Tuesday, March 21, 2017

पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए

-वीर विनोद छाबड़ा
Drinking is not good for health
कोई ४५ बरस पहले की बात है। हम अपने के मित्र के घर गए। देखा, वो खरगोश को बीयर पिलाने को कोशिश कर रहे थे।
हमने पूछा - ऐसा क्यों कर रह हो?
वो बोले - यार, ये बिल्ली से डरता है। बीयर पिला कर इसे मुकाबले के लिए तैयार कर रहा हूं।
वो दिन है और आज का।
हमने दुनिया में अनेक लुंज-पुंज सूटेड-बूटेड शख्सियतों को देखा है। महफ़िलों में बेआवाज़ आते हैं और एक कोने में कुर्सी खींच कर बैठ जाते हैं। रॉक पर एक पैग डलवाया। भुने मुर्गे की टांग मुंह में दबाई। और फिर दो घूंट हलक से नीचे उतरते हैं। अचानक जैसे आग लग गई हो। वो लुंज पुंज शख्सियतें जी उठती हैं। उनके पैरों में थिरकन आ जाती है। मुंह में बोलने वाली जुबान लग जाती है। और आखिर में होता यह है कि अक्सर ऐसे ही लोग महफ़िल लूट कर ले जाते हैं।
हम एक ऐसे साथी अधिकारी को जानते हैं जो बॉस के बुलाने पर अकेले जाने में घबराते थे। उनकी कोशिश रहती कि कोई साथ चले। फिर किसी ने 'घुट्टी' पीनी सीखा दी। दो पैग लगाये। मुंह में दो जोड़ा ३२ नंबर तंबाकू किमाम जर्दा सहित किनारे ठूंसा। पांच मिनट जुगाली की। फिर पिच से थूका। अलमारी के पीछे वाली पहले से रंगीन दीवार और भी रंगीन हो गयी। बॉस से अकेले ही लंबी-लंबी वार्ताएं करने लगे। यहां तक कि गलत बात पर भिड़ने भी लगे। उन्हें कई बार वार्निंग भी मिली। लेकिन बाज़ न आये। 
दरअसल ये नामुराद चीज़ ही ऐसी है कि असहज को मिनटों में सहज बना देती है।
इसके सहारे बड़ों-बड़ों को खुश करने वाले भी बहुत देखे हैं हमने। बिगड़े कामों को संवरते भी देखा है।
किसी को महल बनाते देखा है और किसी के महल गिरते हुए भी देखे हैं।
चिराग जलते ही शेर बने हुओं को सुबह को भीगी बिल्ली बने हुए भी देखा है।
दोस्ती बनते भी और टूटते भी देखी है। प्यार से गले मिलते और इसकी आड़ में छुरा घोंपते भी देखा है।
दो घूंट अंदर धकेल कर रात-रात भर भोंपू पर फ़िल्मी तर्ज पर इबादत करने वालों को भी देखा है।
ऊपर से मज़बूत दिखते मगर अंदर ही अंदर खोखले होकर मरते हुए भी देखा है।
हमने ऐसे भी देखे हैं जिन्हें कामयाबी का ऐसा नशा चढ़ा कि जश्न मना डाला। और कई टन बहा दी।

Monday, March 20, 2017

चाय बिना ज़िंदगी अधूरी

-वीर विनोद छाबड़ा
पंजाब के किसी आदमी को दावत पर बुलायें। एक से बढ़ कर एक बढ़िया परोसें। लेकिन अगर सरसों का साग, मक्के की रोटी और लस्सी नहीं है तो दावत बेकार है।  लेकिन हमारे लिए बिना चाय बढ़िया से बढ़िया पार्टी या प्रोग्राम निरर्थक है। उस दिन मित्र का ड्रामा देखते हुए सरदर्द शुरू हो गया। थिएटर की कैंटीन में चाय नहीं थी। हम ड्रामा बीच में ही छोड़ कर चले आये।
एक ज़माना था जब चाय से पहले सिगरेट और बाद में फिर एक सिगरेट। दिन में चार-पांच बार तो यह सिलसिला चलता ही था। अब सिगरेट तो छूट गयी, लेकिन चाय को अलविदा नहीं कहा। दिल ने कहा - जीने के लिए कुछ तो रखो यार। 
बचपन में मां सिर्फ सुबह और शाम आधा कप चाय देती थी। कहती थी गैस बनेगी, रंग काला पड़ जायेगा। चाय की लत तो हमें हाईस्कूल की परीक्षा से हुई। चाय देर रात तक पढ़ने के लिए जगाये रखती थी। पॉजिटिव एनर्जी भी मिलती थी। यूनिवर्सिटी पहुंचे तो आदत बन गयी। दिन में छह-सात चाय तो हो ही जाती थी।
छुट्टी के रोज़ बहुत बोरियत होती थी। चार दोस्त जमा हुए। चलो गुरमीत के घर एयरपोर्ट कॉलोनी। और कुछ गपशप भी हो जाएगी। साइकिल उठाई और चल दिए दस किलोमीटर दूर। उनकी माताश्री मसाले वाली चाय बनाती थीं। वाह मज़ा आ जाता था। हम लोग कहते थे - एक कप और मिलेगी? वो पूरे दिल से पिलाती भी थीं। कहती थीं - दो बार नहीं दस बार पियो। हम लोग शहर से इत्ती दूर बैठे हैं कि कोई आता ही नहीं यहां तो। तुम लोग आये हो तो ख़ुशी मिलती है।

यूनिवर्सिटी के दिनों में डिनर के बाद हम पांच मित्र कंबाइंड स्टडी के लिए एक मित्र के घर जमा होते थे। रात डेढ़-दो बज जाता था। विसर्जन से पूर्व अब्दुल्लाह टी स्टाल जाकर चाय ज़रूर सुड़कते थे। यह स्टाल हम जैसे निशाचरों के लिए ही रात भर चलता था। यों हम रेलवे स्टेशन के ठीक सामने कई साल तक रहे। चौबीस घंटे यहां चाय मिलती थी। नींद नहीं आई तो उठ कर चल दिए चाय सुड़कने। 
नौकरी के लिए परीक्षा देने हम सिर्फ एक चाय पीकर गए थे। परीक्षा शुरू होने में आधा घंटा शेष था। हमने एक ढाबे में कड़क चाय पी ली। पहली और सेकंड शिफ्ट में दो घंटे का गैप हुआ। उसी ढाबे पर बैठे-बैठे समोसे के साथ दो चाय पी लीं। दो दिन तक यह सिलसिला चला। पांच महीने के बाद चिठ्ठी आई कि उत्तीर्ण हो गए। इसका संपूर्ण श्रेय हम कड़क चाय को ही देते हैं। 
दफ़्तर में भी हमने विधिवत चाय पी भी और खूब पिलाई भी। 'ओवर ए कप ऑफ़ टी' हमने प्रशासन के हित में कई समस्याओं का निदान किया। हम भी खुश और कर्मचारी भी। 

Sunday, March 19, 2017

प्लेटफॉर्म टिकट प्लीज!

-वीर विनोद छाबड़ा
याद आते हैं वो दिन। लगभग २२ साल तक रहे लखनऊ के उत्तर रेलवे स्टेशन के सामने मल्टी स्टोरी बिल्डिंग में। इसमें उत्तर रेलवे के ही कर्मचारी रहते थे।
आइस-पाइस खेलते खेलते हम अक्सर स्टेशन पहुंच जाया करते थे। थोड़ी देर बाद खेलना भूल कर ए.एच.व्हीलर के बुकस्टाल पर खड़े हो जाते। राजा भैया, पराग, बालक, मनमोहन, चंदामामा आदि ढेर पत्रिकाएं उलटते-पलटते थे।
बरसों तक गहरा नाता रहा व्हीलर से और रेलवे प्लेटफॉर्म से। न कभी प्लेटफॉर्म खरीदा और न किसी ने मांगा। दरअसल सबको मालूम था कि हम रेल कर्मचारियों के बच्चे हैं और प्लेटफॉर्म हमारा प्लेग्राउंड है और कई तो मॉर्निंग वॉक भी करते थे। चार-पांच टीसी तो मल्टी स्टोरी में ही रहते थे।
बगल में था उत्तर-पूर्व रेलवे का लखनऊ जंकशन स्टेशन। यहां तैनात रेलवे का स्टाफ हमें नहीं था। लेकिन फिर भी घूमते-घामते चले ही जाते थे। यहां के टिकट चेकर थोड़े सख्त होते थे। कई बार धरे गए। बहुत मिन्नतें करके छूटे। एक बार तो बात इतनी बढ़ी थी कि हम नाबालिग बच्चों को बचाने के लिए नॉर्दन रेलवे के किसी बड़े अफसर का दखल दिलवाया गया। हम बच्चों ने कान पकडे कि यहां कभी नही जायेंगे टहलने। लेकिन बच्चे उस ज़माने के भी होशियार थे। जल्द ही हम लोगों ने वहां से बच निकलने छेद तलाश ही लिए थे।
जब बड़े हुए और नौकरी लगी तो बिना प्लेटफॉर्म टिकट के टहलना बंद कर दिया। रिस्क लेने से कोई फायदा नहीं। बदनामी होगी और अपनी नौकरी पर भी बन आ सकती है। यों हमारे एक मित्र भी थे अनिल द्विवेदी। पक्की यारी थी। पार्सल ऑफिस में थे। हम पहले चेक कर लेते कि वो ड्यूटी पर है। तभी बिना प्लेटफॉर्म टिकट एक नंबर से घुसते थे और पार्सल ऑफिस के रास्ते से बाहर निकलते थे। निकलते हुए अनिल की चाय पीना नहीं भूलते थे।
हम अपने मित्र प्रमोद जोशी के साथ भी रेलवे प्लेटफॉर्म पर कई बार टहले, लेकिन प्लेटफॉर्म टिकट लेकर। उस दौर में टिकट बहुत कम पैसे का था। दस पैसे के दौर से अब तक का दौर तो याद है।

Saturday, March 18, 2017

आज़ादी बाद पहली नव-यथार्थवादी फिल्म थी 'दो बीघा ज़मीन'

- वीर विनोद छाबड़ा
आज़ादी के बाद जो फिल्म राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रस्तुतिकरण के कारण चर्चा का विषय बनी थी वो 'दो बीघा ज़मीन' थी। कहते हैं बिमल रॉय को यह फिल्म बनाने के प्रेरणा वित्तोरियो की 'बाईसाइकिल थीफ' से मिली थी। बिमल दा चाहते थे कि फिल्म का शीर्षक कुछ ऐसा हो कि पूरी फिल्म का ख़ाका एकबारगी जहन में समा जाए। इसके लिए उनकी नज़र गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर की कविता के शीर्षक 'दुई बीघा ज़मीन' पर पड़ी। यह वो दौर था जब देश का चिंतन समाजवादी था। किसान को ज़मींदार से और शहर को पूंजीपति, बनिया और साहुकार से मुक्ति दिलानी थी। फिल्म इसी यथार्थ को उजागर करती है।
गांव के किसान शंभू (बलराज साहनी) का परिवार है- पत्नी (निरुपारॉय), बेटा कन्हैया (रतन)  और बीमार पिता गंगू (नाना पलसीकर)। एक क्रूर ज़मींदार हरनाम (मुराद) भी है। हरनाम मोटी कमाई के लिए गांव में फैक्ट्री लगाना चाहता है। ज़मीन के लिए उसकी निगाह शंभू की दो बीघा ज़मीन पर है। लेकिन शंभू मना कर देता है। तब हरनाम ने दांव चला। शंभू को पैंसठ रूपए के एक पुराने कर्ज़ में फंसा दिया। कर्ज़ चुकाओ या ज़मीन बेचो। दुर्भिक्ष के उस दौर में शंभू ने पत्नी के ज़ेवर बेचे और ज़रूरी रकम हरनाम के सामने रख दी। लेकिन घाघ ज़मींदार बताता है कि ब्याज सहित कुल रकम दो सौ चौंसठ रूपए है। कोर्ट से भी शंभू को राहत नहीं मिलती। तीन महीने में कर्ज चुकाओ या ज़मीन बेचो। शंभू बेटे कन्हैया के साथ पैसा कमाने कलकत्ता पहुंचता है। लेकिन यहां आकर शंभू को एक के बाद एक कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। लेकिन कुछ भले लोंगों के मदद से कन्हैया बूट-पालिश का काम शुरू करता है और शंभू हाथ रिक्शा चलाने का। इधर गांव में पारो को शंभू और कन्हैया की कोई सूचना ने होने से परेशान है। वो शहर जाती है। यहां उसको एक गुंडा बहकाने की कोशिश करता है। वो किसी तरह उसके चुंगल से छूट कर भागती है और एक कार से टकरा जाती है। शोर मचता है। पारो को जिस रिक्शे से अस्पताल ले जाया जाता है, वो शंभू का है। अस्पताल में पारो के ईलाज में शंभू की सारी पूंजी ख़त्म हो जाती है। इधर कन्हैया चोरी करता पकड़ा जाता है। इस बीच तीन महीने गुज़र चुके हैं। शंभू और पारो गांव जाते हैं। उनकी ज़मीन पर हरनाम फैक्ट्री का निर्माण शुरू कर चुका है। शंभू एक मुठ्ठी माटी लेना चाहता है लेकिन सुरक्षा कर्मी उसे ऐसा नहीं करने देता। निराश शंभू और पारो वहां से चल देते हैं। 

रिलीज़ होते ही फिल्म को ज़बरदस्त आलोचना का सामना करना पड़ा। नव-यथार्थवाद के नाम पर कूड़ा बना डाला। पूंजीवादी व्यवस्था इसे हज़म नहीं कर पाती है। समाजवाद अभी शैशवावस्था में है। लेकिन जब फिल्म को कांस और फिर कार्लोव वरी में आयोजित इंटरनेशनल मेलों में अवार्ड मिलते हैं तो सबकी आंखें खुलती हैं। इधर देश में पहली बार नेशनल अवार्ड घोषित होते हैं। उसमें 'दो बीघा ज़मीन' बेस्ट फिल्म का अवार्ड पाती है। इसी समय फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड भी स्थापित होते हैं। बेस्ट फिल्म 'दो बीघा ज़मीन' चुनी गयी और बेस्ट डायरेक्टर बिमल रॉय बने। बरसों बाद २००५ में इंडियाटाइम्स मूवीज़ ने २५ सर्वकालीन श्रेष्ठ फिल्मों के सूची जारी की तो उसमें भी 'दो बीघा ज़मीन' शामिल की गई।

Friday, March 17, 2017

ज्यादा फोकस - ज्यादा ज्ञान

-वीर विनोद छाबड़ा
सैकड़ों साल पहले की बात है। यूनान के जंगल में उस लड़के ने चुपचाप लकड़ियां काटीं। उन्हें इस इतना कायदे से बांधा कि चाहे कुछ भी हो जाए एक भी लकड़ी गिर नहीं सकती थी और न ही कोई निकाल सकता था। मजे की बात यह थी कि बांधने की कला भी बड़ी आकर्षक थी। वो प्रतिदिन ऐसा ही करता और लकड़ियों को बाज़ार में बेच देता। यही उसका रोजगार था।

एक दिन एक विद्वान की नज़र उस लड़के और बहुत करीने से बंधे लकड़ियों के गट्ठर पर पड़ी। वो उसे ऐसा करते कई रोज़ देखता रहा। एक दिन उस विद्वान व्यक्ति ने उस लड़के से कहा - क्या तुम इस लकड़ियों के गठ्ठर को दोबारा बांध सकते हो?
लड़के ने कहा क्यों नही? उसने लकड़ियों का गट्ठर खोला और दोबारा पहले से ज्यादा बेहतर तरीके से बांध कर दिखा दिया।
वो विद्वान हैरान हुआ। उसने ऐसा उससे तीन-चार बार कराया। और उस लड़के ने हर बार पहले से बेहतर तरीके से बांधा।
वो विद्वान इतना ज्यादा प्रभावित हुआ कि उसने उस लड़के के समक्ष एक प्रस्ताव रखा - तुम मेरे साथ चल कर रहो। बदले में मैं तुम्हें खाना दूंगा और अच्छी शिक्षा भी दिलाउंगा।
उस लड़के ने कहा - अगले दिन जवाब दूंगा। वो लड़का रात भर सोचता रहा कि उस आदमी के साथ जाने या न जाने से क्या नफ़ा-नुकसान हो सकता है।
अगले दिन वो विद्वान आया। लड़के ने उसके साथ चलने की इच्छा दिखाई। उस विद्वान ने लड़के के रहने का बहुत उत्तम प्रबंध किया। फिर शिक्षा का भी प्रबंध किया। वो विद्वान उसको स्वयं भी पढने लगा। उस विद्वान के घर में ढेर पुस्तकें भी थीं। उस लड़के का उनसे भी पर्याप्त ज्ञान अर्जन हुआ।
कई बरस बीत गए। वो लड़का अब एक खूबसूरत नौजवान बन चुका था। उसके द्वारा अर्जित ज्ञान की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। इस नौजवान का नाम था - पाईथागोरस, जो आगे चल कर यूनान का बहुत बड़ा दार्शनिक बना। हाई स्कूल तक पढ़ने वाला शायद ही कोई ऐसा किशोर रहा हो जिसने पाईथागोरस थियोरम का अध्धयन ने किया हो। और वो विद्वान, जिसने पाईथागोरस को पाल-पोस कर इस योग्य बनाया था, वो और कोई नहीं विख्यात ज्ञानी डेमोक्रीट्स था।
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हमारे एक शिक्षक हमें यह कथा बार-बार सुनाते थे। और शिक्षा देते कि पाईथागोरस की भांति स्वयं को पढाई के प्रति केंद्रित करो। ज़िंदगी का मक़सद ढेर ज्ञान अर्जन रखो। एक दिन ज़रूर बेहतर और कामयाब इंसान बनोगे।
शिक्षक महोदय बिलकुल दुरुस्त फरमाते थे। लेकिन हममें से ज्यादातर ने इस कान से सुन दूसरे कान से निकाल दिया। यह बात हमे बहुत बाद में पता चली, जब चिड़िया खेत चुग चुकी थीं। अब तो बचे-खुचे दाने बीनने की कोशिश कर रहे हैं।
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Thursday, March 16, 2017

लिफ़ाफ़ा मेज़बान को दीजिये

- वीर विनोद छाबड़ा
हमारे एक मित्र हैं। जब भी मिलने आते हैं तो कोई न कोई नेक सलाह ज़रूर दे कर जाते हैं।
आज अभी थोड़ी देर पहले रुख़सत हुए हैं। बता रहे थे - आजकल सहालग का सीज़न है। न्यौते खूब आ रहे हैं। कई लोगों के हाथ में बड़े बड़े आकर्षक पैक वाले गिफ्ट होते हैं। लेकिन ज्यादतर लोग नक़द देने में विश्वास रखते हैं और वो भी बंद लिफ़ाफ़े में। सस्ता पड़ता है। लिफ़ाफ़ा हमेशा ऊपर की जेब में रखना चाहिए। ताकि मेजबान को दिखाई दे जाये। उसे तसल्ली हो जाती है कि मेहमान खाली हाथ नहीं आया। मेज़बान के इर्द-गिर्द दो-तीन चक्कर भी लगा लो। रक़म भारी हो तो लिफ़ाफ़ा चिपका दो और मेज़बान के हाथ में रखो। स्टेज पर चढ़ कर दूल्हा-दुल्हन को देने की ज़रूरत नहीं। न जाने कौन पार कर दे।

फिर आजकल स्टेज भी बहुत ऊंची होती है। नकली स्टेज और नकली सीढ़ियां। गिरने का ख़तरा बहुत होता है। हमारा एक बार घुटना फूट चुका है। महीना भर अस्पताल में पड़े रहे। यह तो अच्छा हुआ कि यह हादसा लिफाफा देने के बाद स्टेज से उतरते समय हुआ।
एक बार लिफाफा हमने मेज़बान को देना चाहा तो उन्होंने जोर देकर कहा - अरे वर-वधु को दीजिये। और फोटो भी ज़रूर खिंचवाईवेगा।
वर-वधु को हज़ारों रुपया मिला। मगर वो पूरे बंटी और बबलू निकले। एक भी लिफ़ाफ़ा बाप को नहीं दिया। उलटे तर्क दिया - आपसे क्या मतलब? आशीर्वाद तो हमें मिला है।
और उन्होंने सारी रकम हनीमून में उड़ा डाली।
हमारे एक मित्र सलाह देते हैं अगर लिफ़ाफ़े में रक़म कम हो तो सीधे मेज़बान के हाथ में कभी न रखो। आजकल के मेज़बान भी चालाक होते हैं। लिफ़ाफ़ा हाथ में आया नहीं कि अंदाज़ा लगा लेते हैं कि एक सौ एक है या एक हज़ार एक। बेहतर है स्टेज पर चढ़ जाओ। लिफ़ाफ़ा वर-वधु को देते हुए फोटू खिंचवाओ। फिर एक फोटू पीछे खड़े होकर आशीर्वाद की मुद्रा में खिंचवाओ और संभल कर स्टेज से उतर लो। आजकल की पीढ़ी जल्दबाज़ होती है। पहले 'मैं' के चक्कर में धक्का न दे दे। कई लोग तो खाली लिफ़ाफ़ा पकड़ा कर फोटू खिंचवा लेते हैं। मेज़बान सोचता है कि निकाल ली होगी रक़म किसी ने।
कई लोग तो शर्ट की जेब में लिफ़ाफ़ा रखे रहते हैं और डिनर खा कर निकल लेते हैं। इसीलिये कई जगह पुरानी व्यवस्था लागू है। कोई मुनीम टाईप बंदा बैठा दिया जाता है। वो आपका नाम और रक़म नोट करता रहता है।

Wednesday, March 15, 2017

स्टंट फिल्मों के युग की अंतिम बड़ी हिट थी 'पारसमणी'

- वीर विनोद छाबड़ा
हिंदी फिल्मों का इतिहास स्टंट फिल्मों के ज़िक्र के बिना अधूरा है। वस्तुतः आज़ादी से पहले तक का युग स्टंट, पौराणिक और कॉस्ट्यूम फिल्मों का ही रहा है। उसके बाद इनका महत्व शनै: शनै: कम होता गया। लेकिन सन १९६३ में एक सी-ग्रेड फिल्म के गीत-संगीत, हैरतअंगेज जादुई स्टंट दृश्यों ने तहलका मचा दिया था।  इसकी ज़बरदस्त कामयाबी से लगा कि स्टंट फिल्मों का युग लौट आया है। हालांकि ऐसा हुआ नहीं। बल्कि यह इस युग की अंतिम बड़ी हिट साबित हुई। इसका नाम था - पारसमणी।
इसकी कहानी कुछ यों थी। एक राज्य के सेनापति (जुगल किशोर) का जहाज़ तूफ़ान में फंस कर डूब गया। सेनापति का बेटा पारस किसी तरह बच कर साहिल तक पंहुचा। एक गरीब ने उसे पाला पोसा। पारस (महिपाल) बड़ा होकर एक होनहार योद्धा और गायक बना। उसका दिल राज्य की राजकुमारी (गीतांजलि) पर आ गया। एक दिन उसने सम्राट (मनहर देसाई) के सामने गाने का मौका मिला। सम्राट बहुत खुश हुआ और इनाम मांगने के लिए कहा। पारस ने राजकुमारी का हाथ मांगा। क्रोधित होकर सम्राट ने पारस को क़ैद कर लिया। लेकिन वो वहां से भाग निकला। और सेना की ऐसी तैसी करते हुए सम्राट की पुंगी बजा दी। तब सम्राट ने राज़ खोला कि देश श्रापग्रस्त है। जिस दिन राजकुमारी का विवाह होगा वो देश और सम्राट का अंतिम दिन होगा। यदि पारस दूर मायानगरी से पारसमणी ला दे तो सब बच जायेंगे और तभी राजकुमारी से उसका विवाह संभव हो पायेगा। पारस उस मायानगरी तक पहुंचा। मार्ग में उसे अनेक दैत्याकार छिपकलियां, मेंढक, मकड़ियां, उबलते लावा के दरिया, दुर्गम दर्रे, खाईयां, पहाड़ियों का सामना किया। मगर वो सब पर फतह हासिल करता हुआ अपनी मंज़िल तक पहुंच ही गया। वहां डायनों से भी उसे भिड़ना पड़ा। खैर उसे पारसमणी मिल गयी और उसे लेकर वो वापस आ गया। राजकुमारी, सम्राट व देश सभी शापमुक्त हुए। राजकुमारी से उसका विवाह हो गया। पारस को उसका खोया पिता भी मिल गया। और दि  हैप्पी एंड।

रहस्य, रोमांच, लोमहर्षक स्टंट, जादुई करिश्मे, धांसू गीत-संगीत, नाच-गाना सब कुछ था इसमें। कमोबेश हर कॉन्स्टयूम आधारित स्टंट फिल्म की कहानी ऐसी ही होती थी। लेकिन इन सब तत्वों को एक सूत्र में कुशलता से पिरोने का काम सिर्फ़ डायरेक्टर बाबू भाई मिस्त्री ही कर सकते थे और वो एक अच्छे ट्रिक फोटोग्राफर भी थे।   
स्टंट फिल्मों को पसंद करने वाली क्लास में कामगार, ढाबों, साईकिल और ऑटो मरम्मत की दुकानों में काम करने वाले दिहाड़ी गरीब व अपढ़ ही शामिल होते थे। इनके दिल को यह सब बहुत भाता था। दिमाग पर कतई ज़ोर नहीं देना पड़ता था। इन्हें फूहड़ हास्य भी पसंद था। 'पारसमणी' ने उनकी इस ज़रूरत को उनकी असीम संतुष्टि की सीमा तक पूरा किया।