के अशोक की लॉट वाले सारे सिक्के भी गायब हो चुके हैं। 
लेकिन 'सोलह आने सही' गाहे-बगाहे चल रहा है। 
उस दिन हम बाज़ार में थे जब हमारे मुहं से निकल अनायास ही निकल गया - सोलह आने सही।
एक नौजवान ने हमें एक बार सर से पाँव तक निहारा। फिर मुस्कुरा कर चल दिया।
हमने अनुमान लगाया कि मन ही मन ज़रूर कहता होगा - सिक्सटी प्लस है। अंग्रेज़ों के ज़माने का।  
सही सोचता है वो। सिक्सटी प्लस को ही अंग्रेज़ों के ज़माने के सिक्के याद होंगे। ऐसे में हमें याद आता है, कभी हम भी नई पीढ़ी थे। जो आज की पीढ़ी पुरानी पीढ़ी के बारे में सोचती है ऐसा हम भी सोचते थे। यह सिलसिला तो बाप-दादा के काल से चला आ रहा है। शिकायतों का दौर भी चलता आया है। हर दौर की अपनी ज़रूरतें और प्रतिमान होते हैं। 

Saturday, November 14, 2015

उस दौर में हमारे लिए सिर्फ़ चाचा नेहरू थे।

- वीर विनोद छाबड़ा
पचास का दशक था वो। आठ-दस साल के रहे होंगे हम। लखनऊ के आलमबाग की चंदर नगर मार्किट के ऊपर रहते थे। सामने से गुज़रती कानपुर रोड की दूरी अधिक से अधिक पचास-साठ की मीटर रही होगी। वहां से जितने भी वीआईपी गुज़रते थे, उन्हें हम आसानी से देख सकते थे। लेकिन ज्यादा नज़दीक से देखने की हसरत हमें सड़क किनारे खींच लाती। दो दिन पहले से अमौसी एयरपोर्ट से ही सड़क के दोनों तरफ बल्ली-ठड्डी बैरिकेडिंग कर दी जाती थी। स्कूल में छुट्टी कर दी जाती। हमें बताया जाता - चाचा नेहरू आ रहे हैं।

 
चाचा नेहरू खुली कार में आते थे। सड़क के दोनों तरफ अथाह भीड़ जमा हो जाती थी। एक झलक पाने को दुकानदार भी थोड़ी देर के लिए दुकान छोड़ कर आ जाते थे। हमने दो बार देखा है उन्हें। बिलकुल सुर्ख़ चेहरा। शेरवानी और गुलाब का फूल। ये पहचान थी उनकी। हमें नहीं मालूम था कि वो देश के प्रधानमंत्री हैं। हमारे लिए वो बस चाचा नेहरू ही थे।
 
हमें याद है कि चाचा नेहरू का भाषण सुनने झंडेवाला पार्क या बेगम हज़रतमहल पार्क में भारी भीड़ जमा होती थी। एक बार पिताजी ने कंधे पर बैठा कर दिखाया था - वो देखो चाचा नेहरू।

चाचा नेहरू का भाषण १५ अगस्त को रेडियो से प्रसारित होता था। उन दिनों हमारे घर में रेडियो नहीं था। रेडियो होना धनाढ्य अथवा बड़ा अफ़सर होने की  निशानी होती थी। एक बार उनके भाषण के बाद हमारे घर बैठक जमी। यों भी हमारा घर अदबी बैठकों के लिए मशहूर था। उस दिन तमाम अड़ोसी-पड़ोसी जमा हुए। नेहरू जी के भाषण पर जम कर बहस हुई। उन्होंने क्या कहा और उसका मतलब क्या है? इसका असर कहां तक पहुंचेगा? इस दौरान एक पड़ोसी ने नेहरूजी को बुरा-भला कह दिया था। इस पर दूसरा पड़ोसी नाराज़ हो गया। महीनों उनमें कुट्टी रही। फिर इसी बैठक में उन दोनों में बाक़ायदा जश्न मना कर सुलह करायी गयी। 

१४ नवंबर को बाल दिवस होता था। सफ़ेद कुरता पायजामा और नेहरू टोपी पहन हम स्कूल जाते थे। मास्टरनियां आह्लादित होकर कहती थीं - देख कैसे गुड्डे गुड्डियां लग रहे हैं सब बच्चे। पायजामे बार बार सरकते थे। मास्टरनियां को उन्हें कस कर बांधना पड़ता था। वहां बच्चे मिठाई और समोसा खाते थे और चलते वक़्त दो लड्डू लिफाफे में रख दिए जाते। उस दिन बच्चों के साथ-साथ माता-पिता के दिलों में भी उत्साह होता था। शाम को स्कूल में खास प्रोग्राम होते। ड्रामा, चुटकुले, नाच के साथ गाना और संगीत। सब बच्चे ही करते थे। इनमें बच्चों के माता-पिता भी बड़ी ख़ुशी-ख़ुशी सम्मिलित होते थे। बाज़ दुकानदार बच्चों को मुफ़्त टॉफी-बिस्कुट भी बांटते थे।

Friday, November 13, 2015

बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले।

-वीर विनोद छाबड़ा
१९८८ की बात है। ऑफिस के सहकर्मी मित्र रामेश्वर ने भाई की शादी के उपलक्ष्य में प्रीतिभोज का आयोजन रखा।
हमें भी सपरिवार सम्मिलित होने का न्यौता मिला। हम और बच्चे खुश। बढ़िया-बढ़िया पकवान मिलेंगे खाने को। पत्नी खुश कि आज खाना बनाने से फ़ुरसत।

हम पहली बार जा रहे थे उनके घर। मित्र ने पता दिया - डालीगंज में एक बहुत मशहूर जगह है, चरही हसनगंज। चलती-फिरती गली है। आईटी चौराहे से करीब आधा किलोमीटर पर पड़ेगी। सीधा मेरे घर पर आकर रुकती है। यह शार्ट-कट है। 
सर्दी के दिन थे। पत्नी-बच्चों को स्कूटर पर लादा और कड़कड़ाती ठंड में चल दिए।
डालीगंज में घुप्प अंधेरा। उन दिनों आठ बजे तक दुकानें बंद हो जाती थीं। स्ट्रीट लाईट का कोई इंतज़ाम नहीं। सन्नाटा था। चरही हसनगंज दिख ही नहीं रही थी। इक्का-दुक्का राहगीर ही मिले। एक से पूछा, दो से पूछा। तीन-चार और से भी पूछा। किसी को नहीं मालूम कि चरही हसनगंज क्या बलां है। मोबाईल नाम की चिड़िया तो सपनों में नहीं दिखी थी कभी। टेलीफ़ोन था नहीं रामेश्वर के घर में।
पत्नी गुस्सा और बच्चे उदास। कैसा दोस्त है? कोई एड्रेस ही नहीं उसका।
हमने इरादा किया कि आ अब लौट चलें। हम वापस मुड़ने को थे ही कि थोड़ी दूर पर तंबू-कनात दिख गया। लाऊड स्पीकर पर फ़िल्मी गाने भी चल रहे थे। शायद यही है। हर्ष से तब-बदन प्रफुल्लित हो उठा। आंखें चमक उठीं - यूरेका यूरेका…वो मारा पापड़ वाले को।
हम लपक कर पहुंचे। एक दर्शनाभिलाषी प्रौढ़ सज्जन खड़े थे, आगंतुकों का स्वागत करने।
हमने पूछा - राम.…
बात पूरी होने से पहले ही उन्होंने हमें गले लगा लिया - आईये, आईये… अरे ओ वेटर,  कॉफ़ी लाओ इधर।
सर्दी में कॉफ़ी नाम सुनते ही राहत मिल गई। दो-चार घूंट हमने कॉफ़ी सुड़क ली। ख्याल आया कि ऑफिस का कोई बंदा नहीं दिख रहा है और न रामेश्वर। हमने दर्शनाभिलाषी से पूछा - रामेश्वर नहीं दिख रहा है।
उन्होंने हमें सर से पांव तक देखा - कौन रामेश्वर?
हमने कहा - वही रामेश्वर, जिनके भाई की शादी का रिसेप्शन है।
उन्होंने हमें भस्म करने वाली नज़रों से घूरा - मिस्टर यह रामप्रकाश का घर है और उनकी शादी का रिसेप्शन है।
यह कहते-कहते उन्होंने मेरे हाथ से कॉफ़ी का प्याला छीन लिया।
हमें दर्शनाभिलाषी के व्यवहार पर बहुत क्रोध आया। किसी तरह खुद को नियंत्रित किया। पत्नी और बच्चों ने कॉफ़ी लगभग ख़त्म कर ली थी। हमने उन्हें स्कूटर बैठाया और घर की और चल दिए। बड़े बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले।
थोड़ी दूर चले ही थे कि स्कूटर की हेडलाइट में हमें एक सूट-बूट वाला दिखा। ज़रूर ये किसी शादी में जा रहा है या लौट रहा है। हमने सोचा कि एक चांस और लिया जाए। उसके आगे स्कूटर रोक दिया - भैया, यह चरही हसनगंज किधर है?

Thursday, November 12, 2015

बिजली वाले हो तो मैं क्या करूं?

- वीर विनोद छाबड़ा
एक ज़माना था जब अपने यूपी में बिजली विभाग के अदने से कर्मचारी का भी ज़बरदस्त जलवा हुआ करता था।
हमें याद आता है सत्तर और अस्सी का दशक था यह। लखनऊ का कोई भी सिनेमा रहा हो और कितनी ही लंबी लाईन रही हो, हम लोगों को टिकट के लिए कभी दिक्कत नहीं हुई। हाऊसफुल के बावजूद कभी निराश नहीं लौटे। तकरीबन सभी मैनेजर जानते थे।

उन दिनों नोवेल्टी लालबाग के मैनेजर थे - टंडन साहब (नाम पूरा याद नहीं). लंबा-चौड़ा डील-डौल और सख्त मिज़ाज भी। दुबले-पतलों को तो कॉलर से उठा कर बाहर फ़ेंक देते थे। लोग डरा करते थे उनसे। लेकिन हम लोगों पर मेहरबान।
एक दिन फ़िल्म देखने गए। शायद 'सिलसिला' चल रही थी। हाउसफुल की तख्ती टंगी थी। हम लोग बिना नॉक किये धड़धड़ाते हुए घुस गए टंडन साहब के ऑफिस में।
टंडन साहब अख़बार पढ़ते हुए चाय पी रहे थे वो। सर उठा कर हमें देखा उन्होंने - क्या है?
उन्होंने जिस अंदाज़ से हमें देखा और पूछा, उससे हमें हैरानी हुई। हमने कहा - जी, शायद आपने पहचाना नहीं हमें। हम बिजली बोर्ड से हैं।
टंडन साहब पर कोई असर नहीं पड़ा। बड़ी सख्ती और बेरुखी से बोले - हां, तो मैं क्या करूं?
टंडन साहब के इस रवैये से हमें बड़ा धक्का लगा। स्तब्ध हो गए। लंबा-चौड़ा आदमी। हम डर भी गए। जैसे-तैसे हम लोग बोले - जी, वो चार टिकट चाहिए थे।
टंडन साहब बौखला गए - देखा नहीं बाहर हाउसफुल लगा है।
हम बोले -सर, तभी तो हम आपके पास आये हैं। हम बिजली बोर्ड से.…
टंडन साहब हत्थे से उखड़ गए। एकदम उठ कर खड़े हो गए - बिजली वाले हो तो क्या हुआ? लार्ड गवर्नर हो गए क्या? नहीं दूंगा टिकट। क्या कर लोगे? बत्ती कटवा दोगे? जाओ काटो। मेरे पास जनरेटर है। चला लूंगा फ़िल्म।
याद नहीं हमें ठीक-ठीक कि बाहर आने में कितना टाईम लगा। लेकिन अंदाज़ा है कि टंडन साहब के दो कहने से पहले हम लोग बाहर थे।

Wednesday, November 11, 2015

कंटाप रसीद दिया - शाहरुख ही क्यों पसंद है?

- वीर विनोद छाबड़ा
मुझे याद आ रहा है नब्बे का दशक। 'दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे' रिलीज़ हो चुकी थी। शाहरुख़ खान की गुड्डी सातवें आसमान पर थी। हर दूसरा-तीसरा लड़का शाहरुख़-कट हेयर स्टाईल। जैसे अपने ज़माने में देवानंद कट।
शाहरुख की आवाज़ और एक्टिंग की भी नकल उतारी जा रही थी। कई शोहदों के पर्स में फोटो भी रहने लगी थी शाहरुख की। लड़कियों के तकिये के नीचे शाहरुख की तस्वीर पायी जाने लगी।

एक क्या हुआ कि हमारी एक सहकर्मी के १८-१९ साल बेटे को सिपाहियों ने धर दबोचा। टाईम रात एक बजे। किसी शादी की दावत उड़ा कर लौट रहे थे। इलज़ाम - थोड़ी-थोड़ी लगी हुई थी। हेलमेट नहीं। एक मोटर साईकिल पर तीन सवारी। उस पर तुर्रा यह कि रोकने पर भी नहीं रुके। दौड़ा कर पकड़ना पड़ा। तलाशी हुई। जेब से पर्स निकला। रुपया पैसा तो कुछ ख़ास नहीं। यही कोई पच्चीस-तीस रूपए। भिखमंगों की औलाद हैं साले सबके सब। 
लेकिन इंस्पेक्टर खान का खून इससे नहीं खौला। खौला तो इस बात पर कि हेयर स्टाईल शाहरुख खान जैसी और डबल जुर्म कि पर्स में फोटो भी निकली तो शाहरुख़ खान की। साले, लोग लौंडिया की फोटो रखते हैं और यह हैं कि.…
जाने क्यों इंस्पेक्टर खान बहुत घृणा करते थे, शाहरुख से। शायद इसलिए कि अगर शाहरुख़ पैदा न हुआ होता तो शर्तिया वो फिल्मों में हीरो होते। बहरहाल, घसीट कर एक कंटाप रसीद दिया - आजकल जिसे देखो शाहरुख़ खान बना फिरता है। अबे, कोई दूसरा एक्टर नहीं मिला क्या? आमीर खान में क्या बुराई है?

Tuesday, November 10, 2015

हम आज तक माफ़ नहीं कर पाये हैं बिहारी बाबू को!

- वीर विनोद छाबड़ा 
१९७१ की बात है। हम बंबई गए थे।अपने मित्र नील रतन से मिलने, घूमने और देखने कि कैसे स्ट्रगल करते हैं यहां लोग। नील रतन भी वहां एक्टर बनने के चक्कर में गया था। यों हम भी उन दिनों ट्वेंटी प्लस के नौजवान थे और देखने में भी ठीक-ठाक। 
  
बहरहाल, दोपहर बैंडस्टैंड पर टहल रहे थे।
नील रतन ने बताया कि सामने ये जो ऊंची बिल्डिंग देख रहे हो, इसमें कई एक्टर रहते हैं। इसी में एक नाम शत्रुघ्न सिन्हा का भी है।
यह सुनते ही हमारा दिल मचल उठा - वो अपना बिहारी।
तब तक हम शत्रुघ्न सिन्हा को साजन, चेतना, प्रेम पुजारी आदि कुछ फिल्मों में देख चुके थे। खिलौना में तो वो बाक़ायदा विलेन था - बिहारी। रोल बड़ा नहीं था लेकिन इम्प्रेस किया था उसने। 
नील रतन ने हमारे चेहरे पर चमक देखी - चलो मिलते हैं बिहारी से।
हमने कहा - मज़ाक करते हो यार। हमसे क्यों मिलेगा? 
नीलरतन अड़ गया - अभी इतने बड़ा एक्टर नहीं है बिहारी बाबू कि मिलने से मना कर दे। आख़िर इतनी दूर लखनऊ से मिलने आये हैं। पता नहीं घर पर है भी कि नहीं। चलो, चांस लेते हैं। 
थोड़ी देर बाद ही हम शत्रुघ्न सिन्हा के अपार्टमेंट के सामने खड़े हो थे। दिल में धुक-धुक हो रही थी। अपने बिहारी बाबू से मिलने जा रहे हैं, कल के स्टार विलेन से।
नीलरतन ने बेल बजाई। कुछ पल इंतज़ार किया। दरवाज़ा खुला। कोई नौकर था। बड़ी बेरुखी से पूछा - क्या है?
नीलरतन ने कहा - शत्रुजी से मिलने आये हैं।
उसने टका सा जवाब दिया - वो घर पर नहीं हैं। शूटिंग पर गए हैं।
यह कह कर वो दरवाज़ा बंद करने जा ही रहा था कि नीलरतन ने पैर अड़ा दिया - हम इतनी दूर लखनऊ से खासतौर पर मिलने आये हैं। उनसे बोल दो प्लीज़। 
नौकर को तरस आ गया - ठीक है। बोलता हूं।
एक मिनट न गुज़रा था कि शत्रुघ्न सिन्हा आ गए। दुबला-पतला बांका जवान। हम दोनों ने उन्हें नमस्ते की और बताया कि लखनऊ से आये हैं, आपसे ख़ास मिलने।

Monday, November 9, 2015

बॉस, बॉस होता है।

- वीर विनोद छाबड़ा
हमारे एक बॉस हुआ करते थे। बॉस नहीं, सुपर बॉस थे। लोग कहते भी बॉस थे। कर्मठ और ईमानदार। क़ानून कायदे से चलने वाले। कड़क, गुस्सैल और अपनी मर्ज़ी वाले। ऐसे लोग थोड़ा सनकी भी होते हैं। मुंह से न निकल गयी तो फिर किसी भी कीमत पर हां नहीं। चाहे सर फूटे या माथा।

एक दिन सरकार ने फरमान दिया - फलां का ट्रांसफर फलां जगह कर दो। बॉस ने तहक़ीक़ात की। पता चला कि सही आदमी नहीं है वो। मना कर दिया।
माननीय मंत्री जी नाराज़ हो गए। नतीजा, यह हुआ कि हो गया हेडक्वार्टर से ट्रांसफर, एक प्रोजेक्ट पर। उन दिनों प्रोजेक्ट पर ट्रांसफर का मतलब तड़ीपार।
ऐसे लोग बोरिया-बिस्तर हमेशा बांध कर रखते हैं। बॉस चल दिए।
कुछ महीने बाद ज़रूरत आन पड़ी, बॉस कुछ सीक्रेट चिट्ठी भेजने की। साथ में जवाब भी ज़रूरी लाना था। उन दिनों फैक्स का सिस्टम नहीं था। हरकारे ही भेजने पड़ते थे। अब वो ठहरे गुस्से वाले। कौन जाए? आखिर बलि का बकरा हम बने। देखने में भोले-भाले। हमको अच्छी तरह जानते भी थे। गुस्सा नहीं होंगे।
हम तैयार हो गये। सील्ड करके हमारे सेक्रेटरी ने हमें पत्र दिया।
रात्रि भर ट्रेन की यात्रा करके अगली सुबह हम पहुंचे गंतव्य पर। बॉस के सामने पेश हुए।
हमें बैठने का ईशारा करते हुए उन्होंने चिट्ठी पढ़ी। फिर वो हमसे बातें करने लगे। हेडक्वार्टर और वहां के लोगों का हाल-चाल पूछने लगे। इस बीच उन्होंने चिट्ठी को एक किनारे से रोल किया। उसके कोने से कान साफ़ किया और फिर डस्ट-बिन में फ़ेंक दिया।
उन्होंने अपने एक असिस्टेंट को बुलाया और कहा - यह हेडक्वार्टर से आये हैं।  वीआईपी गेस्ट हाऊस में इनके ठहरने और खाने-पीने का इंतज़ाम करो। इन्हें प्रोजेक्ट दिखाओ। आसपास खूब घुमाओ।