Monday, December 7, 2015

खोदा पहाड़, निकली चुहिया!

-वीर विनोद छाबड़ा
बंदे को साठा लगने को है। बिलकुल निरोग और चुस्त दुरुस्त। नो टेंशन। घरैतिन भी सलामत। अपनी अस्सी प्लस मां के सुझाये टोने-टुटकों और घरेलू नुस्खों पर अटूट विश्वास रखती है। बंदा सोशल प्राणी है। इतनी बड़ी दुनिया है। आये दिन कोई न कोई बीमार पड़ता है। बंदा घरैतिन सहित पहुंच जाता है, हाल-चाल जानने। पूरे तन और मन से। धन बैंक में रखता है। घर पर रखे तो चोरी का ख़तरा। पुलिस में रपट और फिर दुनिया को पता चल जाये। बुढ़ऊ धनाढ्य भी हैं।

बहरहाल बात हो रही है अस्पताल की। आजकल अस्पताल में भर्ती होना स्टेटस सिंबल है। अमीर लोग और जिनको बीमा कंपनी या सरकार से चिकित्सा व्यय की प्रतिपूर्ति होती है वो तो सर्दी-जुकाम लगने पर भी लोग भर्ती होते हैं। ऐसे में मिजाज़पुर्सी वालों की भीड़ जुटानी ज़रूरी है। भाड़े पर सब मिलता है। इसके भी इवेंट मैनेजर हैं न! बीमार को देखने जाइए। लंच, चाय-नाश्ता फ्री। चाय-नाश्ते में बंद-मक्खन, ब्रेड-पकौड़ा और समोसा। लंच में पूड़ी-कचौड़ी चाइनीज़ व साऊथ इंडियन। आइसक्रीम और कोल्डड्रिंक भी भरपूर।
एक दिन बंदे को तेज बुखार आया। घरैतिन के दहेज में आये सारे टोने-टुटके फेल कर गए। हिक़मत भी न चली। उसने बंदे को एक बड़े प्राइवेट अस्पताल में भर्ती करा दिया। सबको पता तो चले हम कोई ऐसे-वैसे न हैं। और फिर इसी बहाने घरैतिन को अपनी ब्याहता बहनों पर भी रुआब झाड़ना है।
जिसकी घरैतिन ढिंढोरची हो तो ख़बर का पल भर में वायरल होना लाज़मी ही है। हर जगह मोबाईल लगा दिया गया। चित्रण कुछ ऐसा किया कि आज नहीं तो कल तक  रवानगी तय समझो। स्वतः-स्फूर्त सारा मोहल्ला उमड़ आया। अंतिम बिदाई सा समां। महिलाएं दोपहर की रसोई निपटा कर बच्चों सहित आ धमकीं और दिन भर पंचायत करती रहीं। बच्चे चिकने फर्श पर स्किट करते किलकारियां भरते रहे। 
शाम के वक़्त दफतर से घर लौटते सहकर्मी आ जमे। ज्यादातर अंतिम दर्शन के मोड में हैं। अश्रुपूर्ण सांत्वना दे रहे हैं। ऊपर जाने के बाद किसने देखा कि नीचे कौन और कितनों ने छाती पीटी। बंदे का ठीक जूनियर भी आया। वो फूल-पत्ती भी लेकर आया था। बड़ा उदास दिखा। मगर बंदा जानता है कि वो अंदर से वो खुश है। उसे बड़ी उम्मीद है कि बंदे की अंतिम घड़ी है। उसका प्रमोशन बिलकुल पक्का।

Sunday, December 6, 2015

वो छह दिसंबर!

-वीर विनोद छाबड़ा
आज इतवार है। मुझे अच्छी तरह याद है कि उस ०६ दिसंबर १९९२ को भी इतवार था। इतवार होने के कारण दफ़्तर बंद था। मैं मार्किट के लिए तैयार हो रहा था कि पिताजी ने ब्रेकिंग न्यूज़ दी - बाबरी मस्जिद गिराई जा रही है।

दूरदर्शन पर बताया जा रहा था कि कुछ हिस्सा गिर चुका था और बाकी गिराया जा रहा है। रेडियो पर बीबीसी भी यही बता रहा था।
हम सन्न थे। शब्दहीन। शर्मसार भी। मगर मुझे उम्मीद थी कि अभी आर्म्ड फोर्सेज स्थिति पर काबू पा लेंगी।
मैं मार्किट के लिए निकल पड़ा।
रास्ते में सब शांति मिली। लेकिन तूफ़ान आने से पहले के अंदेशे जैसी। लगा आज सफ़र कुछ लंबा है।
मैं मार्किट  पहुंचा। मौजूदगी रोज़ाना जैसी नहीं थी। माइनॉरिटी का एक भी बंदा नहीं था। उनकी दुकानें भी बंद थीं। ज़ाहिर था सब ग़मगीन थे और भयभीत भी। बड़े भाई किस किस्म का सिला दे रहे हैं?
लोग चर्चा में व्यस्त थे। ज्यादातर लोग खुश थे और भविष्य में बीजेपी के देश में छा जाने कि भविष्यवाणी करते हुए पुलकित हो रहे थे। यक़ीनन मुझे कतई अच्छा नही लगा। चाहे वो मस्जिद है या मंदिर। मामला कोर्ट में है। किस बात की जल्दी है? ज़बरदस्ती क्यों? अगर भगवान राम वहीं पैदा हुए है और अगर भगवान वास्तव में हैं तो खुद सबूत देंगे। 
मुझे कतई अच्छा नहीं लगा। मैंने प्रतिवाद करना चाहा। लेकिन मुझे अपना कोई हमख्याल नहीं दिखा।
सहसा मुझे अनिल सिंह मिल गए। बोले - ऑफिस बुलाया गया था।
मैंने कहा - आज तो संडे है।
वो बोले - बॉस का सुबह सुबह फ़ोन आया था। कुछ और भी बुलाये थे। लेकिन माहौल गर्म देख कर सब वापस कर दिए गए।
अनिल सिंह क्रिश्चियन था। उससे मैंने अपनी भावनाएं ज़ाहिर की।
उसने कान में धीरे से कहा -  सब पगलाए हुए हैं। अब निकल लो। शहर में हालात अभी तक तो ठीक हैं। लेकिन कभी भी बिगड़ सकते हैं।
अनिल सिंह का घर रास्ते में था। मैंने उसे स्कूटर पर पीछे बैठाया और घर चल दिए।
निशातगंज शुरू होते ही उन्मादी भीड़ के जत्थे मिलने लगे। हाथ में थालियां और उसमें ढेर केसरिया रंग। हम मजबूरन ठीका लगवाते रहे। जान बचाना पहली प्राथमिकता थी। हमसे जबरिया बुलवाया भी जा रहा - जै श्रीराम। अनिल ने मुझे कस कर पकड़ा हुआ था। निशातगंज और आसपास अनेक मुस्लिम परिवार हैं। लेकिन शुक्र तो ये था कि प्रतिवाद के लिए दूसरा पक्ष बाहर नहीं निकला।
मैंने अनिल को उसके घर ड्राप किया। हालांकि हिंदू होने के नाते मुझे भीड़ से कोई ख़तरा नहीं था। लेकिन उन्मादी तत्वों का कोई भरोसा नहीं होता। मैं भीड़ से बचते हुए किसी तरह घर पहुंचा।
पिताजी टेलीफोन पर बिजी थे। शहर के पुराने इलाकों का जायज़ा ले रहे थे। अपने मुस्लिम दोस्तों का हौंसला बढ़ा रहे थे कि ख़तरा लगे तो मेरे घर आ जाओ। हिफाज़त की पूरी गारंटी है। ढाल बन कर खड़ा हो जाऊंगा। पीछे की लेन में रहने वाले फ़रीद भाई को तो उनके घर जाकर यही ऑफर दे आये।
रात हो चुकी थी इसके साथ डर और ख़तरा भी बढ़ चुका था। तभी एक मशाल जुलूस उन्मादी नारे लगाता घर के सामने से गुज़रा, जिसमे हमारे मोहल्ले के कई संभ्रांत शामिल थे। सब जाने पहचाने चेहरे। और तो और मेरा पड़ोसी भी दिखा उसमें।
जुलूस मेरे घर के सामने ठहर गया। पिताजी और मैं बाहर आये। पिताजी की नेमप्लेट उर्दू में थी। मैं भाग कर गया। एक चद्दर उठा लाया, नेम प्लेट पर डालने के लिए। पिताजी ने मेरा हाथ पकड़ लिया। वो मुक़ाबला करने के लिए तैयार थे । पिताजी मोहल्ले में जाने-माने आदमी थे। सब उनकी बेहद भी इज़्ज़त करते थे।

Saturday, December 5, 2015

जूता और हमारी समाजवादी विचारधारा।

-वीर विनोद छाबड़ा
होश संभालाते ही हमें एक खास ब्रांड का जूता पहनने की चाहत लग गई। लेकिन औक़ात से बाहर होने के कारण इच्छा दफ़न कर दी।
दिन गुज़रते गए।

वक़्त हमारी शादी तक आ पहुंचा। हमारे यहां एक रिवाज़ है। शादी के रोज़ दूल्हे के तन पर धारित नई पैंट-कमीज और पांव में जूते-मोज़े की कीमत की वसूली दुल्हन के मायके से की होती है। पलट कर दुल्हन वाले भी यही करते हैं। दुल्हन की शादी के जोड़े और सर से पांव तक की सज-धज पर आये खर्च का भुगतान  दूल्हा पक्ष देता है।
हमारे केस में भी दुल्हन पक्ष ने राजी-खुशी कह दिया कि जो पसंद हो खरीदो। न रकम की हदबंदी है और न औक़ात की। बस रसीद पक्की रसीद भिजवा देना। पाई-पाई चुका दी जायेगी। हमारी बाछें खिल उठीं। सोयी हुई पुरानी इच्छा कब्र फाड़ कर बाहर आ गयी। हमने सोचा अपनी पसंद का महंगा वाला जूता ख़रीदने का यही मौका है।
लेकिन सोशलिज़्म तो हमारे डीएनए में था। सो सोये ज़मीर ऐन वक़्त पर जागना ही था। उसने हमें बेतरह धिक्कारा। साथ-साथ चैलेंज भी किया - अबे, जिस जूते को खरीदने की औक़ात नहीं है तुम्हारी, उसका भार भावी दुल्हन के मायके पर क्यों डाल रहा है? ये कहां का इंसाफ है? सोच ज़रा, दुल्हन पर कितना ख़राब इंप्रेशन पड़ेगा? अगर तेज तर्रार निकली तो समझ लेना सुहागरात के दिन ही तेरा बड़ा ग़र्क़। जूते से ख़बर लेगी। 
हम डर गए।
वो बात दूसरी है कि दुल्हन पक्ष कोई समाजवादी विचारधारा से पीड़ित नहीं था। उन्होंने हमें जम कर चूना लगाया।
बहरहाल, हमने भीष्म प्रतिज्ञा की कि मनपसंद जूता तभी खरीदूंगा जब औक़ात होगी। अब तक हम पुराने जूतों को बार-बार मरम्मत करा के पहनते आये थे। जब मोची कह देता था कि अब इसमें कोई गुंजाईश नहीं तभी तिलांजलि देते थे। उस दिन भी यही हुआ - मोची ने जूता उठा कर फ़ेंक दिया। हमने चिरौरी की तो मान गया मगर इस शर्त पर कि कोई गारंटी नहीं। हमने कहा - ठीक है। हमें  कौन अपनी शादी में नाचना है। फिर जूता चुराने का भी रिवाज़ है। पुराना जूता देख सालियां चोरी भी नहीं करेंगी।
और वाक़ई ऐसा ही हुआ। सदियां गुज़र गयीं। किसी न किसी वज़ह से मनपसंद जूता खरीदने का प्रोग्राम टलता रहा। एक बार तो न खरीदने की वज़ह तो यह रही  कि हमारे तन पर पड़े कपड़ों की कुल क़ीमत जूतों से कम थी।
आख़िरकार वो दिनआया। हम रिटायर हो गए। दफ़्तर से काफ़ी पैसा मिला था। गर्म सूट के दिन थे। औक़ात बराबर दिख रही थी। पहुंच गए जूतों के ब्रांडेड शो रूम में - हां तो भाई, दिखा तो वो मनपसंद जूता जिसकी चाहत में हम साठ पार कर गए।

Friday, December 4, 2015

हम एक हैं।


- वीर विनोद छाबड़ा
कई साल पहले हमारे एरिया में किरयाने की एक ही दुकान होती थी। ठीक से नाम याद नहीं आ रहा। शायद शक़ील था उसका नाम। शक़ील प्रोविज़नल किराना स्टोर। फिर के एक और भाई की दुकान खुली। हिंदू भाई थे - बिंदू लाल प्रोविज़नल स्टोर।
कुछ साल बाद विकास के नाम पर बुलडोज़र चला। पूरी मार्किट ही ज़मींदोज़ हो गयी। शक़ील भाई की दुकान भी उसमें शामिल थे। दुखी होकर सड़क के उस पार चले गए शक़ील भाई।
लेकिन हम उन्हीं से सौदा लेते रहे। चौबीस घंटे हैवी ट्रैफ़िक दौड़ाता था उस सड़क पर। जब तब उसे पार करने का रिस्क उठाते रहे। शक़ील भाई और हमारा बरसों का साथ रहा है। कभी-कभार उधार भी चल जाता था।
बिंदू भाई थे हमारे घर से बहुत नज़दीक। सड़क पार करने का झंझट भी नहीं था। लेकिन नाप-तौल के मामले में उनकी उनकी रेपुटेशन ठीक नहीं थी। कई चतुर सम्राटों को भी कई दफ़े किलो में पचास-साठ ग्राम का चूना लगा चुके थे।
शक़ील भाई ठीक थे। पांच वक़्त के नमाज़ी। झूठ-फरेब से कोसों दूर। हम उन्हें सामान की लिस्ट पकड़ा देते। इत्मीनान से बाहर बेंच पर बैठते। अख़बार पढ़ते और शक़ील भाई की एक-आध सिगरेट भी धुआं-धुआं करते। आधा घंटा आराम से गुज़र जाता। इस बीच शक़ील भाई सारा सामान तौल कर थैले में भर देते। और हम बिल पेमेंट करके चल देते।
एक दिन क्या हुआ कि एक आईटम कम निकला। हम पहुंचे शक़ील भाई के पास शिक़ायत करने।
वो पसड़ गए कि उन्होंने रखा है। हमने कहा कि रखा होता तो थैले में होता। बात बढ़ती ही चली गयी।
उन्होंने हमें ही कठघरे में खड़ा कर दिया। आपकी गलती है कि थैले में सामान भरा जा रहा था तो क्यों नहीं देखा? मज़े से सिगरेट फूंक रहे थे। आसपास खड़े लोगों ने भी शक़ील भाई का साथ दिया आपको देखना चाहिए था।
हमने शक़ील भाई को नमाज़ी होने का हवाला दिया। लेकिन वो टस से मस नहीं हुए। हम शून्य पर आऊट बल्लेबाज़ की मानिंद चले आये।

Thursday, December 3, 2015

काका, सिर ते रुमाल रख ले।

- वीर विनोद छाबड़ा
ठीक ठीक याद नहीं। शायद १९७० रहा होगा। दिल्ली गए थे हम बस यूं ही टहलने। 
उन दिनों पंजाबी फ़िल्म 'नानक नाम जहाज़ है' चल रही थी। बड़ी स्टार कास्ट थी - पृथ्वी राज कपूर, निशी, सोमदत्त, विम्मी, आईएस जौहर आदि। रिकॉर्ड तोड़ बिज़नेस कर रही थी।

फिल्म के शौक़ीन तो हम थे ही। लेकिन पंजाबी फ़िल्में बहुत कम देखने को मिली थीं। लखनऊ में न जाने कब आये। हमारी भी उत्सुकता जगी। पन्द्रवां हफ़्ता रहा होगा। कश्मीरी गेट के पास था वो थिएटर - रिट्ज़। टिकट की लंबी लाईन। हमारा नंबर आने ही वाला था कि हाउसफुल।
हम स्पेयर टिकेट की तलाश में इधर-उधर देखने लगे। एक बुज़ुर्ग सरदारजी दिखे, फैमिली सहित। किसी को तलाश रहे थे। हम ताड़ गए कि इनके पास स्पेयर टिकट है। कोई सही बंदा तलाश रहे थे।
हम ग़लत नहीं थे। उनका बेटा नहीं पहुंच पाया था। हमने उनको पैसे देना चाहा तो बोले - ओए काका, अंदर ते चल ही रहे हां न। दे देना।
बहरहाल, हमने उनको सीट पर बैठते ही पैसे दे दिये। उन्होंने हमें आशीर्वाद दिया - ज्यूंदा रह। वडी उम्र हो तेरी।
थोड़ी देर में फिल्म शुरू हो गयी। दस मिनट गुज़रे न थे कि सरदार जी ने मेरी ओर देखा और पूछा  - काका, रुमाल है तेरे बोजे विच?
हमें आश्चर्य हुआ - हां, है।
उन्हें इत्मीनान हुआ - सिर ते रख ले।
हमने उनकी आज्ञा का पालन किया।
सरदारजी ने हमारी पीठ थपथपाई - चंगा पुत्तर।
हम सोच रहे थे कि हाल में तमाम लोग थे जिनके सिर पर कुछ नहीं था। हमीं को क्यों कहा?

Wednesday, December 2, 2015

लिफ़्ट प्लीज़, अपटू टाइम्स चौराहा।

- वीर विनोद छाबड़ा 
हम आमतौर पर देर से ऑफिस छोड़ते थे। यही कोई शाम साढ़े छह बजे। सर्दियों में तो इतने समय तक चिराग़ जल चुके होते थे।

रामप्यारे जी अक़्सर स्कूटर स्टैंड के गेट पर खड़े मिलते - लिफ़्ट प्लीज़। टाइम्स चौराहे तक।
हमें कोई ऐतराज़ न होता। रास्ते में ही तो था। फिर रामप्यारे हमारे सीनियर थे। हम सेक्शन ऑफ़िसर और वो डिप्टी सेक्रेटरी। लेकिन हमें हैरानी यह होती थी कि इनका घर तो टाइम्स से आगे है और वो भी हमारे रास्ते में है। यह टाइम्स पर ही क्यों ड्राप होते हैं? कभी यह क्यों नहीं कहा कि घर तक ड्राप कर दो। फिर ख्याल आता कि यार, शादी-शुदा आदमी है। हज़ार काम होते हैं। दूध-डबलरोटी-अंडा या बिरयानी कुछ भी लेना होता होगा। हमारी बलां से।
हम खुद को डांट देते - ज्यादा लंबा मत सोच और न ही दूसरे के फटे में हाथ डाल।
लेकिन एक दिन हमारा दिल न माना।
रामप्यारे जी ने लिफ़्ट मांगी - टाइम्स चौराहा।
लेकिन हमने रामप्यारे जी की एक न सुनी। वो टाइम्स पर रोको-रोको कहते रह गए। लेकिन हमने स्कूटर नहीं रोका। सीधा उनके घर के सामने रोक कर माने।
रामप्यारे जी स्कूटर से उतरे। चेहरे पर उदासी। थोड़ा गुस्सा भी। थैंक्यू-शैंक्यु भी नहीं बोले। एक खाली रिक्शे पर बैठ गए - चलो टाइम्स।
हम गहरी सोच में पड़ गए। ये क्या हो गया इस बंदे को? इनको घर पर छोड़ा और इसका यह अंजाम? भलाई का ज़माना ही नहीं रहा। होगा कुछ स्क्रू ढीला।
हमने अब तक जो हुआ उसे निकालने के लिए सर झटका। हेलमेट लगाया। सेल्फ लेकर स्कूटर स्टार्ट किया और निकल लिए।
दूसरे दिन सुबह-सुबह ही गेट पर ही रामप्यारे मिल गए। सीनियर होने के नाते हमने नमस्ते की। उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया और आगे निकल लिए।
हमने सोचा - हमसे कुछ न कुछ तो गड़बड़ हुई है।
तभी सियादुलारे दिख गए। हमारे अभिन्न मित्र। चलते-फिरते सूचना केंद्र। भंडार रहता था उनके पास सूचनाओं का। उस ज़माने के फ्री इंटरनेट। हमने उनको सारी राम कहानी कह सुनाई।
सियादुलारे ताली मार कर जोर से हंसे - तुम भी गज़ब करते हो। तुम्हें मालूम नहीं? टाईम्स चौराहे पर उनकी लल्लो खड़ी इंतज़ार करती होती है।
हमें याद आया। यह किस्सा कुछ सुना तो है। लेकिन हमें न मालूम था कि वो 'दूसरी मंज़िल' टाइम्स चौराहे पर मिलती है। अब हम तो भलमनसाहत में उन्हें असली वाली 'पहली मज़िल' पर ही तो छोड़े थे।

Tuesday, December 1, 2015

फ़िल्म देखो, टेंशन भगाओ।

- वीर विनोद छाबड़ा 
पहला दिन, पहला शो। यह भी एक जुनून था हमें। उस दिन शहर के तकरीबन सारे पिक्चरबाज़ एक जगह जमा होते थे। हमारी गिनती भी इसे जमात में होने लगी। लेकिन कुछ दिनों बाद हम इस जमात से बाहर हो गए।
भीड़-भाड़ और धक्कम-धक्का में फ़िल्म देखना हमारे बस में नहीं था। कभी चश्मा टूट जाता तो कभी कपड़े फट जाते। हां, शुरुआत के तीन-चार में फ़िल्म देखना धर्म होता था।
एक दिन में दो-तीन फ़िल्में देखना भी एक उपलब्धि मानी जाती थी। हमने भी एक-दो बार एक दिन में दो फ़िल्में लगातार देखीं। एक बार का तो हमें याद है। नून शो में पृथ्वीराज कपूर-दारा सिंह की 'लुटेरा' निशात में फर्स्ट डे फर्स्ट शो और इवनिंग शो में राजकुमार-मीना कुमारी-धर्मेंद्र की 'काजल' बसंत में फर्स्ट डे। सरदर्द हो गया।
एक बार तो गज़ब ही हो गया। हमने नून शो और फिर मैटनी लगातार दो फ़िल्में देखी। घर आये। थोड़ा हैंगओवर था। बिस्तर पर लेट गए। पिताजी के एक मित्र आ गए। प्रोग्राम बना कि राजिंदर सिंह बेदी की दस्तक देखी जाये। उसमें हमें भी शामिल कर लिया गया। क्रेज़ इतना था कि हम हैंगओवर भूल गए। इस तरह हमने एक दिन में तीन फ़िल्में देख लीं। लेकिन भुगत गए। सुबह तक सर पकड़े रहे। न लेट पाये और न ही बैठ पाये। इसके बाद ऐसी हरकत नहीं की। एक दिन में एक शो पर सीमित कर लिया। 
यह भी उसी दौर की बात है कि २८ दिन वाली फरवरी में हमने ३२ फ़िल्में देखने का अपना एक रिकॉर्ड क़ायम किया। लेकिन हम तो एक छोटे से प्यादे किस्म के पिक्चरबाज़ थे। एक से बढ़ कर एक धुरंधर हुआ करते थे जिनकी ज़िंदगी ही सिनेमाहाल और पिक्चर हुआ करती थी। उठते-बैठते खाते-पीते और सोते-जागते पिक्चर और सिर्फ़ पिक्चर।
हमारे क्रेज़ की हद तो यह थी कि अगले दिन एम.ए. का  वायवा टेस्ट था। मिश्राजी आ गए। 'एक मुट्ठी आसमान' की बड़ी चर्चा थी। नाईट शो फ़िल्म देखने निकल लिये। दिमाग फ्रेश हो गया। उसके बाद रात भर पढ़ते और औंघाते रहे, चाय पर चाय के साथ। अगले दिन टेस्ट दिया। १०० में ६२ नंबर मिले। फल गया फ़िल्म देखना।